Monday, August 29, 2016

हम बूढे लोगों की एक ही नियति है

आज सुबह जरा जल्ली निकले। जल्ली मतलब आठ के पहले- जब रोज निकल लेना चाहिये कायदे से। असल में हम रोज यह सोचकर कर चलते हैं गोया पूरी सड़क हमारे लिये ही बनाई गयी है। बाकी सब फ़ालतू हैं में आ जाते हैं। फ़िर जब क्रासिंग मिलती है, टेम्पो , रिक्शा आगे आता है तो यार ये कहां से आ गये। जानवर तो खैर सड़क पर रहेंगे ही, आदमी रहे न रहे।
निकलते ही जेब में धरा मोबाइल का न जाने कौन हिस्सा दब गया कि नंदन जी की कविता बजने लगी:

"सुनो,
अब जब भी कहीं
कोई झील डबडबाती है
मुझे तुम्हारी आंख में ठिठके हुये
बेचैन समन्दर की याद आती है।"

नंदन जी समन्दर किनारे काफ़ी दिन रहे इसलिये उनकी कविताओं में समन्दर जब मन आता है टहलता चला आता है। एक किस्सा विश्वास टूटने का :

'खारे पन का एहसास मुझे था पहले से
पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया,
कल मेरा एक संमंदर गहरा-गहरा सा
मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।'

सपने और यथार्थ के अंतर का एक बिंब है:
'आंखों में रंगीन नजारे
सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है
जैसे बालू बीच खड़े।'

इसको याद करते ही हम सड़क पर आ गये। आर्मापुर मोड़ पर एक टेम्पो वाला कान पर हाथ धरे कव्वालों वाले अंदाज में बैठा था। ध्यान से देखा तो मोबाइल पर किसी से बतिया रहा था। छुटके मोबाइल पर।

आगे फ़ैक्ट्री के बाहर गेट मीटिंग हो रही थी। कर्मचारी लोग तमाम विसंगतियों के बारे में अपने प्रतिनिधि का भाषण सुन रहे थे। संगठित क्षेत्र के लोग अपनी मांगों के समर्थन में धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं। कर रहे थे।

वहीं बगल में भीख मांगती महिला सड़क पर फ़सक्का मारे बैठी थी। उसका पति रिक्शा चलाता है । जीवन उसका भीख पर निर्भर नहीं है। इसलिये उसके मांगने में दैन्य नहीं है। सामने धरा है कटोरा। जिसकी गरज हो, जिसको अपना परलोक सुधारना हो वो चुपचाप कटोरे में डाल के जाये पैसा। उसके नंगधड़ंग बच्चे वहीं खेल रहे थे। एक छुटका बच्चा फ़टी बनियाइन पहने अपना पिछवाड़ा सड़क पर आते-जातों को दिखाता मजे से अपनी बहन के साथ खड़ा था। उसका सीना सड़क किनारे की फ़ुटपाथ की ऊंचाई के बराबर देखकर लगा मानों कोई जहाज का कप्तान जहाज की रेलिंग पर सीना टिकाये समन्दर निहार रहा है।
इस्स एक बार फ़िर आ गया समंदर। फ़िर एक शेर और हो जाये इसी बात पर समंदर पर। कृष्णबिहारी नूर साहब फ़र्माते हैं:

'मैं कतरा सही मेरा वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।'

अस्तित्व की अहमियत भले ही कोई कितना छोटा न हो हमेशा से होती आई है। पहले भी कहा जाता है बूंद के होने न होने से समुद्र की विशालता में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा लेकिन समुद्र में मिलने बूंद का बूंदपन खतम हो जायेगा:

"जैईहै बनि बिगरि न वारिधिता वारिधि की,
बूंदता बिलैहै बूंद विवश बिचारी की।"

आगे झगड़ेश्वर बाबा मंदिर के सामने नल से पानी झन्नाटेदार धार से आ रहा था। लोग अपने प्लास्टिक के डब्बों में बाल्टियों में पानी भरते जा रहे थे। वहीं एक बुजुर्ग आदमी लगभग गले केले बेंचने के लिये ठेलिया पर लगाये खड़ा था। जिस आत्मीयता से निहार रहा था वह केलों को उससे लग रहा था कि वह केलों से कह रहा होगा - ’हम बूढे लोगों की एक ही नियति है। कोई हमको पूछता नहीं है।’

वहीं रिक्शे पर वजनी पाइप ले जाते मजूर अपनी कमर की रस्सी रिक्शे बांधे चले हईस्सा करते चले जा रहे थे। कुछ लोग पेड़ के नीचे रुककर उन पाइपों के ऊपर ही बैठे सुस्ता रहे थे।

आज जरीबचौकी की क्रासिंग मेरे स्वागत में दोनों बाहें फ़ैलाये खोले मिली। हम सर्र से निकल गये । समय था तो सोचा आज पंकज बाजपेयी से बतियायेंगे तसल्ली से। लेकिन वे आज दिखे नहीं ठीहे पर। उनका झोला झंडा वहीं डिवाइडर पर धरा था। बिना पंकज जी के झोला ऐसा लग रहा था मानो किसी ट्यूब से हवा निकाल दी गयी हो और गुड़ी-मुड़ी करके वहीं धर दिया गया हो। कल भी नहीं दिखे थे। लगता आने में देर कर दिये या कहीं निकल लिये।

बगल में नल में पानी के इंतजार में पचीसों प्लास्टिक के डब्बे लाइन में खड़े थे। अलग-अलग कंपनियों के डब्बे खाली होने के बाद एक ही जगह इकट्ठा हुये देखकर लगा अलग-अलग धर्मों के इन्सान अपनी दुनियादारी खतम करके एक ही तरह से ऐसे ही विदा होते होंगे।

इसके बाद फ़ुर्ती से गाड़ी भगाते हुये आये और फ़ैक्ट्री में समय के पहले जमा हो गये। जब आज जमा हुये तब कल निकले थे घर से। 
अब बकिया फ़िर। आप मजे से रहिये। अपना ख्याल रखियेगा और थोड़ा सा हमारा भी

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