Monday, January 30, 2017

बजट देश का बनाम घर का



बजट माने आमदनी और खर्चे का हिसाब-किताब। आज वैसे तो सब कुछ बाजार तय करता है। लेकिन देश का बजट सरकार बनाती है। बजट बनाने का काम बातें बनाने से ज्यादा जिम्मेदारी का होता है। बातें बनाने में जो सबसे होशियार होता है उसको यह काम सौंपा जाता है। बढिया कपड़े पहने, ब्रीफ़केस थामे वित्त मंत्री संसद में पहुंचकर बजट पेश कर देता है। थोड़ी देर तक लोग सुनते हैं। मेजें थपथपाते हैं। फ़िर ऊंघने लगते हैं। टीवी पर बजट देखते लोग चैनल बदलकर चाय पीने लगते हैं।

अक्सर वित्त मंत्री बजट पेश करते हुये एकाध शेर सुना देते हैं। बजट के दरम्यान शेर सुनाने का मकसद यह जाहिर करना होता है कि बजट को लेकर ज्यादा सीरियस होने की जरूरत नहीं है। शेरो शायरी की तरह ही इसे मन बहलाव के रूप में लिया जाये। पैसे पर किसी का जोर नहीं है। अपनी मर्जी से आता-जाता है। शेरो शायरी भी आमतौर पर गुजरे हुये शायरों/कवियों की होती है। वित्तमंत्री को भी खटका लगा रहता है कि हालिया शायर का कलाम पेश किया तो कहीं रायल्टी या फ़िर राज्यसभा की सीट न मांगने लगे शायर कि गजल पूरी सुनायेगा।

कुछ लोगों का कहना है कि बजट के समय शेरो-शायरी की बजाय चुटकुले सुनाये जाने चाहिये। चुटकुले आसानी से समझ आ जाते हैं। इस बारे में जब हमने एक भूतपूर्व वित्त मंत्री की राय मांगी तो नाम न बताने की शर्त के साथ उन्होंने खुलासा किया- ’बजट अपने आप में एक बड़ा चुटकुला होता है। ऐसे में और चिल्लर चुटकुले सुनाना राजा भोज और गंगू तेली जैसी बात हो जायेगी।’

बजट को चुटकुला कहने वाली बात पर हमने मंत्री की कड़ी निन्दा कर दी। कहा- ’ऐसा कहना देशद्रोह है।’ इस पर वे हंसने लगे। उनको देखकर हमें भी हंसने के लिये मजबूर होना पड़ा। मजबूरी जो न कराये।

बजट पेश होने के बाद उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की रस्म निभाई जाती है। सरकार के सहयोगी बजट को अच्छा, प्रगतिशील और सकारात्मक बताते हैं। विरोधी इसको खराब, विकास विरोधी और नकारात्मक बताते हैं। प्रतिक्रिया देने का यह अभ्यास इतना सटीक होता है कि लोग सोते से जागकर बिना बजट भाषण सुने उस पर अपनी राय जाहिर कर सकते है। कोई राजनेता किस दल का है इसकी पहचान बजट पर उसकी राय से की जा सकती है बशर्ते उसने राय देने के तुरंत पहले दलबदल न किया हो।
बजट पेश होने के बाद टेलिविजन वाले उसकी समीक्षा करते हैं। टेलिविजन वाले अर्थशास्त्रियों को पकड़कर चैनल पर बजट चर्चा करते हैं। अर्थशास्त्री का चुनाव करने समय चैनल वाले शायद यह देखते होंगे कि बंदा इंटर में अर्थशास्त्र में फ़ेल तो नहीं हुआ था। इसके अलावा यह कि वह इकोनामी में हालिया फ़ैशन वाले जुमले जैसे कि फ़िस्कल, डिपाजिट, ग्रोथ, डिप्रेसियेशन, अप्रेशियेशन, डिनोमिनेशन बिना अटके बोल पाता है कि नहीं। इस बार जिन लोगों के चुनाव हुये उनके नोटबंदी पर बयान भी नोट किये जा रहे हैं।
एक अर्थशास्त्री ने तो साफ़ कह दिया -’मैं तो डिनोमिनेशन की जगह नोटबंदी ही बोलूंगा। इसकी अंग्रेजी बोलने में दस में ग्यारह बार जबान अटकती है।’
कुछ चैनल सड़क चलते, बस पकड़ते, सब्जी खरीदते, दाल छौकते, अंडा उबालते , चाय छानते लोगों के मुंह के आगे कैमरा अड़ाकर बजट के बारे में बयान उगलवा लेते हैं। लोग भी अदबदाकर बवाल काटने की गरज से कुछ भी बोल देते हैं। आम तौर पर लोगों का ’बजट बयान’ विशेषज्ञों के मुकाबले बेहतर समझ में आने वाला होता है।
बजट बनाने के लिये जो टीम चुनी जाती है उसे हफ़्तों सबसे अलग रखा जाता है। बजट लीक न हो इसका ख्याल रखने के लिये उनको घर-परिवार से काट दिया जाता है। बाहरी दुनिया से एहतियातन उनका संपर्क कट जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि उनको बनाये बजट के चलते हुये देशवासियों की हुई तकलीफ़ के बदले एडवांस में ’बजट इमारत’ में सजा-ए-तन्हाई दी जाती है। लीक होने की बात पर लोगों का कहना होता है कि जिनके इशारे पर बनता है उनको बजट लीक की क्या जरूरत। कहीं कुछ मनमाफ़िक न हुआ तो बाद में बदलवा लेते हैं लोग।
बजट के दौरान तमाम तरह की योजनायें अपने साथ होने वाले सलूक की कल्पना करती हुई सहमी सी पड़ी रहती हैं। उनके हाल मंदी के समय शुक्रवार को ’पिंक स्लिप’ मिलने की आशंका में दिन बताने वाले कामगार सरीखे हो जाते हैं। गये साल मलाईदार मानी जानी वाली योजना की धुकपुकी इस बजट में खटाईदार बन जाने की आशंका से बढी रहती है। शिक्षा बजट, स्वास्थ्य बजट गरीबों की पेट की तरह सिकुड़ने के लिये अपने को तैयार करने लगते हैं। किसानों के कर्ज माफ़ी वाला बजट पूरी गर्मी बीत जाने पर बादल की उमड़-घुमड़ से थोड़ा उत्साहित दीखता है।
मध्यवर्ग की रुचि इनकम टैक्स में छूट में सबसे ज्यादा रहती है। सरकारी कर्मचारी का एकसाइज/सेल्सटैक्स में बदलाव न देखकर खुश हो जाता है कि फ़ाइलों में बदलाव का बवाल बचा। अखबारों में बजट के विवरण समझ में न आने वाले अंदाज में हफ़्तों छापे जाते हैं। परस्पर विरोधी विद्वानों की राय छापी जाती हैं। क्या मंहगा हुआ , क्या सस्ता यह बताया जाता है। सस्ते के लिये धड़ाम, मंहगे के लिये आसमान लिखा जाता है। जिन अखबारों के संवाददाता बजट की बातें नोट करने में चूक जाते हैं वे वित्त मंत्री की ड्रेस पर ध्यान केंद्रित करके उसका सौंदर्य वर्णन करते हुये ’बजट रिपोर्ट’ बना देते हैं।
घर का बजट का सीन भी इससे अलग नहीं होता। पैसे होने पर सबके हर अरमान पूरे होते हैं। तंगी होने पर आगे से संभलकर खर्च करने के कभी न अमल में लाये जाने वाले प्रण लिये जाते हैं। जिसके खर्च में कटौती होती है वही नेता विरोधी दल बन जाता है। बजट को विकासविरोधी बताता है। थोड़ी सी मांग पूरी हो जाने पर खुश हो जाता है। समर्थक दल में वापस आ जाता है।
सरकार और घरेलू लोगों के अलावा एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसको बजट नाम की चिडिया का ’ब’ तक नहीं पता। बजट में जिन नौकरियां, घर, सुविधाओं की घोषणा होती हैं वे उन तक पहुंचने की बात तो छोड़ दीजिये उनकी खबर तक उन तक नहीं पहुंचती। उनको पता ही नहीं चलता कि सरकार उनके भले के लिये करोड़ों, अरबों, खरबों खर्च का पयाना बांधे हुये है। बजट की कोई हलचल उन तक नहीं पहुंचती। बजट चाहे 28 फ़रवरी को पेश हो जाहे 1 फ़रवरी को उनको इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। रोज की रोजी-रोटी जुगाड़ना और अगले दिन का सूरज देखने की चुनौती ही से जूझते हुये ऐसे लोगों के लिये ’बजट पर बातें’ करना विलासिता की बातें हैं।
आबादी के लिहाज से देश के इस सबके बड़े तबके की चिन्ता भाषणों के अलावा कहीं होती नहीं, घर इनके पास है नहीं ऐसे में इनके बजट की बात क्या की जाये। सालों से बजट उनके लिये एक तमाशा है :
तमाशा है 
जो ज्यों का त्यों चल रहा है
अलबत दिखाने के लिये
कहीं-कहीं सूरते बदल रहा है।
खैर उनकी बात छोडिये। उनका तो हमेशा से ऐसे ही चलता आया है। आगे भी चलेगा। देश का बजट वित्तमंत्री जी देख लेंगे। आप बताइये आपका बजट कैसा होगा?

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