Thursday, January 19, 2017

सड़क पर जिन्दगी



कल दोपहर सड़क पर धूप में टहलते हुये जिन्दगी से रूबरू हुये। लोगों से गपियाये, बतियाये। फ़ोटो खैंचे। सबकी कमेंट्री फ़ोटो के साथ है। देखिये साथ लगी फ़ोटो।
सबसे पहली फ़ोटो खैंची दो बुजुर्ग महिलाओं की। वे धूप में बैठी बतिया रही थीं जैसे कभी अम्मा दोपहर में धूप तापते हुये आराम करती थीं।
संयोग कि शुरुआती कई फ़ोटो बुजुर्गों के ही आये। लगा कि फ़ोटो थीम ’सड़क पर मार्गदर्शक लोग’ रखा जाये। लेकिन फ़िर युवा लोग भी दिखे। जिन्दगी धड़कती हुई दिखी। धड़कती हुयी एकदम -धड़धड़ाती हुई।
जितनी फ़ोटो खैंच पाये उससे ज्यादा खैंच नहीं पाये।
एक बुजुर्ग महिला , जिसकी उमर 70 के करीब होगी, एक युवा से लड़के को सड़क पार करा रही थी। बुढिया हांफ़ रही थी , बच्चे को सड़क पार करा रही थी। बच्चा शायद मानसिक दिव्यांग था। बुजुर्ग महिला बच्चे का हाथ थामे हुये अपने साथ , हाफ़ते हुये , ले जा रही थी। बुढिया का सहारा बन सकने की उमर में बच्चा खुद के लिये सहारे का मोहताज था।
झकरकटी पुल के ऊपर से देखा एक बच्चा सड़क पर साइकिल चला रहा था। अचानक हैंडल मुड़ गया। बच्चा सड़क पर गिर गया। बच्चे ने पीछे देखा। कोई दिखा नहीं जिसके मत्थे अपने गिरने का आरोप लगा सके। साइकिल उठाकर वह फ़िर घुटने सहलाते हुये पैडलियाते हुये चला गया।
एक बस पर कुछ लोग साइकिलें लाद रहे थे। बस गोला जा रही थी। फ़ोटो खैंचते तो बढिया आता। लेकिन तब तक बैटरी खल्लास हो चुकी थी।
एक जगह हमको फ़ोटो खैंचते देख एक लड़के ने कुछ पूछा तो हमने बताया ऐसे ही खींच रहे हैं फ़ोटो। तुम्हारी भी खींच लें?
वो बोला - "हम क्या सलमान खान हैं जो हमारी खैंचोगे। आज वो भी अंदर हो जायेगा।"
हमने कहा -"वो तो छूट गया।"
उसने कहा-" उसके पास बहुत पैसा है। खूब पैसा पेल देगा। निकल आयेगा बाहर। पैसा अंदर-हीरो बाहर।"
एक लड़की अपनी सहेली को साइकिल के कैरियर पर बिठाये चली जा रही थी। साइकिल धीमी हुई। साइकिल चलाती हुई लड़की ने उचककर जोर से हईस्सा वाला पैडल मारा। साइकिल चल दी। पीछे बैठी बच्ची पैर सड़क से दो इंच उपर उठाये बत्तख के पंखो से हिलाती चलती जाती दिख रही थी।
एक रिक्शावाला रिक्शा चलाता जा रहा था। उसका शायद एक पैर खराब था। वह एक पैर से पैडल को धक्का लगाता। दूसरा पैर सीधा रखते हुये पैड़ल के नीचे आने का इंतजार करता। जब आ जाता तब उसको धक्का लगाते हुये आगे चलता।
एक जगह एक बच्ची खुले में ईंटों की आड़ में पीठ के सहारे छिपी हुई थी। शायद छुपन-छुपाई /आइस-पाइस खेल रही थी। मजे की बात वह खुले में छिपी थी। उसको खोजने वाला अंदर अंधेरे में था कहीं। उसको खुले में छिपते देखकर हमें लगा कि हम दुनिया में बहुत कुछ ऐसा यह सोचकर करते हैं कि हमको कोई देख नहीं रहा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। हमको तमाम लोग देख रहे होते हैं। भले ही हमको दिखता नहीं हो।
बच्ची को सड़क पर छुपन-छुपा देखते हुये यह भी लगा कि हममें से तमाम लोग बड़े होकर बचपन के खेलों को याद करते हुये सोचते हैं कि अब बच्चे उन खेलों को खेलते नहीं हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दुनिया में कोई भी खेल कभी खतम नहीं होता। वे किसी न किसी रूप में अस्तित्व में बने रहते हैं। बस उनके खेलने वाले बदल जाते हैं।
देखिये अब फ़ोटो इत्मिनान से। जिसका उन्वान मने शीर्षक है ’सड़क पर जिन्दगी।’
कैसा लगा बताइयेगा।

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