Thursday, January 05, 2017

जो भरा नहीं है भावों से


आजकल कोहरे का जलवा है। चप्पे-चप्पे पर कब्जा किये रहता है। सड़क पर जाते हर राहगीर को ऐसे घेर लेता है जैसे वीआईपी लोगों को सुरक्षा सिपाही घेरे रहते हैं।
कल घर से दफ़्तर जाने के लिये निकले तो एक महिला सड़क पर जाती दिखी। कोहरे की नदी में हाथ चप्पू की तरह चलाते हुये तेजी से चली जा रही थी महिला। दोनों हाथों से कोहरे को पीछे ठकेलती हुई आगे बढ रही थी। जित्ता कोहरा पीछे ढकेल देती उत्ता कोहरा खाली जगह पर कब्जा करने के लिये लपकता। महिला फ़िर कोहरा ठकेलकर आगे बढती जाती।
आगे बढने की लिये रास्तें में वाली तमाम चीजों को पीछे ठकेलना पड़ना है।
सामने से स्कूटर आता दिखता है। स्कूटर की हेडलाइट की अंधेरे में लाइटहाउस की रोशनी की तरह चमक रही थी।
रास्ते में जगह लोग कूड़ा-करकट जलाते हुये उकडू बैठे अलाव ताप रहे थे।
पंकज बाजपेयी जी अपने मोर्चे पर खड़े हुये थे। सर्दी को गार्ड ऑफ़ आनर सरीखा देने के लिये अपनी जगह पर चुस्तैद। जाड़े के कारण कम बोलते हैं। पिछले दिनों उनके कहे कुछ वाक्य :
*कोहली को पकड़वाइये। वह बच्चा उठाने आता है।
*आपका डुप्लीकेट बनकर कोहली गलत काम करता है। पुलिस में उसका *एफ़आईआर कराइये।
*कल हमारे यहां डकैती डालने आये थे लोग। सब सामान लूटने की कोशिश की।
*जाडा बहुत है।
चाय पी चुके होते हैं अक्सर मेरे उनके पास से निकलते समय। डिवाइडर पर खड़े होते हैं । निकलते समय उनसे एकाध वाक्य में बात होती है। जब कभी घर से निकलने में देरी होती है तो बीच सड़क से ही हार्न बजाकर उनका ध्यान अपनी तरफ़ खींचकर ’मौन नमस्कार’ हो जाता है।
पता नहीं पंकज बाजपेयी जी को पता है कि नहीं कि उत्तर प्रदेश में चुनाव घोषित हो चुके हैं। नोटबंदी पर भी उन्होंने कोई बयान जारी नहीं किया अब तक। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया एकदम अलग ही दुनिया है शायद।
आजकल शाम को आर्मापुर बाजार में सब्जी लेने जाते हैं तो सब्जी बाजार के बाहर एक व्यक्ति बैठा दिखता है। एक खराब है शायद। खूब गुस्से में कुछ न कुछ बोलता रहता है। आते-जाते सुनते हैं। बोलचाल का अंदाज शायराना है। कल एक कुत्ते को डांटते हुये कह रहे थे:
"तू कुत्ता है। तुझे सिर्फ़ सूंघना आता है।सूंधने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता तू। सूंघ तू सूंघ। सड़ी-गली चीजों को सूंघ।"
शायद अपने भाई से कुछ नाराजगी है उनकी। भाई का नाम लेकर गुस्साते रहते हैं। एक दिन कहते हुये सुना:
"मैं किसी से भी बात कर सकता हूं लेकिन तेरे से बात नहीं कर सकता। तू मेरा भाई है लेकिन बात करने लायक नहीं है। बात करने के लिये आदमीं कुछ अच्छाइयां होनी चाहिये। कुछ भाव होने चाहिये:
जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"
बचपन में यह कविता पंक्ति देशप्रेम निबंध में लिखते थे अपन। सुनकर लगा कि यह आदमी देशप्रेमी है। पागल नहीं है। वैसे भी देशप्रेम की आड़ में लोग तमाम तरह की पागलपन की बात करते रहते हैं। भारतमाता की जय बोलकर बड़े-बड़े समाज विरोधी काम अंजाम करते रहते हैं। हम उनका कुछ कर नहीं पाते। हम भी वन्देमातरम कहते हुये विनम्र भाव से उनकी हरकतों को देखते रहते हैं। यह सब सोचते हुये मुझे यह आदमी बड़ा भला टाइप लगने लगता है।
कल शाम को दफ़्तर से लौटते समय एक जूस की दुकन से जूस लेने के लिये रुके। चार बच्चे वहां अलाव ताप रहे थे। चार में से तीन बच्चे उसी जूस की दुकान पर काम करते हैं। चौथा बच्चा पास के ’गुरु चश्मे’ की दुकान पर काम करता है। मैंने कहा कि यार तुम्हारी दुकान सड़क से तो दिखती नहीं। चलती कैसी है?
वह बोला- ’लोग जानते हैं दुकान के बारे में। सामने ट्रान्सफ़ार्मर लग गया है लेकिन 24 साल पुरानी दुकान है। लोग आते हैं चश्मा बनवाने।’
तब तक बच्चे का जूस का ग्लास आ गया। वह पीने लगा। हम भी अपना जूस लेकर चले आयेे। आने के पहले जो फ़ोटो खैंचे थे उनको दिखाये। उन्होंने जिस फ़ोटो को सबसे अच्छा बताया था उसको लगा रहे हैं। यह भी सोच रहे हैं कि अपने सहज बचपन को स्थगित करते हुये ये बच्चे रात तक दुकानों में काम करते हुये जीने को अभिशप्त हैं।
सुबह आज भी कोहरे भरी है। लेकिन आज छुट्टी है सो टीवी देखते हुये स्टेटसिया रहे हैं। टीवी पर ’बेबी को बेस पसंदा है’ गाने की पैरोडी पर ’ सबको तो कैशलेस पसंद है’ बज रही है।
आपको क्या पसंद है आप जानो। अपन को तो जाड़े में चाय पसंद है। आ भी रही है बनकर फ़िर से। तब तक इसको अपलोड कर देते हैं। 

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