Wednesday, January 18, 2017

मोबाइल चौपाल

एक घर में कई मोबाइल रहते थे। तरह-तरह के। कोई पुराने माडल का। कोई एकदम नया। घर के अलग-अलग सदस्यों के साथ रहते-रहते मोबाइल की दिनचर्या भी उनके मालिकों के हिसाब से ढल गयी थी। कोई जेब में रहने का आदी था तो कोई पर्स में। किसी को तकिये के नीचे सुकून मिलता तो कोई मेज पर ही पड़ा रहता। लावारिश सा। किसी पर दिन भर फ़ोन आते तो किसी के कान घंटी सुनने को तरस जाते। मोबाइल एक ही घर में रहते परिवार के सदस्यों सरीखे आपस में कभी मिल नहीं पाते थे। कभी जेब में, पर्स में आते जाते दूसरे मोबाइल को देख भर लेते जैसे घर के सदस्य घर से बाहर आते-जाते एक दूसरे को देख लेते। कभी-कभी यह भी होता कि एक साथ घंटी बजने पर दूसरे के होने का पता चलता जैसे घर के सदस्य आते जाते बोल-बतिया लेते तो उनको लगता कि उनके अलावा कोई दूसरा भी है घर में।
एक दिन जाने क्या हुआ कि किसी ने घर के सारे मोबाइल एक मेज पर रख दिये। रख क्या दिये मेज पर लिटा दिये। ऐसा लगा कि सारे मोबाइल अगल-बगल की कब्रों में लेटे हुये हैं। पर कब्र लिखना ठीक नहीं होगा क्योंकि मोबाइल बाकायदा जिन्दा थे। उनमें घंटियां बजती थीं। वाइब्रशेसन मोड में नागिन डांस सा करते तो लगता कि उनके पेट में मरोड़ सरीखी उठी है। हाथ से छूटकर कभी गिरते तो आवाज होती। इससे लगता कि शायद उनको भी चोट लगती हो। दर्द होता हो। गिरने पर चिल्लाते हों- ’अरे, बाप रे, हाय अम्मा। मर गये।’
गिरने पर किसी-किसी मोबाइल की तो बैटरी निकलकर उनसे इत्ती दूर जाकर गिरती कि मानों कसम खा रही हो कि कुछ भी हो जाये अब इस मोबाइल के साथ नहीं रहना। इससे अब नहीं पटनी अपन की। लेकिन कुछ ही देर में शरीफ़ गृहस्थन सरीखी मोबाइल के करेंट सप्लाई करने लगती। तो जब साथ-साथ लेटे दिखे तो मोबाइल तो लगा कि किसी कोचिंग मंडी वाले शहर के किसी पेइंग गेस्ट वाले हास्टल में बच्चे एक के बगल में एक लेटे हुये हों।
अब जब मोबाइलों ने एक-दूसरे को साथ-साथ देखा तो सब आपस में बतियाने लगे। अब वे मोबाइल थे कोई आदमी तो थे नहीं जो मिलने पर बातचीत की शुरुआत ही यह सोचकर नहीं कर पाते कि पहले कौन शुरु करे। मोबाइल एक दूसरे के हाल-चाल पूछने लगे। बतियाने लगे। कोई क्रम नहीं था उनकी बातचीत में। न हम उनकी भाषा समझते थे लेकिन अन्दाज लगा सकते हैं कि वे क्या बतियाये होंगे आपस में। उनमें सीनियारिटी, जूनियारिटी का भी कोई लफ़ड़ा नहीं था इसलिये बेतकुल्लुफ़ जो मन आ रहा था बतिया रहे थे। हमको जैसी समझ में आई उनकी बातें वैसी ही आपको बता रहे हैं।
एक एकदम नये से मोबाइल को सब मोबाइल को देखकर चौंधिया से गये। मोबाइल एकदम चमक सा रहा था। लेकिन मोबाइल के चेहरे पर दुख सा पसरा था। असल में वो घर में सबको बुजुर्ग सद्स्य के साथ रहता था वो उस जमाने का था जब फ़ोन का मतलब सिर्फ़ ’हलो हलो’ होता था। मोबाइल के तमाम नये से नये फ़ीचर उसके लिये बेमतलब थे। फ़ोन भी वो बस इतना ही प्रयोग करता जितना भयंकर डायबिटिक मिठाई खाता होगा। फ़ोन कभी वो खुद नहीं करता था। कोई फ़ोन आता तो कांपते हाथों उठाता और जरा देर में ही –’अच्छा, रखते हैं’ कहकर रख देता। फ़ोन बेचारा अपने सारे लेटेस्ट फ़ीचर के इस्तेमाल की तमन्ना लिये कुढता रहता। उसको लगता कि जैसे इंजीनियरिंग करने के बाद संविदा पर पानी पिलाने के काम में लगा दिया गया हो। उसके हाल उन राल्स रायस कारों सरीखे थे जिनको एक राजा ने कूड़ा ढोने के काम में लगा दिया था। कभी-कभी वह ऐसे ही सोचने लगता जैसे की कब्र में पांव लटकाये शेखों की एकदम नयी उमर की बीबियां सोचती होंगी। फ़ोन हमेशा में मनौती मानता रहता –’ हे भगवान हमको इसके पास से किसी नई वाले के पास भेजो। चोरी ही करा दो। कुछ तो उपयोग हो हमारा।’ लेकिन उसकी बूढे मालिक से दूर जाने की हर तमन्ना अधूरी ही रह जाती क्योंकि बुजुर्गवार के पास और कोई काम तो था नहीं सो उसकी ही देखभाल करते।
एक बुजुर्ग मोबाइल जो देखने में ही मार्गदर्शक मोबाइल टाइप लगा था अपने किस्से सुनाते हुये बोला- ’हम इस घर के पहले मोबाइल थे। घर के अकेले मोबाइल थे हम। सब हमको अपने हाथ में लपकते रहते। सब अपने-अपने तरह से प्रयोग करते हमको। कोई फ़ोटो खैंचता, कोई बतियाता, कोई गेम खेलता। उन दिनों फ़ोन की दरें इतनी सस्ती थी तो थीं नहीं कि जित्ता मन आये बतियाओ। लोग फ़ोन करते जो घड़ी देखते रहते कहीं ज्यादा खर्च न हो जाये। घड़ी देखने के चक्कर में यह भी भूल जाते बात क्या हुई। हर काल के बाद बैलेन्स चेक करते। खर्चा बचाने की गरज से फ़ोन करने अधिकार केवल बड़े लोगों को था। पर काल रिसीव करने का अधिकार सब लोगों को था। घंटी बजते ही बच्चे इत्ती तेज भागते बच्चे हमको उठाने के लिये कि अगर उत्ती तेज ओलम्पिक में भागते तो गोल्ड मेडल झटक लाते। बच्चे लोग गेम खेलते रहते। बीच की उमर वाले बच्चे जिनको फ़ोन करने की इजाजत नहीं थी वो मिस्ड काल करके अपने फ़ोन करने की हसरत मिटाते। कोई भी दस डिजिट का फ़ोन अपने मन मिलाते। नम्बर दस में नौ बार गलत होता। किसी एक नम्बर पर घंटी जाती तो खुश हो जाते और फ़ौरन फ़ोन काट देते कि कहीं उधर से उठ न जाये। सबके हाथ में रहते घूमते दिन कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता।
नये वाले मोबाइल बुजुर्ग मोबाइल के हाल देखकर ताज्जुब करने लगे और सोचने लगे कहीं यह झूठ तो नहीं बोल रहा अपना भाव बढाने के लिये। लेकिन उसकी हालत पर तरस खाकर वे कुछ बोले नहीं। बुजुर्ग मोबाइल बोला- ’अक्सर हमको अपने पास रखने के लिये घरवालों में बहस तक हो जाती। बच्चे हमारे लिये छीना झपटी करने लगते। एक दिन तो इतना हल्ला मचा कि घर वाले ने मारे गुस्से के हमको मेज पर पटक दिया। प्लास्टिक की मेज में तिकोना छेद हो गया। हमारी बैटरी अलग गिरी, कवर अलग, सिम कहीं और। हमारा तो रामनाम ही सत्य हो गया था। लेकिन पुराने जमाने के मोबाइल थे हम। फ़ौरन जुड़े और चलने लगे। अब भी जब कभी उस मेज पर धरे जाते हैं तो मेज अपने घाव की तरफ़ इशारा करते हुये कहती है तुम्हारे ही चक्कर में चोट खायी है हमने यह। हम भी मुस्करा के रह जाते हैं। कभी सारी बोलते हैं तो मेज झिड़क देती है कहते हुये-’ इसमें तुम्हारा क्या दोष। हम तो बने ही उपभोग के लिये हैं। इसी बहाने हमारी तुम्हारी खुशनुमा याद तो है।’ जब वह खुशनुमा कहती है तो मन कैसा हो जाता है वह नयी पीढी के तुम लोग नहीं समझोगे जो ’हलो, हाय बोलने के पहले आई लव यू बोलने के आदी हो गये हैं।’
बुजुर्ग मोबाइल के किस्से को नये मोबाइल मुंह बाये सुन रहे थे। उसके हाल देखकर सब सोचने लगे कि बताओ कभी पूरे घर में राज करने वाले का हाल यह हो गया कि कोई पूछता तक उनको। पड़ा रहता एक कोने में मेज की दराज में। कोई पेपरवेट तक के काम के लिये उसका उपयोग नहीं करता। सब फ़ोनों को एक बार फ़िर से लगा कि किसी को अपने हाल पर बहुत घमंड नहीं करना चाहिये कि वही सबसे अच्छा है। एक दिन सबके इस बुजुर्ग मार्गदर्शक मोबाइल होने हैं जिसका उपयोग लोग मारपीट में ही करने की सोचेंगे।
एक ब्लैकबेरी का मोबाइल बेचारा किसी आईसीयू में मरीज की तरह लेटा हुआ था। उसके अगल-बगल के रबड़ के पार्ट निकले हुये थे। एकदम अधनंगा सा लग रहा था मोबाइल। फ़टेहाल। सूखे इलाके के किसान सरीखा उजड़ा-उखड़ा मुंह। उसके हाल देखकर ऐसा लग रहा कि जैसे किसी पुरातात्विक इमारत के दरवाजे, खिड़कियां लोग निकालकर ले गये हों। देखकर लग ही नहीं था कि कभी इस मोबाइल का जलवा सारी दुनिया में था। उसकी बैटरी भी निकली हुई थी। बिना बैटरी के मोबाइल ऐसे गृहस्थ सरीखा लग रहा था जिसकी घरवाली भरी बुढौती उसको अकेला छोड़कर चली गयी हो।
ब्लैकबेरी मोबाइल कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसका सिम भी हटा दिया गया था। उसके हाल उस दबंग दरोगा सरीखे थे जिसको कप्तान की बीबी की नाराजगी के चलते लाइन हाजिर करके किसी थाना किसी दूसरे दरोगा को थमा दिया गया हो। मोबाइल बेचारा अपने सिम और बैटरी के वियोग में उदास उजड़ी आंखों से दूसरे मोबाइलों को सूनी आंखों से ताक रहा था। सबने उसकी तरफ़ से आंखे फ़ेर लीं लेकिन वह अपना अपराध बोध बयान करने लगा-’ हमारे साथ वाली बैटरी कभी हमको छोड़कर नहीं गयी। हमेशा हमारे साथ रही। हमारे कारण ही गरम होकर वह फ़ूल गयी। हमने बेमतलब उस पर शक किया और फ़िर कवर खोलकर बाहर कर दिया। पता नहीं कहां होगी वह आज। किसी कूड़ेदान में या किसी गाय के पेट में।’ मोबाइल बेचारा बैटरी और बिछड़े सिम की याद में डूब गया।
जो मोबाइल नयी उमर के लोगों के पास थे उनके किस्से अलग टाइप के थे। वे इत्ती जल्दी-जल्दी अपनी बात कह रहे थे कि पता ही नहीं चल रहा था कि आवाज किसके मुंह से निकल रही थी।
एक बोला – ’हमारी तो बैटरी इत्ती जल्दी खतम हो जाती है उत्ती जल्दी तो बाबू लोग सरकारी ग्रांट भी नहीं खर्च कर पाते। इधर भरी उधर खल्लास। हमेशा पावरबैंक के सहारे दिन कटता है। ऐसा लगता है जैसे डायलिसिस पर हों। जरा देर के लिये पावरबैंक हटा कि पूरा ब्लैक आऊट हो जाता है।’
दूसरा बोला-’ पहले ये चार्जिंग वाली पिन इत्ता जोर से चुभता थी जैसे कोई मोटी सुई चुभा रहा हो। अब हाल यह हो गये हैं कि चार्जिंग प्वाइंट और पिन दोनों इत्ती ढीली हो गयी हैं कि मिलते ही बुजुर्ग दम्पतियों की तरह झगड़ने लगते हैं। मिलते ही चिंगारी निकलती है। बिना चिंगारी निकले चार्ज ही नही होता। जाने कब नया जार्जर नसीब होगा।
वह कुछ और कहता तब तक बगल वाला मोबाइल बोला –’ आजकल हर मोबाइल नया चार्जर चाहता है। हरेक की तमन्ना रहती है कि उसको नया चार्जर चार्ज करे। लेकिन सिर्फ़ चाहने से होता तो फ़िर बात की क्या थी। जो भाग्य में बदा है उसी से निभाना पड़ता है।’
एक मोबाइल अपने धारक के गुणगान करने में लगा था। मेरी ये तो मुझे कभी कान के पास से हटाती ही नहीं। इसकी सब सहेलियां ईयर प्लग यूज करती हैं लेकिन ये मुझे हमेशा कान से सटा के रखती हैं। बोलती इत्ता धीरे हैं कि मेरे पर्दे को जरा सा भी फ़ील नहीं होता कि कोई बोल रहा है। ऐसा लगता है कोई शहद घोल रहा है। फ़ोन करने के बाद इत्ता आहिस्ते से रखती हैं पर्स में कि जरा सा भी झटका नहीं लगता।
अरे यार तुम्हारे भाग्य बढिया हैं जो ऐसे के साथ हो। हम जिस लड़के के साथ रहते हैं वो तो हमें ऐसे पटकता है जैसे पुराने जमाने में लोग नौकरियों से इस्तीफ़ा पटकते थे। हर काल के बाद फ़ेंक देता है बिस्तरे पर। हड्डी पसली हिल जाती है। लगता है हमसे छुट्टी पाना चाहता है। आजकल मोबाइल भी तो रोज नये-नये आ रहे हैं।
ऐसे ही तरह-तरह की बातें करते हुये मोबाइल लोग इतना अंतरंग हो गये कि आपस में फ़ुसफ़ुसाते हुये साझा करने लगे कि उनके मालिक उनका कैसे उपयोग करते हैं।
एक बोला –’वो दिन भर में इत्ती सेल्फ़ी लेती है कि क्या बतायें। जितनी बार सेल्फ़ी लेती है मुझमें देखती है। मुझे कोसती है कि अच्छी नहीं आई फ़ोटो। अब हम मोबाइल हैं जैसा थोबड़ा होगा वैसा ही तो बतायेंगे मोबाइल से। कोई फ़ेसबुक फ़्रेंड थोड़ी हैं जो बिना देखे वाह, वाऊ, आसम, झकास, कटीली कहने लगें। तो वो फ़ोटो देखकर हमसे गुस्सा जाती है कि हमने अच्छी फ़ोटो नहीं खींची। पर वही फ़ोटो जब वो फ़ेसबुक पर अपलोड करती है तो बढिया कमेंट देखकर इत्ता प्यार से चूमती है कि बताते शरम आती है। मन करता है कि वह सिर्फ़ अपनी फ़ोटो खैंचकर अपलोड करती रहे।’
दूसरा मोबाइल बताने लगा-’ हमारा मालिक तो इत्ता मेसेजिंग करता है कि हमको लगता है हम फ़ोन न हुये मेसेज कुली हो गयी। दो ठो सिम हैं। दोनों पर एक साथ तमाम लोगों से बतियाता है। सबसे कहता है सिर्फ़ तुमसे ही बात कर रहे हैं। इत्ता झूठ बोलता है कि कभी तो मन करता है फ़ेंक के बैटरी मारे इस झुट्ठे के मुंह में। इत्ते सारे झूठे संदेशे सीने में लादे-लादे छाती दर्द करने लगती है हमारी। लेकिन अब क्या करें। जैसा मालिक मिला है वैसा निभाना पड़ेगा।’
मेसेजिंग की बात एक मजेदार बात आई। एक मोबाइल ने किस्सा मोड में आते हुये बताना शुरु किया। एक बार हमारे वाले मेसेज कर रहे थे। भाव मारने के लिये अंग्रेजी में टाइप कर रहे थे। नई दोस्त बनी थी। सो लव और हेट वाले मोड में थे। दोनों कहते थे कि अगर साथ टूटा तो आत्महत्या कर लेगें। आजकल के प्रेमियों में जाने कौन सा फ़ैशन चला है कि वे जीने की बात करने बाद में करते हैं, मरने का हिसाब पहले बना लेते हैं। तो हुआ यह एक दिन आदतन शुरुआत करते ही ’आई लव यू’ बोले। फ़िर ज्यादा ही इम्प्रेशन मारने के मूड में थे तो उनके लिये ’आई हेट’ लिख दिये जो इस संग से चिढते हैं। अब जाने इंटरनेट कनेक्शन गड़बड़ा गया कि अंग्रेजी के हिज्जे आगे-पीछे हो गये उस तक संदेशा जो पहुंचा वो था –’ आई हेट यू।’ उसने संदेश देखते ही सुसाइड कर लिया।
सब मोबाइल ओह, अरे, हाय दैया कहते हुये दुखी हो गये। इस पर उस मोबाइल ने बताया –’ अरे ऊ वाला सुसाइड नहीं यार, वो सुसाइड कर ली मतलब इनको ब्लाक कर दी। इनसे बातचीत बन्द की उसने। नये से बात करने लगे दोनों। नये से ’आई लव यू’ होने लगा।
सब मोबाइल बोलने लगे- ’बड़े बदमाश हो तुम हो बे। हमारी तो जान ही ही निकल गयी थी आत्महत्या की बात सुनकर।’
उस मोबाइल ने सबको आंख मारी और सब हंसने लगे। सब तरफ़ उनकी हंसी गूंजने लगी। इस बीच घर के लोग भी जग गये और सब अपने-अपने मोबाइल उठाकर अपने-अपने काम में जुट गये।

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