Tuesday, May 09, 2017

व्यंग्यकारों के संग दिल्ली में


आज सुबह जैसे ही दिल्ली का रोजनामचा पोस्ट किया वैसे ही रमेश तिवारी ने धर लिया। मिलो वरना धरने पर बैठ जाएंगे। हम इसी डर के मारे कल दिल्ली का रोजनामचा नहीं लिखे। दफ्तरी काम से निकलने पर कब वापस लौटना हो कोई ठिकाना नहीं। कल लौटते-लौटते रात हो गयी थी।
दिल्ली में इतने मित्र हैं कि सबसे मिलने के लिए महीना कम पड़ेगा। अकेले द्वारका के आयुध विहार में हमारे कई वरिष्ठ , रिटायर्ड अधिकारी रहते हैं जिनसे मिलना हर बार स्थगित हो जाता है यह सोचकर कि अगली बार तसल्ली से आएंगे तब पक्का मिलेंगे।
आज एक ही दफ़्तर जाना था। लगा कि 11 बजे तक फ्री हो जाएंगे। लेकिन फ्री होने में 12 बज गए। इसके बाद रमेश तिवारी के निर्देशानुसार सुभाष जी के दफ्तर पहुंचे। सुभाष जी से मिलने का मन होने के अब्बी अब्बी दो कारण और याद आ गए:
1. अगले व्यंग्य के इतिहास में अपने लिए थोड़ी और जगह का जुगाड़ करना।
2. भविष्य की इनाम वाली जुगत में अपने लिए कम से कम सुभाष जी का वोट पक्का करना।
ये बातें चूंकि हमने सुभाष जी को बताई नहीं थीं क्योंक उस समय ऐसा कोई इरादा नहीं। सिर्फ मिलने की इच्छा नहीं थी। मिलने के बाद सुभाष जी जिस तत्परता से बढ़िया खाना खिलाया और जबरियन पैसे भी खुद दिए उससे मुझे उनसे आशाएं बढ गयी हैं।
बातें खूब हुई। मठाधीशी, माफियागिरी, गदहापचीसी पर। सुभाष जी ने हमारे रिपोर्ताज, संस्मरण की तारीफ़ की। इसका इशारे में मतलब यह था कि व्यंग्य हम दो कौड़ी का लिखते हैं।  लेकिन हमको पूरी आशा है कि लिखें हम भले ही कैसा भी लेकिन कुछ दिन बाद सुभाष जी हमारे लेखन की तारीफ़ करने करने लगेंगे। आशा पर ही दुनिया टिकी हुई है। है कि नहीं।
रमेश तिवारी ने किसी बहाने से व्यंग्य संकलन की उपयोगिता की चर्चा की। हम समझ गए -'कवि यहाँ विनम्रता पूर्वक अपने किये काम की स्वयं तारीफ़ करना चाहता है।' हमने इस बात को कहा भी। रमेश जी की भलमनसाहत कि उन्होंने इस बात से इंकार नहीं किया। वरना आजकल लोग सच कहां स्वीकार करते हैं। कई मित्रों ने बताया मुझे कि इनाम में उनका नाम कटवाने वाले लोग बाद में मिलने पर बताते है -'हमने तो बहुत कोशिश की आपके समर्थन में लेकिन बाकी लोग अड़ गए कि इनको नहीं मिलना चाहिए।'
वैसे भी आजकल जब हर जगह स्वयंसेवा का चलन बढ़ रहा है तो साहित्य का क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है। लोग तारीफ़ में फुल आत्मानिर्भर हो रहे हैं। तारीफ़ में कमी लगी तो अपने खिलाफ हुए अन्याय के वर्णन की मात्रा बढ़ा दी। आत्मप्रसंशा और अपने साथ हुए अन्याय के वर्णन के गठबंधन से लेखक और लेखन का स्तर अपने आप उछल जाता है।
सुभाष जी, रमेश जी और उसके बाद आलोक पुराणिक से मिलने के बाद के लेख का सटीक शीर्षक होना चाहिए था -' मेहनती व्यंग्यकारों से मुलाकात'। तीनों लोग अपने-अपने इलाके के धुरन्धर मेहनती लिक्खाड़ हैं। सुभाष जी ने तो 'व्यंग्य का इतिहास' लिखने में ही इतनी मेहनत कर डाली की अब लिखने के नाम पर टिप्पणियां तक 'मिनी टाइप' करते हैं। रमेश तिवारी ने इस साल कई व्यंग्यकारों के संकलन निकाले। आने वाले समय में शायद रमेश जी व्यंग्य संकलक, व्यंग्य आलोचक और व्यंग्य लेखक के रूप में (सु/कु)ख्यात हों। आलोक पुराणिक का कहना ही क्या । वे व्यंग्य के क्षेत्र में आजकल सबसे ज्यादा पसीना बहाने वाले मेहनती लेखक हैं। इत्ते मेहनती कि सामान्य बुराई-भलाई के लिए भी समय नहीं निकाल पाते। साथ के लेखकों की बुराई भलाई भी न की जाए तो काहे का लिखना और काहे का पढ़ना। आलोक जी को गर्मी की छुट्टियों में कोई कायदे का बुजुर्ग/समकालीन सहज निंदक साथी पकड़कर बुराई-भलाई करना सीखना चाहिए। आगे चलकर काम आएगी।
आलोक पुराणिक जी से मिलना तय हुआ था मण्डी हाउस में। लेकिन सुभाष जी ने विस्तार से जो लंच कराया और लंच में बाद में रसगुल्ले का जो पञ्च था उसमें समय रपट्टा मारकर आगे सरक गया। फिर आलोक जी से मुलाकात हुई नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के फ़ूड प्लाजा में। लस्सी पीते हुए हालिया व्यंग्य लेखन पर बातों की जलेबियां छानी गयीं। समय यहाँ भी स्पीड से गुजरा और देखते देखते ट्रेन का समय हो गया। हम निकल लिए।
और तमाम लोगों से मिलना है दिल्ली में। इस बार मिल नहीं पाये लेकिन जैसा मेरे एक बहुत अजीज ने कहा था बहूत पहले -' मुलाकात नहीं हुई लेकिन मिला हुआ समझना।'

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