Sunday, June 26, 2016

कालपी रोड पर बांस लदी भैंसागाड़ी

कल सुबह कालपी रोड पर बांस लदी भैंसागाड़ी दिखी। दो भैंसागाड़ी में ऊपर तक बांस लदे थे। बांस मण्डी से आते-आते भैंसा थक गया होगा इसलिए सुस्ताने के लिए रुक गए होंगे। पास में गड्डे के पानी से भैंसा पानी पी रहा था। उसकी पीठ पर मिट्टी सनी थी। मिटटी को गीला करके भैंसे को गरमी में ठण्ढक का एहसास कराया जा रहा था।
भैंसे को गड्डे का गन्दा पानी पीते देखकर सवाल उठा कि इसको यह पानी नुकसान नहीं करता होगा क्या? शायद उनका शरीर गन्दगी झेल जाता होगा। जंगल में भी कहां RO का पानी सप्लाई होता है। ये भैंसे भी दुनिया की बड़ी आबादी की तरह हैं जो जो भी पानी मिल जाए उसको पीते हुए पीने के लिए अभिशप्त हैं।
पानी पीने के बाद भैंसे का 'वाटर ब्रेक' खत्म हो गया और उसको वापस गाड़ी में जोत दिया गया। भैंसे के साथ ही एक बच्चा भी लग लिया गाड़ी ठेलने के लिए। भैंसे के सहायक की तरह। दोनों बांस लदी गाड़ियों में एक-एक बांस इस तरह आगे निकला हुआ था कि उसको कन्धे पर धरकर गाड़ी आगे ठेलने का जुगाड़ था। बच्चा उसमें बांस को अपने कंधे पर धरकर जब आगे बढ़ा तो अनायास मदर इण्डिया पिक्चर की याद आ गयी जिसमें नायिका नरगिस हल खेत जोतने के लिये हल पर बैल की तरह जुत जाती है।
बांस भाटिया होटल के पास जाने थे। वहां कुछ दुकाने हैं जो बांस मंडी से बांस लाकर बांस से बना सामान बनाकर बेंचते हैं- टट्टर, सीढ़ी और अन्य सामान।
भाटिया होटल के पास की एक दुकान पर गए तो देखा कि भैंसागाड़ी पर आये बांस यहाँ खड़े थे या पड़े थे। दुकान वाले भाई जी ने बताया कि बांस मंडी से भाटिया होटल तक बांस लाने का किराया 12 रुपया एक बांस के हिसाब से पड़ता है। छोटे/पतले बांस का 7 रुपया है किराया। करीब 10-12 किमी दूरी होगी बांस मंडी से भाटिया होटल। मतलब किराया 1 रुपया प्रति किलोमीटर।
बांस मंडी में बांस आते हैं आसाम से। आसाम से पश्चिम बंगाल, बिहार होते हुए उत्तर प्रदेश आते हैं बांस। थक जाते होंगे। अलग-अलग दलों की सरकारें हैं सब जगह। मन किया पूछें कि किस राज्य के हाल कैसे हैं लेकिन फिर सोचा क्या फायदा पूछने से। जबाब यही मिलेगा -'गरीब आदमी की जगह मरन है।'
बांस की दुकान वाले ने बताया कि 1997 से है उनकी दुकान यहां। चित्रकूट से आये थे, बस गए यहीं । जमीन सरकारी है। उसी में झोपड़ी डालकर , टट्टर से घेरकर चल रहा है कामकाज।
'कभी नगर निगम वाले नहीं आते अतिक्रमण हटाने ?' हमने पूछा।
वो बोले -'आते हैं। जब आते हैं तो दुकान उखाड़ जाते हैं, सामान लादकर ले जाते हैं। कुछ छोड़ जाते हैं। एकाध घण्टे पहले पता चल जाता है तो सामान इधर-इधर कर लेते हैं। पीछे जंगल है वहां धर लेते हैं। कुछ दिन बाद फिर जम जाते हैं।'
बताया -'आज रतनलाल नगर में नगर निगम की कार्रवाई चल रही है। कल इतवार है। हो सकता है सोमवार को इधर की तरफ आएं नगर निगम वाले। जब आएंगे तो गाड़ियां वगैरह आएँगी। उससे पता चल जाएगा तो फिर व्यवस्था देखेंगे हटाने की।'
हम सोच रहे थे कि जिसको पता है कि उसकी दुकान आज उजड़ेगी या दो दिन बाद वह कैसे इतनी तसल्ली से बतिया रहा है। वहीं पर एक बच्चा मस्ती से खेल रहा था। उसका स्कूल बन्द चल रहा है।
शाहजहाँपुर के साथी राजेश्वर पाठक की कविता याद आ गयी जो कि आम आदमी की कहानी है।
हम तो बांस हैं
जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे।
हम कोई आम नहीं
जो पूजा के काम आएंगे
हम चन्दन भी नहीँ
जो सारे जग को महकायेंगे
हम तो बांस हैं
जितना काटोगे उतना हरियायेंगे।
बांसुरी बन के
सबका मन तो बहलायेंगे,
फिर भी बदनसीब ही कहलायेंगे।
जब भी कहीं मातम होगा,
हम ही बुलाये जायेंगे,
आखिरी मुकाम तक साथ देने के बाद
कोने में फेंक दिए जाएंगे।
हम तो बांस हैं
जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे।



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