Friday, August 15, 2025

स्वतंत्रता दिवस की टहलाई



 सुबह टहलते हुए कॉलोनी से बाहर निकल आए तब पीछे से देश भक्ति के नारे सुनाई दिए। कॉलोनी के लोग झंडा सामुदायिक भवन की तरफ़ जा रहे थे। अपन आगे बढ़ गए थे सो बढ़ ही गए।

स्कूल के बाहर कारों की कतार लगे थी। अंदर स्वतंत्रतता दिवस मनाया जा रहा था।
नुक्कड़ की दुकान वाला अपनी गुमटी के कोने में तिरंगा फहराये मोबाइल में कुछ देख रहा था। उसकी दुकान के बाहर नोटिस लगा था -"अठारह वर्ष के कम उम्र के लोगों को धूम्रपान की वस्तुएं बेचना दंडनीय अपराध है।" हमें लगा कि कहीं हमको पकड़ कर कुछ बेंच न दे कहते हुए कि इस नोटिस का मलतब है -"अठारह वर्ष से अधिक उम्र के लोगों द्वारा धूम्रपान न करना दंडनीय अपराध है।"
दुकान के आगे जैसे ही बढ़े एक लड़का साइकिल में अपने क़द से बड़ा तिरंगा लगाए साइकिल लहराता निकला। वह ट्रैफ़िक के उल्टी तरफ़ जा रहा था। सामने से आती कार, मोटरसाइकिल और साइकिल से बेपरवाह वह निडर साइकिल पर पैडल मारता हुआ चलता गया। झंडे की तरह उसका आत्मविश्वास फहराता दिख रहा था। उससे झंडे की ताक़त का अंदाज़ लगा।
अगली गली में एक ऑटो वाला अपने ऑटो के ऊपर झंडा लगाए पिछली सीट पर सो रहा था। बगल से गुजरते हुए हमको देखा तो उठकर बैठ गया । उसने सोचा हमको कहीं जाना होगा। हमने पूछा -"सवारी का इंतजार कर रहे हो?" वह कुनमुनाते हुए हाँ बोलकर फिर सीट पर लम्बलेट हो गया।
आगे फूल की दुकान पर रंगबिरंगे फूल बिक रहे थे। स्वतंत्रता दिवस फूल और भी रंगीन लग रहे थे। दुकान के बाहर की तरफ़ तख़्त पर बैठी महिला गेंदे के फूल की माला गूँथ रही थी। मुझे नंदलाल पाठक जी की कविता पंक्तियाँ याद आईं :
“आपत्ति फ़ूल को है माला में गुंथने से
भारत मां तेरा वंदन कैसे होगा
सम्मिलित स्वरों में हमें नहीं आता गाना
बिखरे स्वर में ध्वज का वंदन कैसे होगा।“
सड़क पर गाड़ियाँ रफ़्तार में आती-जाती दिख रहीं थीं। एक मेन होल के ढक्कन पर पैर रखते हुए सोचा कि कहीं ढक्कन अंदर चला गया तो साथ में हम भी चले जायेंगे। पता नहीं अंदर-अंदर कहाँ पहुँचे। इस मसले पर आगे नहीं सोचा क्योंकि सामने सड़क दिख रही थी।
पेट्रोल पंप को लहरियादार तिरंगे कपड़े से सजाया गया था। पेट्रोल पंप के आगे बढ़ते ही पानी बरसने लगा। अपन एक कॉलोनी के सुरक्षा द्वार के शेड के नीचे खड़े हो गए। वहाँ खड़े बच्चे ने कुर्सी देते हुए कहा -"अंकल जी, बैठ जाइए।" लेकिन अपन खड़े रहे। पानी को बरसता देखते रहे।
सामने ओवर ब्रिज के नीचे शेड में कई दुपहिया वाहन वाले बारिश रुकने का इंतजार करते खड़े थे। हम उनको देख ही रहे थे कि एक महिला छाता लगाए सड़क पार करती चली गई। हमने उसका फोटो खींचा तो सामने की ऊँची इमारत पर झंडा फहराते दिखा। कॉलोनी के गेट का झंडा इमारत के झंडे को हिलते हुए हेलो सा कहता लगा। ध्यान से देखा तो इमारत पर महिला अस्पताल का बोर्ड लगा था। लगा शायद कॉलोनी का झंडा महिला अस्पताल वाले झंडे से बतियाने की कोशिश कर रहा होगा। बाद में हमें इस 'लगने' वाली बात को बेवक़ूफ़ी की बात समझकर ख़ारिज कर दिया।
पानी बरस रहा था। वहीं खड़े-खड़े आते-जाते वाहनों का वीडियो बनाया। बारिश आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को सड़क पर जमा पानी इस सलीके से गोद में लेकर सहेज रहा था जैसे पिता अपने बच्चे को उछालकर वापस गोद में ले लेता है।
पानी बरसते हुए देर हुई तो सोचा भीगते हुए वापस लौट चलें। लेकिन फिर मोबाइल घड़ी भीगने की बात सोचकर रुक गए। बिना मोबाइल, घड़ी के होते तो भीगते हुए वापस लौट जाते। इससे एहसास हुआ कि अक्सर साथ की सुविधाएं/ संपन्नता सहज व्यवहार में अवरोध साबित होती हैं।
पानी धीमा हुआ तो लौट लिए। आगे एक कचरा ढोने वाली गाड़ी सफाई का गीत बजाती हुई कूड़ा उठा रही थी। बगल से एक परिवार हाथ में तिरंगा लिए कहीं जाता दिखा। मोड़ पर एक कार वाला हमको देखकर रुक गया। हम भी रुक गए। उसने हमको निकल जाने का इशारा किया। हमने उसको निकलने का इशारा किया। पहले आप, पहले आप होने लगा। लेकिन आख़िर में जीत हमारी ही हुई। हमने उसको आगे निकल जाने के लिए मजबूर किया। वह मुस्कराते हुए चला गया।
आगे के मकान के पास एक बालक मिट्टी ढो रहा था। एक बुजुर्ग उसको निर्देश दे रहे थे। शायद उनका मकान बन रहा था। बच्चा स्वाधीनता दिवस के दिन भी काम कर रहा था। बुजुर्ग करा रहे थे। पेट का मामला था। भूखे लोगों के लिए स्वाधीनता दिवस की छुट्टी लागू नहीं होती।
सड़क पर एक सांड लालकिले की तरफ़ मुँह किए चुपचाप खड़ा था। बारिश में भीगते हुए क्या पता वह सोच रहा हो की कुत्तों की तर्ज पर सांडों को भी 'शेल्टर होम' में रखे जाने का आदेश हो जाये।
फुटपाथ पर नाई की दुकान पर एक आदमी बाल कटाने के इंतजार में दिखा। नाई बीड़ी पीते हुए धुंआ उड़ा रहा था। दोनों को कोई जल्दी नहीं थी। दोनों के बीच पड़ी खाली कुर्सी अपने ग्राहक का इंतजार कर रही थी। नाई की दुकान की कुर्सी और किसी रुतबे वाली कुर्सी में अंतर होता है।
सड़क पर खड़े ऑटो के अंदर से देशभक्ति के गीत बज रहे थे। ऑटो वाला ऑटो को मोमिया से ढँके शायद पीछे की सीट पर आरामफ़र्मा था। तिराहे पर बाप-बेटे झंडा बेच रहे थे। बच्चा अनमना सा ऊँघता हुआ एक ग्राहक को झंडा बेच रहा था। बच्चे को झंडा बेचते देखा हमको Devendra Kumar Pandey की बात याद आई :
मेहरारू बीमार मरद, दारू पी के मस्त हौ
लइका बेच रहल तिरंगा, पंद्रह अगस्त हौ !
याद तो धूमिल भी आए :
"क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?"
सड़क पर आती-जाती मोटर साइकिल, ऑटो और कार पर तिरंगे फहरा रहे थे। एक कार की खिड़की से फहराता तिरंगा देखकर लगा इसके चलते कहीं और तिरछी होकर पलट न जाये।
एक जगह एक मोटरसाइकिल पर स्वीगी का लोगो लगाए एक बच्चा अपनी मोटरसाइकिल ठीक करवा रहा था। डिलीवरी वालों की भी आज छुट्टी नहीं थी। पानी में भीगते हुए तमाम लोगों का स्वतंत्रता दिवस स्वीगी।जोमैटो वाले यम्मी बनाए हुए हैं।
आगे एक घर के बाहर बैठा कुत्ता जीभ से अपनी टाँग का घाव का चाट रहा था। शायद वह भी सोच रहा हो कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश जल्दी तामील हो और उसे कोई शेल्टर होम एलॉट हो जहाँ रहते हुए वह भी अपना इलाज करा सके।
पार्क के बाहर सामने कुछ बच्चे आते दिखे। पाँच बच्चों में चार लड़कियां। हमने उनका फ़ोटो लेने के लिए पूछा तो बच्चे पोज में खड़े हो गए। पहले सीधे खड़े रहे फिर सलाम मुद्रा में। फोटो देखकर खुश हो गए। उनके पास मोबाइल नहीं था वरना उनको भेज देते फ़ोटो। बच्चों ने बताया कि पास ही रहते हैं। मंदिर तक घूमने गए थे।
पार्क के घुसकर दो चक्कर लगाए। पार्क के इक्का-दुक्का लोग ही टहला रहे। दो चक्कर लगाए पार्क के। इसके बाद घर से बुलौआ आ गया। हम घर आ गए। स्वतंतंत्रता दिवस की टहलाई पूरी हुई।

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