कल करीब करीब घंटे की ट्रेन यात्रा के दौरान गोविंद उपाध्याय Govind Upadhyayजी का नया उपन्यास 'जिदगी@मगनपुर इस्टेट' पढ़ा। बहुत दिनों बाद एक सिटिंग में कोई किताब पढ़ने का सुकून मिला। उपन्यास एक बार में पढ़ जाने के पीछे इसकी रोचकता और इसे उपन्यास के कई पात्रों को वास्तविक जिंदगी में जानना भी रहा। हालांकि उपन्यास के पात्र और स्थान लेखक की कल्पना की उपज बताये गए हैं लेकिन पढ़ते हुए कई पात्र पहचान में आते गए।
गोविंद उपाध्याय जी से मेरा परिचय दो दशक से अधिक पुराना है। आर्डनेंस फैक्ट्री,कानपुर में काम करते हुए मुलाक़ात हुई। उन दिनों तक गोविन्द जी करीब ढाई दशक तक कहानियाँ लिखकर लिखना बंदकर चुके थे। ब्लॉगिंग के दिनों में हम लोग 'बुनो कहानी' अभियान के अंतर्गत कहानी लिख रहे थे। तीन लोगों को कहानी लिखनी थी। संयोग से तीनों कनपुरिये थे। मरीचिका कहानी की शुरुआत जितेंद्र चौधरी Jitendra Chaudhary ने की -'यादें' शीर्षक से, दूसरा भाग अतुल अरोरा Atul Arora ने लिखा -'पिचकना सपनों के गुब्बारे का' शीर्षक से । तीसरा भाग हमको लिखना था। हमने कहानी कभी लिखी नहीं थी। उन दिनों गोविंद जी परिचय हुए कुछ ही दिन हुए थे। हमने कहानी का तीसरा भाग लिखने का काम उनको सौप दिया। गोविंद जी ने शायद अगले ही दिन कहानी का तीसरा भाग लिखकर हमको थमा दिया- शीर्षक था 'और भी गम हैं जमाने में।'
'बुनो कहानी' में कहानी लिखने के बाद गोविंद जी का लिखना फिर से शुरू हुआ।उन्होंने लिखना शुरू किया तो धक्काड़े से लिखा। उन दिनों लगभग 200 कहानियाँ लिख चुके होने के बावजूद उनका कोई कहानी संग्रह आया नहीं था। बाद में पहला कहानी संग्रह आया -'पंखहीन।' उसके बाद से लेकर आज लगभग बीस साल में गोविंद जी की हर साल लगभग एक किताब के औसत से कुल इक्कीस किताबें आ चुकी हैं। उनमें से आधी से अधिक मेरे पास हैं।
गोविंद उपाध्याय जी का बचपन, युवावस्था और कामकाजी जीवन आयुध निर्माणी, कानपुर के अरमापुर इस्टेट में बीता है। अपने इस काल्पनिक उपन्यास 'जिंदगी@मगनपुर इस्टेट' में अरमापुर में बिताई यादों को कच्चे माल के तरह इस्तेमाल किया है गोविंद जी। अरमापुर इस्टेट की जिंदगी से करीब 25 से परिचित होने के कारण कई पात्रों को पहचान भी सकते हैं। अरमापुर इस्टेट में गोविंद जी के साथ पले-बढ़े-रहने वाले यार दोस्त उपन्यास में अपने को पहचान सकते हैं- भले ही उनके नाम और परिचय बदल गए हैं।
अरमापुर इस्टेट के पहले के जीवन के कुछ किस्से गोविंद उपाध्याय जी ने लिखे थे- 'आवारा जिंदगी के पन्ने।' इस क़िस्सों को पढ़कर आप उनके बचपन के दोस्तों के बारे में जान सकते हैं। इन दोस्तों में एक भैंस भी है।
उपन्यास में बचपन के दोस्तों से व्हाट्सएप ग्रुप में जुड़ने के बहाने उनके बारे में बात करते हुए यादों के सफ़र की दास्तान है 'ज़िन्दगी@मगनपुर इस्टेट।' इसमें उनके लेखन के दोस्तों की कहानी गायब है। शायद अगले किसी उपन्यास में आए।
इस उपन्यास के लिए गोविंद जी को बधाई। उनका लेखन जारी रहने के लिए शुभकामनाएँ।
उपन्यास : 'ज़िन्दगी@मगनपुर इस्टेट।'
लेखक: गोविंद उपाध्याय
पेज: 144
कीमत: 299 रुपए
प्रकाशक: सर्व भाषा ट्रस्ट।
किताब अमेजन पर उपलब्ध है। किताब के नाम से खोजने पर किताब ख़रीद का लिंक मिल जाता है।
'बुनो कहानी' और 'आवारा जिंदगी के पन्ने' के लिंक टिप्पणी बक्से में।
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