Sunday, August 03, 2025

निजी कंपनियों की कलाकारी

 


"मिलो के जहाजों को हर जगह जाने की अनुमति थी। एक दिन मिलो ने अमेरिकन मिलिटरी से जर्मनी के कब्जे वाले ओर्वियेटो के राजमार्गों वाले पुलों पर बम बरसाने का ठेका लिया। उसी समय उसने जर्मन मिलिटरी से ओर्वियेटो के राजमार्गों वाले पुलों की रक्षा का ठेका लिया जिसके तहत उसको एंटीएयरक्राफ्ट गनों से फ़ायर करके ख़ुद के विमानों के हमले से बचाव करना था।

अमेरिका की तरफ़ से पुलों पर हमला करने की उसकी फ़ीस इस आपरेशन में होने वाले खर्चे के अलावा 6 प्रतिशत थी और जर्मनी की तरफ़ से पुलों को बचाने की उसकी उतनी ही थी( आपरेशन पर आने वाला खर्च के अलावा 6 प्रतिशत)। इसके अलावा हर एक अमेरिकी विमान को गिराने के एक हज़ार डालर अलग से मिलना तय हुआ ।
इस डील का होना निजी कंपनियों की महत्वपूर्ण विजय थी क्योंकि दोनों देशों की सेनायें की सरकारें समाजवादी संस्थाएं थीं।"
-जोसफ हेलर के उपन्यास कैच -22 का एक अंश
पिछली सदी के दूसरे उत्तरार्ध में प्रकाशित , युद्ध से होने वाली बर्बादी का चित्रण करने वाले, इस व्यंग्य उपन्यास को पढ़ते हुए अंदाजा लगा कि निजी कंपनियाँ किस तरह दुश्मन और दोस्त दोनों से मुनाफ़ा पीटती थीं। बाद में राजनीति ने भी इस माडल को अपनाया जिसके लिए मेराज फैजाबादी कहते थे :
"पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेचना।"
मेराज फैजाबादी का यह शेर चालीस साल पहले सुना था। इस बीच इसका प्रसार और भी महीन तरीक़े से समाज के हर हिस्से में नजर आता है। बड़े-बड़े देशद्रोही, समाजद्रोही लोग देशप्रेम के नारे लगाकर देश, समाज को लूटने में लगे हैं। दुनिया के हर हिस्से में ऐसे ही लोग छाये हुए हैं।व्यापार उनके ख़ून में है।

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