Monday, June 05, 2006

अजीब इत्तफाक है…

http://web.archive.org/web/20110902194038/http://hindini.com/fursatiya/archives/138


अजीब इत्तफाक है…

कुछ दिन पहले जब मैंने कुछ लेख लिखे तो रवि रतलामी जी ने लेख के खिलाफ फतवा जारी किया :-
अब इससे पहले कि फ़ुरसतिया जी का लिखा नया विष्णु पुराण सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, बंधुओं इस पुराण को यहीं समाप्त करने का अनुरोध किया जाए.दरअसल, आपकी साइकिल का पंक्चर कहीं हो गया है और उसे ठीक कराकर सड़क पर लाना जरूरी है – पुराण तो और भी कई हैं, लिख लेंगे – यायावरी वृत्तांत तो आप का देखा सुना भोगा है वो तो आपको ही लिखना होगा.यात्रा वृत्तांत में बाधा पड़ गई है, उसे दूर कर जरा नियमितता लाएँ, यही निवेदन है
इस फतवे का आशीष ने समर्थन किया। मैंने जब यह यात्रा विवरण लिखना शुरू किया था तो सोचा था कि हर हफ्ते कम से कम एक लेख अपनी यायावरी के बारे में लिखूँगा। कुछ दिन यह क्रम नियमित रहा तथा सप्ताह की शुरुआत को पोस्ट करने के चलते प्रत्यक्षाजी इसे सोमवारी चिट्ठा कहतीं रहीं। कुछ दिन की नियमितता के बाद इस साइकिल यात्रा की हवा सी निकल गई। इस व्यवधान में मुख्य कारण था कि हमारे पास जो फोटो थे उनके स्कैन नहीं करा पाया था। दूसरा कारण था कि जब हम यात्रा पर गये थे तब हमने नियमित डायरी लेखन कुछ दिन के बाद छोड़ दिया था। केवल प्रतिदिन का यात्रा विवरण -कहाँ गये,कहाँ रुके ,कब चले ,कब पहुँचे की तरह से लिख रखा था। सोचा था कि बाद में आराम से लिखेंगे।लेकिन संयोग कुछ ऐसा कि अभी तक नहीं लिख पाया।
अब रविरतलामी के तथा अन्य दोस्तों के फरमाइशी आदेश ,अमित की हरिद्वार-श्रषिकेश यात्रा विवरण,आशीष के रोचक हाफ पैंट-फुल पैंट विवरण तथा इससे पहले विजय वडनेरे के सिंगापुर विवरण तथा सुनील दीपक जी के इधर-उधर भ्रमण के विवरण ने फिर से हमें अपने यात्रा विवरण लिखने के पानी पर चढ़ाया है।
तो अब आशा है कि मेरी साइकिल नियमित चलेगी। कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट लिखने का प्रयास रहेगा। फोटो हमारे सारे काले-सफेद हैं। उस समय हमारे पास कोडक का क्लिक थ्री कैमेरा था जिसकी रील हम फोटो खींच के अपने पास रखते गये थे। तीन माह बाद धुलवाये गये। अब हमारे फोटो कोई मुगले आज़म फिल्म तो हैं नहीं जिनको रंगीन कराने का विचार बनाया जाय।
नेट की दुनिया बड़ी तेज है।रोज नये-नये लोग मैदान में आते जा रहे हैं। दिन पर दिन हम पुराने बासी होते जा रहे हैं। तरुन ने हमें अनुगूँज पर लिखने के लिए के लिये उकसाते हुये लिखा-
आप सीनियर चिठा्कारों को विशेष आमंत्रण है कि इस बार अनुगूँज में लिख ही डालिये, भाभी जी के गुस्‍से का ठीकिरा हमारे सर पे फोड़ दीजयेगा
अब बताओ हमें लिखते हुये दो साल भी नहीं हुये और हमें वरिष्ठ बना दिया गया। नीरज दीवान जी ने भी लिखा :-
बिना सोचे ही कह रहा हूं कि आपके इस लेख ने अब मुझे सोचने के लिए बाध्य कर दिया है. समझ गए ना आप. चुटीली शैली ने मुझे आपके ब्लॉग पर रोज़ आने वाला मेहमान बना दिया है. नोट कर लें. रोज़ परोसिएगा कुछ.
मतलब हमें नियमित लिखना है। लिखने के लिये तो रोज हमारा मन उचकता है। हम टाइप करके जब लेख पोस्ट कर देते हैं तब अक्सर बाद में लगता है -क्या बकवास लिखा है! लेकिन मजा यही है कि पिछली बकवास से सीख न लेकर आगे की बकवास के लिये मन उचकने लगता है। एक दिन इन्द्र अवस्थी ने कहा -तुम भी पूरे खुशवन्त सिंह हो रहे हो। हमने पूछा -कैसे? तो जानकारी देते हुये बताया कि खुशवन्त सिंह की कलम के लिये कोई गर्भ निरोधक नहीं बना वैसे ही तुम भी बेरोक-टोक,ऊटपटाँग लिखने में लगे रहते हो।
ऐसे ही आज दोपहर को हमारे कालेज के मित्र मनोज अग्रवाल के फोन ने हमें जगाया। मनोज आजकल बनारस के रेलवे के डीजल लोकोमोटिव वर्क्स में अधिकारी हैं। बचपन से कविता लिखने की बीमारी से ग्रस्त हैं तथा आजकल इस कुटेव से मुक्त नहीं हो पाये हैं।
मनोज अग्रवाल
मनोज अग्रवाल
हमसे हालचाल पूछा तो हमने बताया – चकाचक हैं। अपनापा दिखाना जरूरी मान के वो बोले -तुम साले कभी चकाचक के अलावा भी कुछ रहते हो? हम भी अपनेपन से घायल होकर बोले- हाँ काहे नहीं! मस्त हैं, झकास हैं,दिव्य हैं, टिचन्न हैं।
फिर बात ब्लाग की हुई हमने कहा -तुम आजकल हमारा ब्लाग नहीं पढ़ते। जवाब में फिर बेहद अपनेपन से बताया गया -आजकल साले तुम्हारा ब्लाग कामा,फुल स्टाप सहित पढ़ता हूँ। साथ में तुम्हारे दोस्तों का भी पढ़ता हूँ। तो भाई अगर किसी का ब्लाग बनारस से पढ़ा जा रहा है तो समझे उसे पढ़वाने में मेरा भी कुछ हाथ है।
हमने आगे कहा- अगर तुम पढ़ते हो तो टिप्पणी काहे नहीं करते? हमारे काबिल दोस्त का जवाब भी वही था जो विष्णु जी का था- हिंदी में ब्लाग कैसे लिखते हैं? यह हाल तब हैं जब हमारा दोस्त नियमित कम्प्यूटर इस्तेमाल करता है तथा मैं उसको उसका ब्लाग बना कर पोस्ट लिखना बता चुका हूँ। बहरहाल ,हम ज्यादा कोस नहीं पाये मनोज को क्योंकि मनोज ने हमारे लेखन की तारीफ करना शुरू कर दी।
तारीफ सुनता हुआ आदमी दुनिया का सबसे निरीह प्राणी होता है। चकोर की तरह तारीफ करने वाले चांद की तरफ मुँह बाये ताकता रहता है। लोग कहते हैं किसी की तारीफ वह ब्रह्मात्र जिसकी मार से कोई भी बच नहीं सकता बशर्ते तारीफ करने वाले को ब्रह्मात्र के ऊपयोग का ज्ञान होना चाहिये।
पहले तो हमने उसे टोंकने का मन बनाया लेकिन बाद में भारतीय संविधान में वर्णित मूल अधिकार (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के बारे में सोचते हुये तथा यह सोचकर कि विरोधी विचारों को भी पूरे आदर के साथ सुनना चाहिये मैंने मनोज को बोलने का पूरा मौका दिया।
मनोज ने कहा- तुम्हारे ब्लाग का अनगढ़ लहकटपन काबिले तारीफ है। लहकटपन दिन पर दिन बढ़ता जा रहा।
बाद में यह प्रमाण देने के लिये कि मेरे सारे ब्लाग पढ़े हैं मनोज ने बताया कि उन्होंने तो धूमिल की कविता के अंश
मैंने जिसकी पूँछ उठायी है
उसको मादा पाया है।
का आधार लेते हुये कविता भी लिखी है। हमने सोचा गई भैंस पानी में। धूमिल सुनेगें तो क्या सोचेंगे! बहरहाल ,हमने जैसे कि तारीफ करनी चाहिये की। वाह-वाह ,लिखो न अपने ब्लाग में। काहे नहीं लिखते। आदि-इत्यादि। लेकिन हमारी मुक्ति इतने में ही नहीं होनी थी। मनोज ने हमारी तारीफ के पानी चढ़ते हुये हमें फोन से कविता नोट कराई तथा बोले हम तो जब लिखेंगे तब लिखेंगे लेकिन फिलहाल हमारी यह कविता तुम अपने ब्लाग पर पोस्ट कर दो। अब हम अपने कालेजियट दोस्त का जो हमारे लेखन के लहकटपन फिदा होने की कम से कम बात तो करता है ,का आग्रह जैसे ठुकरा दें? लिहाजा प्रस्तुत है
मनोज अग्रवाल की कविता-
जिसको समझा पूरा,उसको आधा पाया,
जिस-जिसकी पूँछ उठाई,उसको मादा पाया।
थीं बातें बड़ी-बड़ीं,मगर थे दर्शन छोटे-छोटे,
स्वार्थ सिद्धि के दलदल में ,क्या खरे,क्या खोटे।
सुनते थे कानून की ताकत,पाया उसको भी अंधा,
व्यवस्था की शवयात्रा में, सबको देखा देते कंधा।
भूखी,अनपढ़,बेबस-पिसती देखी जनता,
जिसको समझा मिटना,उसको पाया बनता।
कलयुग के भगवान, देखा तेरा न्याय अजूबा,
कौवों को मोती चुगते देखा,और हंसों को भूखा।
जिसको समझा कम, उसको कुछ ज्यादा पाया,
जिस-जिसकी पूँछ उठाई ,उसको मादा पाया।
हालाँकि हिंदी ब्लाग जगत की वाह-वाह की परम्परा पर हमें पूरा भरोसा है लेकिन फिर हमें दूसरी परम्परा भी याद आई- पहली कविता दूसरी से अच्छी है,दूसरी में बात बढ़िया ढंग से कही गई है। इस बात को ध्यान में रखते हुये हमने कहा कि एक और सुना दो कविता उसे भी डाल दें। बरवादी हो तो कायदे से हो। मनोज ने भी बिना संकोच के दूसरी कविता लिखा दी-
मेरे घर के सामने
हुआ करता था एक सूखा पेड़
उस पेड़ पर बैठता था
एक उल्लू रोज
एक दिन वो पेड़ कट गया।
उस पेड़ की सूखी लकड़ी से
बनी एक सुविधाजनक कुर्सी।
अजीब इत्तफाक है
पेड़ पर उल्लू आज भी बैठा है।
कुर्सी पर बैठे यह कविता टाइप करते समय मुझे लग रहा है कि यह भी अजीब इत्तफाक है कि इसे मनोज ने कुर्सी पर बैठकर यह कविता लिखी तथा अधिकांश लोग जो इसे पढ़ रहे हैं वे भी कुर्सी पर बैठे हैं।
फिलहाल इन कविताओं पर आप अपने विचार लिखिये । संभव है कि आपके विचार पढ़कर हिंदी ब्लागजगत में एक और ब्लागर दुबारा पैदा हो जाये।
अचरज नहीं हम अगली पोस्ट में रविरतलामी के फतवे के अनुसार फिर से साइकिल चलाते पाये जायें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “अजीब इत्तफाक है…”

  1. प्रत्यक्षा
    वाकई दूसरी कविता पहली से ज्यादा अच्छी है :-)
  2. रवि
    चलिए, यूपी के मिनिस्टर के फ़तवे की तरह (उसकी राजनीति चल गई) अपना फ़तवा भी चल गया दीख रहा है. :)
  3. आशीष
    हम अपनी टिप्पणी तो यायावरी के चिठ्ठे पर ही देंगे
    मनोज जी की कविता पर एक शेर याद आ गया
    एक ही उल्लू काफी था,बर्बाद ए गुलिस्तां के लिये
    यहां हर शाख पर उल्लु बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा ?
  4. समीर लाल
    क्या बात कही है आपके मित्र ने दूसरी कविता के माध्यम से.यह तो अच्छा हुआ आज बिस्तर पर बैठ कर आपका ब्लाग पढ रहे थे.
    यात्रा वृतांत का वाकई इंतज़ार रहता है, जल्दी लिखिये.वैसे तो आप कुछ भी लिखें, होता तो मज़ेदार ही है.
  5. सुनील
    यह तो अच्छा है कि यहाँ लकड़ी की कुर्सी नसीब ही नहीं होती, प्लास्टिक से ही काम चलाना पड़ता है! आशा है कि आप के मित्र को बहुत सी कुर्सियाँ मिलेंगी जिसपर बैठ कर सभी ज्ञानी मित्र रात रात भर कविता पाठ करेंगे.
  6. नारद मुनि
    बहुत सुन्दर कविता है (ऐसा नही लिखेंगे तो एक ब्लॉगर भाई नही बढेगा), लगातार लिखते रहिए। और हाँ फुरसतिया जी को मोबाइल पर कविताएं सुनाते रहिए।
    और हाँ अब एक कविता हम भी झिला ही देते है (नही फुरसतिया जी की आत्मा को कष्ट होगा)
    …..कविता का मूड नही बना….. किसी और दिन सुनाएंगे। (तब तक फुरसतिया जी की आत्मा को भटकने दो।)
  7. फ़ुरसतिया » यायावर चढ़े पहाड़ पर…
    [...] नारद मुनि on अजीब इत्तफाक है…सुनील on अजीब इत्तफाक है…समीर लाल on अजीब इत्तफाक है…आशीष on अजीब इत्तफाक है…रवि on अजीब इत्तफाक है… [...]
  8. Amit
    तो अब आशा है कि मेरी साइकिल नियमित चलेगी। कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट लिखने का प्रयास रहेगा।
    अनूप जी, आप अपनी साईकल में tube-less टायर लगवा लो, हवा नहीं निकलेगी और पंक्चर भी नहीं होगा!! ;) :P
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… [...]

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