Wednesday, June 07, 2006

यायावर चढ़े पहाड़ पर…

http://web.archive.org/web/20110101191655/http://hindini.com/fursatiya/archives/139

[मित्रों के आग्रह तथा आदेशपर अपने आलस्य को परे धकेल के फिर से अपनी साइकिल यात्रा के किस्से बयान करना शुरू कर रहा हूँ। पहले के किस्से पढ़ने का मन करे तो यहाँ पढ़ें। फिलहाल यह संस्मरण प्रसिद्ध जैन तीर्थ पारसनाथ पर के बारे में ।जिस साथियों को पारसनाथ के बारे में और विस्तार से जानना हो वे इन कड़ियों को देखें।]

बगोदर से हम नास्ता करके सबेरे चल दिये। यात्रा के कार्यक्रम के हिसाब से हमारा अगला पड़ाव धनबाद था। हम साइकिल से खरामा-खरामा चलते हुये बढ़े जा रहे थे। मौसम कुछ गरम सा था। ८ जुलाई ,सन्‌ १९८३ । बारिश कुछ-कुछ होकर रुक जाती थी। गर्मी तथा उमस थी वातावरण में। कुछ देर बाद हमें याद आया कि हम हजारीबाग जिले में चल रहे हैं। हजारीबाग से याद आया कि यहीं की सेन्ट्रल जेल से जयप्रकाश नारायण दीवार फाँदकर फरार हो गये थे। जेल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बता कर फरार होने से जयप्रकाश जी की प्रसिद्धि बहुत हो गयी थी। हमें कुछ पता नहीं था हजारीबाग जेल के बारे में तथा इलाका भी वीरान सा था लेकिन सड़क के बायीं तरफ की हर ऊँची दीवार देखकर हम अनुमान लगाते कि हम जेल के बगल में चल रहे हैं। घाट सेक्सन में साइकिल चलाने में बहुत मेहनत पड़ती है। ऊँचाई पर चढ़ते समय दम फूलने लगता लेकिन हम जिद्द में साइकिल से नीचे नहीं उतरते थे। ऊँचाई पर चढ़ते हुये हमारी गति ट्रक के बराबर होती । कभी-कभी चढ़ाई पर चढ़ते समय हम बगल से गुजरते ट्रक की पीछे की जंजीर पकड़कर ट्रक के साथ चलते। दुर्घटना के अंदेशे को देखकर ड्रायवर क्लीनर हमको डांटते लेकिन हम जहां मौका मिलता जंजीर थाम लेते।

उतरते समय सर्र-सर्र साइकिल चलती। तब मोड़पर ब्रेक लगाना पड़ता। लगभग हर घाट सेक्सन में ‘हेयरपिन ब्लाइंड टर्न ‘ बोले तो अंधे मोड़ रहते हैं। बहुत सावधान रहना पड़ता है चढ़ते- उतरते समय। ट्रक चींटी की मानिन्द चढ़ते-उतरते देखकर हमें लगता कि इससे तेज तो हम ही हैं।

पारसनाथ पहाड़

पारसनाथ पहाड़
दोपहर के करीब हम निमियाघाट पहुँचे। वहाँ एक ढाबे में खाना खाया। हम लड़कों की वेशभूषा देख कर की लोग अंदाजा लगा लेते कि ये परदेशी आइटम है। लोग पूछताछ करते हुये आसपास के इलाके के टूरिस्ट गाइड बन जाते। ये नहीं देखा तो क्या देखा? यहाँ जरूर जाओ,वहाँ तो चले ही जाओ। निमियाघाट में खाना खाने के बाद ऐसे ही स्थानीय लोगों से पता चला कि हम जहाँ पर हैं वहां से पास ही प्रसिद्ध पारसनाथ जैन मँदिर है। पहाड़ पर स्थित प्रसिद्द जल मंदिर जैन धर्मावलंबियों के लिये श्रद्धा का केन्द्र है।

पारसनाथ मँदिर जैनियों के लिये इतना प्रसिद्ध है जितना मुस्लिमों के लिये मक्का। हमें लगा कि भाई जब मामला इतना प्रसिद्ध है तो देख लेने में क्या हर्जा? हम जब निकले ही आवारगी के लिये हैं तो इतनी महत्वपूर्ण जगह कैसे छोड़ दें। हमने तुरन्त तय किया कि देखना है मंदिर। अब ये कोई ब्लागर मीट तो थी नहीं कि महीने पहले से प्रोग्राम बनाया जाय,हफ्तों परिचर्चा की जाय। इधर प्रोग्राम तय किया उधर सीटी बजा के चल दिये।
फिर क्या , वहीं निमियाघाट पुलिस स्टेशन में अपनी साइकिलें जमा कीं तथा यायावर पर्वतारोहियों में तब्दील हो गये। पर्वतारोही इसलिये कि पारसनाथ मँदिर पारसनाथ पहाड़ पर स्थित है।

असल में पारसनाथ तो जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जनता द्वारा घिसकर अपनाया गया सरल नाम है। इस तीर्थ की महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि जैन धर्म के कुल चौबीस तीर्थंकरों में से बीस ने अपना अंतिम समय पारसनाथ पहाड़ पर ही बिताया तथा यहीं पर निर्वाण प्राप्त किया। जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ने हिमालय के जिस स्थान पर शरीर त्याग किया था वह स्थान अगम्य होने तथा बाद के बीस तीर्थंकरों द्वारा पारसनाथ में शरीर त्याग के कारण यहाँ की महत्ता और बढ़ जाती है। जैन धर्म के बारे में अक्सर लोग भ्रम बस भगवान महावीर को जैन धर्म का संस्थापक बताते हैं जबकि वे चौबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान महावीर ने पटना जिले के पावतपुरी में निर्वाण प्राप्त किया।

बहरहाल हम तीर्थयात्रा के लिये पहाड़ पर चढ़ने लगे। दोपहर के बाद चढ़ना शुरू किया था।खाना खाने के बाद हमारी गति वैसे भी धीमी थी। धूप भी थी लेकिन पहाड़ पर जगह-जगह पेड़ के कारण गर्मी नहीं लग रही थी। हमें तो पता नहीं था लेकिन लोग (बाद में पता चला)ने बताया कि पारसनाथ पहाड़ पर चंदन के बहुत सारे पेड़ हैं। जगह-जगह बकरी तथा दूसरे जानवर चराने वाले लोगों से हम रास्ता पूँछते जा रहे थे। निमियाघाट की तरफ से जाने वाला रास्ता आम रास्ता नहीं था । आम रास्ता मधुबन कस्बे से होकर है लेकिन वह हमारे रास्ते से अलग था।

रास्ते में कई जगह पानी के झरने मिले। हम उन दिनों पानी की बोतल लेकर नहीं चलते थे। बस ऐसे ही मुँह उठाकर जहाँ मन आया चल देते थे।लिहाजा पानी के लिये कई बार काफी इंतजार करना पड़ता था। फिर भी यह समझ नहीं विकसित की पानी का इंतजाम करके चला जाय। शायद कारण यह भी रहा हो कि हमें लोगों ,देश की आम जनता पर बहुत भरोसा था। यह भी संयोग है कि हमारा भरोसा कभी टूटा नहीं।

जलमँदिर
जलमँदिर
शाम होते-होते हम जब ४४८१ फुट ऊँचाई पर स्थित तीर्थस्थान पर पहुँचे तबतक हम बहुत थक चुके थे। लेकिन यह सोचकर कि अब आराम से सबेरे तक यहीं आराम करेंगे ,हमने सुकून की साँस ली।
हम वहाँ पहुँच तो गये लेकिन शाम होने के बावजूद इतने प्रसिद्ध तीर्थ में पसरा सन्नाटा हमें कुछ अजीब सा लग रहा था। चारो तरफ मंदिर जैसे बने थे लेकिन आदमी कोई नहीं दिखाई दे रहा था। हम सोच ही रहे थे कि कारण क्या है तबतक एक मंदिर से निकलकर एक साधु ने हमसे पूछा -तुम लोग कौन हो? यहाँ कैसे रुके हो?

हम लोगों ने अपने सवाल से उपजे आश्रचर्य को दबाते हुये श्रृद्धा पूर्वक बताया कि हम यहाँ भगवान के दर्शन करने आये हैं। जवाब में हमें झटका लगा जब हमें बताया गया कि यहाँ रात में किसी भी दर्शनार्थी को रुकने की अनुमति नहीं है। हमने बहुत विनय की की हम रास्ता नहीं जानते,रात को नीचे कैसे जायेंगे,यही बाहर पड़ें रहेंगे। लेकिन हमारी सारे अनुरोध खारिज कर दिये गये। बताया गया कि नीचे चले जाओ नहीं तो रात में जंगली जानवर खा जायेंगे। तमाम बेवकूफी तथा उत्साह के बावजूद हम लोग उस समय तक जंगली जानवरों भोजन बनकर निर्वाण प्राप्ति के तरीके के खिलाफ थे लिहाजा हमने नीचे जाने को तैयार हो गये। हमने बहुत विनयावत होके अनुरोध किया कि जिधर से हम आये हैं उधर से नीचे जायेंगे नीचे पहुँचने के पहले ही ऊपर पहुँच जायेंगे। क्योंकि हम जिस रास्ते से आये थे उस रास्ते में कई जगह बहुत संकरे रास्ते थे तथा कई जगह संकरे रास्तों के दोनों तरफ गहरी खाइयाँ थीं। दिन में सब कुछ भले ही सुहावना लग रहा था लेकिन रात में ऊधर से वापस जाने की बात सोचने मात्र से हमें डर लग रहा था।

खैर,हमारी परेशानी जायज मानते हुये हमारे साथ वहीं मंदिर के एक सेवक को साथ कर दिया गया। शायद वह वहां से रोज नीचे शाम को नीचे आने-जाने वालों में से था ।क्योंकि वहाँ पहाड़ पर खाने-पीने की सारी व्यवस्था नीचे से ही होती है। हमारे जैसे लोग आते होंगे वहां । उनको नीचे भेजने में सहयोग करने के लिये उसे लगा दिया जाता होगा। बहरहाल ,हम बिना वहां रुके नीचे के लिये चल दिये। शाम को चाय न पीने के कारण पेट अलग से कुलबुला रहा था। भूख भी लग आई थी। थकान तो थी ही। हम अँधेरे में सीढ़ियां -रास्ता तय कर रहे थे। यह रास्ता प्रचलित है तथा सुगम भी। इधर सीढ़ियाँ-रास्ता बना होने से आसान है।

लेकिन कुछ भी हो हम थके थे। हम कछुये की चाल से चल रहे थे। वह खरगोश सा फुदकता नीचे उतर रहा था। बीच-बीच में रुककर हमारी राह देखता जा रहा था। हम रास्ते भर जैन साधु को कोसते आ रहे थे कि कैसे साधु हैं? जो धर्म जीवों पर दया करने को कहता है उसके अनुयायी निर्दयता से थके यायावरों को नीचे भगा रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे रात होती गई पहाड़ में रह-रह कर गूँजती जानवरों की आवाज से लग रहा था कि जल्दी नीचे पहुँचें।

कुछ देर में ही हमें नीचे रोशनी दिखाई देने लगी। लेकिन जो रोशनी बहुत पास दिखाई दे रही थी उस तक पहुँचते-पहुँचते हम बेहाल हो गये। जिस दूरी (करीब छह किमी)को हमने दिन में करीब चार-पाँच घंटे में तय किया उसी को रात में हम एक घंटे से भी कम समय में करके नीचे आ गये। यह बताता है कि ऊपर उठने में कितनी ही मेहनत क्यों न की जाये,नीचे आने में ज्यादा समय नहीं लगता है।

नीचे जब पहुंचे तो हमारे पैर थकान के मारे में थरथरा रहे थे। आधा घंटा हम एक चाय की दुकान पर बैठे अपने पैर की कँपकँपी तथा दिल की धड़कन को काबू में लाने का प्रयास करते रहे।

उस दिन के हमारे पैरों तथा दिल की कुछ हालत दुष्यन्त कुमार का यह शेर बयान करता है:-
तू किसी रेल -सी गुजरती हो,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
रात को हम वहीं खाना खाकर एक श्वेताम्बर जैन धर्मशाला में रुक गये- मुफ्त में। उस दिन हमें पारसनाथ पहाड़ पर चढ़कर बिना अच्छी तरह दर्शन किये उतरना पड़ा। बहुत खला। बाद के दिनों में हमें अपने एक दक्षिण भारतीय मित्र की तुकबंदी अब याद रही है:-
बकरी चढ़ी
पहाड़ पर
और…
उतर गई।
वास्तव में यह हमारे साथ हुआ-
यायावर चढ़े
पहाड़ पर,
और…
उतार दिये गये।
हम निमियाघाट से चले थे पहाड़ पर चढ़ने के लिये। उतरे मधुबन नामक कस्बे में। इस प्रक्रिया में हम अपनी साइकिलों से पचास किमी दूर हो गये थे। साइकिलें अपने सवारों से पचास किमी दूर इंतजार करती रहीं। सवार खाना खाकर घोड़े बेंचकर सो गये थे।

दिलीप गोलानी(टोपी में),अनूप शुक्ला पहाड़ पर

दिलीप गोलानी(टोपी में),अनूप शुक्ला पहाड़ पर
मेरी पसन्द

गर्म और उदास बाड़े में
सहमी हुई बकरियाँ मिमियाँ रहीं हैं
अकस्मात दो झगडा़लू बकरी के बच्चे
अपने मन का गुस्सा निकालने के लिये
दो पाँवों पर खड़े होकर सींग लडा़ने लगते हैं।

नानी दादी की उम्र की बकरियाँ भी हैं
जिनके थन खूब दूध – भरे हैं
वे घुटनों पर झुकी विश्राम कर रहीं हैं
कभी-कभी भोली तिरछी निगाह से
दाड़ी वाले बकरों की ओर देखती हैं-
जैसे स्नेहाकुल औरतें!
-लुइस एल. फान्को, अर्जेण्टाइना

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “यायावर चढ़े पहाड़ पर…”

  1. e-shadow
    बहुत रोचक है आपका यात्रा वृत्तान्त। फिर कभी आपने पारसनाथ दर्शन किये या नही? आपकी हिम्मत की दाद देता हूँ (भले ही आप उसे उस उम्र की बेवकूफी कहें)।
  2. आशीष
    ये हुयी ना बात ! मजा आ गया….
    अगले अंक का इंतजार है…………..
  3. रवि
    …बहुत रोचक है आपका यात्रा वृत्तान्त।…
    और, जब इसकी 56 क़ड़ियाँ पूरी हो जाएँ, तो किताब के रुप में प्रकाशन हेतु किसी प्रकाशक को भी तैयार कर रखिए!
  4. अतुल
    विवरण अति सुँदर। रवि भाई का सुझाव तो सोने पर सुहागा।
  5. मनीष
    पुरानी बातें आपने इस तरह रखीं हैं जैसे अभी हाल फिलहाल में गये हों । बहुत रोचक लगी आपकी ये यात्रा ।
  6. Theluwa
    चकाचक, जल्दी कलकत्ता पहुँचो!
  7. फ़ुरसतिया » लागा साइकिलिया में धक्का,हम कलकत्ता गये
    [...] जैसा कि हमने बताया कि हम पारसनाथ पहाड़ पर चढ़े लेकिन बिना मंदिर का दर्शन किये हमें चढ़ने के तुरंत बाद नीचे उतरना पड़ा। इससे अहसास होता है कि हमें नीचे घसीटने वाली शक्तियाँ आज से नहीं वर्षों से सक्रिय हैं। किस-किस को कोसे! [...]
  8. Lovely
    बात यह है जंगली जानवरों से ज्यादा वहाँ नक्सलीओं का खतरा है. इसलिए निचे उतार देते हैं
  9. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती [...]

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