Tuesday, June 06, 2006

अभी उफनती हुई नदी हो…

http://web.archive.org/web/20110101200257/http://hindini.com/fursatiya/archives/141

अभी उफनती हुई नदी हो…

पिछले दिनों मातृ दिवस के अवसर पर अभिव्यक्ति के लिये ‘माँ’ शीर्षक कोई कविता भेजने के लिये पूर्णिमा वर्मन जी ने कहा था। मेरे तमाम खोजने पर भी कविता न मिल पाई। इसके बाद जब शोयेब ने अपने ब्लाग पर (६ जून,२००६)माँ के बारे में लिखा तब मैंने ‘कुँवर बेचैन’ की बहुत पहले सुनी कविता दुबारा खोजना शुरू किया। अब यह कविता मिल गई तो सोचा कि पोस्ट कर दूँ ताकि जरूरत पड़ने पर खोजने में आसानी रहे।
‘कुँवर बेचैन’ जी यह कविता पढ़ते समय मंच के आसपास किसी किस्म का व्यवधान नहीं पसन्द करते। पूरी तन्मयता से पढ़ते हैं जैसे पूजा कर रहे हों। उनकी माता का देहान्त तब हो गया था जब कुँवर बेचैन जी मात्र छह साल के थे। कम उम्र में माँ को खो देने का अभाव ही शायद उनके अपनी इस कविता से भावुक लगाव का कारण हो। ‘कुँवर बेचैन’ की यह कविता मैं खासतौर से ‘शोयेब के लिये पोस्ट कर रहा हूँ।

माँ


अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ,
रहो किसी भी दशा-दिशा में,
तुम अपने बच्चों का प्यार हो माँ।
नरम सी बाहों में खुद झुलाया,
सुना के लोरी हमें सुलाया ,
जो नींद भर कर कभी न सोई,
जनम-जनम की जगार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
भले ही कांटों भरी हों गलियाँ,
जो तुम मिलीं तो मिली हैं कलियाँ,
तुम्हारी ममतामयी अंगुलियाँ,
बता रहीं हैं बहार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
किसी भी मौसम ने जब सताया,
उढ़ा के आँचल हमें बचाया,
हो सख्त जाड़े में धूप तुम ही
तपन में ठँढी फुहार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
दिया जो तुमने वो तन लपेटे,
तुम्हारी बेटी, तुम्हारे बेटे,
सदा तुम्हारे ऋणी रहेंगे,
जनम-जनम का उधार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
तुम्हारे दिल को बहुत दुखाया,
खुशी तनिक दी बहुत रुलाया,
मगर हमेशा ही प्यार पाया,
कठोर को भी उदार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
बड़ों ने जो भी यहाँ कहा है,
‘कुंवर’उसे कुछ यों कह रहा है,
ये सारी दुनिया है एक कहानी,
तुम इस कहानी का सार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ,
रहो किसी भी दशा-दिशा में,
तुम अपने बच्चों का प्यार हो माँ।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “अभी उफनती हुई नदी हो…”

  1. प्रेमलता पांडे
    इतनी सुंदर कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद। बेचैन जी को बहुत बार कवि-सम्मेलनों में सुना है परंतु हमेशा उन्हें सुनने की इच्छा बनी रहती है।
    प्रेमलता
  2. सागर चन्द नाहर
    अनूप भाई साहब,
    बहुत वर्षों पहले रघुपति सहाय ” फ़िराक गोरखपुरी” ( जिनकी माँ का निधन शायद उन्हें जन्म देते ही हो गया था) की कविता ” माँ” पढी़ थी कविता याद नहीं है पर उसके भाव अभी तक याद है, इतनी सुन्दर कविता कभी नहीं पढ़ी। अगर आप ने पढी़ हो तो कृपया अपने चिठ्ठे पर प्रकाशित करावें।
    शब्द शायद कुछ यूँ थे
    वो माँ जो मुझे अपनी गोदी में खिला ना सकी….
  3. SHUAIB
    भैया जी, इतनी सुंदर कवीता खोजने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद। मां तो मां है जिस पर जितनी भी कवीतायें, तारीफें लिखो कम है। एक बार फिर धन्यवाद :)
  4. फ़ुरसतिया » रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी
    [...] सागर चन्द नाहर on अभी उफनती हुई नदी हो…प्रेमलता पांडे on अभी उफनती हुई नदी हो…आशीष on नेतागिरी,राजनीति और नेता संजय बेंगाणी on नेतागिरी,राजनीति और नेता SHUAIB on नेतागिरी,राजनीति और नेता [...]
  5. प्रत्यक्षा
    “माँ ” पर निदा फाज़ली जी की ये नज़्म याद आ गई….
    बेसन की सोंधी रोटी पर
    खट्टी चटनी जैसी माँ
    याद आती है चौका बासन
    चिमटा फुकनी जैसी माँ
    बान की खुर्री खाट के ऊपर
    हर आहट पर कान धरे
    आधी सोयी आधी जागी
    थकी दुपहरी जैसी माँ
    चिडियों की चहकार में गूँजे
    राधा मोहन अली अली
    मुर्गे की आवाज़ से खुलती
    घर की कुंडी जैसी माँ
    बीवी बेटी बहन पडोसन
    थोडी थोडी सी सब में
    दिनभर एक रस्सी के ऊपर
    चलती नटनी जैसी माँ
    बाँट के अपना चेहरा माथा
    आँखें जाने कहाँ गईं
    फटे पुराने इक अलबम में
    चँचल लडकी जैसी माँ
  6. SHUAIB
    Wah ji, ye bhi sunder aur pyari kavita hei
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी [...]

Leave a Reply

Post Comment

Post Comment

No comments:

Post a Comment

Google Analytics Alternative