Tuesday, June 27, 2006

पूर्णिमा वर्मन से बातचीत

http://web.archive.org/web/20140419213921/http://hindini.com/fursatiya/archives/150

पूर्णिमा वर्मन से बातचीत

इंटरनेट के माध्यम से कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया से जुड़े पाठकों रचनाकारों के लिये पूर्णिमावर्मन जाना-पहचाना नाम है। देश दुनिया के कोने-कोने में अभिव्यक्ति एवं अनुभूति के माध्यम से साहित्य-संस्कृति के प्रचार-प्रसार में जुटी पूर्णिमाजी बताती हैं :-
हिन्दी में शायद यह पहली पत्रिका होगी जहां संपादक एक देश में निदेशक दूसरे देश में और टाइपिस्ट तीसरे देश में हों। फिर भी सब एक दूसरे को देख सकते हों सुन सकते हों दिन में चार घंटे दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम। वो भी तब जब एक की दुनिया में दिन हो और दूसरे की दुनिया में रात। हम आपस में अक्सर कहते हैं, “हम दिन रात काम करते हैं। इसी लिये तो हम दूसरों से बेहतर काम करते हैं”।
पीलीभीत की सुंदर घाटियों में जन्मी पूर्णिमाजी को प्रकृतिप्रेम एवं कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। फिर मिर्जापुर व इलाहाबाद में इस अनुराग में साहित्य एवं संस्कृति के रंग भी मिले।संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि,पत्रकारिता तथा बेवडिजाइनिंग में डिप्लोमा पूर्णिमाजी के जीवन का पहला लगाव पत्रकारिता आजतक बना हुआ है। इलाहाबाद के दिनों में अमृतप्रभात ,आकाशवाणी के अनुभव आज भी ऊर्जा देते हैं। जलरंग,रंगमंच ,संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती रखने वाली पूर्णिमाजी पिछले पचीस सालों से संपादन,फ्रीलांसर,अध्यापन,कलाकार ,ग्राफिक डिजाइनिंग तथा जाल प्रकाशन के रास्तों से गुजरती हुई फिलहाल अभिव्यक्ति तथा अनुभूति के प्रकाशन तथा कलाकर्म में व्यस्त हैं।
पूर्णिमाजी जानकारी देते हुये बताती हैं कि अभिव्यक्ति तथा अनुभूति विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों के पाठ्‌यक्रम में सम्मिलित है। इसीलिये सामग्री के चयन तथा बदलाव में अतिरिक्त सजगता बरतनी पड़ती है। महीने में चार अंक नियमित रूप से निकालने में तमाम चुनौतियां से जूझना पड़ता है लेकिन पिछले पिछले पांच वर्षों में कोई भी अंक देरी से नहीं निकला।
कहानी,कविता,बालसाहित्य,साहित्यिक निबंध ,हास्यव्यंग्य सभी में लेखन करने वाली पूर्णमा जी का मन खासतौर से ललित निबंध तथा कविता में रमता है। कविता संग्रह ‘वक्त के साथ’ तथा उपहार स्तंभ की कविताओं की ताजगी तथा दोस्ताना अंदाज काबिले तारीफ है तथा बार-बार पढ़े जाने के लिये मजबूर करता है।
साहित्य संस्कृति के सत्यं,शिवं,सुंदरम् स्वरूप से आम लोगों को जोड़ने में सतत प्रयत्नशील पूर्णिमा जी को साधारण समझे जाने वाले जनजीवन से जुड़े रचनाकारों पर असाधारण विश्वास है। उनका मानना है कि बहुत कुछ लिखा जा रहा है आमजन द्वारा जो कि समाज को बेहतर बनाने काम कर सकता है । उसे सामने लाना हमारा काम है। हर शहर के जनप्रिय रचनाकारों की उद्देश्यपरक रचनायें सामने लाने के लिये सतत प्रयत्नशील पूर्णिमाजी के जन्मदिन के अवसर पर उनको मंगलकामनायें प्रेषित करते हुये शब्दांजलि पत्रिका के लिये लिये गये साक्षात्कार के प्रमुख अंश पूर्णिमाजी के प्रशंसक पाठकों के लिये खासतौर से यहाँ प्रस्तुत हैं:-

पूर्णिमा वर्मन
आपने लिखना कब शुरू किया?
कविता लिखना कब शुरू किया वह ठीक से याद नहीं लेकिन बचपन की एक नोट बुक में मेरी सबसे पुरानी कविताएं 1966 की हैं।
अभिव्यक्ति निकालने का विचार कैसे आया?
1995 में शारजाह आने के बाद मेरा काफ़ी समय इंटरनेट पर बीतने लगा। तब अहसास हुआ कि हमारी भाषा में दूसरी विदेशी भाषाओं की अपेक्षा काफ़ी कम साहित्य (लगभग नहीं के बराबर) वेब पर है। उसी समय चैट कार्यक्रमों में बातें करते हुए पत्रिका का विचार उठा था पर इसको आकार लेते लेते तीन साल लग गए। शुरू-शुरू में यह जानने में काफ़ी समय लगता है कि कौन दूर तक साथ चलेगा। किसके पास समय और शक्ति है इस योजना में साथ देने की। अंत में प्रोफ़ेसर अश्विन गांधी और दीपिका जोशी के साथ हमने एक टीम तैयार की। साथ मिल कर अभिव्यक्ति और अनुभूति की योजना बनाते और उस पर काम करते हमें दो साल और लग गए। यहां यह बता दें कि हममें से कोई भी पेशे से साहित्यकार, पत्रकार या वेब पब्लिशर नहीं था। और हमने सोचा कि विश्वजाल के समंदर में एकदम से कूद पडने की अपेक्षा पहले तैरने का थोडा अभ्यास कर लेना ठीक रहेगा।
जब आप इलाहाबाद में थीं तो वहां का रचनात्मक परिदृश्य कैसा था?
रचनात्मक परिदृश्य काफ़ी उत्साहवर्धक था। हिंदी विभाग में‘प्रत्यंचा’ नाम की एक संस्था थी जिसमें हर सप्ताह एक सदस्य अपनी रचनाएं पढता था। अन्य सब उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे। एक विशेषज्ञ भी होता था इस गोष्ठी में. उन दिनों हिंदी विभाग में डा जगदीश गुप्त, विजयदेव नारायण साही, डा मोहन अवस्थी, संस्कृत विभाग में डा राजेन्द्र मिश्र, डा राजलक्ष्मी वर्मा जैसे लोग थे, अंग्रेजी विभाग में भी कुछ नियमित हिंदी लेखक थे। मेयो कॉलेज में भी कोई न कोई हमें खाली मिल ही जाता था विशेषज्ञ का पद विभूषित करने के लिए। मनोरमा थी, अमृत प्रभात था, आकाशवाणी थी (वो तो अभी भी है) खूब लिखते थे। छपते थे। प्रसारित होते थे। थियेटर का भी बडा अच्छा वातावरण था। बहुत अच्छा लगता था।
उन दिनों तो इलाहाबाद सिविल सर्विसेस के लिया जाना जाता था। आपका इधर रुझान नहीं हुआ कभी?
नहीं, उन दिनों इलाहाबाद में उसके सिवा भी बहुत कुछ था। साहित्य, संगीत और कला की ओर ज़्यादा रुझान रहा हमेशा से. थियेटर का वातावरण भी काफ़ी अच्छा था उस समय।
आप सबसे सहज अपने को क्या लिखने में पाती हैं, कविता, कहानी,संस्मरण?
कविताएं, रेखाचित्र और ललित निबंध।
आपके पसंदीदा रचनाकार कौन से हैं?
कविताएं पढना काफ़ी पसंद है पर कोई एक नाम लेना मुश्किल है। सबसे पहले जो पसंद थे वे थे सुमित्रानंदन पंत। फिर जब आगे बढते हैं तो अलग-अलग कवियों की अलग-अलग विशेषताओं को पहचानना शुरू करते हैं और जाने-अनजाने हर किसी से बहुत कुछ सीखते हैं। काफ़ी लोगों के नाम गिनाए जा सकते हैं लेकिन इस तरह बहुत से नाम छूट भी जाएंगे जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है।
आप लगातार अभिव्यक्ति के काम में लगी रहती हैं. आपका पारिवारिक जीवन पर इसका क्या प्रभाव पडता है?
मेरे परिवार में दो लोग हैं. मेरी बेटी और मेरे पति. दोनों महाव्यस्त। इस तरह पत्रिका के लिए काम करते रहना सबमें सामंजस्य बना देता है।
भारत की तुलना में अबूधाबी में महिलाओं की, खासकर कामकाजी महिलाओं की स्थिति कैसी है? मेरा मतलब कामकाज के अवसर, परिस्थितियां और उनकी सामाजिक स्थिति से है।
शायद तुलना करना ठीक नहीं। यहां पारिवारिक दबाव कम हैं पर प्रतियोगिता ज्यादा हो सकती है। अगर काम के जितने परिणाम की कंपनी अपेक्षा करती है वह नहीं ला सके तो नौकरी खतरे में पड सकती है। बिना नौकरी के ज़िंदा रहना मुश्किल हो सकता है। पर साथ ही अंतर्राष्ट्रीय लोगों के साथ काम करना मनोरंजन और अधिक अनुभव वाला भी हो सकता है। शिक्षक, बिजनेस मैनेजमेंट,डॉक्टर, इंजीनियर सभी क्षेत्रों में महिलाएं हैं। विश्व के हर कोने से लोग यहां काम करने के लिए आते हैं। तो काफ़ी मेहनत करनी पडती है अपने को सफल साबित करने में। यही बात पुरुषों के लिए भी है।
आपकी अपनी सबसे पसंदीदा रचना (रचनाएं) कौन सी है?
मुझे तो शायद सब अच्छी लग सकती हैं। बल्कि सवाल मेरी ओर से होना चाहिए था कि आपको मेरी कौन सी कविता सबसे ज्यादा पसंद है।
क्या कभी ऐसा लगता है कि जो लिखा वह ठीक नहीं तथा फिर सुधार करने का मन करे?
हां, अक्सर और वेब का मजा ही यह है कि आप जब चाहें जितना चाहें सुधार सकते हैं।
अभी तक अभिव्यक्ति के अधिकतम हिट एक दिन ६00 से कम हैं. इंटरनेट पर आप अभिव्यक्ति की स्थिति से संतुष्ट हैं?
हां, काफ़ी संतुष्ट हूं। मैं इसको रोज क़े हिसाब से नहीं गिनती हूं। हमारा जालघर दैनिक समाचार नहीं देता। इसमें पाठक अपने अवकाश के क्षण बिताते हैं या फिर साहित्य की कोई महत्वपूर्ण जानकारी खोजते हैं। कहानी और व्यंग्य के काफ़ी प्रेमी हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों के तमाम हिंदी छात्र हैं।प्रवासी हिंदी प्रेमी हैं जो व्यस्त समय में से कुछ पल निकाल कर इसे देख लेना ज़रूरी समझते हैं। माह में चार बार इसका परिवर्धन होता है लेकिन इसकी संरचना ऐसी है कि एक महीने की सामग्री मुखपृष्ठ से हमेशा जुडी रहती है।तो हमारे पाठक दैनिक या साप्ताहिक होने की बजाय मासिक हैं। जो एक बार पढ लेता है वह दूसरे दिन दुबारा नहीं खोलता है। अगर दोनों पत्रिकाओं को मिला कर देखें तो इनके हिट 18,000 के आसपास हैं जो एक अच्छी संख्या है और अभी यह बढ रही है तो मेरे विचार से अभी असंतोष की कोई बात नहीं है।

नेट पत्रिकाओं को निकालने में क्या परेशानियां हैं?
परेशानी तो कुछ नहीं है। इसलिए देखिए हर दूसरे दिन एक नयी पत्रिका आती है वेब पर। हिंदी वालों में कंप्यूटर की जानकारी इतनी व्यापक नहीं है जितनी अंग्रेजी, ज़र्मन या फ्रेंच वालों में इसलिए जाहिर है कि हम पीछे हैं।दूसरे हिंदी में यूनिकोड का विकास और ब्राउजर सहयोग हाल में ही मिला है।एम एस आफ़िस भी पिछले साल ही हिंदी में आया है तो वेब पर हिंदी की सही उपस्थिति 2004 से ही हुई समझनी चाहिए। उसके पहले तो हम जबरदस्ती जमे हुए थे। सीमा भी कुछ नहीं है। वेब तो असीमित है। सीमाएं काम करने वालों की होती हैं।
दलित साहित्य, स्त्री लेखन की बात अक्सर उठती है आजकल कि दलित या स्त्री ही अपनी बात बेहतर ढंग से कह सकते हैं। आप क्या सोचती हैं इस बारे में?
क्या आप यह कहना चाहते हैं कि बाकी सब लोग अंग्रेजी में लिखने पढने बोलने लगे हैं? हां, मैं मानती हूं कि जनसाधारण की पहली जरूरत रोजग़ार की होती है। और भारत में रोज़गार परक सभी पाठयक्रम अभी तक अंग्रेजी में ही हैं।इसलिए भारतीय जनता पर अंग्रेजी सीखने का बोझ बना रहता है इस कारण भारत का वातावरण हिंदी बोलने या लिखने को प्रोत्साहित नहीं करता। स्त्रियों पर फिर भी पैसे कमाने का दायित्व कम है। दलितों में भी अंग्रेजियत समा नहीं गई है इतने व्यापक रूप से (जितनी दूसरी जातियों में) तो वे अभी हिंदी लिखने में अपने को योग्य और सुविधाजनक महसूस करते हैं। जिसका भी भाषा पर अधिकार है और हृदय संवेदनशील है वह अपनी बात कह सकता है। इसमें जाति या लिंग का सवाल कहां उठता है?

अभिव्यक्ति को शुषा फांट से यूनीकोड फांट में कब तक लाने की योजना है?

जितनी जल्दी हो सके, पर समय के बारे में कहना मुश्किल है। लोग समझते हैं कि अगर फांट कन्वर्जन का सॉफ्टवेयर आ गया तो पत्रिका को रातों-रात यूनिकोड पर लाया जा सकता है पर ऐसा नहीं है। इसमें कई समस्याएं हैं:-
1-फांट परिवर्तित करने के बाद सघन संपादन की ज़रूरत होती है। घनी प्रूफ़रीडिंग करनी होती है। नए फांट में इसको तेजी से करना संभव नहीं है। हमारे जालघर का आकार 300 मेगा बाइट से भी ज्यादा है तो इसमें लगने वाले समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। हम यह नहीं चाहते कि जिस समय यह काम हो रहा हो उस समय जालघर को कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाए। इसलिए समांतर काम करने की योजना है।
2-अभी हम शुषा के कारण विंडोज 98 पर काम कर रहे हैं। इसलिए एम एस आफ़िस हिंदी का प्रयोग नहीं हो रहा है। इसके अभाव में हमारे फोल्डर और फाइलें अकारादि क्रम से न हो कर ए बी सी डी के क्रम में हैं। यूनिकोड का पूरा इस्तेमाल हो इसके लिए ज़रूरी है कि फाइलों को अकारादि क्रम से व्यवस्थित किया जाए। जब ऐसा किया जाएगा तो हर पृष्ठ का पता बदल जाएगा। हमारे जालघर के अनेक अंश विदेशी विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम या संदर्भ अध्ययन में लगे हुए हैं। इनको अचानक या बार-बार नहीं हटाया जा सकता है। इसके लिए पहले से एक कंप्यूटर पर पूरा जालघर पुर्नस्थापित कर के पूर्वसूचना देनी
होगी कि यह पृष्ठ इस दिनांक से इस पते पर उपलब्ध होगा।
3-हम यह भी नहीं चाहते हैं कि काम करते समय आधी पत्रिका एक फांट में हो और आधी दूसरे फांट में। यह पाठक और प्रकाशक दोनों के लिए बहुत मुसीबत का काम है। और भी समस्याएं हैं पर सब बता कर सबको उबाना तो नहीं है। आखिर में एक दिन सभी को यूनिकोड में आना है तो हम जल्दी से जल्दी जैसे भी संभव हो उस तरह से आने की प्रक्रिया में हैं।
मुझे लगता है कि अत्यधिक दुख, विद्रोह, क्षोभ को छापने की बजाय खुशनुमा साहित्य जो बहुत तकलीफ़ न दे पाठक को, छापने के के लिए आप ज्यादा तत्पर रहती हैं। क्या यह सच है? यदि हां तो क्यों?
हम हर तरह का साहित्य छापना पसंद करते हैं बशर्ते वह साहित्य हो. आजकल साहित्य के नाम पर रोना धोना, व्यक्तिगत क्षोभ, निराशा या लोकप्रियता लूटने के लिए नग्नता, सनसनी या बहसबाजी क़ा जो वातावरण है उसे साहित्य का नाम दे देना उचित नहीं. स्वस्थ दृष्टि ही साहित्य कहलाती है। साहित्य में रसानुभूति होना जरूरी है। उदाहरण के लिए करुण रस लिखने के लिए करुणा में डूब कर उबरना होता है। उबर नहीं सके तो लेखन में रोनाधोना ही रहेगा। पर उबरना कैसे वो तो साहित्य शास्त्र में पढने का समय किसी के पास नहीं।
आपके लेखन में सबसे ज़्यादा प्रभाव किसका रहता है?
कह नहीं सकती। अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रभाव हो सकते हैं। हर लेखक की यही इच्छा होती है कि वह अपना रास्ता अलग बनाए. मेरा रास्ता अभी बना नहीं है।
आपकी रचनाओं के प्रथम पाठक कौन रहते हैं? घर में आपकी रचनाओं को कितना पढा जाता है?
मेरे पहले पाठक स्वाभाविक रूप से मेरे सहयोगी अश्विन गांधी और दीपिका जोशी होते हैं। घर में भारत में मां-पिताजी और भाई-भाभी पढते हैं। अमेरिका वाली बहन भी कंप्यूटर वाला सब लेखन पढने का समय निकाल लेती है। जो कागज़ पर प्रकाशित होता है वह उस तक नहीं पहुंचता। ससुराल में मेरी जिठानी हिंदी पढने की शौकीन हैं। प्रिंट माध्यम में जो कुछ आता है जरूर पढती हैं। वे कंप्यूटर इस्तेमाल करती हैं पर कंप्यूटर पर पत्रिका पढना अलग बात है। बाकी सब अपनी दुनिया में व्यस्त, सबके अलग-अलग शौक हैं।

देश से दूर रहकर साहित्य सृजन कैसा लगता है? देश से दूर रहना कैसा लगता है?

देश में रहने या परदेस में रहने में खास कुछ फ़र्क नहीं है। हां, यहां काम करने का समय और सुविधाएं ज्यादा हैं। एक कंप्यूटर पास में हो तो क्या देश क्या परदेस आप सभी से जुडे रहते हैं।

अभिव्यक्ति निकालनें में कितना खर्च आता है? कौन इसे वहन करता है?

इतना ज्यादा नहीं आता कि किसी से मांगना पडे। हम सब मिल कर उठा लेते हैं। पर लेखकों को मानदेय मिलना चाहिए। वह व्यवस्था हम नहीं कर पाए हैं। उस ओर प्रयत्नशील हैं।
आपका अपना रचनाकर्म कितना प्रभावित होता है संपादन से?
कुछ न कुछ ज़रूर होता होगा। जब सारा मन मस्तिष्क पत्रिका में लगा हो। पर मैं वैसे भी ज़्यादा लिखने वालों में से नहीं तो खास अंतर महसूस नहीं होता।
आप आलोचकों द्वारा स्थापित मान्य रचनाकारों की बजाय जनप्रिय रचनाकारों को ज्यादा तरजीह देती हैं. क्या विचार है आपके इस बारे में?
अपनी ओर से हम दोनों को बराबर स्थान देने की कोशिश करते हैं। आलोचकों द्वारा मान्य और स्थापित लेखकों को पुरस्कार और सम्मान दिए जाते हैं। ये रचनाकार थोडे से होते हैं। पर भारत में हजारों अच्छा लिखने वाले हैं.सबको सम्मान या पुरस्कार नहीं मिल जाता. पुरस्कार या सम्मान नहीं मिला इसका मतलब यह नहीं कि उनकी रचनाओं में दम नहीं। पुरस्कृत या सम्मानित लेखकों को बार बार प्रकाशित करना पाठकों के लिए उबाऊ हो सकता है। नियमित पत्रिका के लिए निरंतर नवीनता की आवश्यकता होती है। जनता में लोकप्रिय लेखकों को पुरस्कार के विषय में सोचने या तिकडम लगाने की जरूरत या समय नहीं मिलता इस बात को तो आप भी मानेंगे। आलोचकों के भी अपने-अपने पूर्वग्रह हो सकते हैं। इसलिए यह नहीं कह सकते कि जनप्रिय रचनाकार अच्छा नहीं लिखते। जनप्रिय रचनाकारों ने भी बेहतरीन साहित्य रचा है और लगातार रच रहे हैं। हम खोज कर ऐसा साहित्य अंतर्राष्ट्रीय पाठकों को सुलभ कराने की कोशिश करते हैं। प्राचीन साहित्य को संरक्षित करते हुए नए साहित्य को प्रोत्साहित करना ही हमारा उद्देश्य है और इसलिए न केवल जनप्रिय लेखक बल्कि उदीयमान लेखकों को भी हम पूरा प्रोत्साहन देते हैं।
हिंदी के कई चिठ्ठाकार आपके नियमित लेखक हैं- रवि रतलामी, अतुल अरोरा,प्रत्यक्षा आदि। चिठ्ठाकारी के प्रति आपके क्या विचार हैं?
रवि जीकी प्रतिभा बहुमुखी है इससे आप इनकार नहीं करेंगे। वे लगभग शुरू से ही हमारी पत्रिका से जुडे हुए हैं। उनके व्यंग्य और कविताएं लोगों ने पसंद की हैं। प्रौद्योगिकी के उनके नियमित स्तंभ ने उनके बहुत से शिष्य बनाए होंगे। मुझे यह बहुत बाद में पता चला कि वे हिंदी कंप्यूटिंग के क्षेत्र के जाने-माने विद्वान हैं। हमारे साथ स्तंभ लिखना उन्होंने बहुत बाद में शुरू किया। चिठ्ठाकारी लोग नियमित रूप से करते हैं और अक्सर व्याकरण और वर्तनी पर ध्यान नहीं देते। संपादन भी नहीं होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि उन लेखकों में प्रतिभा नहीं या उनकी हिंदी अच्छी नहीं। कुछ तो सुविधाओं की कमी है जैसे हर एक के पास हिंदी आफ़िस नहीं जो गलत वर्तनी को रेखांकित कर सके, दूसरे समय की भी कमी है। अगर इन्हीं लोगों को समय और सुविधा मिले तो हिंदी साहित्य का कायाकल्प हो सकता है। जब मैंने अतुल के कुछ छोटे आलेख देख कर उनसे नियमित स्तंभ की बात की थी तब वे रचनात्मक आकार में नहीं थे। उन्होंने समय और श्रम लगा कर उसे जो आकार दिया उसे सबने पसंद किया। इसी तरह बहुत से चिठ्ठे ऐसे हैं जिन पर ध्यान दिया जाए तो वे स्तरीय साहित्य की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। हमें प्रसन्नता होगी अगर ऐसे लोग हमारे साथ आकर मिलें और अभिव्यक्ति का हिस्सा बनें। चिठ्ठा लिखने में किसी अनुशासन या प्रतिबध्दता की जरूरत नहीं है। आपका मन है दो दिन लगातार भी लिख सकते हैं और फिर एक हफ्ता ना भी लिखें। पर जब पत्रिका से जुडना होता है तो अनुशासन और प्रतिबध्दता के साथ-साथ काफ़ी लचीलेपन की भी जरूरत होती है। ये गुण जिस भी चिठ्ठाकार में होंगे वह अच्छा साहित्यकार साबित होगा। प्रत्यक्षा हमारी लेखक पहले हैं चिठ्ठाकार बाद में। विजय ठाकुर और आशीष गर्गआदि कुछ और चिठ्ठाकारों के बारे में भी सच यही है ।

पूर्णिमा वर्मन>
आपने चिठ्ठा लिखना शुरू किया था। अश्विन गांधी के चित्रों के साथ कुछ खूबसूरत कविताएं लिखीं थीं, चिठ्ठा लिखना स्थगित क्यों कर दिया?
हमेशा के लिए स्थगित नहीं हो गया है। थोडा रुक गया है. मुझे अपनी कविताओं के लिए जैसे ले आउट की जरूरत थी उसके लायक तकनीकी जानकारी मेरे पास फिलहाल नहीं है। जैसे पृष्ठ मुझे चाहिए उसके लिए काफ़ी प्रयोग की आवश्यकता है जिसका समय नहीं मिल रहा है। कुछ चिठ्ठाकर जरूर ऐसे होंगे जिन्हें ब्लॉग पर ले आउट और ग्राफ़िक्स के प्रदर्शन की बढिया जानकारी होगी। शायद मुझे कोई ऐसा सहयोगी मिल जाए जो इस काम में सहयोग कर सके। पर अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। अगर हो भी तो इस व्यस्तता के दौर में दोनों ओर से काम करने का समय और सुविधा का संयोग होना भी जरूरी है।
कुछ हमारे जैसे चिठ्ठाकार हैं जो आपको जबरदस्ती अपना लिखा पढाते रहते हैं. क्या आप अन्य लोगों को भी नियमित पढ पाती हैं?
चिठ्ठाकार की सदस्य हूं तो नियमित मेल आती है। लगभग सभी नए चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे मिल जाते हैं। काफ़ी चिठ्ठे देखती हूं पर सभी लेख पढे हैं ऐसा नहीं कह सकती कभी-कभी छूट भी जाते हैं।

साहित्य से समाज में बदलाव की आशा करना कितना तर्क संगत है?

दो सौ प्रतिशत तर्क संगत है। आप ध्यान दें तो पाएंगे कि दुनिया के सभी क्रांतिकारी श्रेष्ठ लेखक हुए हैं। हां, लेखक में क्रांतिकारी के गुण होने चाहिए। मैं गांधी जी की इस कथन में विश्वास रखती हूं कि ”मुठ्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।”
दुनिया में खासकर अंग्रेजी भाषा में हर दूसरे महीने कोई बेस्ट सेलर आता है तथा कोई न कोई नया कीर्तिमान बना जाता है। इसकी तुलना में हिंदी साहित्य की गुणवत्ता तथा प्रचार-प्रसार की स्थिति को किस रूप में देखती हैं?हिंदी प्रकाशकों में कोई अरब-खरबपति नहीं है, इसलिए वे लोग जोखिम लेने से डरते हैं। नए लेखकों के प्रचार और प्रोत्साहन में पैसे नहीं फेंकते पर आशा रखती हूं कि जल्दी ही ये दिन दूर होंगे। हिंदी को फैशन और सभ्य समाज की भाषा के रूप में अभी तक प्रस्तुत नहीं किया गया है पर समय बदलेगा ज़रूर। अभी बीस साल पहले तक हिंदी में पॉप म्यूजिक़ हास्यास्पद बात समझी जाती थी। सब अंग्रेजी क़े दीवाने थे पर अब देखिए तो सोनी और एम टी वी पर हिंदी पॉप गायकी को कितना प्रोत्साहन मिल रहा है। वीवा, आसमां, इंडियन आइडोल अभिजित सावंत या फेमगुरुकुल के काजी तौकीर जैसे लोगों के पास फैन फालोइंग है, पैसा है। साहित्य में अभी उस ओर लोग सोच रहे हैं। आशा रखें कि यह सोच जल्दी ही कार्यान्वित हो और हिंदी के साहित्य सितारे भी लोगों की भीड क़े साथ जगमगाएं। बडे-बडे बुक स्टोर्स उनके विशेष कार्यक्रम आयोजित करें और उनके हस्ताक्षरों से युक्त पुस्तकें 10 गुने दाम पर बिकें।

नए लेखकों में आप किसमें सबसे ज्यादा संभावनायें देखती हैं?

नाम लेकर तो नहीं कहूंगी पर आजकल हिंदी में लिखने वाले पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा हैं, विद्वान हैं, अंतर्राष्ट्रीय अनुभव से संपन्न हैं। आज हिंदी लेखक कुर्ता झोला वाली छवि से बाहर आ चुका है. वे प्रकाशक या प्रचार के मोहताज भी नहीं हैं. चाहें तो अपना पैसा खर्च कर के स्वयं को स्थापित कर सकते हैं। बस दस साल और इंतजार करें। हिंदी की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है।

आपकी पसंदीदा पोशाक क्या है?

सदाबहार साडी।

खाने में क्या पसंद है?

कददूकस किया हुआ अरबी खीरा हल्का सा नमक डाल के, गरम-गरम हिंदुस्तानी रोटी के साथ।
सबसे खुशी का क्षण याद हो कोई?
जीवन में कोई बडा उतराव चढाव नहीं रहा। इसलिए खुशी या अवसाद की ऐसी कोई विशेष घटना याद नहीं।
सबसे अवसाद का क्षण?
जैसा पहले कहा।

अगर आपको फिर से जीवन जीनेका मौका मिले तो किस रूप में जीना चाहेंगीं?

मैं 21 साल की उम्र से अभिव्यक्ति पर काम करना चाहूंगी ताकि जब मैं 50 की होऊं तब तक यह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ जालघर हो जाए। 21 वर्ष की उम्र से इसलिए कि इसके पहले मैं वेब पब्लिशिंग में स्नातक या परास्नातक कोई डिग्री लेना पसंद करुंगी।
शब्दांजली के लिए कोई संदेश देना चाहेंगी?
तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार।

18 responses to “पूर्णिमा वर्मन से बातचीत”

  1. मनीष
    पूर्णिमा जी के साक्षात्कार को हम सबों के साथ बांटने के लिये धन्यवाद !
  2. प्रेमलता पांडे
    यह साक्षात्कार मैंने शब्दाँजली में पढ़ा था पुनः पढ़वाने के लिए धन्यवाद। अन्य साक्षात्कार भी पढ़वाएँ।
  3. Anunad
    पूर्णिमा जी का जीवन, उनकी लगन और उनके विचार सब हमारे लिये प्रेरणास्पद हैं | अभिव्यक्ति और अनुभूति में छपी रचनाओं एवं उनके महान योगदान से तो मैं परिचित था, लेकिन उसके पीछे तपस्या किसकी है, यह अच्छी तरह नही पता था | मुझे इस बात में पूरा यकीन है कि हर महान कार्य के पीछे कोई तपस्वी अवश्य होता है | इस साक्षात्कार के माध्यम से उस तपस्वी से साक्षात्कार हो गया | अनूप जी को भी साधुवाद |
  4. संगीता मनराल
    धन्यवाद अनूप जी,
    पूर्णिमा जी से रुबरू कराने के लिये| वैसे पूर्णिमा जी से मिलने का सौभाग्य इस वर्ष के शुरूवात में हुआ था| जब वें चतुर्थ (4th) प्रवासी उत्सव में हिस्सा लेने दिल्ली पँहुची| जहाँ उन्हें “अक्षरम प्रवासी मीडीया सम्मान” से नवाज़ा गया|
    जितना अच्छा उनसे मिलकर लगा| वैसा ही सुखद अनुभव साक्षात्कार पङकर हो रहा है|
  5. Neeraj Diwan
    सकारात्मक सृजनशील साहित्यकार पूर्णिमा जी की अभिव्यक्ति को मेरी शुभकामनाएँ. अनूप जी को धन्यवाद क्योंकि उनकी वजह से हम पूर्णिमा जी जैसी मूर्धन्य साहित्यकार के बारे में विस्तार से जान सके.
  6. मितुल
    पूर्णिमा जी के साक्षात्कार के लिए धन्यवाद, काफी प्रेरणादायक और रोचक है। हम भी विश्वास रखते है कि ”मुठ्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।”
    पूर्णिमा जी का काम उन सभी लोगो के लिए एक सीख है जो केवल शिकायत करते है कि हिन्दी का उपयोग कोम्पुटर पे नही हो रहा, और करते कुछ भी नही।
  7. suresh goyal hissar
    kis ko dhanvad do anup ji ko ya purnima ji ko jo itna badhia saksatkar padhne ko mila bahut acha paryas ha asa ha bhavisya me or nae experiment karte rhanga
  8. जाकिर अली "रजनीश"
    पूर्णिमा वर्मा जी को मैं एक सम्पादक के रूप में जानता रहा हूं। जीमेल पर अक्सर उनसे चैट भी होती रही है। इस साक्षात्कार के द्वारा उनके विशाल व्यक्तित्व का परिचय मिला, पढकर अच्छा लगा। इतनी सुन्दर वार्ता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
  9. mrityunjay mishra
    behtarin sakchatkar k liye anoop ji ko dhanywad. poornima ji jaisi sahityakar k bare me jankar kafi accha laga. anoop ji prays karte rahiyega kuch aur sahityakaro se mulakat karane ka.
  10. अविनाश वाचस्पति
    पूर्णिमा जी से पहली बार मिलना 10 सितम्‍बर 2008 को प्रख्‍यात कवि बल्कि ऑलराउंडर अशोक चक्रधर जी के निवास पर हुआ। मेरे साथ मेरे मित्र पवन चंदन साथ थे। इस अवसर पर श्री विजेन्‍द्र विज, बागेश्री चक्रधर, पायल शर्मा, स्‍नेहा चक्रधर और अशोक चक्रधर जी तो थे ही। कुल मिलाकर अविस्‍मरणीय मुलाकात और बातचीत रही। हम न उन्‍हें और न इन्‍हें कभी भुला न पायेंगे और सच बतलायें भुलाना चाहते भी नहीं। पूर्णिमा वर्मन जी जयजयवंती सम्‍मान के सिलसिले में दिल्‍ली में थीं और पवन चंदन और मैंने अवसर नहीं गंवाया। खूब बतियाया। उनकी दी गई सलाहों को अमली जामा पहनायेंगे। कम्‍प्‍यूटर साक्षरता फैलायेंगे।
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी 7.गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी 8.गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… 9.मौसम बड़ा बेईमान है… 10.सितारों के आगे जहाँ और भी हैं… 11.अमरीकी और उनके मिथक 12.अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार 13.पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक 14.पूर्णिमा वर्मन से बातचीत [...]
  12. Anonymous
    सटकर बैठा चांद एक दिन
    अपनी मम्मी से यह बोला
    करने दो अब मुझे मोहब्बत
    गाने भी दो झिंगा लाला।
    मेरे नाम पे कितने ही जोड़े
    रोज मोहब्बत कर जाते हैं
    काला अक्षर जिनको भैंस बराबर
    वे भी इलू-इलू चिल्लाते हैं।
    उमर हो रही मेरी भी अब
    अब मैं भी प्रेम गीत गाऊंगा
    किसी सुन्दरी के चक्कर में पड़
    सबसे ऊंचा आशिक कहलाऊंगा।
    बिना प्रेम के सड़ी जिन्दगी
    गड़बड़-सड़बड़ सी लगती है
    शांत-शांत से गुजर रहे दिन
    मन में खड़बड़-खड़बड़ होती है।
    लोग कहेंगे इस चंदा ने
    कित्ते प्रेमी मिलवाये हैं
    रूखे-सूखे दिल वालों में
    प्रेम बीज पनपायें हैं।
    लेकिन खुद न प्रेम कर सका
    है नहीं किसी के लिये मरा
    मिला किसी से नहीं आज तक
    नहीं उठाया किसी का नखरा।
    इसलिये सुनो मम्मी अब तुम
    मैं भी प्रेम गीत अब गाऊंगा
    इश्क मोहब्बत में जो होता है
    वह सब अब मैं फ़रमाऊंगा।
    मम्मी बोली सुन मेरे बच्चे
    तुमने जी मेरा हर्षाया है
    तेरी बातों से लगता है अब
    तू सच्ची में पगलाया है।
    युग बीते मैं बस रही तरसती
    कब मेरा बच्चा प्रेमगीत गायेगा
    गला फ़टा है तो क्या बेटा
    हल्ले-गुल्ले में सब दब जायेगा।
    कन्या के संग इधर-उधर तू
    डिस्को करता खूब फ़िरेगा
    तेरी और बुराई छिप जायेंगी
    बस मजनूंपन का हल्ला होगा।
    कन्या कैसी चाहिये तुझको
    बस थोड़ा ये भी बतला दो
    अभी फ़ाइनल कर लेते हैं
    अखबार में विज्ञापन दे दो।
    दो दिन में न्यूज छपेगी
    अप्लाई कन्यायें कर देंगी
    दो दिन में फ़िर छांट-छूंटकर
    तेरे लिये कुड़ी-चयन कर दूंगी।
    लड़की लड़की जैसी हो बस
    थोड़ी उसको अंग्रेजी आती हो
    जब शरमाना तो हड़काये औ
    हड़काने के मौके पर शर्माती हो।
    एस.एम.एस.करना आता हो
    बातें चटर-पटर करती हो
    झूठ बोलने से गुस्साती हो
    पर बोलने पे हल्के से लेती हो।
    मम्मी अब क्या तुम्हें बताऊं
    कैसी लड़की चाहिये मुझको
    पहला प्यार का मामला है
    मैं बतलाऊं क्या कैसे तुमको।
    मम्मी जी ने खबर भेजवाई
    सब अखबारों ने विज्ञापन छापा
    अनगिन सारे बायोडाटा आये
    अनगिन ने मारा सवाल का छापा।
    लड़के की लम्बाई क्या है
    वजन कहो कै केजी है
    लड़का लड़की के साथ रहेगा
    या मम्मी का हांजी-हांजी है।
    बात दहेज की भी फ़रिया लें
    क्या कुछ उधार चल जायेगा
    वैसे तो हम सब कैश ही देंगे
    क्या कुछ काइंड में चल जायेगा।
    लड़की जींस पहनती है पर
    क्या घूंघट की आदत डाले?
    अपने सारा अल्हड़पन क्या
    लाये साथ या यहीं दफ़ना ले?
    जैसे आप कहेंगी वैसे ही
    लड़की तो ढ़ल जायेगी
    नहीं पटेगी गर लड़के से
    अपना मुंह सिल निभायेगी।
    लेकिन भैया लड़के की
    नाप भेजा दो फ़ौरन से
    सूट सिलाना है दूल्हे का
    पक्का करना है दर्जी से।
    ऐसे भी रिश्ते आये थे
    जिनमें कुछ उल्टी बातें थी
    लड़के को उस तरफ़ जाना था
    उसकी ऐसी-तैसी पक्की थी।
    दो बार मिलेगा मम्मी से
    लड़की के हिसाब से चलना है
    धीमे-धीमे से मुस्काना है
    हफ़्ते में दुइऐ बार चहकना है।
    ससुराल को स्वर्ग समझना है
    और पत्नीजी को आकाशपरी
    मम्मी की याद करी अगर
    समझो रिश्ते पर गाज गिरी।
    मम्मी ने जब चंदा से पूछा
    उसकी आंखे भर्राय गयीं
    बोला मम्मी तुम क्या करती
    काहे मोरा व्याह कराय रही।
    हमने कन्या की बात करी
    बस खाली प्यार करन को
    शादी की न अभी उमर मेरी
    न कोई इच्छा व्याह करन की।
    अभी मुझे आवारा फ़िरने दो
    कुछ मौज-मजे से रहने दो
    कन्या की भी तुम चिंता छोड़ो
    मैं खुद जुगाड़ कुछ कर लूंगा।
    कुश की शादी में जाऊंगा
    कुछ सुमुखि सुंदरियां देखूंगा
    बात करूंगा हौले-हौले
    उनके दिल में जा बैठूंगा।
    इस तरह खोजकर कन्या कोई
    मैं अब लव करके ही मानूंगा
    चाहे कुछ भी करना पड़ जाये
    लेकिन मैं मजनू बनकर हीमानूंगा।
    मम्मी ने ली उसकी बलैयां
    प्यार से उसका माथा चूमा
    चांद गया फ़िर ड्यू्टी पर अपनी
    खिला-खिला सा उस दिन घूमा।
  13. सतीश पंचम
    मैंने अभिव्यक्ति और अनूभूति दोनों साइटों पर कई बार विजिट किया है, कई बार वहां से रोचक सामग्रीयों का संदर्भ यदा कदा मित्रों आदि के बीच शेयर किया है लेकिन नहीं जानता था कि उनके संचालक कौन हैं।
    इस साक्षात्कार के जरिये जानने का मौका मिला। बहुत बहुत आभार।
  14. व्न्दना अवस्थी दुबे
    शानदार व्यक्तित्व का, शानदार व्यक्तित्व के द्वारा लिया गया जानदार साक्षात्कार. बधाई, शुक्रिया सहित :)
  15. राजेंद्र अवस्थी
    गुरुवर नमस्कार,
    बहुत ही अच्छी जानकारियों से भरपूर शानदार “बातचीत” पढ़ने को मिली इसके लिए आपको आभार व्यक्त करता हूँ, हकीकत को वास्तविकता के साथ लिखना कोई आपसे सीखे..
  16. GGShaikh
    पूर्णिमा बर्मन जी की संयत्ता और आत्मविश्वास हर किसी के लिए उर्जाप्रद…
    एक संपादक में जो गुण, दृष्टि, अपने काम की जानकारी, सूझबूझ होनी चाहिए
    वह पूर्णिमा जी में पर्याप्त है, और मिथ्याभिमान तो है ही नहीं उनमें…
    ऐसी सौम्य, निराभिमानी को हमारा सआदर सलाम…जोकि आदर अर्जित व्यक्तित्व तो
    उनका पहले से ही है… प्रसन्नता हुई यह साक्षात्कार पढ़कर…
  17. shikha varshney
    पूर्णिमा जी से यूँ मिलना अच्छा लगा .मैंने अपने हालिया वेब पत्रकारिता के वक्तत्व में अभिव्यक्ति और अनुभूति को भी कोटे किया था.आभार.

    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..तू और मैं …
  18. archana
    पूर्णिमा जी के बारे में जानना अच्छा लगा….देर से ही सही..मगर पूर्णिमा जी को जन्मदिन की बधाई…

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पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक

http://web.archive.org/web/20140419215004/http://hindini.com/fursatiya/archives/149

पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक


पूर्णिमा वर्मन>
करीब दो साल पहले जब मैंने नेट का प्रयोग करना शुरू किया था तो हमारे मित्र गोविंद उपाध्याय ने अभिव्यक्ति पत्रिका के बारे में बताया। तब से मैं इसका नियमित पाठक हूँ। अभिव्यक्ति में उन दिनों हमारे कानपुर के कृष्ण बिहारी जी अपने जीवन के संस्मरण लिख रहे थे। हम उन बेबाक संस्मरणों को पढ़ते-पढ़ते अभिव्यक्ति से जुड़ते चले गये तथा उसके नियमित पाठक बनते चले गये। बाद में इसी पत्रिका में छपा रवि रतलामी का वह लेख जिसने मुझे ब्लाग जगत में घसीटा ।
अभिव्यक्ति कुछ दिन हमारी आदरणीय सी नेट पत्रिका रही। हम उसके पुराने अंक पढ़ते रहे। किसी भी लेखक कवि की कोई रचना खोजनी होती हम खट से अभिव्यक्ति को खोजते । आज भी यह हमारे लिये साहित्य सम्बंधित साम्रगी खोजने के लिये सम्पूर्ण भले न हो लेकिन एकमात्र विश्वनीय अड्डा है।
कुछ दिन बाद अभिव्यक्ति में हमारे साथियों की चहल-पहल बढ़ी। रविरतलामी के बाद फिर नयी शुरूआत अतुल से हुई। जब उनके अमेरिकी जीवन के संस्मरण अभिव्यक्ति में छपने शुरू हुये। हमें अभी भी अतुल की मिठाई का डिब्बा हाथ में थामे फोटो याद है जो उनके अभिव्यक्ति में लेख छपना शुरू होने उन्होंने पता नहीं किसको खिलाई हो लेकिन दिखाई सबको थी।बाद में उसी डिब्बे निकाल कर पंकज ने जलेबी सबके सामने रख दी थी।
फिर धीरे-धीरे ब्लागजगत के और साथी अभिव्यक्ति के लगभग नियमित लेखक होते गये। इनमें आशीष गर्ग,अतुल अरोरा,रमण कौल, विजय ठाकुर,जीतेंद्र चौधरी,इंद्र अवस्थी,अनूप शुक्ला भी शामिल थे। कुछ लिया तो कुछ दिया के तहत कुछ महारथी ऐसे भी थे जो अभिव्यक्ति के लेखक पहले थे वहां से होते हुये ब्लागजगत से जुड़े। प्रत्यक्षा तथा मानसी इनमें प्रमुख हैं।धीरे-धीरे यह सम्माननीय पत्रिका आदरणीय के साथ-साथ हमारी अपनी पत्रिका होती गई जिससे हमारा लगाव-जुड़ाव बढ़ता गया ।अब ऐसा विरला ही अंक होता है जिसमें हमारे साथियों की किसी न किसी रूप में भागेदारी न हो।

पूर्णिमा वर्मन
एक दिन ऐसे ही अपनी मेल देख रहा था तो याहू मैसेंजर भी खुला था। पता चला कि पूर्णिमा वर्मन जी हमसे बात करना चाहता हैं। हमारे लिये यह खुशी तथा गौरव की बात थी। बचपन से ही हम गुरुओं तथा सम्पादकों के प्रति अपने मन खास सम्मान रखते आये हैं। अपने काम की मजबूरी के तहत मुझे दो इंटर कालेज का प्रबंधन देखना पड़ता है । मुझे बहुत अटपटा लगता है जब उन विद्यालयों में जाने पर मुझसे हमारे शिक्षक साथी आदर जैसे भाव से बात करते हैं। यही बात सम्पादकों के साथ हैं। मैं बता नहीं सकता मुझे कितना असहज लगता रहा जब हर तरह से हमारे आदर की पात्र होने के साथ-साथ सम्पादिका होने के बावजूद पूर्णिमा जी मुझसे कहती हैं-अनूपजी आप कैसे हैं?
बहरहाल पूर्णिमाजी से बात हुई । कुछ कहानी चाहिये थी उनको गिरिराज किशोर की। हमने तब से लेकर अब तक सैकडो़ बार बात की होगी उनसे। कभी काम की ,ज्यादातर ऐसे ही। पूर्णिमा जी जब फुरसत में होंती हैं तो ढेर सारी बातें करती हैं।लेकिन जब अभिव्यक्ति या अनुभूति निकालने का समय होता है तो उनके बातचीत की शुरूआत नमस्ते से शुरू होकर फिर बात करते हैं में खतम हो जाती है बीच में कुछ बेहद जरूरी काम से संबंधित कुछ बातचीत ही होती है जिसमें भी प्रकाशन से सम्बंधित जानकारी ही एकमात्र मुद्दा होता है।काम के प्रति पूर्णिमा जी यही समर्पण ही वह कारक है कि अभिव्यक्ति सालों से हर सप्ताह नियमित रूप से प्रकाशित होती है,बिना किसी देरी के हर हफ्ते। अभिव्यक्ति और अनुभूति ,जिन्हें वे बड़े लगाव से अभि,अनु कहती हैं, को पूर्णिमाजी के सबसे नजदीकी होने का गर्व हासिल है।
अपनों के संग सब मेले हों/सच सपने सब अलबेले हों/किस्मत करे श्रंगार!/जन्मदिन आये बारंबार!
हिंदी के प्रचार-प्रसार के बारे में ढेर सारी योजनाओ से लेकर याहू में नमस्ते का आइकन कैसे लाया जाय तक। हिंदी का सारा अच्छा साहित्य नेट पर लाने की उनकी नित नयी कोशिशें चलती रहती हैं। इन कोशिशों में जहाँ गौरवगाथा जैसे प्रयास हैं जिनमें कालजयी लेखकों की मील का पत्थर मानी जाने वाली रचनायें हैं वहीं चिट्ठा पंडित जैसी गतिविधियां भी हैं जिनमें लेखन सागर में एकदम ताजा छलांग लगाने वाले के प्रयासों का भी जिक्र है।
वेब पर सदा हाजिर, दुनिया के हर कोने से हिंदी की आवाज को बुलंद करने के लिए तत्पर पूर्णिमा जी हिंदी का लोकप्रिय साहित्य नेट पर लाने के लिये सदैव प्रयासरत रहती हैं। मुझसे हमेशा कानपुर के सभी साहित्यकारों का लेखन नेट पर लाने का काम करने के लिये कहती रहती हैं। जिन दिनों मैं अपने स्वामीजी के साथ हैरी पाटर के जादू तथा हामिद के चिमटे की जुगलबंदी करा रहा था उन दिनों पूर्णिमाजी का विचार है कि देवकी नन्दन खत्री का चन्द्रकान्ता नेट पर लाया जाना चाहिये। धारावाहिक रूप में कुछ भाषा में बदलाव लाकर ताकि केवल खड़ी बोली से वास्ता रखने वाले पाठक भी इसका आनंद उठा सकें।
उमर की लंबी डगर रहे/साथ मित्रों का बसर रहे/
मान मर्यादा अजर रहे/साल भर सुंदर सफर रहे।
पूर्णिमाजी का विश्वास है कि “मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।” नेट पर हिंदी की बढ़ती गतिविधियां उनके इस विश्वास को सच में बदलने का प्रयास हैं। पूर्णिमा जी के अभिव्यक्ति के माध्यम से देश-दुनिया में हर जगह उनके सम्पर्क सूत्र फैले हैं-खास कर हिंदी कला तथा साहित्य से संबंध रखने वाले। निरंतर की शुरूआत में जो लेख उन्होंने लिखा था उसमें अभिव्यक्ति के प्रारम्भ से लेकर उस समय के प्रसार तक के बारे में लिखा गया था। किस तरह एकल प्रयास से शुरू होकर पत्रिका इस रूप में पहुंची कि विदेशों में हिंदी अध्ययन के लिये संदर्भ पत्रिका के रूप में मानी जाती है।
निरंतर के कुछ समय के लिये बंद होने पर वे बार-बार हम लोगों को उकसाती रहती थीं कि कैसे इतने मेहनती ,मेधावी लोग होकर एक नियमित मासिक पत्रिका नहीं निकाल सकते ? शायद उनके इस प्रोत्साहन का भी प्रभाव है नेपथ्य में कि निरंतर का फिर से प्रकाशन होना लगभग तय हो चुका है तथा शीघ्र ही यह नये कलेवर में पाठकों के सामने होगी।
फूल भरा सुंदर गुलदस्ता/देखो कहता हंसता हंसता/दुख का जीवन में ना भय हो/जन्मदिवस शुभ मंगलमय हो
पूर्णिमा जी ने अपने इलाहाबाद के दिनों में तमाम अखबारों के लिये संवाददाता का काम किया। इलाहाबाद की ट्रेनिंग उनके अभिव्यक्ति के संपादन में झलकती है। सनसनीखेज लेखन को तथा उछालने से परहेज रखते हुये विवादों से बचकर अपना काम करते रहना उनकी सफलता का मूलमंत्र है शायद। पूर्णिमाजी अभिव्यक्ति की सफलता का श्रेय सामूहिक रूप से अपनी टीम को देती हैं तथा इस बात पर जोर भी देती हैं कि उनके साथियों दीपिका जोशी तथा प्रो.आश्विन गांधी जैसे उनके साथियों की मेहनत तथा सहयोग के बिना उनका कोई काम सफल नहीं हो सकता।
सम्पादक के रूप में हर अंक के लिये पूरी तैयारी करना उनके स्वभाव में है। गुलमोहर विशेषांक में मुझसे रचना भेजने के लिये दो माह पहले कहा था। अपने सम्पादकीय में दुष्यन्त कुमार के शेर से सम्बंधित कुछ लाइनों का प्रसंग खोजने के लिये प्रख्यात लेखक कमलेश्वर की लिखी चर्चित किताब कितने पाकिस्तान देखकर मुझसे भेजने को कहा। फिर वह प्रसंग मैंने तीन बार किताब पूरी पलटकर भेजा(जिसके लिये बाकायदा तारीफ तथा शाबासी भी मिली) । अपने लेख के एक अंश के लिये इतनी खोजबीन करने की प्रवृत्ति उनके सिद्ध सम्पादक होने की कहानी कहती है।)
पूर्णिमा वर्मन बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न लेखिका,कवियत्री,सम्पादिका हैं। आज उनका ५१ वां जन्मदिन है। इस अवसर पर मैं उनको बधाई देता हूँ तथा भारतीय परम्परा के अनुसार कामना करता हूँ कि वे शतायु हों। यशस्वी हों। उनके हिंदी भाषा को समृद्ध करने के सारे प्रयास सफल हों।उनके काम का समुचित सम्मान हो।
यह लेख हड़बड़ी में लिखा जा रहा है। लेख का उद्धेश्य पूर्णिमाजी के व्यक्तित्व-कृतित्व की पड़ताल न होकर सिर्फ उनको जन्मदिन के अवसर पर शुभकामनायें प्रेषित करना है। उनके लेखन के बारे में तथा व्यक्तित्व के बारे में फिर कभी आराम से लिखा जायेगा। वैसे उनके बारे में रुचि रखने वाले पाठकों से अनुरोध है कि इस पोस्ट को फिर-फिर देखते रहें क्योंकि जो लिंक छूट गये हैं वे मैं शामिल करता रहूंगा। कोई बड़ी बात नहीं कि कुछ लेख भी लम्बा होता जाय। आज की मेरी पसंद में मैं पूर्णिमाजी की ही वह कविता दे रहा हूँ जो उन्होंने अभिव्यक्ति में उपहार स्तंभ के अंतर्गत जन्मदिन की बधाई देने के लिये खासतौर पर लिखी है तथा जिसे मैं अपने तमाम दोस्तों को ग्रीटिंग कार्ड के रूप में भेज चुका हूँ।
एक बार फिर पूर्णिमाजी को उनके जन्मदिन के अवसर पर हार्दिक बधाई।
मेरी पसंद
जन्मदिवस के इस अवसर पर
थोड़ा सा तो न्याय हो जाय
गुमसुम से बैठे हैं हम तुम
चलो एक कप चाय हो जाय।

धूम धडा़का किया उम्र भर
जीवन जी भर जिया उम्र भर
आज सुखद यह शीतल मौसम
कल की यादों में डूबा मन
खिड़की में यह सुबह सुहानी
यों ही ना बेकार हो जाय
चलो एक कप चाय हो जाय।
खुशबू हो हमने महकाई
देखो दुनिया ने अपनाई
जगह-जगह लगते हैं मेले
हम क्यों बैठे यहाँ अकेले
नयी तुम्हारी इस किताब का
ज़रा एक अध्याय हो जाय
चलो एक कप चाय हो जाय।
फूल भरा सुंदर गुलदस्ता
देखो कहता हंसता हंसता
दुख का जीवन में ना भय हो
जन्मदिवस शुभ मंगलमय हो
नानखताई का डिब्बा खोलो
मुंह मीठा एक बार हो जाय
चलो एक कप चाय हो जाय।
पूर्णिमा वर्मन
सूचना:- अगली पोस्ट में पढ़ें -पूर्णिमा वर्मन से साक्षात्कार

26 responses to “पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक”

  1. Arbuda
    mera kuchh hi mahino se parichay hai purnima aunty k sath. ye sab pad kar aisa hi laga ki mere dil me unke liye jo jagah hai wohi apne shabdo me likhi hai, achha laga purnimaji k bare me pad kar. unko janmadin ki dhero shubhkamnayein
  2. Rajendra Tewari
    Shukla ji , Sadar namaskar
    Aap ne sachmuch abhivyakti se jure longon ki bhawnao ke anuroop yeh patra likha hai badhai ke paatra hain.Purnima ji ka hindi ke liye adhuni yug main yogdan shabdon main vyakt karna athin hai.Aisa lagta hai ki aap ne jo kuchh bhee likha hai woh abhi-anu ke har pathak ke bhawnaon ki abhivyakti hai. Padh kar yeh lagta hai haan aisa to hamare sath bhee hua .Etnee vyastataon ke vawjood purnima ji ka vyaktigat sampark sarahneeya hai.
  3. hindiblogger
    पूर्णिमा जी को जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ!
  4. संजय बेंगाणी
    पूर्णिमाजी से परिचीत नही हुं, पर दुआ-सलाम से शुरूआत हो ही सकती हैं. आपके चिट्ठे पर टिप्पणी के रूप में जन्मदिन कि शुभकामनाएं व्यक्त करता हुं. वे शतायु तक युं ही कार्य करती रहें तथा हम प्रेरणा पाते रहें ऐसी कामना करता हुं.
  5. आशीष
    पूर्णिमा वर्मन जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई।
    मै भी अभिव्यक्ति का एक नियमीत पाठक हूं, हर सप्ताह इस पत्रीका का इंतजार रहता है।
    आशीष
  6. सुनील
    मेरी ओर से भी पूर्णिमा जी को जन्मदिन की बहुत बधाई. आप और अभिव्यक्ति ऐसे ही फ़लती फूलती रहें.
  7. जगदीश
    जन्मदिन की बहुत बधाई पूर्णिमा जी.
  8. प्रेमलता पांडे
    पूर्णिमा जी को जन्मदिन पर शुभकामनाएँ।
    -प्रेमलता पांडे
  9. अतुल
    पूर्णिमा जी ने पहली बार मेरा लेख रोजनामचा पर देख कर मुझसे संपर्क किया था। बाद में उन्होने खुलासा किया कि वे उसी सिटी माँटेसरी स्कूल में पढ़ चुकी हैं जिसके प्रबँधक श्री जगदीश गाँधी की मैं जाने अनजाने खिचाँई कर चुका हूँ। वैसे उसी खिंचाई की परिणिति अभिव्यक्ति पर लाईफ ईन ए के छपने से हुई। पूर्णिमा जी इतनी सरल स्वभाव की हैं कि मुझे अनुरोधवश कहना पढ़ा कि वे मेरे लिये जी का सँबोधन न जोड़े। आज मैं मित्रमँडली में एक चुहलबाज से बढ़कर छपे हुये कहानीकार की रँगबाजी झाड़ लेता हूँ तो वह सिर्फ पूर्णिमा जी जैसे पारखी की वजह से ही सँभव है, अन्यथा ब्लागिंग तो स्वान्त: सुखाय माध्यम ही है, जहाँ आपको कुछेक मित्र‍,प्रशंसक तो मिल जाते हैं पर हिंदी के पाठक वर्ग तक पहुँच अभिव्यक्ति जैसे मँच ही करा सकते हैं। पूर्णिमा जी को जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनायें।
    चलते चलते अनूप भाई को साधुवाद है जो हिंदी साहित्यकारो और ब्लागरों का जन्मदिन इतने हिसाब से याद रखते हैं कि हमारे सरीखे अलाल टिप्पणी के जरिये बधाई धर्म निभाने का अवसर मिल जाता है ।
  10. SHUAIB
    पूर्णिमा जी को जन्मदिन की मुबारकबाद
  11. रमण कौल
    मेरी ओर से भी पूर्णिमा जी को बधाई। जून में पैदा हुए लोगों की बात ही अलग है। ;-)
    हिन्दी के संसार को अभिव्यक्ति और अनुभूति जैसे तोहफ़े देने के लिए पूर्णिमा जी को सहृदय धन्यवाद। मेरे लिए भी इंटरनेट पर हिन्दी का पहला सार्थक संपर्क अभिव्यक्ति के द्वारा ही हुआ है।
  12. Jitendra Dave
    Bhaii aapne to hamare dil kii baat likh dii. Aisaa lag raha hai maano lekhani bhale hii aapki ho magar ehsaas mere hain. Purnima ji ne Hindi sahitya ke liye jo kiyaa hai aur kar rahi hain vo durlabh hai. Unke dwara khada kiya gayaa Buniyaadi kaam aane vaale vaqt me Hindi ke liye miil ka patthar saabit hogaa. Itni vyastata ke baavzood ve apne andar ke kavi/rachnakaar ko jivit rakhe hue hain vo hum sab ke liye prerana kii baat hai. Aaj Abhi-Anu ek benchmark ban gaya hai. Aur iska shrey Purnima ji ke prayaso ko jaata hai. Kabhi-Kabhi to Purnima Varman koi naam nahin balki ek jiti-jaagti sansthan lagti hai. Is sabke baavzood sampadan karm ko bina kisi aham bhaav ke dayitva ke roop mein nibhana aur sabse saral, sahaj samvaad kaayam karte hue smay par Abhi-Anu prakashit karna koi aasan kaam nahin hai. Vyaktitva kii Purnata kaa naam hi shaayad Purnima ji hain. Ishvar unki aayu ke saath saath unki khamtaaon me bhi srivriddhi karen…iski shubhkaamnayen: Jitendra Dave
  13. अनूप भार्गव
    हिन्दी साहित्य को जन जन तक पहुँचानें में पूर्णिमा जी के योगदान को ‘शब्दों में बाँधना’ कठिन है । उन्हें जन्मदिन पर बहुत बहुत शुभकामनाएं ..
    अनूप
  14. ratna
    पूर्णिमा जी को जन्म दिन की बधाई ।
  15. जयप्रकाश मानस
    अनुप जी आपने यह बहुत अच्छा उपहार दिया है हम सबको । मुझे तो चौका ही दिया भाई जी आपने । मुझे इस समय शब्द ही नहीं मिल रहे हैं कि आपका कैसे आभार मानूं ?
    हिन्दी में खासकर भारत में जन्मदिवस पर लेखकों को बधाई देने की परंपरा का लोप मन को सालता है । हिन्दी पट्टी के लोग लगता है स्वार्थी होते जा रहे हैं । शायद भौतिकता, यांत्रिकता और मनवाद के जगह पर धनवाद के कारण (कृपया इसे धनबाद) न समझें ।
    कहते हैं भाषा और साहित्य दो दिलों को जोड़ते हैं । दोनों सेतु ही होते हैं । इस समय सोचता हूँ कि भाषा के आदि समय में कैसे हमारे पूर्वजों से अक्षरों और शब्दों को अपने जीवन के लिए संरक्षित किया होगा । उसे एक अर्थ दिया होगा । और साहित्य ने उसे लगातार मौखक पंरपरा से समृद्ध किया होगा । कितने महान थे हमारे पूर्वज जिन्होंने हमें भाषा का उपहार दिया । साहित्यकारों ने हमें उन्नत भाषा के माध्यम से संस्कारित किया । सोचिए तो लगता है हम जो भी है भाषा और हमारे साहित्य के कारण ही हैं- यानी कि इंसान । हम भाषा या वाक् या शब्द या साहित्य के बिना क्या है आखिर । जहाँ वाक् नहीं होता, जहाँ शब्द नहीं होता वहाँ एक महाशुन्य होता है । अर्थात् यदि भाषा नहीं होती तो हम कुछ भी नहीं होते । और ऐसे ही भाषा संरक्षिका, शब्दशिल्पी आदरणीया पूर्णिमा दीदी के जन्म दिन का स्मरण कराकर आपने सचमुच अनुप जी हमें तो उपहार दिया ही है दीदी की उदारता और तन्यमता को विशेष सम्मान दिया है । यही सृजन का सम्मान है । यही स्वयं के होने का सम्मान है । हम हर रचनाकार का उत्तरदायित्व होता है कि हम वरिष्ठ और मार्गदर्शक पीढ़ी का स्मरण करें । उनका अभिनंदन करें । कम से कम शब्दों से । धन से ही सम्मान नहीं होता । सच तो यह है कि धन का सम्मान तो कर्पूर की तरह उड़ जाता है । मन का सम्मान तो अजर अमर है । शब्दों के माध्यम से आपने जो उन्हें रेखांकित किया है वह ऐतिहासिक है । शायद किसी प्रधानमंत्री को भी किसी अंतरजाल साइट पर ऐसी वंदना का सौभाग्य नहीं मिला होगा । आपसे मुझे अब ईर्ष्या होने लगी है । ……….. । हम पूर्णतः भारतीय होकर, भारत में रहकर भी अपनी दीदी को आपसे पहले जन्मदिवस की बधाई नहीं दे सके । आपकी सदाशयता को मैं नमन करना चाहता हूँ ।
    पूर्णिमा मेरी ही नहीं हिन्दी वालों की दीदी हैं । वे हिन्दी के लोकव्यापीकरण का पर्याय बन चुकी हैं । नेट भले ही किसी की खोज हो । हिन्दी को नेट पर लाकर उसे वैश्विक बनाने में जिनके योगदान का जिक्र इतिहास करेगा उसमें पूर्णिमा जी भी समादृत होंगी ।
    पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्णतः वलयाकार होता है । किसी भी कोण से उसमें निर्मलता के अलावा कोई भाव नहीं होता । वह सरस होता है । वह सरल होता है । वह उज्ज्वल तो होता ही है । पूर्णिमा भारतीय तंत्र में और अध्यात्म में भी कम महत्वपूर्ण नहीं । साहित्य तो उसके बिना सूना है । मैं उनके माता-पिता को भी इस अवसर पर स्मरण करना चाहूंगा कि वे भी माटीपूत्र थे जिनके आँगन में ऐसी साहित्यसाधिका पली बढ़ी । और आज हिन्दी का समाज जिस पर गर्व करता है । पूर्णिमा जी को आपके माध्यम से पुनः नमन । उनकी साधना को नमन । उनकी चेतना को नमन ।
    मैं यहाँ भारत में देखता हूँ । खासकर शासकीय गलियारों में । हिन्दी का सत्यानाश करने पर सारा तंत्र जुटा हुआ है । हिन्दी के नाम पर जितनी भी दुकाने खुली हुई है सबमें बासीपन है और मात्र औपचारिकता । परायी भाषा को माँ कहा जा रहा है और मातृभाषा को बेवा की तरह रखा जा रहा है । ऐसे ही समाज के भीतर से निकल कर कोई जब पूर्णिमा वर्मन बन जाता है तो मुझे और मेरे जैसे किसी हिन्दी प्रेमी को तोष होता है कि अभी भी हम हारे नहीं है । अभी भी हिन्दी का पताके को समूचे विश्व में फहराने का हौसला जुटा सकते हैं हम ।
    पूर्णिमा जी को जैसा मैंने और जितना जाना है- उसके प्रकाश में कहा जा सकता है कि वे सुकोमल चित्त की मालकिन हैं । उनके लेखन में प्रकृति की उद्दातता रस बनकर टपकती है । शब्दों जैसे उनके इशारे पर नाचते हैं । मन के भाव जैसे होते हैं शब्दों के माध्यम से वैसे ही और उसी गति और लय से अर्थात् संपूर्णतः कह पाने का कौशल कम साहित्यकारों में देखा जाता है । यह हम सब महसूसते भी हैं । पूर्णिमा जी की रचना में वह आलोक है जिसे गंभीरता से भाषाविज्ञानी मन से देखने पर मैने हर बार पाया है कि वे शब्दों को साध चुकी हैं । यह बात उनके प्रतीक और बिंब चयन से ज्ञात होता है । बिंब केवल ऋंगार नहीं साहित्य में वह दृष्टि और सृष्टि के मध्य का रास्ता भी है । उनके बिंब इसकी गवाही देती हैं । खैर.. यह जगह उनकी रचनात्मकता को परखने का समय नहीं है । यह फिर कभी
    पूर्णिमा जी सदाशयता की प्रतिमूर्ति हैं । वे परम सहयोगी है उस भाषासेवी के जो हिन्दी के लिए कुछ करना चाहता है । प्रोत्साहन करने में तो वे मेरी छोटी सी दुनिया में सबसे अव्वल जान पड़ती हैं । मैं ही क्यों मेरा बेटा जो मात्र 13 साल का है उनके सहयोग और प्रेरणा से प्रभावित है । मुझे सर्वप्रथम अंतरजाल पर प्रकाशित करने वाली पूर्णिमा जी ही हैं । http://www.srijangatha.com दरअसल उनकी संवेदना के पथ का अनुसरण है जिसका दूसरा अंक जुलाई 1 2006 को आ रहा है ।
    महिला होकर भी अपने माटी से दूर रहकर इतना तटस्थ क्रियाशील होना । निर्विवाद लेखन और प्रकाशन करना । शिविरबाज साहित्यकारो के जाल में न उलझना । विश्व के लेखक बिरादरी से सतत् जुडे रहना कोई सीखना चाहता है तो दीदी से सीखे । आपकी बात आप जाने मैं तो उन्हें अपना मार्गदर्शक मानता हूँ ।
    आज मन कर रहा है कि मैं उन्हे दो भाषाओं में बधाई दूं । क्योंकि आप सब तो हिन्दी मे बधाई दे ही चुके हैं ।
    पहला उडिया होने के कारण— आपणंकर जन्म दिबस फेरि-फेरि आसू थाऊ । हामें सबू छूआ माने सहे बरस तक जीऊँ आउ पूर्णिमा भउँणी हामर सबु जनंकर जन्म दिवस रे पूणि-पूणि सहे (100 वर्ष) बरस र उमर बृद्धि पाऊँ थाउँ ।
    छत्तीसगढ़ी भाषा वाले राज्य में रहने के कारण – दीदी तोर जनम दिन सकल संसार ला याद रही जाय । तें हम जम्मे झन के उमर पा जा । आऊ अइसनेच हिन्दी आऊ भाखा के सेवा करत रहस । जम्मो लईका पिचका डाहर ले जनमदिन के गाडा-गाड़ा बधाई पहुँचे ।
    शायद इसलिए की वे माटी की मान हैं । और माटी की गंध लोकभाषा में ज्यादा होती है …
    जयप्रकाश मानस
    http://www.srijangatha.com
  16. Theluwa
    meri taraf se bhi dher see badhaiyan!
  17. Deepika Joshi 'sandhya'
    पूर्णिमा को जन्मदिन की बधाइयां २७ जून को सुबह ही दे चुकी हूं। पर मेरी दीदी के बारे में और कुछ –मेरी ज़िंदगी में उनका बहुत ऊंचा स्थान है। हमारी इंटरनेट की मुलाकात को छः साल से ऊपर हो गए हैं, पर इन सालों में मेरी ज़िंदगी पूरी बदल गई है। उनसे जो सीखा उसकी फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है। सही कहा है रमण कौल जी ने — जून में पैदा हुए लोगों की बात ही कुछ और है –
    ‘व्यक्तित्व की पूर्णता का नाम ही पूर्णिमा वर्मन है’ मैं जितेंद्र दवे जी से पूर्णतः सहमत हूं। आज ‘अभि-अनू’ और पूर्णिमा ही मेरे प्रेरणास्रोत हैं।
    दीपिका जोशी ‘संध्या’
  18. Deepika Joshi 'sandhya'
    पूर्णिमा की हौसला-अफ़ज़ाही की बदौलत याहू का यह मेरा ब्लाग – एक नज़र आप भी डालिए।
  19. पूर्णिमा वर्मन
    मेरे लेखक पाठक और सहयोगी, जो लेखक पाठक सहयोगी कम और मित्र ज्यादा है, जो अनेक मामलों में मुझसे ज़्यादा ज्ञानी और गुणी हैं जो अनेक मामलों में मेरे गुरू हैं जब इस तरह लिखते हैं तो दो प्रकार की बातें मन में उठती हैं। पहला तो यह सुखद अहसास कि मैंने जो (तथाकथित) अमहत्वपूर्ण सा काम शुरू किया था उसके इतने सारे संरक्षक हैं, सब मेरे साथ है और दुनिया के हर कोने में तन्मयता से हिंदी के विकास को अपनी-अपनी तरह से दिशा देने में लगे है। दूसरी ओर एक चुनौती सी महसूस होती है कि हम सब लोग जितनी मेहनत से इस काम में लगे हैं और जितनी अपेक्षा इस काम से रखते हैं क्या वह पूरी होगी।
    आप सबके स्नेह, सहयोग, समय, सदभावना, सहृदयता और इतनी सारी शुभकामनाएं पाकर अभिभूत हूं। जन्मदिन का ऐसा उपहार शायद ही पहले किसी ने पाया हो। हार्दिक आभार। सबसे बहुत कुछ कहना है पर वह आराम से अपने चिट्ठे पर।
    आप सबकी मुझे हमेशा ज़रूरत रहेगी क्यों कि यह काम एक दो या तीन लोगों का नहीं। आशा है सदा की तरह मेरे आवाज़ देने पर आपकी आवाज़ भी सुनाई देगी।
    धन्यवाद और मंगलकामनाओं के साथ,
    पूर्णिमा वर्मन
  20. रेणु आहूजा
    पूनम का चांद जब खिला
    लिए रौशनी अपनी
    मन में तब तब ही
    तरंगें बहुत उठी
    लिये भंगिमा नेह की
    बांटे सौम्य मधुरता
    लिये अनुभूति एक विभूति
    बांचे काव्य कथा
    लिया वर मन काव्य से
    बिखेर पुर्णिमा अपनी
    स्वीकार करें वह पूर्णिमा
    बधाई जन्म दिवस की.
    -रेणु आहूजा.
  21. मानस
    नंदन जी की रचना का आनंद उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद ।
    उन्हें हमारी संस्था ने गत वर्ष राष्ट्रीय सम्मान पद्मभूषण झाबरमल्ल शर्मा सम्मान से सम्मानित किया था । वे यहाँ रायपुर आये थे । खैर…..
    क्या आप पूर्णिमा जी पर प्रकाशित आलेख को rewrite कर कुछ नयी जानकारियों के साथ भेज सकते हैं ? हम srijangatha.com में प्रकाशित करना चाहेंगे । अपने विचार से अवगत कराना चाहें । उस साक्षात्कार के लिए पुनः आपको बधाई
  22. prashant
    dear,
    well worked in this site also
  23. ramesh vishvahar
    Renu Ahuja ki Kavita ”Prem” aur ”Tum” achchhi lagi, Renu ji ko badhaee. Kripya isi tarah ki rachnayen padhne ka soubhagya prapt karne ka awasar pradan karte jahe, Ye aapse nivedan hai. Ranu ji ko Meri or se dher sari badheeyan.
    Ramesh vishvahar
    Vishvahar@yahoo.co.in
    Raipur, Chhattisgarh(INDIA)
  24. ramesh vishvahar
    Dear Rath
    Rasik Bihari Awadhia ke Kavita bahut achchha lagis, aap la badhaee au rasik bhai ghalok la.
    ramesh vishvahar
  25. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] मिथक 12.अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार 13.पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक 14.पूर्णिमा वर्मन से [...]
  26. RAJKISHOR MISHRA
    जन्मदिन मुबारक हो उनको ,,,,
    चाहत का अम्बार मिले ,,,,,
    खुशियाँ समृधि रहे सुखमय ,,,
    स्वह्र्दय में अति अनुराग लसे ,,,
    मनोकामना पूर्ण हो उनकी ,,,,
    चाहत का संसार मिले ,,,
    अह्लाद सदा अनुकंपित हो ,,,
    नेह स्व प्रेम निछावर को ,
    रवि अनुराग भरे ऐसा ,,,
    विज्ञान का भाव जगे जैसा ,,,
    शशि शीतल भाव भरे निसदिन ,,
    मलयागिरि मंद सुगंध बहे ,,
    नवजीवन का अहसास रहे ,,
    चाहत का अम्बार मिले ,,,,
    खुशियाँ समृधि रहे सुखमय ,,,
    सतत ही आता रहे,
    मधुर डे ,,,
    जीवन में नव उत्साह भरे ,,
    सद्भाव सदा जागृत होवे ,
    नभ मंडल भी गुणगान
    करे ,,,
    जन्मदिन मुबारक हो उनको ,,,,
    चाहत का अम्बार मिले ,,,,
    पूर्णिमा वर्मन जी
    काश आज आपका जन्मदिन होता
    मुझे जन्मदिन की शुभकामना ,
    देने का एहसास होता ,
    दो शब्द लिखने नया अंदाज होता
    जो भी हो जन्मदिन ,का
    दिन कुछ विशेष होता है ,,,
    नव जीवन का एहसास
    होता है ,,
    देर से आये हैं ,
    आपके जन्मदिन का मुबारक देने ,
    रब जिन्दगी की खुशियाँ ,
    बिखेरे चाँद की तरह ,
    जिन्दगी सलामत रहे
    आफताब [रवि]
    की तरह ,,
    जन्मदिन की कोटि -कोटि
    हार्दिक शुभकामना
    राजकिशोर मिश्र [प्रतापगढ़ ]
    http://www.blogger.com/blogger.g?blogID=4346059438305619084#editor/target=post;postID=410880655518012961;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=19;src=postname

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