Sunday, November 13, 2016

न से नमक

दो दिन पहले कई जगह नमक ’ब्लैक’ में बिका। नमक को लगा होगा कि जब धन काला हो सकता है तो नमक क्यों नहीं। लोकतंत्र में काला होने का सबको बराबर हक है। फ़िर क्या , नमक भी ब्लैक होने के लिये मचल गया। नोट के लिये लाइनों में लगे लोग नमक की लाइनों में लग गये। लोकतंत्र बचाये रखने के लिये लाइन जरूरी है। लाइन चाहे वोट देने के लिये हो या फ़िर नोट बदलने के लिये। नौकरी के लिये हो या फ़िर नमक के लिये। हो किसी की लाइन लेकिन लाइन लगनी चाहिये। लाइन है तो लोकतंत्र है। लाइन टूटी, लोकतंत्र दरका। लाइन लोकतंत्र की ’लाइफ़ लाइन’ हैं।

नमक तो देश में इफ़रात है। फ़िर भी इसकी कमी की अफ़वाह फ़ैल गयी। 20 रुपये का नमक 400 रुपये तक बिक गया। ’नमक ब्लैक’ के पैकेज के साथ धक्कम मुक्का, गाली-गलौज, पारपीट मुफ़्त में। परेशानी का ’मेक बाई जनता’ था नमक का ब्लैक होना।

नमक मामले में बातचीत करने के लिये एक ठेलुहा मित्र मिल गये। वे न नोट बदलने के लिये लाइन में लगे थे नमक लेने की कतार में। आइये देखिये उनसे हुये सवाल-जबाब:

सवाल: ये नमक के लिये भगदड़ का क्या कारण है यार जबकि नमक तो इफ़रात है देश में ?
जबाब: नमक के लिये लाइन लगाकर जनता ने एक बार फ़िर से अपनी ताकत दिखा दी कि परेशान होने के लिये वह किसी बाहरी सहातया की मोहताज नहीं है। परेशानी के मामले में जनता खुदमुख्तार है। स्थानीय स्तर पर परेशान होकत जनता ने ’लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण’ टाइप करके दिखा दिया। गांधी जी के सपनों को पूरा किया जनता ने।
सवाल: लेकिन जिस चीज की कमी नहीं है उसके लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने का क्या मतलब है?
जबाब: यह तो जनता द्वारा संविधान के जनता संस्करण में आस्था व्यक्त करने का तरीका है। नमक के लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने वाले लोगों ने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग किया। अपनी रोजी-रोटी के लिये कहीं भी जा सकने के अधिकार का प्रयोग करके लोग नमक के दुकानों में घुस गये। ब्लैक में बेंचकर मांग और आपूर्ति के मूल सिद्धांत की पुष्टि की दुकानदारों ने।
सवाल: लेकिन जिनके घरों में नमक इफ़रात था वे भी क्यों नमक की लाइन में लग गये यार?
जबाब: अब यार आदत भी कोई चीज होती है न! जनता को आदत हो गयी है लाइन में लगने की। इसलिये नोट की लाइन से निकला आदमी नमक की लाइन में लग गया। लाइन में लगने का अभ्यास बना भी रहना चाहिये। कल को अगर पानी के लिये लाइन में लगना पड़ा, हवा के लिये कतार बनानी पड़ी तो अभ्यास काम आयेगा न! अभ्यास बहुत जरूरी है लोकतंत्र में जीने के लिये। लूटने वाले को लूटने का अभ्यास, लुटने वाले को लुटने का अभ्यास, पीटने वाले को पीटने की प्रैक्टिस तो पिटने वाले को पिटने की आदत बनी रहनी चाहिये। व्यवस्था बनी रहने से सुकून बना रहता है!
सवाल: लेकिन इससे अरहर की दाल, टमाटर, प्याज जैसे वीआईपी आइटम बड़ा बुरा महसूस कर रहे होंगे? उनमें दहशत हो रही होगी कि कहीं वे ’मंहगाई के मार्गदर्शक मंडल’ में तो नहीं ठेल दिये गये।
जबाब: इसमें सनीमा की साजिश है। तुमको याद होगा कि शोले पिक्चर में जब गब्बरसिंह सांभा के डायलाग –’सरदार आपका नमक खाया है’ के जबाब में कहता है न - ’तो अब गोली खा।’ तो जनता जब एटीएम से खाली हाथ लौटी तो उनको लगा होगा कि बैंक एटीएम ने पैसे न देकर उनको ’गोली’ दी है। तो उन्होंने सोचा होगा कि अब जब ’गोली’ मिल ही गयी तो नमक भी ले लिया जाये। वर्ना क्या पता गब्बरसिंह नाराज होकर फ़िर रात के बारह बजे हल्ला मचाये - ’रामगढ़ वालों तुमने ’गोली’ खा ली लेकिन नमक क्यों नहीं खाया?’ इसी चक्कर में वे नमक की लाइन में लग गये होंगे। उसी से भभ्भड़ मच गया। हिट पिक्चरों के साइड इफ़ेक्ट हैं ये सब। शोले में अगर सांभा गब्बर की दाल पिये होता तो दाल की दुकाने लुटतीं।
सवाल: लेकिन जिस तरह नमक जैसी इफ़रात में उपलब्ध चीज के बारे में बवाल देखकर डर नहीं लगता तुमको?
जबाब: यही तो हमारी ताकत है यार! हमारी खासियत है यह कि हमारे सामने कोई भी समस्या आ जाये हम अगले दिन उससे बड़ी दूसरी समस्या पैदा करके उस पहली समस्या का टेटुआ दबा देते हैं। बुखार और दिल के दौरे में आदमी पहले दिल के दौरे को का इलाज करवाता है न! इसी तरह बेरोजगारी, मंहगाई, कालाबाजारी, धार्मिक कट्टरता से निपटने के तरीके हैं ये अपन के। ये तो शाश्वत साथी हैं अपन के। ये तो घर के लोग हैं। ये हैं तो हम हैं। ये निपटे तो हम भी निपट गये। छोटी लकीर को मिटाने की जगह जैसे बड़ी लकीर खींचनी पड़ती है न! वैसे ही इन समस्याओं छोटा बताने के लिये इनसे बड़े दुश्मन पैदा करने पड़ते हैं और उनको निपटाते रहना पड़ता है। वो शेर है न :
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना।
नयी समस्या पैदा करते रहना और उनके हल खोजना ही आज के समय का सच है। जो नयी समस्यायें पैदा नहीं कर सकता वह आज के समय में प्रगति नहीं कर सकता। हमें हर समस्या का अपने लिये धनात्मक उपयोग करना आना चाहिये।
सवाल: इस समस्या का क्या धनात्मक उपयोग किया जा सकता है?
जबाब: इस समस्या के बहाने बच्चों को वर्णमाला सिखाई जा सकती है। व्यवहारिक ज्ञान दिया जा सकता है। बच्चों को नमक के लिये लंबी लाइन दिखाकर बताया जा सकता है – ’बेटे ये लाइन लगी है वह नमक के लिये लगी है।’ नोटवादी युग में भी बच्चों को बताया जा सकता है कि ’न से नोट’ ही नहीं होता सिर्फ़। ’न से नमक’ भी होता है।
बातचीत और होती तब तक उनके घर से आवाज आई-’अरे एटीएम लेकर लाइन में लगो जाकर। क्या पता आज नोट निकल ही आयें।’
हम भी अपने दोस्त के साथ-साथ लाइन में लगे हुये मुफ़्त की विटामिन डी ग्रहण करते हुये एटीएम खुलने का इंतजार कर रहे हैं। लाइन बढ़ती जा रही है।


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