Tuesday, November 15, 2016

हाल तो बेहाल हैं ही

दफ्तर जाते हुए देखा यूको बैंक के एटीएम के बाहर लाइन लगी है। एटीमएम अभी खुला नहीं है। एटीम से शुरू हुई लाइन सड़क तक पहुंच गयी है।
रास्ते में कई जगह एटीम की लाइनें दिखीं। कोई अंगेजी के आई (I) की तरह,कोई एल (L) के आकार में। कहीं-कहीं एल मुड़कर यू (U) या फिर एस ( S ) नहीं तो (Z) के आकार में बदल गयीं लाइनें भी दिखीं। क्षण-क्षण रूप बदलती लाइनें भगवान की लीला की तरह दिखीं। अंग्रेजी सिखाने वाले स्कूल अपने बच्चों को इन लाइनों को दिखाते तो बच्चे अंग्रेजी के अक्षर फ़ौरन पहचान कर फर्राटे से गलत अंग्रेजी बोलना सीख जाते।
सुबह का समय था सो लोग तसल्ली से लाइन में लगे हुए थे। धूप गुनगुनी थी। लोग मुफ़्त की विटामिन डी लेते हुए एटीएम खुलने का इंतजार कर रहे थे जिस तरह अपने देश की धर्मभीरु जनता किसी अवतार का इंतजार करती है कि वह अवतार लेकर आये तो उनके कष्ट कम हों।
दफ़्तर में सुबह से ही लोग बाहर जाने के लिए परेशान दिखे। लोगों के घरों में पैसा नहीं है। एटीएम में जाकर लाइन लगाएंगे। क्या पता पैसा मिल जाए। खबर यह थी कि पास के एटीएम में पैसा है। देर हुई तो ख़त्म हो जायेगा। बाहर जाने की अनुमति मिलने में देरी के साथ उनकी चिंता और गुस्सा बढ़ता जा रहा था। जिसको जाने की अनुमति मिली वह उसको देखकर अंदाज लगाया जा सकता था कि तरकश से तीर और बन्दूक से गोली निकलते हुए कैसे निकलती है।
जो पैसे निकाल पाये एटीएम से उनके चेहरे पर विजेता का गर्व पसरा हुआ था। क्या पता शाम को घर जाकर गाना भी गायें हों:
हम लाएं एटीएम से नोट निकालकर
पैसे को खर्च करना बच्चों संभालकर।
जिनके पैसे नहीं निकल पाये वे दुख चेहरे पर पोते दूसरे एटीएम की तरफ बढ़ गए और लाइन में लग गए।
आराम तलबी के लिए बदनाम बैंक वाले बेचारे दिन रात जुटे हैं नोट बदलने, जमा करने में, नकदी देने में। सुबह से देर रात तक काम करते हुए।लोग अपनी परेशानियों में ही इतने व्यस्त हैं कि इनकी मेहनत की अनदेखी करते हुए अपनी ही कठिनाइयों का भोंपू बजाये जा रहे हैं।
टेलीविजन पर पैसे के लिए मारपीट, लाइन में लगने के चलते मौत और इसीतरह की खबरें आ रहीं हैं। ऐसा लगा रहा है जैसे पूरा देश भयंकर परेशानी से जूझ रहा है। कई फुटकर दुकानदारों की आमदनी एकदम ठप्प हो गयी है। लेकिन लोगों में उतना आक्रोश नहीं जितना विपक्षी दलों के नेताओं की आवाज में है। नेता जनता की आवाज को कई गुना बढाकर बोलता है।
कल पुस्तक मेले में भी गए। पता चला पुस्तक मेला फ्लॉप हो गया। राजकमल प्रकाशन को छोड़कर किसी के पास इलेक्ट्रानिक भुगतान की व्यवस्था नहीँ थी। बाकी जगह किताबें केवल देखकर और राजकमल से खरीदकर वापस लौट लिए।
एक बेकरी से कुछ सामान लेना था। उसके पास भी इलेक्ट्रानिक भुगतान की व्यवस्था नहीं थी। लाखों की बिक्री है महीने की। लेकिन ई पेमेंट की सुविधा नहीं। बिल भी नहीं देते लेते। टैक्स चोरी के अलावा दूसरे और भी कारण होंगे। ऐसा ही गड्डमड्ड समाज है अपन का।
जो ठेकेदार फैक्ट्री का काम करते है ठेके पर उसके पास अपने कामगारों को देने के लिए पैसे नहीं हैं। 100 लोग काम करते होंगे , 300 रूपये रोज भी धर ली जाए मजदूरी तो हफ्ते की दो लाख रूपये से ऊपर के नोट चाहिए उसको। नकद भुगतान ही होता है ज्यादातर। रूपये न निकल पाने के चलते काम ठप्प भले न हो लेकिन हाल तो बेहाल हैं ही।
एटीएम से फटाफट पैसे निकलने की आदत हो गयी है अपन को। घर में पैसे नहीं रखते लोग। कभी वो दिन भी थे जब आधा दिन तक लगता था रुपये निकालने में।
कुछ दिन वैसा ही सही।
बैंक के लोगों से बात होती है तो उनका कहना है कि जल्दी ही स्थिति सामान्य होगी। कुछ दिन लगेंगे बस।
फ़िलहाल तो इंतजार है कि जल्द ही नोट संक्रमण का यह समय जल्दी समय जल्दी विदा हो। नए-नवेले नोट आएं और हालात को ठीक बनाएं। इस बीच कमखर्च करके काम चलायें।
आप मजे करिये। तब तक हम दफ़्तर होकर आएं।

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