Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न नूर साहब का:

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।

मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।

बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।

आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।

हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।

हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।


सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।

पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।

’श्वान चिन्तन’ करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये।’पलक झपकते’  से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।

बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

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