Sunday, November 06, 2016

बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन

अजीब बवाल है यार है। यही दिन देखने को बचे थे। लिखने के पहले विषय तय करना पड़ेगा। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अपने घर में परिचय पत्र दिखा के घुसने को मिले। अपन तो जो मन आये लिखते हैं। आदतन उल्टा-पुल्टा। ईरान की बात को तूरान से जोड़ते हैं। मीडिया में हालिया चलन वाले शब्द यहां-वहां घुसा देते हैं। अपनी गरीबी की बात लिखकर थोड़ा रोना टाइप। दूसरों की अमीरी के किस्से थोड़ी हिकारत के साथ। नेताओं का जिक्र गाली के साथ। तकनीक का तफ़सरा बुड़बकपन के साथ। विनम्रता का चित्रण अक्खड़पन के साथ। अपन तो ऐसे ही बिनते हैं ताना-बाना!


ओत्तेरी की। विसंगति को तो भूल ही गये थे। अच्छा हुआ याद आ गया। व्यंग्य मतलब विसंगतियों का चित्रण। बिना विसंगति के व्यंग्य उसी तरह फ़ीका लगता है जैसे बिना गुंडों-बाहुबलियों के कोई लोकतांत्रिक सरकार। फ़िर वापस लौटते हैं। लिखे हुये वाक्यों तोड़ते-मरोडते हैं। सीधा समझ में आने वाली बातों को उलझाऊ बनाते हैं। उसमें विसंगतियां घुसाते हैं।


अब आप विसंगति का मतलब पूछेंगे क्या? पूछेंगे तो बताना ही पड़ेगा। लेकिन आप मोटा मोटी यह समझ लो कि अपने देश में विसंगति का मतलब है बिना गढ्ढे की कोई सार्वजनिक सड़क होना। बिना लिये दिये आपना ड्राइविंग लाइसेंस बनना। बिना जाम का कोई शहर होना। बिना प्रदूषण की दिल्ली होना। बिना उकसावे के किसी देशभक्त का बयान होना। बिना राजनैतिक पहुंच वाले किसी शरीफ़ और विद्वान व्यक्ति का किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होना।


लेख में विसंगति घुसा के सांस ले ही रहे थे कि स्मृति ( अरे वो वाली नहीं भाई) ने टोंक दिया कि व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा भी होनी चाहिये। अब ये नया बवाल। करुणा कहां से लाई जाये। कित्ती करुणा मिलायी जाये? असली बंधानी हींग की तरह कोई असली करुणा भी मिलती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लेख बिना के करुणा के लिख दिया जाये और फ़िर पैकिंग करुणा के कागज से कर दी जाये। खैर करुणा को छोडिये अभी। करुणा तो अपने यहां इफ़रात में पसरी मिलती है। जिधर देखो उधर करुणा ही करुणा दिखती है। अपने खिलाफ़ हुई साजिश के किस्से सुनाता हर बड़ा लेखक करुणा का चलता-फ़िरता इश्तहार लगता है।


हमसे एक पाठक ने पूछा – “भाईसाहब आप अपने हर अटपटे लेखन को व्यंग्य क्यों कहते हैं? अपने बेवकूफ़ी के लेखन को जिसे आप व्यंग्य लेखन कहते हैं को अगर परिभाषित करने को कहा जाये तो कैसे करेंगे?”
मन तो किया कि पाठक को जबाब देते हुये रोने लगें। अपनी व्यंग्य साधना का इतना मार्मिक वर्णन करें कि वह दहल जाये। इत्ता रोयें कि देखकर उसके मन में मेरे प्रति करुणा पैदा हो जाये जिसको इकट्ठा करके दो-चार व्यंग्य लेख निकाल लें हम। बाकी चलते समय उसी को ’सप्रेम भेंट’ कर दें। लेकिन फ़िर हम किये नहीं। यह उन बड़े लेखकों को शोभा देता है जिनकी तमाम किताबें छप चुकी होती हैं, जिनको खूब इनाम मिल चुके होते हैं। हमको तो कोई दूसरा क्या , हम खुद ही लेखक नहीं मान पाते।


हमने अपने पाठक को प्यार से निहारते हुये बचपन में सुनी एक सब्जी बेंचने के लिये निकली स्त्री का सौंदर्य वर्णन सुनाया:
शकरकंद सी शकल बनाई
गाजर की पैजनियां
आलू के दो बन्द लगाये
ठुमक चली काछिनिया।
अपन का व्यंग्य लेखन इसी तरह का है। अखबार/टीवी में जैसे ही कोई खबर मिली उसको लपक लिया। थोड़ा अंग्रेजी मिलाई ताकि युवा पीढी पढ सके। आगे बढते हुये शब्दों के अनुप्रासिक श्रंगार किया। हट,पट, सट,खट,लट, झट। आओ,जाओ, भगाओ, पटाओ, दिलाओ। अबे, तबे, सबे, क्यों बे, हां बे, ना बे, फ़ूट बे।
किसी भी पढे-लिखे लेखक के लिये ’अनुप्रासिक श्रंगार’ का लालच सहज होता है। चाट के ठेले के पास से गुजरते हुये बतासे खाने की सहज इच्छा की तरह। ’शब्दों की ड्रिबलिंग’ में लेखक इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि अपना गोल किधर है यही भूल जाता है। इसी चक्कर में कभी अपने ही गोल पोस्ट में गेंद घुसा देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक खेल खत्म होने का सीटी बज जाती है। ऐसे लेखक के यहां से लेख निकलता है तो देखते ही पता चल जाता है कि सीधा ’अनुप्रास ब्यूटी पार्लर’ से मेकअप कराकर आ रहा है।


कभी-कभी मन में विसंगतियों पर इत्ता गुस्सा आता है कि मन करता है एकदम सर्जिकल स्ट्राइक कर दें उनके खिलाफ़। ऐसे में जित्ती भी विसंगतियां सामने दिखती हैं उन सबको एक सिरे से गरिया देते हैं। कुछ इस तरह जैसे हर बड़ा लेखक अपने अलावा बाकी सारे लेखन को ’लगभग कूड़ा’ बताते हुये अपना बड़प्पन सुरक्षित रखता है। कभी-कभी तो इत्ता जोर से हड़काते हैं विसंगतियों को कि बेचारी सहमकर रोने लगती हैं। कभी-कभी मन करता है कि व्यंग्य में सपाटबयानी व्यंग्य सम्प्रदाय, सरोकारी व्यंग्य सम्प्रदाय, गाली युक्त व्यंग्य सम्प्रदाय के साथ एक ’वीरगाथा व्यंग्य सम्प्रदाय’ का चलन भी होना चाहिये।


इतना लिखने के बाद लगता है कि व्यंग्य लेख पूरा हो गया। परसाई जी की परम्परा से सीधे जुड़ गये। परम्परा से क्या जुड़े उनसे आगे का लेखन कर रहे। परसाई जी के जाने के बीस साल बाद कुछ लिखना उनसे आगे का ही लेखन हुआ न! भले ही देश दुनिया की समझ उत्ती भी न हो जितनी परसाई जी को साठ साल पहले थी।
अब जब लेख पूरा हो गया है तो इसका शीर्षक भी तय करना जरूरी है। वैसे शीर्षक तो पहले ही तय है- व्यंग्य का विषय क्या हो? इसके अलावा अगर हमसे किसी लेख का विषय तय करने को कहा जाये तो हम इस तरह के शीर्षक सुझायेंगे:


1. बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन
2. एवरेस्ट से उतरकर कूड़ा बीनता व्यंग्य लेखक
3. शब्द अनुप्रास की फ़िसलपट्टी पर झूलता लेखक
4. व्यंग्य के मठाधीशों का करुणा आख्यान
5. व्यंग्य के देवालय में चिरकुटई साधता लेखक
आपको कौन सा शीर्षक पसंद आया? आप भी कुछ सुझाइये!

Post Comment

Post Comment

Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न नूर साहब का:

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।

मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।

बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।

आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।

हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।

हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।


सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।

पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।

’श्वान चिन्तन’ करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये।’पलक झपकते’  से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।

बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

Post Comment

Post Comment

Friday, November 04, 2016

हर तरफ मंगतों का हुजूम है

किरन और करन
शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।

जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।

एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।

ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।

भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।

एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई करन 4 में पढ़ता है। बहन किरन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।

यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।

यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम है। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।

शायद  हम मंगते समाज के रूप में विकसित हो रहे हैं। मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10209563771944615&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative