Tuesday, October 16, 2018

कानपुर में सीधा कोई नहीं चलता



Add caption

सबेरे उतरे स्टेशन पर। भोपाल में आधे घण्टे लेट चली पुष्पक कानपुर में बीस मिनट पहले पहुँच गयी। भागी होगी सरपट अंधेरे में। झांसी तक ही राइट टाइम हो गयी। इससे हमको यह शिक्षा मिलती है कि शुरू में पिछड़ जाने पर भी लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
पुष्पक जैसी इस रूट की वीआईपी जैसी ट्रेन कानपुर के प्लेटफार्म पर आठ नम्बर मिला रुकने को। जैसे आइंस्टीन को किसी वैज्ञानिक से सभा में बुलाकर मंच के सामने सुनने वालों में बैठा दिया जाए।
उतरते ही कुछ बच्चों ने गुड मार्निग की। याद आया कल भोपाल में नानी की दुकान पर मिले थे। कानपुर से भोपाल रेलवे भर्ती का इम्तहान देने गए थे। क्या पता भोपाल वाले नागपुर या कानपुर आये हों। बच्चे अपने चेहरे की नींद और थकान नल के पानी से धो रहे थे। अनारक्षित डिब्बे में आये थे।
वही प्लेटफार्म पर एक पुलिस वाला दूसरे से उलझा था। पुलिस वाला बिना रिजर्वेशन ऐसी डिब्बे में चढ़ा था। टीटी ने टोंका था। उसने वर्दी का रोब दिखाया। टीटी की वर्दी भी भड़क गई। वर्दी, वर्दी में ठन गयी। स्टेशन पर पूछताछ हो गयी। वर्दी , वर्दी की लड़ाई फिर किसी वर्दी वाले ने ही सुलझाई।
इसके पहले डिब्बे में बिना टिकट चढ़े वर्दी वाले ने फरमाया था-' हम वैसे वर्दी पहनते नहीं। लेकिन आज गुरुजी के साथ हैं इसलिए वर्दी में हैं। पास दिखा रहे हैं।फिर भी ये नखरा दिखा रहा। उधर डब्बे में सैकड़ों बिना टिकट लड़के घुसे हैं। वहां हिम्मत नहीं चेक करने की। बतायेंगे कानपुर में इनको।'
चिरकुट से दिखते गुरु जी ने निस्संग भाव से उवाचा -' बदतमीज है।' गुरु जी के उच्चारण से स्पष्ट नहीं कि बदतमीज किसके लिए कहा उन्होंने। चले गए टीटी के लिए या अपने भक्त पुलिसवाले के लिए। यह भी हो सकता है कि उन्होंने यह आपसी नजारा देखने वाले के लिए ऐसा कहा हो। 
वर्दी वालों को वहीं छोड़कर हम आगे बढ़े। देखा ओला देवी घर तक का 180 रुपया मांग रहीं थी। हम बाहर आ गए। बिना बुक किये ओला। बाहर कई लोगों ने कहा होटल छोड़ दें। 10 रुपये लगेंगे। मन किया घर तक चलें और कहें इसी होटल जाना है। लेकिन मन को हमने बहुत जोर से डांट दिया। पैसे के लिए इतना नीच काम करेगा। घर को होटल बताएगा।
बाहर कुछ महिलाएं गठरियों के पास बैठी थी। हम उनसे बात करते तब तक एक ऑटो वाला अपना ऑटो नागिन सा लहराता हुआ मेरे बगल से गुजरा। हमने उसको लपक लिया। सौ रुपये में तय भी कर लिया। 80 रुपये बचने की खुशी और सिंकदर की पोरस पर विजय की खुशी की तुलना की जाए तो जीत अस्सी रुपये की होगी क्योंकि इसमें न खून खच्चर है न ही मारकाट। अहिंसा की जीत है यह। बच्चों को भी इतिहास रटने से मुक्ति क्योंकि अपन की यह विजय किसी इतिहास में दर्ज नहीं होनी।
आटो वाला लहराते हुए चल रहा था। उसकी ऑटो जमा करना था। हमें लगा अपना ऑटो जमा करने के पहले हमको किसी अस्पताल में न जमा कर दे बालक।
हम सोच ही रहे थे कि उसने वन वे ट्रैफिक में उल्टी तरफ से ऑटो घुसा दिया। हमने टोंका की उल्टा क्यों चल रहे। उसने मुझे समझाते कम डपटते ज्यादा हुए कहा -'कानपुर में सीधा कौन चलता है।' अपनी बात के समर्थन में उसने हमसे आगे जाती कार दिखाई -'वो देखो जा रहे हैं चार पहिये वाले।'
मुझे लगा यह अराजकता का मामला मजेदार है। जिस तरह अपने देश में हर जाति वाला अपने से से छोटी जाति खोज ही लेता है उसी तरह हरेक को अपनी अराजकता सही ठहराने के लिए खुद की अराजकता से बड़ी अराजकता मिल ही जाती है। हर एक को अपनी अराजकता का छप्पर तानने के कोई न कोई अराजकता की बल्ली मिल ही जाती है । यह अराजकता का विश्वबंधुत्व है।
हम चुप हो गए। लगा कि सीधे चलने को कहा तो हमको यह कानपुर की नागरिकता से बेदखल कर देगा। मन में सोचा -'झाड़े रहो कलत्तरगंज।'
घर पहुंचकर चाय बनाई। खालिश दूध की। जिसके लालच में कल आलोक पुराणिक ने अपने ट्रेन तक छोड़ दी थीं। चाय शानदार बनी है। फोटो लगाकर किसी की लार टपकवा कर हम किसी का मोबाइल स्क्रीन खराब नहीं करवाना चाहते। जिसको पीना हो वो आ जाये। लेकिन आये सीधे से। यह न कहे कि कानपुर में सीधा कोई नहीं चलता।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10215385729409913

Post Comment

Post Comment

No comments:

Post a Comment

Google Analytics Alternative