Thursday, October 18, 2018

लगता है गंगा मैया नाराज हैं

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, लोग खड़े हैं और बाहर
पानी में भीगे कपड़ों संग खुद भी सूखती महिला। साथ में सवाल पूछते लोग।

'आज लागत है गंगा मैया नाराज हैं। तीन लोगन मां केहू के कुछ नहीं मिल रहा। एक्को सिक्का तक नहीं मिला।'
भैरो घाट की सीढ़ियों पर बैठे गंगा जी में गरदन तक घुसे तीन लोग गंगा के तल से हाथ से खोद कर मिट्टी सीढ़ियों में रख रहे हैं। मिट्टी में राख, जले हुए शवों की टुकड़ों में हड्डियां, कांच के टुकड़े, चूडियां मिलती हैं। एक आदमी इस मिट्टी को पानी में छानकर देख रहा है। शायद कोई काम की चीज मिल जाये।
काम की चीज मतलब कोई सोने, चांदी का टुकड़ा जो कुछ लोग शवों के साथ जला देते हों। कुछ मिल नहीं रहा है। खोजने वाला निराश हो रहा है। कह रहा है -'आज लगता है गंगा जी नाराज हैं।'
दूसरा कहता है -'गंगा जी नाराज नहीं है। हम लोग ही खोज नहीं पा रहे।'
लगता है आज पीने का जुगाड़ भी न बन पाएगा।
पानी में मुंडी घुसाए हुए मिट्टी खोजता आदमी मुंह में गंगा का पानी भरकर मुंह के मसाले सहित गंगा में विसर्जित कर देता है। स्वच्छ गंगा अभियान में अपने हिस्से का योगदान दे रहा है।
तब तक एक और आदमी आकर बैठता है बगल में। बताता है -'सबेरे से दो बिछिया और एक नग मिला। नग पीतल का टुकड़ा निकला। साठ-सत्तर मिले बस्स।'
'आजकल सोना कौन चढाता है।' - दूसरा कहता है।
मिट्टी में मिली हड्डियां अलग-अलग लोगों की हैं। अलग-अलग जाति के लोगों की। पता नहीं लगता कि आदमी की कौन, औरत की कौन। सब एक दूसरे में गड्ड- मद्द। किसी को कोई एतराज नहीं। मरने-जलाए जाने के पहले जिनको आपस में छू लेने भर से बवाल हो सकता है, जलाए जाने के बाद उन्हीं की हड्डियां एक-दूसरे के संग , ऊपर नीचे पड़ी हैं।
'हाथ में कांच लग जाता होगा'- हम पूछते हैं।
'कांच को डरें तो रोजी कैसे कमाएंगे' -पानी में घुसा आदमी हाथ में आई छोटी शीशी की वापस गंगा में फेकते हुए कहता है।
एक आदमी नदी में तैरते नारियल को पकड़कर घाट की सीढ़ियों पर पटककर गरी निकाल कर सबको देता है। हमको भी देता है -'लेव भाई आप भी खाओ।' हम मना करते हैं। वे खाते हैं। एक कहता है- 'भाई जरा तम्बाकू बनाओ।'
'मेहनत की कमाई खाते हैं हम। गंगा मैया आज लगता है मेहनत से खुश नहीं हैं।' - एक फिर निराश होता है।
'सोनू को बुलाओ। वो होता तो अब तक 2000/- का माल मिल जाता। उसके हाथ मे जस है।'-एक कहता है
एक बच्ची जीन्स-टॉप में सीढ़ियों पर बैठी हाथ के मोबाइल को आईने की तरह चेहरे के सामने रखे उससे गाने सुन रही है।
अचानक हल्ला मचता है। एक महिला पानी के साथ बहते दीखती है। लड़की भी चिल्लाती है -'अरे उसको बचाओ।' नदी में नहाता एक लड़का आगे बढ़कर तैरते हुये महिला को घसीट लाता है। सीढ़ियों पर बैठाता है। सब महिला पर गुस्साते हैं -'अभी संगम पहुंच गई होतीं। पानी में क्यों गयी? घर में कौन है? कहां रहती हो?'
बुढिया हांफ़ते हुए बताती है-'कोई नहीं है घर में। तीन लड़के थे। अब कोई नहीं है। बिटिया है, उसकी शादी दूर हुई है। आना-जाना नहीं होता। ऐसे ही अड़ोसी-पड़ोसी कुछ दे देते हैं। गुजारा होता है। हर्ष नगर में घर है। वहां से रिक्शे से आई हूँ। नहा रहे थे, पैर फिसल गया।'
पता चलता है कि महिला के पैर में फाइलेरिया है। सबको लगता है जिंदगी से निराश महिला पानी में डूबने की कोशिश कर रही थी। असफल रही।
जिंदगी आसानी से किसी का साथ नहीं छोड़ती ।
सब पूछते हैं -'घर छोड़ दें।'
पानी में रहने के कारण महिला को ठंड लग रही है। वह धूप में बैठ जाती है। सामने गंगा बैराज दिख रहा हैं। दूसरी तरफ सूरज डूबने की तैयारी कर रहा है। पानी जगह-जगह 'घुम्मर डांस' करता हुआ आगे बढ़ रहा है।
पीछे खड़ी एक महिला झपट कर आगे बढ़कर बताती है कि बुढिया को उसके बच्चे ने बचाया। उसको लगा कि कुछ इनाम मिल जाएगा। लेकिन बुढ़िया की तंगहाली देखकर पीछे हट गई। घाट पर मौजूद लोगों के सामने टहलते हुए मांगने लगी।
लौटते हुए वह आदमी मिलता है जो नदी के पानी में कुछ खोज रहा था। जिससे गंगा मैया नाराज थी। बोला -'कुछ मिला नहीं आज।' मुझसे कुछ पाने की आशा में पास खड़ा है। हम बताते हैं -'बटुआ घर भूल आये।'
मेरी बेवकूफी पर वह मुस्करा दिया। हमने उससे और बेवकूफी का सवाल किया -'इतनी मेहनत की कमाई दारू में क्यों उड़ा देते हो?'
'ठंडे पानी में दिन भर रहते हैं। थोड़ा गर्मी के लिए ले लेते हैं '-उसने तर्क दिया।
आगे बताया कि 16 लोग यह काम करते हैं। शमशानी लोग हैं। ऐसे ही जिंदगी की बसर होती है।
कुछ देर मेरे पास खड़ा रहा इस आशा में कि गंगा मैया की जगह हम ही कुछ दे दें। हम बताते हैं - 'बटुआ घर भूल आये।'
सूरज भाई अपनी दुकान बढाते हुए बोले -'अब घर जाओ। बहुत हुई आवारगी।' हम चुपचाप घर चले आये।

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