Saturday, October 12, 2024

राम-रावण अगर आज होते

 राम-रावण जी आज के समय होते तो क्या होता इस बारे में केवल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन यह तो पक्का है कि सब कुछ वैसा तो नहीं ही हुआ होता जैसा हो चुका है। हमारे एक सीनियर ने अपनी राय जाहिर करते हुये विचार प्रकट किये कि अगर राम जी की विजय न हुई होती तो विभीषणजी राजद्रोह की सजा पाते। रावणजी ने उनको भाईचारे के चलते सस्ते में छोड़ दिया। आज की तारीख में ऐसा होता तो कोई न कोई आर.टी.आई. कार्यकर्ता इस पर जरूर सवाल उठाता। बवाल मचाता। तदोपरान्त टी.वी. चैनलों पर प्राइमटाइम बहस यज्ञ होता। क्या पता कोई इसी पक्षपात के चलते रावणजी से इस्तीफ़ा मांग लेता। वे देते न देते यह बात दीगर है। उनका व्यक्तिगत मामला ठहरा। वैसे भी इस्तीफ़ा होता ही मांगने के लिये है, दिया थोड़ी जाता है।

हनुमानजी ने लंका में रावणजी की संपत्ति जलाई इसके चलते उनके ऊपर वहां सरकारी संपत्ति के नुकसान का मुकदमा तो पक्का चलता।
लंका विजय के पश्चात रामजी ने जिस तरह लोकमर्यादा के बहाने सीताजी का परित्याग किया उसकी आज के समय में बहुत धुआंधार आलोचना होती। शायद महिला संगठनों और अन्य मानवाधिकारवादियों की आलोचना के चलते वे अपने फ़ैसले पर फ़िर से विचार करते। क्या पता इसी के चलते सीताजी इत्ती जल्दी विदा न होतीं। उनका गृह्स्थजीवन सुखमय बीतता। लम्बा खिंचता।
क्या पता कोई चैनल इस बात का खुलासा करता कि राम-रावण जी युद्ध में ये घपला हुआ। वो घोटाला हुआ। बाण खरीदने में ये लेन-देन हुआ। धनुष की बिड में वो कमीशनबाजी हुई। सूचना के अधिकार के चलते तमाम खुलासे होते। तब शायद सारी रामकथा वैसी ही न होती जैसी आज के समय चलन में हैं।
आज जब भी रावण जी की बात होती हैं तो कुछ लोग उनको बड़ी कड़ाई से संबोधित करते हैं। ऐसे लगता है कि वे उनके रावणजी उनके संगी-साथी रहे हों या फ़िर कोई आजकल के बदनाम जनप्रतिनिधि। ’रावण ऐसा था, वैसा था’ इस तरह की बातें जब लोग लिखते हैं तो मुझे लगता है कि हम अपने पूर्वज का अपमान कर रहे हैं। रावणजी भले ही बुराई के प्रतीक थे लेकिन थे तो अपन के बुजुर्गवार ही। रामजी की सारी हीरोगीरी रावणजी की विलेनगीरी पर टिकी है। उनका स्मरण जरा सलीके से किया जाना चाहिये। आज के समय में भी अमरीशपुरीजी, प्राणजी, अमजद खानजी की जब बात चलती है तो उनके बारे में तरीके से लिखते हैं न! रावणजी ने तो दुनिया के सबसे बड़े विलेन का पार्ट अदा किया। तो उनको तो और भी कायदे से संबोधित किया जाना चाहिये। है कि नहीं? 🙂
क्या पता अगर राम-रावण जी की लड़ाई में परिणाम उलटा होता तो रावणायण भला किस तरह लिखी जाती। शायद इस रूप में लिखा जाता कि एक बलशाली राजा रामजी ने लंका पर कब्जा करने के इरादे से हमला किया। जिसका रावणजी ने बहादुरी से मुकाबला किया और लंका की रक्षा की। क्या पता इस तरह की कहानी लिखी भी गयी हो लेकिन आलोचकों ने उस समय उसको तवज्जो न दी हो और रामकथा की अच्छी आलोचनायें लिखकर उसको चलन में ला दिया हो।
आज के दिन कुछ लोग कहते है- "हमको अपने अंदर के रावण को मारना चाहिये।" अब बताइये भला कि जब रावणजी नही रहेंगे तो रामजी को कौन पूछेगा। मामला रामराज की तरह एकरस सा हो जायेगा। मीडिया के पास कुच्छ रहेगा नहीं रिपोर्ट करने के लिये।
रामराज के समाचारों की बाइट के बारे में उस समय के विवरण यही तो मिलते हैं- नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीनी। नहिं कोऊ अबुध न लच्छन हीना॥ कोई दुखी नहीं है, कोई दरिद्र नहीं है, कोई कुलच्छनी नहीं है तो समाज में एकरसता आजायेगी न। दैहिक, दैविक, भौतिक ताप न होने पर सारे मेडिकल कालेज उजड़ जायेंगे न। रामराज में एन.आर.एच.एम. घोटाले नहीं होंगे तो पुलिस क्या करेगी बेचारी? राम जी का महत्व बने रहने के लिये रावण जी की उपस्थिति अनिवार्य है।
आज तमाम टीवी चैनल भ्रष्टाचार रूपी रावण के दहन की बात कर रहे थे। लेकिन रावण जी और भ्रष्टाचार में मौलिक अंतर है। रावण जी का पता, ठिकाना, पिन कोड, आई.पी.एड्रेस सब पता था। जबकि भ्रष्टाचार का पूरा पता ही नहीं चलता। पता चलता है कि जो भ्रष्टाचार के संहार में जुटा दिखता है वो भी किसी दूसरे के नजर में कोई अलग तरीके के भ्रष्टाचार में संलग्न है। रोज भ्रष्टाचार की नयी कलायें दिखायी देती हैं। गणितीय लप्पेबाजी में कहें तो भ्रष्टाचार ऐसा कृत्य है कि जिसे कोई फ़ंकशन पूरी तरह परिभाषित नहीं कर पाता। हर फ़ंक्शन कहीं न कहीं फ़ट जाता है भ्रष्टाचार को परिभाषित करने में। रावणजी बेचारे तो त्रिविमीय( Three Dimentional) ही थे। भ्रष्टाचारजी तो अनन्त विमीय हैं। उनकी तुलना रावणजी से करना रावणजी जैसे शरीफ़ विलेन को बदनाम करना जैसा है।
जहां तक मुझे पता है उसके हिसाब से रावणजी के खिलाफ़ भ्रष्टाचार का कोई केस बनता ही नहीं। वे सब काम फ़ुल बकैती से करते थे। कुबेरजी उनके यहां नौकरी बजाते थे। उनको कोई जरूरत ही नहीं थी करप्शन के पचड़ों में पड़ने की। उन पर अधिक से अधिक सीताजी के अपहरण का केस बनता। आज अगर वे होते और अपना अपराध स्वीकार कर भी लेते तो उनको अधिक से अधिक कुछ साल की सजा होती। इसके बाद वे छूट जाते। भ्रष्टाचार जैसे कोई काम उनके खाते में दर्ज ही नहीं हैं। लेकिन आज जिसे देखो वही हर बुराई उन पर टैग कर देता है। उनको भ्रष्टाचार का प्रतीक बनाना तो ऐसा ही है जैसे कि लाखों करोड़ के घपले-घोटाले के लिये किसी बाबू को चार्जशीट दिया जाना। है कि नहीं?
खैर आप भी कहां फ़ंस गये इन झमेलों में। मजे कीजिये। शान से दीपावली की तैयारी करिये। मस्त रहिये। राम-रावण तो चलता ही रहेगा। 🙂

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