किताबों की लिस्ट बनाते हुए कल 40 पेज की पतली किताब मिली। इसमें फिराक गोरखपुरी का एक लंबा लेख है। इसमें उन्होंने साम्प्रदायिकता के मसले पर बहुत विस्तार से बात की है। धर्म के नाम पर संघर्ष की भावना को 'हमारा सबसे बड़ा दुश्मन' बताया है।
बहुत सरल भाषा में तार्किक ढंग से लिखे इस लेख में हर धर्म के नजरिये से बात करते हुए फिरकापरस्ती को पुरजोर तरीके से खारिज किया है। फिराक साहब के लेख को पढ़ते हुए लगता है उस समय हमारे समाज के महापुरुषों में लोगों को समझाने, टोंकने की कितनी हिम्मत होती थी।
आजादी के कुछ समय पहले लिखे लेख के कुछ अंश:
"1. हमारा देश इस धरती पर एक बहुत बड़ा देश है। यहाँ तीस करोड़ हिन्दू, नौ करोड़ मुसलमान और डेढ़ करोड़ के लगभग दूसरे धर्मों के माननेवाले बसे हुये हैं। सोचिए कि इस देश की बढ़ाई किस बात में है? इस सवाल का ठीक जबाब यह है कि यहां कोई निवासी मर्द, औरत या बच्चा, बूढ़ा चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या दूसरे किसी धर्म का माननेवाला दुखी न रहे; खाने, पीने, पहनने, रहने, पढ़ने - लिखने, कमाने हर तरक्की करने में उसे कोई रुकावट न हो। इस देश की बढ़ाई इस बात में कभी नहीं है कि यहाँ के बसनेवालों में किसी एक जाति या दूसरे धर्म के माननेवाले तो सुख चैन से रहें और दूसरी जाति या दूसरे धर्म के मानने वाले दुखी और बेइज्जत होकर रहें। जो सुख या धन किसी को दुखी बनाकर या किसी को निर्धन रखकर या लूट मार करके बेइंसाफी के साथ हासिल किया जाएगा या जो बढ़ाई किसी को नीचा दिखाकर या छोटा बनाकर पायी जाएगी, न तो वह सुख सच्चा सुख होगा न वह सच्ची बढ़ाई होगी। ऐसा सुख या ऐसी बढ़ाई पाने का विचार हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है।
2. साम्प्रदायिक हिन्दू, हिन्दू जाति के लिए जितना खतरनाक है, मुसलमान के लिए उतना खतरनाक नहीं है। फिरकापरस्त मुसलमान फिरके के लिए ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला है, हिन्दू के लिए उतना नहीं और यही हाल साम्प्रदायिक एंग्लो इंडियन, साम्प्रदायिक ईसाई का है। ये सब अपनी जाति के दुश्मन हैं। साम्प्रदायिकता के आधार पर अपने सहधर्मियों की सेवा ही नहीं की जा सकती पर साम्प्रदायिकता से बचकर ही अपने सम्प्रदाय की , अपने सहधर्मियों की तरक्की हो सकती है।
3. संसार इतना विशाल है कि वह एक धर्म के सम्भाले नहीं संभल सकता। अगर हम मान भी लें कि हिन्दू संस्कृति,मुस्लिम संस्कृति, बौध्द संस्कृति बड़ी-बड़ी संस्कृतियां होते हुए भी एक दूसरे से कुछ अलग हैं तो भी संसार को इस अलगाव की आवश्यकता है। "
-फिराक गोरखपुरी
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