Tuesday, November 19, 2024

देख लेते हैं तेरा क्या लेते हैं?

 


देख लेते हैं तेरा क्या लेते हैं?

अपने दिल की हसरत मिटा लेते हैं।
-ख़ुर्शीद अकरम
दो-तीन दिन पहले शाहजहाँपुर के ख़ुर्शीद अकरम का फ़ोन आया। ख़ुर्शीद शाहजहाँपुर में टेलर हैं। आयुध वस्त्र निर्माणी , शाहजहांपुर में मैं क़रीब ढाई साल महाप्रबंधक रहा। दो साल पहले निर्माणी से विदा होते हुए उन्होंने मुझे ये शेर सुनाया था:
"कुल उलझने हैं ऐसी मेरी जिंदगी के साथ,
कि गम को कबूल कर लिया है, मैंने खुशी के साथ,
माना तेरी जिन्दगी में कुछ भी नहीं हूँ मैं,
जा उनसे जाके पूछ जिनको मयस्सर नहीं हूँ मैं।"
शाहजहाँपुर के ढाई साल के प्रवास के दौरान कभी बातचीत नहीं हुई थी। चलते समय जब शाप में सभी लोगों से मुलाक़ात कर रहा था तब सिलाई की बेंचों के बीच खड़े होकर उन्होंने ये सुनाया था। फ़ोन पर काफ़ी देर बातचीत हुई। ख़ुर्शीद ने अपनी शेरों-शायरी का ज़िक्र किया और अपना शेर सुनाया:
"देख लेते हैं तेरा क्या लेते हैं?
अपने दिल की हसरत मिटा लेते हैं।"
दुनिया में तमाम लोगों के लिए यह शेर काम का है। कोई देखने पर एतराज़ करे तो ये सुनाकर काम चलाया जा सकता है।
बात ख़त्म करते हुए ख़ुर्शीद ने एक और शेर सुनाया:
"दो रंगी छोड़ एक रंग हो जा,
या तो संग हो जा या मोम हो जा।"
बातचीत के दौरान शाहजहाँपुर की तमाम यादें ताज़ा हुई। यह भी तय हुआ क़ि जल्द ही शाहजहाँपुर में मुलाक़ात होगी।

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