Sunday, August 31, 2025

मेट्रो में पसीना सुखाती, किताब पढ़ती बालिका

 

परसों श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी में जाना हुआ। कार्यक्रम रवींद्र भवन में होना था। दिल्ली मेट्रो एप्प में देखा कि सबसे पास का मेट्रो स्टेशन मंडी हाउस है। फिर नेट पर देखा तो पता चला 270 मीटर दूर है मंडी हाउस से रवींद्र भवन।
पहले सोचा था घर से नोयडा सिटी सेंटर तक पैदल जाएँगे। लेकिन हमेशा की तरह निकलने में देर हो गई। फिर सोचा ऑटो से चले जाएंगे। उबर और रैपिडो में ऑटो का किराया 86 रुपए बता रहा था। 900 मीटर दूरी के 86 रुपए ज़्यादा लगे लेकिन देर भी हो रही थी। ऑटो करें या पैदल जाएँ सोचते हुए कॉलोनी के गेट पर पहुँच गए। सामने ऑटो खड़े थे। एक से पूछा -"नोयडा सिटी सेंटर चलोगे?" उसने बगल वाले ऑटो की तरफ़ इशारा किया -"ये जाएगा।"
दूसरे वाले से पूछा तो बोला -"हाँ, चलेंगे।" किराया बताया -"पचास रुपये।" 36 रुपए और दस-पंद्रह मिनट बचने की ख़ुशी मन में धारण किए हम लपककर ऑटो में बैठ गए। पाँच से भी कम मिनट में स्टेशन पहुँच गए।
प्लेटफार्म पर पहुँचने के बाद देखा कि मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़ी थी। यात्री सामान की तरह ठसाठस पैक हो गए थे मेट्रो में। दरवाज़े बंद ही होने वाले थे। हम लपकते हुए और भागते हुए की स्पीड की औसत स्पीड से मेट्रो में धँस गए। लपकते और भागते के औसत से जाने की बजाय अगर हम टहलते हुए जाते मेट्रो की तरफ़ तो या तो मेट्रो छूट जाती या फिर मेट्रो में पहले से मौजूद यात्रियों की भीड़ को देखकर अंदर घुसने में हिचकिचाते। मेट्रो की तरफ़ तेजी से जाने से जड़त्व के नियम का भी सहयोग मिला और हम धँस ही गए यात्रियों के समन्दर में। हमारे अंदर घुसते ही मेट्रो के दरवाजे बंद हो गए। मेट्रो चल दी।
अंदर घुसते ही जिस मेट्रो में भीड़ के कारण दाखिल होना मुश्किल हो रहा था उसी में ऐसे जगह बनती गई कि हम सरकते हुए गेट से कई मीटर अंदर यात्रियों के सामने पहुँच गए। हमारे सामने की सीट महिला सीट थी।उनमें महिलाएँ बैठी थी।
महिला सीट के सामने खड़े-खड़े हम सोच रहे थे कि मेट्रो, बस वगैरह में महिलाओं, बुजुर्गों की सीट तय होती है। महिला सीट पाने की अधिकारिणी महिला को तो अपने शरीर और पहनावे के कारण अपना हक पाने के लिए कोई अलग से परिचय पत्र नहीं दिखाना पड़ता है। अक्सर उनको उनकी सीट मिल ही जाती है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा कम ही होता है। कोई कब बुजुर्ग हो गया यह उसके चेहरे या पहनावे से पता नहीं चलता। अक्सर वरिष्ठ नागरिक अपने लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवाओं को देखते खड़े रहते हैं। मारे संकोच के कुछ कह नहीं पाते।
मेट्रो में काफ़ी भीड़ थी। लोग हाथ ऊपर किए मेट्रो के लटकते हुए कुंडे पकड़े मेट्रो के साथ झूलते खड़े थे। मुझे लगा कि किसी चिरकुट नेता को अपनी कोई महा चिरकुट बात मनवानी हो तो मेट्रो का उपयोग कर सकता है। इसके लिए वह सुबह दफ़्तर के समय या शाम को लौटते समय मेट्रो के डब्बे में घुस जाये और अपनी महा चिरकुट बात को बताकर कहे -"जो लोग हमारी बात से सहमत से हों वे अपने हाथ उठायें।" इसके बाद लोगों के ऊपर उठे हुए हाथों के फोटो लेकर उनको गिनते हुए कह दे बहुमत हमारे समर्थन में है, इसलिए हमारी बात सही है।
किसी स्टेशन पर रुकते ही यात्रियो के थान के थान मेट्रो से निकलकर स्टेशन पर फ़ैल जाते। ठट्ठ के ठट्ठ यात्री मेट्रो से उतर कर प्लेटफार्म पर चलने लगते है। ऐसे लगता जैसे किसी आलू के बोरे को यात्रियो के रूप में प्लेटफार्म पर उलट दिया गया हो।
एक स्टेशन पर एक लड़की हमारे डब्बे में आई। उसके अंदर आते समय तो मैंने नहीं देखा लेकिन पास आने पर उसने मेरे पास खड़े यात्री को अपनी पीठ में लदा पिट्ठू बैग किनारे कर लेने को कहा ताकि वह आगे आ सके। यात्री अपने बैग सहित सरककर आगे हो गया। बालिका के लिए जगह बन गई।
लड़की ने महिला यात्रियों के लिए आरक्षित सीट के सामने खड़े होकर अपने बैग से एक छुटका पंखा टाइप निकाला और उसको अपनी चेहरे की तरफ़ करके पंखे का स्विच आन कर दिया। बालिका के चेहरे पर लटकी एकाध पसीने की बूँदों का मेरे देखते-देखते क़त्ल टाइप हो गया। पंखे की हवा ने उसके चेहरे पर लटका पसीना सुखा दिया। बालिका अपने चेहरे के सामने पंखे को हिलाते-डुलाते हुए न आया हुआ पसीना भी एडवांस में सुखाती रही।
मैंने ऐसा पसीना सुखाने वाला पंखा पहली बार देखा था। बाद में घर में लोगों को बताया तो पूछा गया -"तुमने पंखा पहली बार देखा कि मेट्रो में लड़की को पहली बार पंखे के साथ देखा?" हमने बताया-" हमने सब कुछ पहली बार देखा। हमको पता भी नहीं था कि ऐसा कोई पंखा होता है।"
हमको बताया गया कि यह आम चलन में है। इसको यूएसबी फैन कहते हैं।
बालिका हमारे आगे ही खड़ी थी। उसने बैग से एक किताब निकाली और खड़े-खड़े उसे पढ़ने लगी । मेट्रो के साथ हिलती-डुलती बालिका को किताब पढ़ते देखकर हमको बचपन में खड़े होकर हिलते-डुलते पहाड़े याद करते बच्चे याद आ गए । मेट्रो में यात्रा करते हुए बचपन की यात्रा करने में कोई टिकट नहीं पड़ा। स्मृतियों की यात्राएँ हमेशा मुफ्त होती हैं। इसी लिए दुनिया के तमाम लोग यादों के सफ़र पर जाते रहते हैं।
बच्ची जो किताब पढ़ रही थी वह अंग्रेजी की थी। हमको उत्सुकता हुई तो हमने किताब का नाम पढ़ा । किताब का नाम था - Infinite potential unlimited success. मतलब अनंत क्षमता,असीम सफलता। शायद कोई मैनेजमेंट की किताब थी। शायद कोई इंटरव्यू देने जा रही हो बालिका। पीछे से बालिका के किताब पकड़े हुए हाथ की लकीरें भी दिख रहीं थीं। लकीरें एक-दूसरे को प्रतिद्वंदियों की तरह काटती-पीटती लग रहीं थीं। हाथ की लकीरें किसी उम्रदराज का हाथ होने का इशारा कर रहीं थीं लेकिन चेहरा उससे अलग बयान जारी कर रहा था।
करीब पाँच स्टेशन साथ चलने के दौरान हम बालिका को किताब पढ़ते और एक ही पन्ने पर ठहरे देखते रहे। मन किया उसका फ़ोटो लें या फिर उसको संभावित इंटरव्यू के लिए शुभकामनाएं दे दें। लेकिन दोनों ही इरादों पर अमल करने की हिम्मत नहीं हुई। बाद में उसको याद करके चैटजीपीटी पर बालिका की स्थितियां बयान करते हुए फ़ोटो बनाने के लिए कहा कई बार कोशिश करने के बावजूद वैसी तस्वीर बनी नहीं जैसी हमने मेट्रो में देखी थी। हमको बार -बार गाना याद आता गया -"तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती।"
मंडी हाउस पर उतरकर सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए देखा कि हर सीढ़ी पर किलोकैलोरी के निशान बने हुए थे। एक सीढ़ी चढ़ने में कितने कैलोरी कम होंगे इसका हिसाब दिया था। वजन कम करने वालों के लिए यह अच्छा हिसाब है- "सीढ़ियाँ चढ़ते जाओ, कैलोरी खर्च गिनते जाओ।"
स्टेशन से बाहर आकर देखा रवींद्र भवन 270 मीटर दूर था। लपकते हुए चल दिए। दो मिनट बाद देखा दूरी 900 मीटर हो गई थी। मतलब हम ग़लत दिशा में चल रहे थे। वापस लौटे। रास्ते में मंडी हाउस के चौराहे पर लगे स्क्रीन के किसी विज्ञापन में दो बाबा लोग लड़ते-झगड़ते दिखाई दिए। दूर होने के कारण समझ में नहीं आया कि किस किए लड़ रहे थे बाबा लोग। शायद गद्दी की लड़ाई हो। मुझे याद आया कि किसी ने संत नगरी के महंतों का जिक्र करते हुए लिखा था -"यहाँ हर महंत के कमर में कट्टा रहता है।"
चौराहे के पास ही महान रूसी कवि पुस्किन की बड़ी सी मूर्ति लगी हुई थी। भारत-रूस की मैत्री के प्रतीक के रूप में रूस के महान कवि की प्रतिमा लगाई गई होगी। बड़ी बात नहीं कि कल को अगर भारत से रूस के राजनयिक संबंध खराब होते हैं तो कोई कट्टर देश भक्त पुश्किन की मूर्ति पर कालिख पोत दे। ऐसा पिछले दिनों हुआ था जब हालिया भारत-पाकिस्तान झड़प के बीच तुर्की द्वारा पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करने की बात पर पर गुस्साए कुछ लोगों ने दिल्ली के मुस्तफा कमाल अतातुर्क मार्ग का नाम बदलने की माँग की है। उन लोगों को शायद पता नहीं होगा कि तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी बिस्मिल की वीरता से प्रभावित होकर उनके सम्मान में तुर्की के एक शहर का नाम 'बिस्मिल' रखा था।
पुस्किन की मूर्ति के बगल में ही रवींद्र भवन था। अपन पुस्किन की मूर्ति को आदर के साथ देखते हुए रवींद्र भवन पहुंच गए जहाँ श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी का आयोजन हो रहा था।
-श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी की रपट का लिंक

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Saturday, August 30, 2025

हादसा जो हसीन हो गया



 श्रीलंका में एक हफ़्ता रहकर हम वापस भारत लौट आए। लौटते समय एक हसीन हादसे के शिकार हुए हम लोग। हादसे जिनसे उबर जाया जाता है, वो हसीन ही कहलाते हैं।

हुआ यह कि रात की फ़्लाइट से हम लोग वापस लौटे। फ्लाइट में जो मिला खाने-पीने को वो खा-पीकर कोलंबो से दिल्ली पहुँचकर। दिल्ली पहुंचकर इमीग्रेशन पर पासपोर्ट में भारत वापसी का ठप्पा लगवाकर हम लोग बाहर आ गए। कन्वेयर बेल्ट पर सामान का इंतज़ार करने लगे। अनन्य पीछे से आ रहे थे।
अनन्य ने पास आने पर पूछा -"मेरा बैग आपके पास है?" हम लोगों ने कहा नहीं। उस बैग में अनन्य के पैसे, मोबाइल और कई कार्ड थे। वह पीछे कहीं रह गया था।
पीछे रह गए बैग की याद करते हुए क़यास लगाए गए कि कहाँ रह गया होगा। यात्रा में सामान एक हाथ से दूसरे हाथ में टहलता रहता है। एक-दूसरे का बोझ हल्का करने, सहायता करने के भाव के चलते यात्राओं में एक का सामान कोई दूसरा उठा लेता है। दूसरे का कोई तीसरा। इसी चक्कर में कभी सामान इधर-उधर हो जाता है।
छोटा होने और ट्रिप लीडर होने के चलते कई अनन्य को दूसरों का सामान उठाना पड़ा। इस बार भी कुछ ऐसा ही। दूसरे का सामान लादने के चक्कर में अपना छूट गया शायद।
बैग की खोज में अनन्य वापस जहाज़ की तरफ़ जाने लगा। लेकिन इमिग्रेशन वालों ने अंदर जाने नहीं । कहा , अब आप वापस नहीं जा सकते। अपने सामान के बारे में खोया-पाया विभाग से संपर्क करें।
हम लोग परेशान। बैग में अनन्य पैसे के अलावा अनन्य के तमाम कार्ड, परिचय पत्र आदि और दूसरी जरूरी चीजें थी जिनको दुबारा बनवाना अपने में बड़ा झंझट और समय खपाने वाला काम।
एयरलाइंस वालों को बताया तो उन्होंने कहा -"हम लोग जहाज़ में दिखवा लेते हैं।सामान अगर छूटा होगा तो मिल जाएगा।"
हम लोग याद कर रहे थे कि कहाँ छूटा होगा बैग? एक अनुमान यह कि जहाज़ में छूट गया होगा , दूसरा यह कि एक जगह रुके थे फ़ोन करने को , शायद वहीं रख दिया होगा बैग। हमारे पास इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
कुछ देर बाद जहाज़ वालों ने बताया कि जहाज में जिन सीटों पर हम बैठे थे वहाँ कोई सामान नहीं छूटा है। इसका मतलब बैग जहाज से बाहर आने के रास्ते में कहीं छूटा होगा।
इस बीच हमें याद आया कि हमारे एक मित्र के मित्र हवाई अड्डे की सिक्योरिटी में काम करते हैं। जाते समय हमने उनसे बात भी की थी। उन्होंने कहा था -"कोई काम हो तो बताइयेगा।"
हमने अपने मित्र को खड़े-खड़े कई कई फ़ोन कर डाले। उधर से कोई जबाब नहीं आया।
इस बीच एयरलाइंस वाले ने बताया कि उनका स्टाफ़ जहाज़ से वापस देखता आयेगा। वैसे भी एयरपोर्ट कोई सामान खोता है तो कोई उठाता नहीं है। कहीं कोई सामान दिखता है तो उसे सिक्योरिटी में जमा करवा देता है। खोया हुआ सामान एकाध दिन में मिल जाता है।
बैग खोने-मिलने की आशा-आशंका के बीच झूलते हुए हम देर तक एयरपोर्ट के आगमन वाले अंदरखाने में खड़े रहे। लगभग सभी लोग अपना-अपना सामान लेकर अपने-अपने घर जा चुके थे। हम अनुमान लगा रहे थे कि जो-जो चीजें छूटी हैं उनको दुबारा बनवाने में क्या-क्या करना पड़ेगा?
इस बीच एयरलायंस की एक महिला सहायक सामने से आते दिखी। अपने हाथ में लिए बैग को हिलाते हुए उसने पूछा -"यह है आपका बैग?"
अनन्य ने लपक कर 'हाँ' कहते हुए बैग उस महिला सहायक से लिए। कई-कई बार थैंक्यू, थैंक्यू वेरी मच बोला। मुस्कराहटों का आदान-प्रदान हुआ। कन्वेयर बेल्ट, जहां हम खड़े थे, के आसपास का माहौल धन्यवाद मय हो गया। हादसा जो कुछ समय तक हादसा लग रहा था अब हसीन हादसे में तब्दील हो गया।
बैग मिल गया । इस घटना से सीख भी मिली कि हवाई यात्राओं में सामान कम से कम रखने के अलावा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपना सामान अपने पास ही रखना चाहिए। एक-दूसरे के हाथ में देने-लेने के चक्कर में सामान इधर-उधर हो सकता है।
लेकिन यह इस तरह की सीख है जिसका पालन अक्सर ही हम नहीं करते।

Friday, August 29, 2025

श्रीलाल जन्मशती संगोष्ठी -एक रपट


 कल दिल्ली के साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में श्रीलाल शुक्ल जी की जन्म शताब्दी के मौके पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत हुई । दिन भर का कार्यक्रम। श्रीलाल जी से लखनऊ में उनके घर में कई बार मिलने का, बतियाने का सौभाग्य मिला मुझे। पहली मुलाक़ात पिछली सदी के आख़िरी साल के दिनों की थी। बातचीत के बाद चलते समय उनके फ़ोटो लिए तो उन्होंने संकोच भरी आवाज में आग्रह किया था -"अनूप जी, इस फोटो की कॉपी मुझे भेजियेगा।"

बाद में मुझे पता चला कि जिस दिन श्रीलाल जी मुलाकात हुई थी उस दिन उनका जन्मदिन था। मैंने उनको फ़ोटो भेजते हुए उनको अपनी अज्ञानता का जिक्र करते हुए उनको जन्मदिन की बधाई दी थी। उन्होंने फोटो भेजने के लिए धन्यवाद देते हुए पोस्टकार्ड भेजा था।
इसके बाद श्रीलाल जी से कई मुलाक़ातें हुईं। एक बार कानपुर मेरे घर भी आए थे। साथ में मार्कंडेय जी और कमलेश अवस्थी जी भी थीं। घर में खाना खाने के बाद चलते समय घर के बगीचे में उगाई गई हल्दी उनको भेंट की थी तो उन्होंने प्रसन्न आवाज में कहा था -"इससे पवित्र और क्या हो सकता है?"
श्रीलाल शुक्ल जी की जन्मशती के बहाने उनसे जुड़ा यह प्रसंग 'उसी घराने' का जिसमें लोग किसी बड़े इंसान के बारे में बताते हुए सबसे पहले उससे अपनी नजदीकी के बारे में विस्तार से बताते हैं। यादों में उसके साथ इतना ज़्यादा चिपक जाते हैं कि महान व्यक्ति के बजाय उसको याद करने वाला ज़्यादा (बड़ा) दिखने लगता है। वो मुझे इतना चाहते थे, इतना मानते थे , इतना महत्व देते थे। संस्मरण का यह अंदाज़ जिसके बारे में बताया जा रहा है उससे ज़्यादा अपने को बताने की कोशिश का होता है।
बहरहाल, बात श्रीलाल जी पर केंद्रित कार्यक्रम के बारे में। कार्यक्रम दस बजे से था। उस समय तक कम लोग आए थे लेकिन कार्यक्रम तय समय पर शुरू हो गया। श्रीलाल जी पर केंद्रित वृत्तचित्त शुरू हो गया। 28 मिनट के इस वृत्तचित्त में श्रीलाल जी जुड़ी स्मृतियाँ और उनके बारे में उनसे जुड़े लोगों के संक्षिप्त वक्तव्य थे। श्रीलाल शुक्ल जी नातिन नंदिनी ने रोचक अंदाज़ में बताया कि जब भी उसने 'रागदरबारी' पढ़ना शुरू किया तब उन्होंने रोक दिया यह कहते कि "यह फालतू का लेखन है।" वक्तव्य रिकार्ड करने ऐसा उसके साथ तीन बार हो चुका था ।
कुछ ऐसा ही श्रीलाल जी कई बार अलग-अलग लोगों से कहते थे। मेरे द्वारा रागदरबारी का जिक्र करने पर मुझसे भी उन्होंने एक बार कहा था -"रागदरबारी तो मेरा बदमाशी का लेखन है।"
स्वागत भाषण के बाद गोविंद मिश्र जी ने श्रीलाल जी से जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। उन्होंने कहा -"श्रीलाल जी पर केंद्रित वृत्तचित्र देखते हुए लगा वे अभी भी हमारे बीच हैं।"
गोविंद मिश्र जी ने अपने प्रति श्रीलाल जी के स्नेह का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे एक बार बांदा में उनके(गोविंद मिश्र जी के) सम्मान समारोह में शिरकत के लिए श्रीलाल जी सूट-टाई में पहुंचे थे। वहाँ बैठने का इंतज़ाम बुंदेली अंदाज में तख्त पर था। लोगों ने गोविंद जी से आत्मीयता जताते हुए लंबे-लंबे व्याख्यान दिए। श्रीलाल जी धैर्य पूर्वक उनको सुनते रहे।
श्रीलाल शुक्ल जी के सौन्दर्य प्रेम का जिक्र करते हुए गोविंद मिश्र जी ने 'रागदरबारी' को साहित्य अकादमी सम्मान पाने के बाद हुई पार्टी का क़िस्सा सुनाया। पार्टी में जाने से पहले एकाध पैग ले चुके श्रीलाल जी पार्टी में किसी सुंदर महिला को देखकर बार-बार पूछ रहे थे -"who is she, who is she?"
गोविंद मिश्र जी का यह संस्मरण सुनते हुए मुझे श्रीलाल जी का वह कथन याद आया जिसमें उन्होंने लिखा था -"लेखक के अच्छे लेखन के लिए एक अदद प्रेमिका जरूरी है ।" श्रीलाल जी के इस कथन के जबाब में उनसे शायद किसी ने यह भी पूछा था -"लेखिका के अच्छी लेखन के लिए प्रेमी का भी बंदोबस्त होना चाहिए।"
गोविंद जी ने श्रीलाल जी और उनकी पत्नी के आपसी प्रेम का जिक्र करते हुए बताया कि जब गिरिजा जी बीमार थीं तो श्रीलाल जी ने उनकी देखभाल के लिए कहीं आना-जाना, लिखना-पढ़ना सब बंद कर दिया था। इस पर वे कहतीं थीं -"ये कहीं आयेंगे,जाएँगे नहीं , लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे नहीं तो लिखेगे कैसे?"
श्रीलाल शुक्ल जी की बीमारी के दौरान एक मुलाकात का जिक्र करते हुए गोविंद जी ने बताया -"श्रीलाल जी बीमार थे। उनके पीने-पिलाने पर रोक थी। उनकी बहू इस बात का ख्याल रखती थी कि वे शराब न पी सकें। मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने पूछा -"कुछ मंगवाया जाये?" इस मैंने कहा -"आपको पीना मना है घर में। बहू टोकेगी।" इस पर श्रीलाल जी ने कहा -"मुझे मना है लेकिन तुमको एलाऊ कर देगी (बहू) । तुम हैसियत वाले हो।"
गोविंद मिश्र जी के रिटायर होने पर श्रीलाल जी ने उनको "काजल की कोठरी से बेदाग़" निकल आने की बधाई दी थी। एक पत्रिका का संपादक बनने के बाद उनकी सलाह -"एक लेखक को डेढ़ साल से अधिक संपादक नहीं रहना चाहिए।" का जिक्र करते हुए बताया कि संयोग यह रहा कि "मैं पत्रिका के संपादक के दायित्व से डेढ़ साल से पहले ही मुक्त हो गया।"
गोविंद मिश्र जी ने जब इस बात का जिक्र किया तब शायद उन्होंने ही या किसी श्रोता ने अखिलेश जी का का जिक्र करते हुए कहा -"इनको तो डेढ़ साल से ऊपर हो गया संपादकी करते हुए।" वहीं प्रेम जनमेजय जी भी वहीं बैठे शायद सोच रहे होंगे -"हमको भी तो बीस साल से ऊपर हो गए व्यंग्य यात्रा की संपादकी करते हुए।"
गोविंद जी ने श्रीलाल जी से अपने जुड़ाव का जिक्र करते हुए कहा -"मेरे लिए वे हमेशा जीवित हैं।"
बीज वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित प्रो रामेश्वर राय जी Rameshwar Rai ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा -"मुझको बीज वक्तव्य देने के लिए कहा गया है। लेकिन बीज वक्तव्य तो गोविंद जी दे चुके हैं। बीज पेड़ भी बन गया है। मैं तो बस उसके बढ़ने के लिए थोड़ा खाद -पानी डालूँगा। "
प्रो रामेश्वर राय जी कहा -"मेरा श्रीलाल जी से व्यक्तिगत परिचय नहीं रहा। यह अच्छा ही है। रचनाकार से व्यक्तिगत परिचय होने पर , उससे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित होने के कारण, उसके लेखन पर राय प्रभावित होती है।"
प्रो राय ने श्रीलाल शुक्ल जी के लेखन पर विस्तार से चर्चा की। 'रागदरबारी' और 'विश्रामपुर का संत' के चरित्रों के बारे में चर्चा की।
प्रोफेसर रामेश्वर राय जी को सुनना अपने आप में अद्भुत अनुभव है। संगत में पहली बार उनकी बातचीत सुनकर उनके वक्तव्य, बातचीत खोज-खोजकर सुने। उन जैसे शिक्षकों को कभी रिटायर नहीं होना चाहिए। उनके हर वक्तव्य को नेट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
प्रो रामेश्वर राय जी श्रीलाल जी की रचनाओं पर अपनी प्रभावी आवाज में सारगर्भित चर्चा कर रहे थे कि क़रीब चालीस मिनट के उनके वक्तव्य के बाद सामने बैठे संचालक ने उनको 'वाइंड अप' करने का इशारा किया। वक्तव्य ख़त्म करने का इशारा होते ही ऐसा लगा जैसे चालीस हज़ार फीट की ऊंचाई पर उड़ता हुआ जहाज़ अचानक दस-पाँच हज़ार फीट पर उतर आए। बाद में प्रो रामेश्वर राय जी ने अपना वक्तव्य समेट कर ख़त्म करते हुए बताया -"मैं श्रीलाल शुक्ल जी पर केवल 2% ही बोल पाया।"
बाद में चाय के दौरान प्रो रामेश्वर राय जी के कुछ छात्र-छात्राओं से बात हुई। बच्चों ने बताया कि प्रोफेसर रामेश्वर राय जी के लेक्चर में दूसरे विषयों के छात्र भी आते हैं। प्रो राय का जिक्र करते हुए प्रभात रंजन जी Prabhat Ranjan ने अपनी एक पोस्ट में लिखा था -"दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में दो तरह के लोगों ने हिंदी की पढ़ाई की- एक जिनको रामेश्वर राय ने पढ़ाया और दूसरे जो उनसे नहीं पढ़ पाये। पैंतीस साल पहले मैं भी उनका छात्र था।"
प्रभात रंजन जी की बात को विस्तार देते हुए मैं लिखना चाहता हूँ -" दुनिया में दो तरह श्रोता हैं। एक वे जिन्होंने उनको सुना है, दूसरे वे जिन्होंने उनको नहीं सुना है। यह मेरी उपलब्धि है कि मैंने उनको सुना है।"
प्रो रामेश्वर राय जी का पिछला वक्तव्य सुनकर मनीश कुमार ने लिखा था -"मनोहर श्याम जोशी व्याख्यानमाला में ' प्रो. रामेश्वर राय ' का समृद्ध व्याख्यान सुनकर ऐसा लगा, मानो समंदर की गहराई से मछलियाँ भी निकलकर इस भावयुक्त भाषा-प्रवाह में अपनी जीवनशक्तियाँ तलाश रही हों।"
श्रीलाल शुक्ल जी पुत्री विनीता माथुर जी ने अपने पिता से जुड़ी यादें साझा कीं। अपने इलाहाबाद पढ़ने जाते समय श्रीलाल जी के भावुक होकर रो पड़ने का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने उनसे पूछा -"पापा, आप इतने भावुक क्यों हो रहे?" इस पर श्रीलाल जी ने उनसे कहा था -"मुझे लगता है अब इसके बाद तुम्हारे साथ इतना रहना नहीं हो पायेगा।" बाद में ऐसा ही हुआ।
विनीता जी ने बताया कि उनके पापा के ही कारण उनको विश्व साहित्य के अच्छे रचनाकारों को पढ़ने की रुचि हुई और वे अच्छी रचनाओं से वाक़िफ़ हो पायीं।
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष कौशिक जी ने कहा -" श्रीलाल शुक्ल जी का स्मरण करना ऋषि ऋण अदा करने जैसा है।"
साहित्य अकादमी की उपाध्यक्षा डा कुमुद शर्मा जी ने सभी वक्ताओं का आभार प्रकट करने के पहले श्रीलाल जी के बारे में अपनी यादें करते हुए वक्तव्य दिया।
पहले सत्र के बाद चाय पान हुआ। लंबी लाइन में लगे लोग चाय और नाश्ते लेकर आपस में गपियाते, बतियाते रहे। बिस्कुट ख़त्म हो गए थे, चाय आधी। लेकिन बिस्कुट फिर आए , चाय चलती रही। सबको मिली।
चाय सत्र के बाद श्रीलाल शुक्ल जी के 'कृती व्यक्तित्व' पर चर्चा करते हुए अखिलेश जी, शैलेंद्र सागर जी और ममता कालिया जी ने अपने संस्मरण सुनाये।
अखिलेश जी ने श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़े कई रोचक, संवेदनशील और अनूठे संस्मरण सुनाये। समकालीन लेखकों में अखिलेश जी शायद ऐसे रचनाकार हैं जिनका सबसे लंबा व्यक्तिगत और रचनात्मक संपर्क श्रीलाल जी से रहा है। अखिलेश जी की तद्भव पत्रिका का प्रवेशांक श्रीलाल शुक्ल जी पर केंद्रित था। अपने आप में अनूठा अंक है यह।
अखिलेश जी ने श्रीलाल जी की मिलनसार व्यक्तित्व का जिक्र करते हुए कहा :
" श्रीलाल जी को लोगों से मिलने-जुलने का शौक था। जो भी आता उससे मिलते। गांव घर से, देश से मिलने लोग उनके यहाँ आते। एक बार वे लोगों से मिलते हुए थक गए थे। बाहर लोग उनसे मिलने के लिए बैठे थे। उन लोगों को कहलवा दिया गया कि श्रीलाल जी घर पर नहीं हैं। इस बीच मैं भी गया उनसे मिलने। मुझसे भी कहा गया -"घर में नहीं हैं।" मैं यह कहते हुए वापस लौट आया कि आयें तो बता दीजियेगा कि अखिलेश आए थे मिलने।
मैं गेट तक पहुँचा ही था कि अंदर से उनका नौकर आया और कहा कि अभी आ जाएँगे। आप अंदर आ जाइए। जब मैं अंदर पहुँचा तो वहाँ श्रीलाल जी बैठे थे। बोले -"मैं आज लोगों से मिलते हुए थक गया हूँ इसलिए कहलवा दिया कि मैं घर पर नहीं हूँ।"
श्रीलाल जी की आदत थी कि जो कोई भी उनसे मिलने जाता उसको गेट तक छोड़ने बाहर आते थे। घंटे -डेढ़ घंटे बात करने के बाद जब मैं वापस निकला तो हमको बाहर तक छोड़ने आए। उनसे मिलने आए लोग, जिनसे कहला दिया गया था कि श्रीलाल जी घर पर नहीं हैं , अभी भी बाहर बैठे उनका इंतज़ार कर रहे थे। श्रीलाल जी उनको देखकर जिस तरह झेंपे उसका वर्णन मुश्किल है। "
श्रीलाल जी व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :
" उनका जीवन उनके उपन्यास राग-विराग की तरह था। एक तरफ़ वे जीवन के हर क्षण का आनंद उस क्षण से जुड़कर उठाते थे दूसरी तरफ़ जीवन के हर आकर्षण से उचाट हो जाते थे। संगीत सुनना उनका शौक था। लेकिन उसको पुराने रेडियो/टेपरिकार्डर पर सुनते थे। जब मैंने उनसे कहा कि नया, अच्छा सेट ले लीजिये तो उन्होंने कहा -"ऐसे ही ठीक है।"
आमने-सामने घंटों बतियाने वाले श्रीलाल जी को टेलीफ़ोन पर लंबी बातचीत करना पसंद नहीं था। टेलोफ़ोन पर बात करते-करते अचानक फ़ोन रख देते। एक बार किसी शोध छात्रा ने उनको फ़ोन करके उनके साहित्य और कृतियों पर उनसे जानकारी लेनी चाही। श्रीलाल जी कुछ देर तो उससे बात करते रहे। इसके बाद यह कहते हुए फ़ोन रख दिया -"आप यह समझकर शोध करिए कि लेखक मर चुका है।"
पीने-पिलाने और इससे जुड़ी ख़ुद की इमेज के प्रति एक तरफ़ बेहद सतर्क और दूसरी तरफ़ एकदम बेपरवाह होने से जुड़े दो किस्से अखिलेश जी ने सुनाये।
पहले क़िस्सा तद्भभव के प्रवेशांक से जुड़ा था। रवींद्र कालिया और गोविंद मिश्र के संस्मरण में श्रीलाल जी के शराब पीने से जुड़े संस्मरण थे। श्रीलाल जी नहीं चाहते थे कि वे संस्मरण छापे जायें। उन्होंने कहा -"इनको निकाल दिया जाये।"
इस पर अखिलेश जी ने कहा -"इनको निकाला कैसे जाये? लिखने वाले ने लिखकर दिए हैं। क्या ये संस्मरण ग़लत हैं?"
इसपर श्रीलाल जी ने कहा -" इनको मेरे घर के लोग, बच्चे भी पढ़ेंगे तो मेरे बारे में क्या सोचेंगे।"
शराब से जुड़ी अपनी इमेज के प्रति इतने सतर्क और चिंतित श्रीलाल जी की इसके एकदम विपरीत याद साझा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :
" इंदौर में एक विश्वविद्यालय में कार्यक्रम था। श्रीलाल जी के साथ हम लोग पहुँचे। एक बीए में पढ़ने वाले छात्र ने उनके वहाँ पहुँचने पर आदर के साथ उनके पैर छुए। उन्होंने उससे कहा -"यहां आसपास कोई शराब की दुकान हो लेकर आओ।"
श्रीलाल जी की स्मरण शक्ति बहुत जबरदस्त थी। एक बार उज्जैन जाते हुए उन्होंने बारिश के मौसम में वर्षा से जुड़ा कोई श्लोक सुनाया। उनके साथ बैठे लोगों ने तारीफ़ की। उन्होंने एक और श्लोक सुना दिया। इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उनसे कहा गया -"आपको याददाश्त गजब की है।" कुछ और बात चली तो उन्होंने हाल ही में छपी हेमंत कुकरेती की कविता सुना दी। इससे अंदाज लगता है कि वे अपने समय के नए से नए कवि/लेखक को पढ़ते थे और उनकी रचनाओं को याद भी रखते थे।
वे नए से नए लेखक को पढ़कर उसकी रचनाओं पर अपनी राय भी देते थे। उत्साह वर्धन करते थे। एक बार अखिलेश जी ने कहा -"आप इतना कैसे कर लेते हैं, कैसे लोगों की ख़राब रचनाओं को भी पढ़कर उस पर अपनी राय व्यक्त कर लेते हैं?"
इस पर श्रीलाल जी ने कहा -"नए लेखक मेहनत करके लिखते हैं। उनका उत्साह वर्धन करना चाहिए।इसलिए मैं उनको पढ़ता और उनके बारे में लिखता हूँ।"
अखिलेश जी ने कहा -"श्रीलाल जी आस्तिक थे। पूजापाठ करते थे लेकिन दकियानूस नहीं थे।"
गिरिजाजी से जुड़ा संस्मरण साझा करते हुए अखिलेश जी ने बताया :
"गिरिजा जी को भूलने की बीमारी हो गई थी। श्रीलाल जी सब कुछ भूलकर गिरिजा जी की सेवा करते थे। एक दिन मैंने देखा कि श्रीलाल जी रामचरित मानस की एक चौपाई को रुक-रुक कर उनको पढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। मैं कुछ बोला नहीं। लेकिन श्रीलाल जी ने कहा -"तुम सोच रहे होगे कि मैं इस उमर में इनको दुबारा सिखाने के लिए क्यों मेहनत कर रहा हूँ?" इस पर मैंने कहा -" नहीं ऐसा कुछ नहीं।" फिर श्रीलाल जी ने संस्कृत का श्लोक सुनाया जिसका मतलब है अगर कोई विद्या सीखनी हो यह सोचकर सीखनी चाहिए कि हम अजर -अमर हैं। "
अखिलेश जी के श्रीलाल जी से जुड़े रोचक संस्मरण सुनने के बाद शैलेंद्र सागर जी ने श्रीलाल जी से जुड़े अपने संस्मरण सुनाये। शैलेंद्र सागर जी ने अपना वक्तव्य लिखकर लाए थे। उन्होंने श्रीलाल जी से जुड़ी कई यादें साझा कीं। इनमें अधिकांश कथाक्रम के आयोजन से जुड़ी यादें थीं। श्रीलाल जी लगातार कथाक्रम से जुड़े रहे। शैलेंद्र जी ने बताया कि श्रीलाल जी कथाक्रम के आयोजनों से जुड़ी बैठकों में नियमित भाग लेते थे, सबकी बातें सुनते थे और अपनी तार्किक राय देते थे। अपनी राय थोपते नहीं थे। कई बार कथाक्रम के आयोजन में उनमने, असावधान दिखते तो लगता कि अपना संबोधन कैसे देंगे लेकिन जब वे बोलते तो सजग, सुचिंतित और तार्किक तरीके से अपनी बात रखते।
कृती व्यक्तित्व के अध्यक्ष के रूप में ममता कालिया जी Mamta Kalia ने श्रीलाल जी से जुड़ी तमाम यादें साझा कीं। इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान श्रीलाल जी का उनके यहाँ मिलना-जुलना, आना-जाना था। श्रीलाल जी की रागदरबारी प्रकाशित हुई तो उनके कई आलोचक मित्रों ने इसकी बहुत ख़राब आलोचना की। अश्क जी ने रवींद्र कालिया जी को उपन्यास पढ़ने को दिया तो उन्होंने पढ़कर उपन्यास की श्रीलाल जी से तारीफ़ की तो श्रीलाल जी ने पूछा -"क्या तुम सही कह रहे हो? सही में उपन्यास तुमको पसंद आया?"
इस पर रवींद्र कालिया जी ने कहा -"सही में उपन्यास बहुत अच्छा है।"
बाद में रागदरबारी हिंदी व्यंग्य का क्लासिक उपन्यास साबित हुआ। आज भी हिन्दी के सबसे अधिक बिकने वाले उपन्यासों में इसका शुमार है।
रवींद्र कालिया और श्रीलाल जी की मित्रता में लगाव और नोकझोंक के मजेदार किस्से ममता जी ने सुनाये। श्रीलाल जी के कई दोस्त परिमल से जुड़े थे , केशव चंद्र वर्मा, धर्मवीर भारती आदि। रवींद्र कालिया जी परिमलियन को उतना पसंद नहीं करते थे। दोनों के बीच नोक-झोंक चलती रहती। कभी ऐसा होता कि रवींद्र कालिया जी से बहस के बाद वे अपसेट हो जाते लेकिन फिर ममता जी और बच्चों से बातचीत करके खुश हो जाते। ममता जी ने अपनी एक कहानी में दो शैतान बच्चों का जिक्र किया था। श्रीलाल जी बच्चों/ममता जी से उन कहानी के पात्रों का ज़िक्र करके पूछते इनमें से वो कौन है?
श्रीलाल जी को इंटरव्यू देना पसंद नहीं था। एक बार ममता जी उनसे बातचीत करने आईं तो श्रीलाल जी ने एकदम शरीफ, आदर्श व्यक्ति की तरह सवालों के जवाब दिए। वे बड़ी ख़ुश हुईं। जब घर जाकर उन्होंने रवींद्र जी को इंटरव्यू के सवाल-जबाब दिखाए तो उन्होंने कहा -"तुमको श्रीलाल जी ने बेवकूफ बनाया है।"
बाद में श्रीलाल जी ममता जी को फ़ोन करके कहा -"वो इंटरव्यू फाड़ दो।" फिर उन्होंने ममता जी बातचीत की।
ममता कालिया जी जब बोलने खड़ी हुईं तो डायस से केवल उनका चेहरा दिख रहा था। कुछ देर बाद उनके लिए नीचे शायद छोटा स्टूल या मेज़ रखा गया। ममता जी अब श्रोताओ को साफ़ नज़र आने लगीं। नीचे स्टूल रखे जाते समय किसी ने कहा -"आपका क़द ऊँचा किया जा रहा है।"
इस पर ममता जी ने कहा -"लेखक का कद ऐसे नहीं ऊँचा होता। बहुत मेहनत करनी पड़ती है, बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं लेखन में क़द ऊँचा करने के लिए।"
तीसरे सत्र में श्रीलाल जी के उपन्यासों पर चर्चा हुई। नित्यानंद तिवारी जी ने अध्यक्षीय वक्तव्य सबसे पहले देते हुए श्रीलाल जी उपन्यासों पर चर्चा करते हुए अपनी पुरानी यादें भी साझा की।
'व्यंग्य उपन्यास' और 'उपन्यास में व्यंग्य' का अंतर बताते हुए नित्यानंद तिवारी जी ने कहा -"रागदरबारी में आद्योपान्त व्यंग्य है इसलिए यह एक व्यंग्य उपन्यास है। इसके पहले लिखे मैला आँचल में कई व्यंग्यात्मक प्रकरण हैं लेकिन यह व्यंग्य उपन्यास नहीं है।"
87 साल की उमर में श्रीलाल शुक्ल के लेखन पर चर्चा करते हुए नित्यानंद तिवारी जी कहा -"मैं इधर-उधर की बात करते हुए अपनी बात करूँगा।" इधर-उधर की बात करते हुए उनकी याददाश्त भी इधर-उधर होती रही। वे कुछ भूलते-याद करते बोलते रहे। लेकिन उनका भूलना-याद करना, बोलना और फिर भूलना - याद करना और फिर भूलना एक ऐसे बुजुर्ग का सहज आत्मीय व्याख्यान था जिसकी मौन उपस्थिति भी यादगार होती।
नित्यानंद जी ने कहा -"राग दरबारी जब लिखा गया था तब समाज में इतनी खराबी नहीं थी।" बाद में स्थितियां ज़्यादा ख़राब होती चली गयीं।
साहित्य और समाज के संबंध बताते हुए उन्होंने कहा -" ऐसा हो सकता है कि कोई ऐसा समाज हो जिसमें साहित्य न हो लेकिन बिना समाज के कोई साहित्य नहीं लिखा जा सकता।
अपनी बात कहकर नित्यानंद तिवारी जी चले गए। इसके बाद विनोद तिवारी जी ने श्रीलाल जी के उपन्यासों पर बात करने से पहले उनसे जुड़ा एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया।
विनोद जी Vinod Tiwari ने बताया कि उनके विवाह के अवसर पर भेंट में आए लिफाफों में जो शुभकामनाएँ लिखीं थीं उन्होंने उनका कोलाज बनाया था। श्रीलाल शुक्ल जी ने अपनी शुभकामनायें व्यक्त करते हुए लिखा -"तुम्हारा वैवाहिक जीवन रामकथा सा दीर्घायु हो।"
विनोद तिवारी जी ने श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए बताया -"कोई कृति कालजयी तब बनती है जब वो बदलते समय के साथ भी प्रासंगिक बनी रहे। रागदरबारी में वर्णित गबन की, चुनाव जीतने की तरकीबें बदले रूप में आज भी लागू हैं। रागदरबारी में मशीन (घड़ी) के सहारे चुनाव जीतने की तरकीब आज बदले रूप में जारी है। रागदरबारी लोकतंत्र की विद्रूपता का प्रहसन है।
विनोद तिवारी जी के बाद प्रेम जमनेजय जी ने अपने विस्तृत व्याख्यान में श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़ी तमाम यादों को साझा किया। इसके साथ नामवर सिंह और नित्यानंद तिवारी जी को भी याद किया। श्रीलाल शुक्ल जी के साथ 'हिंदी साहित्य के हास्य-व्यंग्य संकलन' के प्रकाशन से जुड़ी यादों को भी साझा किया। यह भी बताया कि उनके और श्रीलाल शुक्ल जी के साझा संपादन में प्रकाशित इस किताब का तेईसवाँ संस्करण आया है। यह इस संकलन की उल्लेखनीय उपलब्धि है।
प्रेम जी को श्रीलाल जी के उपन्यास 'मकान ' पर चर्चा करनी थी लेकिन वे 'रागदरबारी' पर चर्चा करने से अपने को रोक नहीं सके। रागदरबारी के मंदिर में माथा टेकने के बाद ही वे अपने 'मकान' की तरफ़ आये। इसके पहले और बाद में तथा बीच-बीच में भी वे अपनी 'व्यंग्य यात्रा' का जिक्र करते रहे।
व्यंग्य यात्रा और प्रेम जी एक-दूसरे से जिस तरह जुड़े हैं उसके चलते उनके द्वारा उसका इस तरह जिक्र करना सहज-स्वाभाविक है। प्रेम जी और सुभाष चंदर जी के व्यंग्य से जुड़े कई वक्तव्यों को सुनने के बाद मुझे लगता है कि अगर दोनों 'व्यंग्य बुजुर्गों' से मौज लेनी हो उनके बोलने पर या शर्त लगा देनी चाहिए की आप व्यंग्य यात्रा और हिंदी व्यंग्य के इतिहास का जिक्र नहीं करेंगे। इस पर शायद दोनों व्यंग्य-दिग्गज बोलने से मना कर दें कहते हुए -" फिर हम बोलेंगे क्या?"
प्रेम जी हमने चाय के दौरान जब उलाहना दिया कि आपने इतने लंबे उद्धरण क्यों पढ़े तो उन्होंने बताया -" यहाँ तमाम शोध छात्र भी हैं श्रोताओं में। शोध में उद्धरण जरूरी होते हैं।" इस पर हमने ध्यान दिया कि सही में तमाम छात्र किताब-कलम लिए नोट्स लेने के जुटे थे। कई बच्चे तो चाय और भोजन सत्र के दौरान प्रो रामेश्वर राय जी और विनोद तिवारी जी से अपनी शंकाओं का समाधान कर रहे थे। मेरे सामने एक बच्ची ने विनोद तिवारी जी 'विरूपण' का अर्थ पूछा। विनोद जी ने विस्तार से बताया भी।
बातचीत के दौरान प्रेम जनमेजय जी ने बताया कि श्रीलाल शुक्ल जी के जन्मशती आयोजन में उनके अनुरोध की भी भूमिका रही है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। मैं यह भी सोच रहा हूँ कि साहित्य अकादमी या राजकमल प्रकाशन श्रीलाल जी के जन्मदिन के मौके पर साल के आख़िरी दिन कोई आयोजन हर साल कराये तो कितना अच्छा हो।
आख़िरी सत्र में श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यासेतर साहित्य पर चर्चा हुई। शाम हो जाने के चलते कई श्रोता चले गए थे। उपन्यासेतर साहित्य पर श्रोतातर चर्चा हुई। राजकुमार गौतम जी , सुभाष चंदर जी और अध्यक्ष के रूप में रेखा अवस्थी जी ने श्रीलाल शुक्ल जी उपन्यासेतर साहित्य की चर्चा की। लेकिन लगभग सभी ने मुख्य कृति 'रागदरबारी' को याद करते हुए ही अपनी बता कही। राजकुमार गौतम जी ने श्रीलाल शुक्ल जी से जुड़ी अपनी कुछ यादें साझा करते हुए उनकी व्यंग्य कथाओं की चर्चा की।
सुभाष चंदर जी ने रागदरबारी से संबंधित अपने अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा -"राग दरबारी पर तो मैं दो दिन तक बोल सकता हूँ।" धमकी के रूप में बोले उनके इस कथन को सुनकर हमने सोचा -"शुक्र है कि सुभाष जी को रागदरबारी पर बोलने के लिए नहीं कहा गया।"
सुभाष जी ने श्रीलाल जी द्वारा लिखी कुन्ती का झोला, उमरावनगर में कुछ दिन आदि कहानियों का जिक्र करते हुए उनकी ख़ासियत की चर्चा की।
उपन्यासेतर साहित्य पर चर्चा करते हुए किसी ने उनके साथी लेखकों और साथ जुड़े लोगों के बारे में लिखे संस्मरण लेखों की चर्चा नहीं की। श्रीलाल जी ने कई यादगार संस्मरण भी लिखे हैं।
सुभाष चंदर जी Subhash Chander के बाद रेखा अवस्थी जी ने भी विस्तार से श्रीलाल जी के समग्र लेखन पर अपनी बात रखी। उनके अनुसार शायद श्रीलाल जी व्यंग्य को विधा न मानकर एक प्रवृत्ति मानते थे।
समारोह के बाद चाय पर चर्चा करते हुए सुभाष चंदर जी ने दृढ़तापूर्वक यह स्थापित किया कि व्यंग्य एक मुक्कमल विधा है। चाय के साथ समोसे और पकौड़े का इंतज़ाम सुभाष जी का था, उनका नमक खाये होने के कारण उनके वक्तव्य का खंडन करने की जुर्रत तो हमने नहीं की लेकिन मजे लेने के संविधान प्रदत्त अधिकार का उपयोग करते हुए यह ज़रूर कहा -" व्यंग्य को विधा मानना आपके लिए मजबूरी है। आप ऐसा नहीं मानेगे तो आपका लिखा 'हिंदी व्यंग्य साहित्य का इतिहास' सवालों के घेरे में आ जाएगा।"
सबसे रोचक बातचीत दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों से हुई। बच्चों ने अपने गुरुओं के बारे में बताया। यह ही बताया कि लभभग सभी बच्चे पढ़ाई करते हुए कंप्टीशन की तैयारी में जुटे हैं।
साहित्यभवन में किताबघर का प्रकाशन भी है। हमने वहाँ से 'डॉन क्विक्जोट' का हिन्दी अनुवाद ख़रीदा। वहाँ पर आनलाइन भुगतान की व्यवस्था ने होने के कारण दोनों के पैसे कमलेश पांडेय जी ने दिये । इस फ्रेंच उपन्यास का अंग्रेजी संस्करण दस साल से भी ऊपर समय से अनपढ़ा रखा है। हिंदी अनुवाद शायद पढ़ लें। इस उपन्यास के बारे में परसाई जी के लेख में बीस -पचीस साल पहले पढ़ा था। पाँच सौ साल पहले लिखे उपन्यास के पढ़ने में पाँच-दस साल की देरी तो चलती है।
राग दरबारी का जिक्र करते हुए भी शायद कौशिक माधव जी ने कहा था -"साहित्य में बहुत कुछ ऐसा होता है जो पढ़ा देर से जाता है। समझा और भी देर से जाता है।"
समारोह के दौरान कई वक्ताओं ने अपने वक्तव्य पढ़कर दिए। उनको सुनते हुए मुझे लगा कि पढ़कर दिए गए वक्तव्य का पर्चा वक्तव्य के लिए बाली की तरह होता है। वक्तव्य की आधी ताक़त हर लेता है। लिखित वक्तव्य में भी अगर वक्ता अपना ही जिक्र करता है तो वक्तव्य का प्रभाव और भी आधा हो जाता है।हालांकि बिना पढ़े बोलने में काफ़ी कुछ भूलने का ख़तरा भी होता है।
कल किताब घर की दुकान से किताब खरीदते हुए हम लोगों (मैंने और कमलेश Kamlesh Pandey पांडेय जी ने) सुशील सिद्धार्थ जी को भी याद किया। वे होते तो श्रीलाल जी से जुड़ी कुछ यादें साझा करते। सुशील जी ने श्रीलाल जी के साथ बातचीत भी है।
इस तरह सुबह से लेकर शाम तक का एक दिन श्रीलाल शुक्ल जी की यादों के साथ बीता। उनकी रचनाओं की चर्चा सुनते हुए उनके उपन्यासों और लेखों को दुबारा पढ़ने का संकल्प लिया। इस दौरान कई मित्रों से मुलाकात भी हुई। रजनीकांत शुक्ल जी Rajnikant Shukla से तो एक बार पहले भी मिल चुके थे। ओम सप्रा जी Om Sapra से पहली बार मुलाकात हुई। ओम सप्रा जी ने अपनी दो किताबें भी भेंट की। सभी वक्ताओं से भी नमस्ते-बातचीत हुई।
यह रिपोर्ट याददाश्त के भरोसे लिखी है। असल में मैंने कई वक्ताओं के वक्तव्य के वीडियो बनाए थे। लेकिन न जाने क्या हुआ कि जिस मोबाइल में वीडियो बनाए थे वह चलते-चलते रूक गया और दुबारा स्टार्ट ही नहीं हुआ। बाद में उसको फ़ार्मेट करना पड़ा। सारे वीडियो ग़ायब हो गए। इसलिए कुछ गड़बड़ी हो गई हो लिखने में। बताए जाने पर उसे ठीक कर लेंगे।
पोस्ट पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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