Wednesday, June 07, 2006

यायावर चढ़े पहाड़ पर…

http://web.archive.org/web/20110101191655/http://hindini.com/fursatiya/archives/139

[मित्रों के आग्रह तथा आदेशपर अपने आलस्य को परे धकेल के फिर से अपनी साइकिल यात्रा के किस्से बयान करना शुरू कर रहा हूँ। पहले के किस्से पढ़ने का मन करे तो यहाँ पढ़ें। फिलहाल यह संस्मरण प्रसिद्ध जैन तीर्थ पारसनाथ पर के बारे में ।जिस साथियों को पारसनाथ के बारे में और विस्तार से जानना हो वे इन कड़ियों को देखें।]

बगोदर से हम नास्ता करके सबेरे चल दिये। यात्रा के कार्यक्रम के हिसाब से हमारा अगला पड़ाव धनबाद था। हम साइकिल से खरामा-खरामा चलते हुये बढ़े जा रहे थे। मौसम कुछ गरम सा था। ८ जुलाई ,सन्‌ १९८३ । बारिश कुछ-कुछ होकर रुक जाती थी। गर्मी तथा उमस थी वातावरण में। कुछ देर बाद हमें याद आया कि हम हजारीबाग जिले में चल रहे हैं। हजारीबाग से याद आया कि यहीं की सेन्ट्रल जेल से जयप्रकाश नारायण दीवार फाँदकर फरार हो गये थे। जेल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बता कर फरार होने से जयप्रकाश जी की प्रसिद्धि बहुत हो गयी थी। हमें कुछ पता नहीं था हजारीबाग जेल के बारे में तथा इलाका भी वीरान सा था लेकिन सड़क के बायीं तरफ की हर ऊँची दीवार देखकर हम अनुमान लगाते कि हम जेल के बगल में चल रहे हैं। घाट सेक्सन में साइकिल चलाने में बहुत मेहनत पड़ती है। ऊँचाई पर चढ़ते समय दम फूलने लगता लेकिन हम जिद्द में साइकिल से नीचे नहीं उतरते थे। ऊँचाई पर चढ़ते हुये हमारी गति ट्रक के बराबर होती । कभी-कभी चढ़ाई पर चढ़ते समय हम बगल से गुजरते ट्रक की पीछे की जंजीर पकड़कर ट्रक के साथ चलते। दुर्घटना के अंदेशे को देखकर ड्रायवर क्लीनर हमको डांटते लेकिन हम जहां मौका मिलता जंजीर थाम लेते।

उतरते समय सर्र-सर्र साइकिल चलती। तब मोड़पर ब्रेक लगाना पड़ता। लगभग हर घाट सेक्सन में ‘हेयरपिन ब्लाइंड टर्न ‘ बोले तो अंधे मोड़ रहते हैं। बहुत सावधान रहना पड़ता है चढ़ते- उतरते समय। ट्रक चींटी की मानिन्द चढ़ते-उतरते देखकर हमें लगता कि इससे तेज तो हम ही हैं।

पारसनाथ पहाड़

पारसनाथ पहाड़
दोपहर के करीब हम निमियाघाट पहुँचे। वहाँ एक ढाबे में खाना खाया। हम लड़कों की वेशभूषा देख कर की लोग अंदाजा लगा लेते कि ये परदेशी आइटम है। लोग पूछताछ करते हुये आसपास के इलाके के टूरिस्ट गाइड बन जाते। ये नहीं देखा तो क्या देखा? यहाँ जरूर जाओ,वहाँ तो चले ही जाओ। निमियाघाट में खाना खाने के बाद ऐसे ही स्थानीय लोगों से पता चला कि हम जहाँ पर हैं वहां से पास ही प्रसिद्ध पारसनाथ जैन मँदिर है। पहाड़ पर स्थित प्रसिद्द जल मंदिर जैन धर्मावलंबियों के लिये श्रद्धा का केन्द्र है।

पारसनाथ मँदिर जैनियों के लिये इतना प्रसिद्ध है जितना मुस्लिमों के लिये मक्का। हमें लगा कि भाई जब मामला इतना प्रसिद्ध है तो देख लेने में क्या हर्जा? हम जब निकले ही आवारगी के लिये हैं तो इतनी महत्वपूर्ण जगह कैसे छोड़ दें। हमने तुरन्त तय किया कि देखना है मंदिर। अब ये कोई ब्लागर मीट तो थी नहीं कि महीने पहले से प्रोग्राम बनाया जाय,हफ्तों परिचर्चा की जाय। इधर प्रोग्राम तय किया उधर सीटी बजा के चल दिये।
फिर क्या , वहीं निमियाघाट पुलिस स्टेशन में अपनी साइकिलें जमा कीं तथा यायावर पर्वतारोहियों में तब्दील हो गये। पर्वतारोही इसलिये कि पारसनाथ मँदिर पारसनाथ पहाड़ पर स्थित है।

असल में पारसनाथ तो जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जनता द्वारा घिसकर अपनाया गया सरल नाम है। इस तीर्थ की महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि जैन धर्म के कुल चौबीस तीर्थंकरों में से बीस ने अपना अंतिम समय पारसनाथ पहाड़ पर ही बिताया तथा यहीं पर निर्वाण प्राप्त किया। जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ने हिमालय के जिस स्थान पर शरीर त्याग किया था वह स्थान अगम्य होने तथा बाद के बीस तीर्थंकरों द्वारा पारसनाथ में शरीर त्याग के कारण यहाँ की महत्ता और बढ़ जाती है। जैन धर्म के बारे में अक्सर लोग भ्रम बस भगवान महावीर को जैन धर्म का संस्थापक बताते हैं जबकि वे चौबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान महावीर ने पटना जिले के पावतपुरी में निर्वाण प्राप्त किया।

बहरहाल हम तीर्थयात्रा के लिये पहाड़ पर चढ़ने लगे। दोपहर के बाद चढ़ना शुरू किया था।खाना खाने के बाद हमारी गति वैसे भी धीमी थी। धूप भी थी लेकिन पहाड़ पर जगह-जगह पेड़ के कारण गर्मी नहीं लग रही थी। हमें तो पता नहीं था लेकिन लोग (बाद में पता चला)ने बताया कि पारसनाथ पहाड़ पर चंदन के बहुत सारे पेड़ हैं। जगह-जगह बकरी तथा दूसरे जानवर चराने वाले लोगों से हम रास्ता पूँछते जा रहे थे। निमियाघाट की तरफ से जाने वाला रास्ता आम रास्ता नहीं था । आम रास्ता मधुबन कस्बे से होकर है लेकिन वह हमारे रास्ते से अलग था।

रास्ते में कई जगह पानी के झरने मिले। हम उन दिनों पानी की बोतल लेकर नहीं चलते थे। बस ऐसे ही मुँह उठाकर जहाँ मन आया चल देते थे।लिहाजा पानी के लिये कई बार काफी इंतजार करना पड़ता था। फिर भी यह समझ नहीं विकसित की पानी का इंतजाम करके चला जाय। शायद कारण यह भी रहा हो कि हमें लोगों ,देश की आम जनता पर बहुत भरोसा था। यह भी संयोग है कि हमारा भरोसा कभी टूटा नहीं।

जलमँदिर
जलमँदिर
शाम होते-होते हम जब ४४८१ फुट ऊँचाई पर स्थित तीर्थस्थान पर पहुँचे तबतक हम बहुत थक चुके थे। लेकिन यह सोचकर कि अब आराम से सबेरे तक यहीं आराम करेंगे ,हमने सुकून की साँस ली।
हम वहाँ पहुँच तो गये लेकिन शाम होने के बावजूद इतने प्रसिद्ध तीर्थ में पसरा सन्नाटा हमें कुछ अजीब सा लग रहा था। चारो तरफ मंदिर जैसे बने थे लेकिन आदमी कोई नहीं दिखाई दे रहा था। हम सोच ही रहे थे कि कारण क्या है तबतक एक मंदिर से निकलकर एक साधु ने हमसे पूछा -तुम लोग कौन हो? यहाँ कैसे रुके हो?

हम लोगों ने अपने सवाल से उपजे आश्रचर्य को दबाते हुये श्रृद्धा पूर्वक बताया कि हम यहाँ भगवान के दर्शन करने आये हैं। जवाब में हमें झटका लगा जब हमें बताया गया कि यहाँ रात में किसी भी दर्शनार्थी को रुकने की अनुमति नहीं है। हमने बहुत विनय की की हम रास्ता नहीं जानते,रात को नीचे कैसे जायेंगे,यही बाहर पड़ें रहेंगे। लेकिन हमारी सारे अनुरोध खारिज कर दिये गये। बताया गया कि नीचे चले जाओ नहीं तो रात में जंगली जानवर खा जायेंगे। तमाम बेवकूफी तथा उत्साह के बावजूद हम लोग उस समय तक जंगली जानवरों भोजन बनकर निर्वाण प्राप्ति के तरीके के खिलाफ थे लिहाजा हमने नीचे जाने को तैयार हो गये। हमने बहुत विनयावत होके अनुरोध किया कि जिधर से हम आये हैं उधर से नीचे जायेंगे नीचे पहुँचने के पहले ही ऊपर पहुँच जायेंगे। क्योंकि हम जिस रास्ते से आये थे उस रास्ते में कई जगह बहुत संकरे रास्ते थे तथा कई जगह संकरे रास्तों के दोनों तरफ गहरी खाइयाँ थीं। दिन में सब कुछ भले ही सुहावना लग रहा था लेकिन रात में ऊधर से वापस जाने की बात सोचने मात्र से हमें डर लग रहा था।

खैर,हमारी परेशानी जायज मानते हुये हमारे साथ वहीं मंदिर के एक सेवक को साथ कर दिया गया। शायद वह वहां से रोज नीचे शाम को नीचे आने-जाने वालों में से था ।क्योंकि वहाँ पहाड़ पर खाने-पीने की सारी व्यवस्था नीचे से ही होती है। हमारे जैसे लोग आते होंगे वहां । उनको नीचे भेजने में सहयोग करने के लिये उसे लगा दिया जाता होगा। बहरहाल ,हम बिना वहां रुके नीचे के लिये चल दिये। शाम को चाय न पीने के कारण पेट अलग से कुलबुला रहा था। भूख भी लग आई थी। थकान तो थी ही। हम अँधेरे में सीढ़ियां -रास्ता तय कर रहे थे। यह रास्ता प्रचलित है तथा सुगम भी। इधर सीढ़ियाँ-रास्ता बना होने से आसान है।

लेकिन कुछ भी हो हम थके थे। हम कछुये की चाल से चल रहे थे। वह खरगोश सा फुदकता नीचे उतर रहा था। बीच-बीच में रुककर हमारी राह देखता जा रहा था। हम रास्ते भर जैन साधु को कोसते आ रहे थे कि कैसे साधु हैं? जो धर्म जीवों पर दया करने को कहता है उसके अनुयायी निर्दयता से थके यायावरों को नीचे भगा रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे रात होती गई पहाड़ में रह-रह कर गूँजती जानवरों की आवाज से लग रहा था कि जल्दी नीचे पहुँचें।

कुछ देर में ही हमें नीचे रोशनी दिखाई देने लगी। लेकिन जो रोशनी बहुत पास दिखाई दे रही थी उस तक पहुँचते-पहुँचते हम बेहाल हो गये। जिस दूरी (करीब छह किमी)को हमने दिन में करीब चार-पाँच घंटे में तय किया उसी को रात में हम एक घंटे से भी कम समय में करके नीचे आ गये। यह बताता है कि ऊपर उठने में कितनी ही मेहनत क्यों न की जाये,नीचे आने में ज्यादा समय नहीं लगता है।

नीचे जब पहुंचे तो हमारे पैर थकान के मारे में थरथरा रहे थे। आधा घंटा हम एक चाय की दुकान पर बैठे अपने पैर की कँपकँपी तथा दिल की धड़कन को काबू में लाने का प्रयास करते रहे।

उस दिन के हमारे पैरों तथा दिल की कुछ हालत दुष्यन्त कुमार का यह शेर बयान करता है:-
तू किसी रेल -सी गुजरती हो,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
रात को हम वहीं खाना खाकर एक श्वेताम्बर जैन धर्मशाला में रुक गये- मुफ्त में। उस दिन हमें पारसनाथ पहाड़ पर चढ़कर बिना अच्छी तरह दर्शन किये उतरना पड़ा। बहुत खला। बाद के दिनों में हमें अपने एक दक्षिण भारतीय मित्र की तुकबंदी अब याद रही है:-
बकरी चढ़ी
पहाड़ पर
और…
उतर गई।
वास्तव में यह हमारे साथ हुआ-
यायावर चढ़े
पहाड़ पर,
और…
उतार दिये गये।
हम निमियाघाट से चले थे पहाड़ पर चढ़ने के लिये। उतरे मधुबन नामक कस्बे में। इस प्रक्रिया में हम अपनी साइकिलों से पचास किमी दूर हो गये थे। साइकिलें अपने सवारों से पचास किमी दूर इंतजार करती रहीं। सवार खाना खाकर घोड़े बेंचकर सो गये थे।

दिलीप गोलानी(टोपी में),अनूप शुक्ला पहाड़ पर

दिलीप गोलानी(टोपी में),अनूप शुक्ला पहाड़ पर
मेरी पसन्द

गर्म और उदास बाड़े में
सहमी हुई बकरियाँ मिमियाँ रहीं हैं
अकस्मात दो झगडा़लू बकरी के बच्चे
अपने मन का गुस्सा निकालने के लिये
दो पाँवों पर खड़े होकर सींग लडा़ने लगते हैं।

नानी दादी की उम्र की बकरियाँ भी हैं
जिनके थन खूब दूध – भरे हैं
वे घुटनों पर झुकी विश्राम कर रहीं हैं
कभी-कभी भोली तिरछी निगाह से
दाड़ी वाले बकरों की ओर देखती हैं-
जैसे स्नेहाकुल औरतें!
-लुइस एल. फान्को, अर्जेण्टाइना

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “यायावर चढ़े पहाड़ पर…”

  1. e-shadow
    बहुत रोचक है आपका यात्रा वृत्तान्त। फिर कभी आपने पारसनाथ दर्शन किये या नही? आपकी हिम्मत की दाद देता हूँ (भले ही आप उसे उस उम्र की बेवकूफी कहें)।
  2. आशीष
    ये हुयी ना बात ! मजा आ गया….
    अगले अंक का इंतजार है…………..
  3. रवि
    …बहुत रोचक है आपका यात्रा वृत्तान्त।…
    और, जब इसकी 56 क़ड़ियाँ पूरी हो जाएँ, तो किताब के रुप में प्रकाशन हेतु किसी प्रकाशक को भी तैयार कर रखिए!
  4. अतुल
    विवरण अति सुँदर। रवि भाई का सुझाव तो सोने पर सुहागा।
  5. मनीष
    पुरानी बातें आपने इस तरह रखीं हैं जैसे अभी हाल फिलहाल में गये हों । बहुत रोचक लगी आपकी ये यात्रा ।
  6. Theluwa
    चकाचक, जल्दी कलकत्ता पहुँचो!
  7. फ़ुरसतिया » लागा साइकिलिया में धक्का,हम कलकत्ता गये
    [...] जैसा कि हमने बताया कि हम पारसनाथ पहाड़ पर चढ़े लेकिन बिना मंदिर का दर्शन किये हमें चढ़ने के तुरंत बाद नीचे उतरना पड़ा। इससे अहसास होता है कि हमें नीचे घसीटने वाली शक्तियाँ आज से नहीं वर्षों से सक्रिय हैं। किस-किस को कोसे! [...]
  8. Lovely
    बात यह है जंगली जानवरों से ज्यादा वहाँ नक्सलीओं का खतरा है. इसलिए निचे उतार देते हैं
  9. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती [...]

Tuesday, June 06, 2006

अभी उफनती हुई नदी हो…

http://web.archive.org/web/20110101200257/http://hindini.com/fursatiya/archives/141

अभी उफनती हुई नदी हो…

पिछले दिनों मातृ दिवस के अवसर पर अभिव्यक्ति के लिये ‘माँ’ शीर्षक कोई कविता भेजने के लिये पूर्णिमा वर्मन जी ने कहा था। मेरे तमाम खोजने पर भी कविता न मिल पाई। इसके बाद जब शोयेब ने अपने ब्लाग पर (६ जून,२००६)माँ के बारे में लिखा तब मैंने ‘कुँवर बेचैन’ की बहुत पहले सुनी कविता दुबारा खोजना शुरू किया। अब यह कविता मिल गई तो सोचा कि पोस्ट कर दूँ ताकि जरूरत पड़ने पर खोजने में आसानी रहे।
‘कुँवर बेचैन’ जी यह कविता पढ़ते समय मंच के आसपास किसी किस्म का व्यवधान नहीं पसन्द करते। पूरी तन्मयता से पढ़ते हैं जैसे पूजा कर रहे हों। उनकी माता का देहान्त तब हो गया था जब कुँवर बेचैन जी मात्र छह साल के थे। कम उम्र में माँ को खो देने का अभाव ही शायद उनके अपनी इस कविता से भावुक लगाव का कारण हो। ‘कुँवर बेचैन’ की यह कविता मैं खासतौर से ‘शोयेब के लिये पोस्ट कर रहा हूँ।

माँ


अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ,
रहो किसी भी दशा-दिशा में,
तुम अपने बच्चों का प्यार हो माँ।
नरम सी बाहों में खुद झुलाया,
सुना के लोरी हमें सुलाया ,
जो नींद भर कर कभी न सोई,
जनम-जनम की जगार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
भले ही कांटों भरी हों गलियाँ,
जो तुम मिलीं तो मिली हैं कलियाँ,
तुम्हारी ममतामयी अंगुलियाँ,
बता रहीं हैं बहार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
किसी भी मौसम ने जब सताया,
उढ़ा के आँचल हमें बचाया,
हो सख्त जाड़े में धूप तुम ही
तपन में ठँढी फुहार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
दिया जो तुमने वो तन लपेटे,
तुम्हारी बेटी, तुम्हारे बेटे,
सदा तुम्हारे ऋणी रहेंगे,
जनम-जनम का उधार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
तुम्हारे दिल को बहुत दुखाया,
खुशी तनिक दी बहुत रुलाया,
मगर हमेशा ही प्यार पाया,
कठोर को भी उदार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ।
बड़ों ने जो भी यहाँ कहा है,
‘कुंवर’उसे कुछ यों कह रहा है,
ये सारी दुनिया है एक कहानी,
तुम इस कहानी का सार हो माँ।
अभी उफनती हुई नदी हो,
अभी नदी का उतार हो माँ,
रहो किसी भी दशा-दिशा में,
तुम अपने बच्चों का प्यार हो माँ।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “अभी उफनती हुई नदी हो…”

  1. प्रेमलता पांडे
    इतनी सुंदर कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद। बेचैन जी को बहुत बार कवि-सम्मेलनों में सुना है परंतु हमेशा उन्हें सुनने की इच्छा बनी रहती है।
    प्रेमलता
  2. सागर चन्द नाहर
    अनूप भाई साहब,
    बहुत वर्षों पहले रघुपति सहाय ” फ़िराक गोरखपुरी” ( जिनकी माँ का निधन शायद उन्हें जन्म देते ही हो गया था) की कविता ” माँ” पढी़ थी कविता याद नहीं है पर उसके भाव अभी तक याद है, इतनी सुन्दर कविता कभी नहीं पढ़ी। अगर आप ने पढी़ हो तो कृपया अपने चिठ्ठे पर प्रकाशित करावें।
    शब्द शायद कुछ यूँ थे
    वो माँ जो मुझे अपनी गोदी में खिला ना सकी….
  3. SHUAIB
    भैया जी, इतनी सुंदर कवीता खोजने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद। मां तो मां है जिस पर जितनी भी कवीतायें, तारीफें लिखो कम है। एक बार फिर धन्यवाद :)
  4. फ़ुरसतिया » रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी
    [...] सागर चन्द नाहर on अभी उफनती हुई नदी हो…प्रेमलता पांडे on अभी उफनती हुई नदी हो…आशीष on नेतागिरी,राजनीति और नेता संजय बेंगाणी on नेतागिरी,राजनीति और नेता SHUAIB on नेतागिरी,राजनीति और नेता [...]
  5. प्रत्यक्षा
    “माँ ” पर निदा फाज़ली जी की ये नज़्म याद आ गई….
    बेसन की सोंधी रोटी पर
    खट्टी चटनी जैसी माँ
    याद आती है चौका बासन
    चिमटा फुकनी जैसी माँ
    बान की खुर्री खाट के ऊपर
    हर आहट पर कान धरे
    आधी सोयी आधी जागी
    थकी दुपहरी जैसी माँ
    चिडियों की चहकार में गूँजे
    राधा मोहन अली अली
    मुर्गे की आवाज़ से खुलती
    घर की कुंडी जैसी माँ
    बीवी बेटी बहन पडोसन
    थोडी थोडी सी सब में
    दिनभर एक रस्सी के ऊपर
    चलती नटनी जैसी माँ
    बाँट के अपना चेहरा माथा
    आँखें जाने कहाँ गईं
    फटे पुराने इक अलबम में
    चँचल लडकी जैसी माँ
  6. SHUAIB
    Wah ji, ye bhi sunder aur pyari kavita hei
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी [...]

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Monday, June 05, 2006

अजीब इत्तफाक है…

http://web.archive.org/web/20110902194038/http://hindini.com/fursatiya/archives/138


अजीब इत्तफाक है…

कुछ दिन पहले जब मैंने कुछ लेख लिखे तो रवि रतलामी जी ने लेख के खिलाफ फतवा जारी किया :-
अब इससे पहले कि फ़ुरसतिया जी का लिखा नया विष्णु पुराण सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, बंधुओं इस पुराण को यहीं समाप्त करने का अनुरोध किया जाए.दरअसल, आपकी साइकिल का पंक्चर कहीं हो गया है और उसे ठीक कराकर सड़क पर लाना जरूरी है – पुराण तो और भी कई हैं, लिख लेंगे – यायावरी वृत्तांत तो आप का देखा सुना भोगा है वो तो आपको ही लिखना होगा.यात्रा वृत्तांत में बाधा पड़ गई है, उसे दूर कर जरा नियमितता लाएँ, यही निवेदन है
इस फतवे का आशीष ने समर्थन किया। मैंने जब यह यात्रा विवरण लिखना शुरू किया था तो सोचा था कि हर हफ्ते कम से कम एक लेख अपनी यायावरी के बारे में लिखूँगा। कुछ दिन यह क्रम नियमित रहा तथा सप्ताह की शुरुआत को पोस्ट करने के चलते प्रत्यक्षाजी इसे सोमवारी चिट्ठा कहतीं रहीं। कुछ दिन की नियमितता के बाद इस साइकिल यात्रा की हवा सी निकल गई। इस व्यवधान में मुख्य कारण था कि हमारे पास जो फोटो थे उनके स्कैन नहीं करा पाया था। दूसरा कारण था कि जब हम यात्रा पर गये थे तब हमने नियमित डायरी लेखन कुछ दिन के बाद छोड़ दिया था। केवल प्रतिदिन का यात्रा विवरण -कहाँ गये,कहाँ रुके ,कब चले ,कब पहुँचे की तरह से लिख रखा था। सोचा था कि बाद में आराम से लिखेंगे।लेकिन संयोग कुछ ऐसा कि अभी तक नहीं लिख पाया।
अब रविरतलामी के तथा अन्य दोस्तों के फरमाइशी आदेश ,अमित की हरिद्वार-श्रषिकेश यात्रा विवरण,आशीष के रोचक हाफ पैंट-फुल पैंट विवरण तथा इससे पहले विजय वडनेरे के सिंगापुर विवरण तथा सुनील दीपक जी के इधर-उधर भ्रमण के विवरण ने फिर से हमें अपने यात्रा विवरण लिखने के पानी पर चढ़ाया है।
तो अब आशा है कि मेरी साइकिल नियमित चलेगी। कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट लिखने का प्रयास रहेगा। फोटो हमारे सारे काले-सफेद हैं। उस समय हमारे पास कोडक का क्लिक थ्री कैमेरा था जिसकी रील हम फोटो खींच के अपने पास रखते गये थे। तीन माह बाद धुलवाये गये। अब हमारे फोटो कोई मुगले आज़म फिल्म तो हैं नहीं जिनको रंगीन कराने का विचार बनाया जाय।
नेट की दुनिया बड़ी तेज है।रोज नये-नये लोग मैदान में आते जा रहे हैं। दिन पर दिन हम पुराने बासी होते जा रहे हैं। तरुन ने हमें अनुगूँज पर लिखने के लिए के लिये उकसाते हुये लिखा-
आप सीनियर चिठा्कारों को विशेष आमंत्रण है कि इस बार अनुगूँज में लिख ही डालिये, भाभी जी के गुस्‍से का ठीकिरा हमारे सर पे फोड़ दीजयेगा
अब बताओ हमें लिखते हुये दो साल भी नहीं हुये और हमें वरिष्ठ बना दिया गया। नीरज दीवान जी ने भी लिखा :-
बिना सोचे ही कह रहा हूं कि आपके इस लेख ने अब मुझे सोचने के लिए बाध्य कर दिया है. समझ गए ना आप. चुटीली शैली ने मुझे आपके ब्लॉग पर रोज़ आने वाला मेहमान बना दिया है. नोट कर लें. रोज़ परोसिएगा कुछ.
मतलब हमें नियमित लिखना है। लिखने के लिये तो रोज हमारा मन उचकता है। हम टाइप करके जब लेख पोस्ट कर देते हैं तब अक्सर बाद में लगता है -क्या बकवास लिखा है! लेकिन मजा यही है कि पिछली बकवास से सीख न लेकर आगे की बकवास के लिये मन उचकने लगता है। एक दिन इन्द्र अवस्थी ने कहा -तुम भी पूरे खुशवन्त सिंह हो रहे हो। हमने पूछा -कैसे? तो जानकारी देते हुये बताया कि खुशवन्त सिंह की कलम के लिये कोई गर्भ निरोधक नहीं बना वैसे ही तुम भी बेरोक-टोक,ऊटपटाँग लिखने में लगे रहते हो।
ऐसे ही आज दोपहर को हमारे कालेज के मित्र मनोज अग्रवाल के फोन ने हमें जगाया। मनोज आजकल बनारस के रेलवे के डीजल लोकोमोटिव वर्क्स में अधिकारी हैं। बचपन से कविता लिखने की बीमारी से ग्रस्त हैं तथा आजकल इस कुटेव से मुक्त नहीं हो पाये हैं।
मनोज अग्रवाल
मनोज अग्रवाल
हमसे हालचाल पूछा तो हमने बताया – चकाचक हैं। अपनापा दिखाना जरूरी मान के वो बोले -तुम साले कभी चकाचक के अलावा भी कुछ रहते हो? हम भी अपनेपन से घायल होकर बोले- हाँ काहे नहीं! मस्त हैं, झकास हैं,दिव्य हैं, टिचन्न हैं।
फिर बात ब्लाग की हुई हमने कहा -तुम आजकल हमारा ब्लाग नहीं पढ़ते। जवाब में फिर बेहद अपनेपन से बताया गया -आजकल साले तुम्हारा ब्लाग कामा,फुल स्टाप सहित पढ़ता हूँ। साथ में तुम्हारे दोस्तों का भी पढ़ता हूँ। तो भाई अगर किसी का ब्लाग बनारस से पढ़ा जा रहा है तो समझे उसे पढ़वाने में मेरा भी कुछ हाथ है।
हमने आगे कहा- अगर तुम पढ़ते हो तो टिप्पणी काहे नहीं करते? हमारे काबिल दोस्त का जवाब भी वही था जो विष्णु जी का था- हिंदी में ब्लाग कैसे लिखते हैं? यह हाल तब हैं जब हमारा दोस्त नियमित कम्प्यूटर इस्तेमाल करता है तथा मैं उसको उसका ब्लाग बना कर पोस्ट लिखना बता चुका हूँ। बहरहाल ,हम ज्यादा कोस नहीं पाये मनोज को क्योंकि मनोज ने हमारे लेखन की तारीफ करना शुरू कर दी।
तारीफ सुनता हुआ आदमी दुनिया का सबसे निरीह प्राणी होता है। चकोर की तरह तारीफ करने वाले चांद की तरफ मुँह बाये ताकता रहता है। लोग कहते हैं किसी की तारीफ वह ब्रह्मात्र जिसकी मार से कोई भी बच नहीं सकता बशर्ते तारीफ करने वाले को ब्रह्मात्र के ऊपयोग का ज्ञान होना चाहिये।
पहले तो हमने उसे टोंकने का मन बनाया लेकिन बाद में भारतीय संविधान में वर्णित मूल अधिकार (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के बारे में सोचते हुये तथा यह सोचकर कि विरोधी विचारों को भी पूरे आदर के साथ सुनना चाहिये मैंने मनोज को बोलने का पूरा मौका दिया।
मनोज ने कहा- तुम्हारे ब्लाग का अनगढ़ लहकटपन काबिले तारीफ है। लहकटपन दिन पर दिन बढ़ता जा रहा।
बाद में यह प्रमाण देने के लिये कि मेरे सारे ब्लाग पढ़े हैं मनोज ने बताया कि उन्होंने तो धूमिल की कविता के अंश
मैंने जिसकी पूँछ उठायी है
उसको मादा पाया है।
का आधार लेते हुये कविता भी लिखी है। हमने सोचा गई भैंस पानी में। धूमिल सुनेगें तो क्या सोचेंगे! बहरहाल ,हमने जैसे कि तारीफ करनी चाहिये की। वाह-वाह ,लिखो न अपने ब्लाग में। काहे नहीं लिखते। आदि-इत्यादि। लेकिन हमारी मुक्ति इतने में ही नहीं होनी थी। मनोज ने हमारी तारीफ के पानी चढ़ते हुये हमें फोन से कविता नोट कराई तथा बोले हम तो जब लिखेंगे तब लिखेंगे लेकिन फिलहाल हमारी यह कविता तुम अपने ब्लाग पर पोस्ट कर दो। अब हम अपने कालेजियट दोस्त का जो हमारे लेखन के लहकटपन फिदा होने की कम से कम बात तो करता है ,का आग्रह जैसे ठुकरा दें? लिहाजा प्रस्तुत है
मनोज अग्रवाल की कविता-
जिसको समझा पूरा,उसको आधा पाया,
जिस-जिसकी पूँछ उठाई,उसको मादा पाया।
थीं बातें बड़ी-बड़ीं,मगर थे दर्शन छोटे-छोटे,
स्वार्थ सिद्धि के दलदल में ,क्या खरे,क्या खोटे।
सुनते थे कानून की ताकत,पाया उसको भी अंधा,
व्यवस्था की शवयात्रा में, सबको देखा देते कंधा।
भूखी,अनपढ़,बेबस-पिसती देखी जनता,
जिसको समझा मिटना,उसको पाया बनता।
कलयुग के भगवान, देखा तेरा न्याय अजूबा,
कौवों को मोती चुगते देखा,और हंसों को भूखा।
जिसको समझा कम, उसको कुछ ज्यादा पाया,
जिस-जिसकी पूँछ उठाई ,उसको मादा पाया।
हालाँकि हिंदी ब्लाग जगत की वाह-वाह की परम्परा पर हमें पूरा भरोसा है लेकिन फिर हमें दूसरी परम्परा भी याद आई- पहली कविता दूसरी से अच्छी है,दूसरी में बात बढ़िया ढंग से कही गई है। इस बात को ध्यान में रखते हुये हमने कहा कि एक और सुना दो कविता उसे भी डाल दें। बरवादी हो तो कायदे से हो। मनोज ने भी बिना संकोच के दूसरी कविता लिखा दी-
मेरे घर के सामने
हुआ करता था एक सूखा पेड़
उस पेड़ पर बैठता था
एक उल्लू रोज
एक दिन वो पेड़ कट गया।
उस पेड़ की सूखी लकड़ी से
बनी एक सुविधाजनक कुर्सी।
अजीब इत्तफाक है
पेड़ पर उल्लू आज भी बैठा है।
कुर्सी पर बैठे यह कविता टाइप करते समय मुझे लग रहा है कि यह भी अजीब इत्तफाक है कि इसे मनोज ने कुर्सी पर बैठकर यह कविता लिखी तथा अधिकांश लोग जो इसे पढ़ रहे हैं वे भी कुर्सी पर बैठे हैं।
फिलहाल इन कविताओं पर आप अपने विचार लिखिये । संभव है कि आपके विचार पढ़कर हिंदी ब्लागजगत में एक और ब्लागर दुबारा पैदा हो जाये।
अचरज नहीं हम अगली पोस्ट में रविरतलामी के फतवे के अनुसार फिर से साइकिल चलाते पाये जायें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “अजीब इत्तफाक है…”

  1. प्रत्यक्षा
    वाकई दूसरी कविता पहली से ज्यादा अच्छी है :-)
  2. रवि
    चलिए, यूपी के मिनिस्टर के फ़तवे की तरह (उसकी राजनीति चल गई) अपना फ़तवा भी चल गया दीख रहा है. :)
  3. आशीष
    हम अपनी टिप्पणी तो यायावरी के चिठ्ठे पर ही देंगे
    मनोज जी की कविता पर एक शेर याद आ गया
    एक ही उल्लू काफी था,बर्बाद ए गुलिस्तां के लिये
    यहां हर शाख पर उल्लु बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा ?
  4. समीर लाल
    क्या बात कही है आपके मित्र ने दूसरी कविता के माध्यम से.यह तो अच्छा हुआ आज बिस्तर पर बैठ कर आपका ब्लाग पढ रहे थे.
    यात्रा वृतांत का वाकई इंतज़ार रहता है, जल्दी लिखिये.वैसे तो आप कुछ भी लिखें, होता तो मज़ेदार ही है.
  5. सुनील
    यह तो अच्छा है कि यहाँ लकड़ी की कुर्सी नसीब ही नहीं होती, प्लास्टिक से ही काम चलाना पड़ता है! आशा है कि आप के मित्र को बहुत सी कुर्सियाँ मिलेंगी जिसपर बैठ कर सभी ज्ञानी मित्र रात रात भर कविता पाठ करेंगे.
  6. नारद मुनि
    बहुत सुन्दर कविता है (ऐसा नही लिखेंगे तो एक ब्लॉगर भाई नही बढेगा), लगातार लिखते रहिए। और हाँ फुरसतिया जी को मोबाइल पर कविताएं सुनाते रहिए।
    और हाँ अब एक कविता हम भी झिला ही देते है (नही फुरसतिया जी की आत्मा को कष्ट होगा)
    …..कविता का मूड नही बना….. किसी और दिन सुनाएंगे। (तब तक फुरसतिया जी की आत्मा को भटकने दो।)
  7. फ़ुरसतिया » यायावर चढ़े पहाड़ पर…
    [...] नारद मुनि on अजीब इत्तफाक है…सुनील on अजीब इत्तफाक है…समीर लाल on अजीब इत्तफाक है…आशीष on अजीब इत्तफाक है…रवि on अजीब इत्तफाक है… [...]
  8. Amit
    तो अब आशा है कि मेरी साइकिल नियमित चलेगी। कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट लिखने का प्रयास रहेगा।
    अनूप जी, आप अपनी साईकल में tube-less टायर लगवा लो, हवा नहीं निकलेगी और पंक्चर भी नहीं होगा!! ;) :P
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… [...]

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