Sunday, September 06, 2020

परसाई के पंच- 28

 1. पाकिस्तान ने लगातार फ़ौजी तानाशाही के कारण अपने को एक पेशेवर गुण्डा बना दिया है। उसे पैसे दे दो, लाठी दे दो और कह दो कि जा, उस शरीफ़ आदमी को पीछे से लाठी मार आ। गुण्डा बार-बार पिटता है मगर पेशा नहीं छोड़ता। पेट का सवाल है।

2. सन्तुष्ट और असन्तुष्ट विधायक में यह खुला फ़र्क है कि सन्तुष्ट का बिल दूसरा चुकाता है और सन्तुष्ट को अपना बिल खुद चुकाना होता है। असन्तुष्ट जब सन्तुष्ट हो जाता है तब उसका बिल चुकाने वाले निकल आते हैं।
3. विधायकों की दो जातियां होती हैं- सन्तुष्ट और असन्तुष्ट। इनकी बाहरी पहचान कुछ नहीं है सिवा इसके कि असन्तुष्ट थोड़ा भुनभुनाता रहता है। उसके चेहरे पर तनाव रहता है।
4. राजनीति में जब एक गुट पिट जाता है तो वह असन्तुष्ट होकर जनता के दुखों पर विलाप करने लगता है- हाय ! जनता की हालत कितनी खराब है। पीने को पानी नहीं मिलता। दाम आसमान पर चढ गये हैं। गुण्डागिरी का यह हाल है कि माताएं-बहनें सड़क पर नहीं निकल सकतीं। हाय जनता की हालत देखकर रोना आता है।
5. ये असन्तुष्ट आंसू पोंछने के लिये चार-चार रूमाल रखते हैं। जो धोती पहनते हैं उनकी धोती आंसुओं से भीग जाती है।
6. जब ये असन्तुष्ट सत्ता में पहुंचकर सन्तुष्ट हो जाते हैं तब इनकी जगह नये असन्तुष्ट आकर जनता की हालत पर रोने लगते हैं।
7. अभाव की दाद जब लाइलाज हो जाये, तब उसे खुजाने का मजा लेना चाहिये।
8. वास्तव में क्रांति से सामान्य आदमी को आजादी नहीं मिलती। वह हमेशा गुलाम रहता है। आजदी हमेशा शासक और शोषक वर्ग को मिलती है। इसलिये सामान्य आदमी शगल के लिये क्रांति करे तो उसे प्रहसन (मजाकिया नाटक) की तरह करे, क्रांति को कभी गम्भीरता से नहीं करना चाहिये। यह नाटक हमेशा दुखान्त होता है।
9. कोई देश हो या आदमी हो, अमेरिकी पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खेल में वे ताश के पत्ते होते हैं।
10. गांधीवाद, समाजवाद , धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह खास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाये, सत्ता पा लेना। एक पक्का गाना चल रहा है, जिसके बोल हैं-’ प्रभु मैं कैसे सत्ता पाऊं?’
11. हम तो पहले जैसे ही हैं। वही कर रहे हैं। भूख से मरते हैं और चुप रहते हैं। मंहगाई बर्दाश्त करते हैं, बेखटके बच्चे पैदा करते हैं, घटिया फ़िल्में देखते हैं, कच्ची दारू उतारते हैं और पीकर मरते हैं। हरिजनों को जिन्दा जलाते हैं, कृष्णार्पण करके घूस लेते हैं, सस्पेण्ड होने पर ग्रहशांति करवाते हैं।

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Saturday, September 05, 2020

परसाई के पंच-27

 1. चरित्रवान और चरित्रहीन में कुल इतना फ़र्क होता- एक पकड़ा नहीं जाता और दूसरा पकड़ा जाता है। जिसकी दबी है वह चरित्रवान और जिसकी खुल गयी वह चरित्रहीन।

2. निराशा की नैतिकता भी स्थाई नहीं होती।
3. इमर्जेन्सी के दौरान भी, और अब भी, मन्त्री को देखते ही विद्वान ’इमर्जेन्सी’ की बात करने लगते हैं। तब उसके समर्थन में बोलते थे, अब विरोध में बोलते हैं।
4. एक बेचारी मामूली क्रांतिकारी होता है, जो क्षेत्र में काम करता है। भूखा रहता है। रोटी और प्याज झोले में लेकर चलता है, पिटता है, जेल जाता है। यह मामूली क्रांतिकारी है। एक अतिक्रांतिकारी होता है, विशिष्ट। यह दिन में दाढी ’ट्रिन’ कराता है, काफ़ी हाउस में बैठकर कॉफ़ी पीता है, बिटर कॉफ़ी। क्रांति एक कड़वी चीज है। कॉफ़ी में शक्कर डली हुई आयी हो, तो चम्मच से उसे निकालकर टेबिल पर डाल देता है, जिस पर मक्खियां भिनकती हैं। सिगरेट को क्रोध में मरोड़कर बुझाता है, जैसे बुर्जुआ का गला घोंट रहा हो। दिन में यह क्रांतिकारी मार्क्स, लेनिन, माओ के जुमले याद करता है, रात को दोस्तों के साथ शराब पीता है और क्रांतिकारी जुमले दुहराता है। फ़िर मुर्गा इस तरह खाता है, जैसे पूंजीवाद को चीथ रहा हो।
5. क्रांति के लिये हमेशा दूसरे के बाप की तलाश करनी चाहिये। अपने बाप को खून चूसने की सुविधा दी जाती है क्रांति में। उस खून का एक हिस्सा क्रांतिकारी बेटा भी पीकर सर्वहारा का नेतृत्व करने बढ जाता है।
6. जवानी में जैसे अच्छे कपड़े, अच्छे जूते, अच्छी टाई का शौक होता है, वैसे ही सम्पन्न घरों के कुछ युवकों को क्रांति का शौक हो जाता है। क्रांतिकारिता को वे एक और अच्छा सूट, एक और अच्छी टाई, एक और अच्छा जूता समझते हैं। इससे शोभा बढती है, प्रतिष्ठा बढती है।
7. मैं कुछ क्रांतिकारियों को जानता हूं जिनकी बाकी जिन्दगी इस प्रचार को धोने में गुजरती है कि वे कम्युनिस्ट थे। क्रांतिकारिता , जिसे उन्होंने कभी द्वार पर रंगोली की तरह सजाया था, अब पांवों में कांटे की तरह चुभती है। उसे वे नष्ट कर देना चाहते हैं।
8. क्रांतिकारिता के पानी में जो मछली ज्यादा उछलती और उतराती है उसे अमेरिकी बगुला उतनी ही फ़ुर्ती से पकड़ता है।
9. अमेरिकी अस्मिता उस औरत की तरह है, जिसकी तरफ़ देखने से ही उसका सतीत्व भंग हो जाता है।
10. मजहबी उन्माद की पूंजीवाद से ही पटती है।
11. तनाव से डर पैदा किया जाता है। डर से हथियार की बिक्री होती है।

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Friday, September 04, 2020

परसाई के पंच-26

 1. हम समझते थे , यह लोकतंत्र वटवृक्ष है। कैसी भी आंधी आये, उखड़ेगा नहीं। रोपा इसी उद्देश्य से था। मगर अब सिद्धांतहीन, बेईमान, गैरजिम्मेदार हमारे नेताओं ने उसे गमले का पौधा बना दिया है। अब यह हाल है कि कोई भी बैल,गधा, भैंसा उस पर मुंह मारकर पत्ते नोंच लेता है। अभी यह पौधा उखड़ा तो नहीं है, मगर गर्दिश में है।

2. गलती हमारी भारतीय जनता की भी है। हमने समझ लिया कि पांच साल में एक बार वोट देना ही लोकतंत्र है। जिसका ज्यादा हल्ला हो, उसे वोट दे दो।
3. जिन्हें पांच साल के लिये चुन लिया उन्होंने अपने को ही देश मान लिया। वे मुंह खोलकर अपने भीतर वैसे ही भारत को बताने लगे, जैसे कृष्ण ने अर्जुन को अपने मुंह में सारा ब्रह्माण्ड दिखाया था।
4. क्या इसीलिये कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। मंहगाई को रोयेंगे, लेकिन दीवाली ठाट से ही मनायेंगे। जैसे-जैसे मंहगाई बढ़ती है, वैसे-वैसे उत्सव बढ़ते हैं।
5. वैदिक आर्य उत्सव-प्रेमी था। मस्त था। खाती-पीता, नाचता था। गेहूं पैदा करना उसे पहले नहीं आता था, पर उसने तब भी वह सोमलता खोज ली थी, जिससे सोमरस निकलता था। यानी घर में रोटी का ठिकाना नहीं है पर दारू की भट्टी जरूर खोले बैठे हैं।
6. लक्ष्मी की उत्पत्ति की कल्पना अद्भुत है। वह समुद्र मन्थन से अन्य रत्नों के साथ निकली थी। समुद्र-मन्थन अकेले देवों ने नहीं किया था। उसके लिये दानवों का सहयोग लिया था। जब रत्न निकले तो दानवों को तो मदिरा पिला दी और लक्ष्मी को विष्णु ले उड़े।
7. फ़ौजी तानाशाह इन्सानों से डरता है। अलग-अलग इन्सानों से कम डरता है, पर इकट्ठे इन्सानों से बहुत डरता है।
8. तानाशाह एक डरपोक आदमी होता है। अगर पांच गधे भी साथ-साथ घास खा रहे हों, तो तानाशाह को डर पैदा होता है कि गधे भी मेरे खिलाफ़ साजिश कर रहे हैं।( हालांकि गधे अपनी बिरादरी के खिलाफ़ साजिश नहीं करते।)
9. धार्मिक उन्माद पैदा करना, अन्धविश्वास फ़ैलाना, लोगों को अज्ञानी और क्रूर बनाना राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरुषसत्ता का पुराना हथकंडा है। हिन्दू पीछे नहीं हैं मुसलमानों से।
10. हम दूसरी जातियों पर थूकें तो वह अपने ऊपर ही गिरेगा। हमारा सौभाग्य यह है कि हमारे शंकराचार्य उन्माद नहीं पैदा कर सकते, जैसा अयातुल्ला और इमाम कर सकते हैं। शंकाराचार्यों की इस अक्षमता ने हमें बहुत बचाया।
11. हर नेता दूसरे की धोती खींचता है। कुछ तो शुरु से ही सिर्फ़ चड्डी पहने हैं। ये नाड़ा खींचते ही नंगे हो जाते हैं।

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Thursday, September 03, 2020

रात लगी कहने सो जाओ, देखो कोई सपना

 सूरज भाई सुबह-सुबह जम गए हैं आसमान में। आलथी-पालथी मार के बैठे हैं। आंगन में पंखा डुलाते हुए बैठी बुढ़िया की तरह हुकुम दे रहे होंगे -'ये छुटकी तुम इधर चलो, बड़की तुम चलो जरा भारत दैट इज इंडिया पर रोशनी फैला के आओ, ये मंझली तुम्हारी शिकायत मिली है कि तुम बहुत धीरे रोशनी करती हो। सबको बराबर रोशनी बांटना तुम्हारा काम है। रोशनी कोई राहत सामग्री थोड़ी है जो नेताओं, अधिकारियों की तरह जित्ती बांटो उससे ज्यादा खुद के लिए रख लो। आइंदा ऐसा किया तो किसी ब्लैकहोल में भेज दूंगा।'

मंझली मनचली नजरों से सूरज भाई को निहार रही है। उसको पता है कि सूरज भाई उसको कितना चाहते हैं। चुनाव में चंदा देने वालों को सरकार बनने पर उनके भले लिए नीतियां बनाने वाले जनप्रतिनिधियों से भी ज्यादा प्यार करते हैं सूरज भाई मंझली को। वह सूरज भाई को 'अदा पर फिदा' नजरों से निहारती रही। सूरज भाई भी उनको कनखियों से देखते हुए अनदेखा करते रहे। इस अलौकिक प्रेम की शोभा का वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं किसी कवि के पास। इसके लिए किसी लफ्फाज नेता की सेवाएं लेनी पड़ेंगी।
ये तो अभी की बात। सुबह जब निकलने को हुए तो ऐसे दबे पांव अंधेरे की चादर आहिस्ते से हटाकर आये धरती की तरफ जैसे पुराने जमाने के आशिक अपनी माशूक से मिलने जाते थे। लेकिन कितना भी दबे पांव आये यहां की चिड़ियां तो जान ही गयी कि सूरज भाई आ गए। वे चहचहाते हुए गुडमार्निंग टाइप करने लगीं। दबे पांव आने वाले सूरज भाई चिडियों की चहचाहट सुनकर लाज-लाल हो गए। उनकी देखा-देखी दिशाएं भी लाल हो गयी। कुछ देर बाद सब सूरज भाई सामान्य हो गए। दे रोशनी के थान के थान धरती और उड़ेलने लगे। पूरे 12 घण्टे के वियोग की कमी पूरी करने लगे। धरती को भी 'रोशनी चम्पी' कराने में मजा आ रहा था।
उधर सुबह का हूटर बजा। पूरे शहर में हल्ला हो गया होगा। हूटर कर्मचारियों के लिए निर्माणी आने जाने का इशारा है। सुबह आने के लिए शाम को जाने के लिए। सुबह तो लोग आहिस्ते-आहिस्ते आते हैं। शाम को जाते समय हूटर बजते ही भीड़ की भीड़ फटाक से निकल लेना चाहती है।
हूटर से कायनात की शुरुआत की बात जुड़ती है। लोग कहते हैं कि सृष्टि की शुरआत बड़े धमाके से हुई। धमाका हुआ और ब्रहाण्ड बन गया। तारे-ग्रह-नक्षत्र बने। एक दूसरे से दूर भागते हुए पसरने लगे।
ऐसा लगता है कि ये जो बिग बैंग है न वो कायनात का हूटर होगा। इधर बजा उधर कायनात के कारखाने में काम करने वाले सारे तारे-ग्रह-नक्षत्र कांजी हाउस का दरवज्जा खुलने ओर भाग निकलने वाले जानवरों की तरह अदबदा कर भड़भड़ाते हुए निकल लिए होंगे। पूरी कायनात में फैल गए होंगे। बाद बाकी उसी से सृष्टि का निर्माण हुआ।
सुबह उठकर टहलने निकले तो हाथ का बैंड बता रहा कि रात 6घण्टा 14 मिनट सोए। उसमें 2 घण्टे 12 मिनट गहरी वाली नींद। बाकी हल्की नींद। मने नींद में भी दूध और पानी की तरह मिलावट। हल्की और गहरी नींद का गठबंधन भी बढ़िया दूध और पानी शादी में आराम वाली पत्ती और सपनों की इलायची डालकर बनी चाय की तरह है। पीकर आनन्द आ जाता है।
सपने की बात से याद आया कि रात फिर गड़बड़ सपना देखे। पूरा तो नहीं याद लेकिन कुछ ऐसा कि इम्तहान आ गया है। तैयारी नहीं है। कुछ आता नहीं। लगता है फेल हो जाएंगे। पूरे सपने भर फेल होने का डर हावी रहा। इतना डर गए कि हनुमान जी का प्रसाद भी नहीं मान पाए कि बजरंगबली नैया पार कराओ सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाएंगे।
बहुत डर लगा इम्तहान के सपने से। अब कब्जे में कोई कोई चैनल हैं नहीं जो इम्तहान के डर से बचने के लिए रिया-सुशांत टाइप स्टोरी चलवा दें। तमाम देशों की सरकारें करती हैं ऐसा। भुखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने के लिए कोई सनसनाती हुई खबर चलवा देते हैं। मन किया सूरज भाई से पूछें कि उनके यहां मीडिया कैसे काम करता है। क्या उनके यहां भी सुशांत-रिया टाइप किस्से चलते हैं। लेकिन जब तक पूछे तब तक सूरज भाई और उचक गए थे आसमान में। गलत थोड़ी कहते हैं नन्दन जी:
जिसे दिन बताये दुनिया, वो तो आग का सफर है,
चलता है सिर्फ सूरज, कोई दूसरा नहीं है।
सपने के चक्कर में इतना सब कह गए। सपने कभी उपचार होते थे । रमानाथ जी कहते हैं:
रात लगी कहने सो जाओ,देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना।
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
सो न सका कल याद तुम्हारी,आई सारी रात।
लेकिन हमको तो फुल नींद भी आई, किसी की याद नहीं आई। लेकिन नींद के बहाने जगने पर क्या क्या लंतरानी हांक रहे। वास्तविकता से मुंह छिपाने के लिए सपने के कनकौवे उड़ा रहे। क्या यही आपदा में अवसर है।

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Wednesday, September 02, 2020

परसाई के पंच-25

 

1. मौन मूर्ख , मुखर मूर्ख से फ़िर भी अच्छा होता है। मुखर को बाद में मौन होना पड़ता है।
2. रचनात्मक कार्य यानी लोगों को लाइसेन्स , परमिट दिलाना, उनके तबादले कराना, उनकी नियुक्ति कराना, कभी-कभी उनकी जमानत कराना, केस उठवाना, सार्वजनिक जमीन कर कब्जा करवाना, तस्करियों , जुआडियों को सुरक्षा प्रदान करना। ये सब ’रचनात्मक कार्य’ ही तो हैं।
3. जयन्ती करने के और भी फ़ायदे हैं। सरकारी अनुदान और चन्दा मिलता है, जिससे आत्मा का उन्नयन होता है।
4. फ़फ़ूंद से पेनिसिलिन बनता है जो रोगाणुओं को पास फ़टकने नहीं देता। फ़फ़ूंदे हुये दिमागों में वैचारिक पेनिसिलिन बन जाता है, जिससे नये विचारों के रोगाणु उस पर असर नहीं करते।
5. पूंजीवादी सभ्यता अमानवीकरण करती है। महाजनी सभ्यता यही है। यह शोषक और शोषित दोनों का अमानवीकरण करती है।
6. कोई सरकार न आज तक शराबबन्दी कर सकी , न कर सकेगी। न यह इस्लाम के नाम से सम्भव है, न महात्मा गांधी के नाम से। शराब बन्दी तो कमाई करके पीने का सुभीता दिलाती है।
7. पुलिस और आबकारी वाले अगर छापा मारें , तो नेताजी बीच में पड़कर मामला संभाल भी लेते हैं। पुलिस वाले जरूरतमन्द को खुद बता देते हैं कि कहां मिल जायेगी। अगर कहीं पुलिस छापा मारे, तो वहां के ग्राहकों को बता देती है कि दो-तीन दिन फ़लां अड्डे से ले लीजिये।
8. हमें-जनता को समझ में नहीं आता कि हम मनुष्यों को चुन रहे हैं या केचुओं को, जिनके हड्डी ही नहीं है।
9. क्रांति इस देश में भुनी हुई मूंगफ़ली हो गयी है। इसके खोमचे लगे हैं। जिसे देखो, वही पचीस पैसे में क्रांति की मूंगफ़ली का पूड़ा लेता है और छीलकर खाने लगता है।
10. इस्तीफ़े की घोषणा मनाने वालों को ध्यान में रखकर की जाती है। जैसे आमरण अनशन की घोषणा दूसरे दिन मुसम्मी का रस पिलाने वाले को ध्यान में रखकर की जाती है।
11. अगर निष्कण्टक राज करना है तो प्रजा में अज्ञान और अन्धविश्वास फ़ैलाना जरूरी है।

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Monday, August 31, 2020

'लटक मुद्रा' में लोग

 

सुबह साइकिल का ताला खोलने के लिए चाबी घुमाई। खुला नहीं। अकड़ गया। आगे-पीछे किया तो और अकड़ गया। लगा अब खुलेगा नहीं। तुड़वाना पड़ेगा। एक और कोशिश की तो हाथ में आ गया। साइकिल से समर्थन वापस ले लिया। लगता है कोरोना के डर से 'सामाजिक दूरी' बनाने के लिए निकल लिया बाहर। जान है तो जहान है।

दरबान गुमटी पर बैठा मोबाइल में गाना सुन रहा था। घण्टी बजाने पर जोर से नमस्ते किया। हमें लगा कहीं कंधा न उखड़ गया हो। पर वह सलामत था।
सड़क पर लोग टहल रहे थे। पार्क में कसरत कर रहे थे। एक आदमी हाथ ऊपर किये जिस पोज में खड़ा था उसे देखकर लगा वजन उठौवा कसरत में आसमान को उठा लिया हो। नीचे करने में हिचक रहा था वह। कहीं किसी के सर पर न गिर पड़े आसमान।
एक भाई जी सड़क पर टहल रहे थे। एक ही हाथ हिला रहे थे। दूसरा लटका हुआ था। शायद पैरालिसिस के चलते दूसरा हाथ बेकार हो गया हो। दोनों हाथ का काम एक हाथ से ही करने से मामला धीमा हो गया था। चेहरे पर चिंता। इनका हाथ तो पैरालिसिस के चलते गड़बड़ हुआ। लेकिन समाज में तमाम लोग बिना पैरालिसिस ही 'लटक मुद्रा' धारण कर लेते हैं। खून मिल ही रहा है दिल से।काहे को हिलना डुलना । इन्हीं 'लटक मुद्रा' वाले लोगों के चलते समाज को पैरालिसिस हो रहा है।
एक महिला अपनी 'पच्चल' हाथ में सड़क पर टहल रही थी। शायद चप्पल टूट गयी हो या फिर उसको डर हो कि कहीं उसकी चप्पल से सड़क गन्दी न हो जाये।
दो लड़के मोबाइल हाथ में लिए बेंच पर बैठे कुछ सुन-सुना रहे थे। उनके सामने एक लड़का हाथ ऊपर किये धीमे दौड़ रहा था मानों प्रकृति ने उसको 'हैंड्स अप' बोल दिया हो। वह जान के खतरे को देखते हुए हाथ ऊपर किये दौड़ा जा रहा था।
बेंचों पर रखे कांटे वैसे ही थे। कांटे भी सूख गए थे। मुरझाये हुए कांटे शायद पेड़ से अलग होने के दुख में दुखी हों। अपनी जड़ से अलग होने का दर्द कांटे को भी होता है। 'दहिजरा कोरोना' के चलते कांटों को पेड़ से अलग होना पड़ा। क्या पता गाना भी गा रहे हों:
'हमसे का भूल भई, जो ये सजा हमका मिली।'
आगे एक भाई जी फुटपाथ पर अंगौछा बिछाए कसरतिया रहे थे। अनुलोम-विलोम करते हुए सड़क की तरफ ताकते भी जा रहे थे। शायद कहना चाह रहे हों -'हल्के में मत लो हम योगा कर रहे योगा। अनुलोम-विलोम।'
लेकिन सड़क पर केवल टहलने वाले और योग करने वाले ही नहीं थे। एक भाई जी अपनी बहुत स्वस्थ कमर को दोनों तरफ हिलाते हुए शरीर से अलग टाइप करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन कमर 'जनम-जनम का साथ है, हमारा-तुम्हारा' कहते हुए शरीर से जुड़ी रही। हमारे दिमाग में गाना बजने लगे -'आरा हीले, छपरा हीले, कलकत्ता हीले ला, कि तोहरी लचके जब कमरिया'।
तन्वंगी कमर के लिए आरक्षित गाना स्वस्थ कमर पर आरोपित करते हुए अटपटा सा लगा। लेकिन फिर कमरों के समानता के सिद्धान्त की बात याद आ गयी। हर तरह की कमर को लचकने का एक समान अधिकार है।
मोड़ पर दो लड़के मोटरसाइकिल धकियाते हुए ले रहे थे। हमें लगा पेट्रोल खत्म हो गया होगा। लेकिन पूछा तो बताया कसरत कर रहे थे। मोटरसाइकिल धकियाते हुए वर्क आउट। हमको लगा कि और ज्यादा वर्कआउट करना हो तो कार धकियाते निकलने लगेंगे लोग। पेट्रोल के बढ़ते दाम इसमें सहयोग भी करेंगे।
बहरहाल हम साइकल पर ही वर्क आउट करते हुए वापस आ गए। सूरज भाई इतनी जोर से चमकते हुए मेरे मुंह पर लाइट मार रहे थे कि चेहरा चौंधिया गया अपन का। झटके मुंह फेर लिया। बगीचे की हरियाली सुकून देती लगी। सूरज भाई हमारी पीठ पर किरणों, रोशनी और उजाले की धौल मारते हुए हंसने लगे। पूरी कायनात खिलखिला उठी। सुबह हो गयी।

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Sunday, August 30, 2020

परसाई के पंच- 23

 1. बड़ा नेता जब पार्टीवालों को सावधान करता है कि खबरदार, तुम्हें खरीदने की कोशिश हो रही है ,वह अपनी पार्टीवालों को आदमी नहीं, कद्दू, बैंगन, लौकी समझता होगा। बैगन और लौकी नहीं जानते कि वे बिकने वाले हैं।

2. क्रांति आखिर क्या है? प्याऊ है जिसे पैसेवाला खोल देता है और हम उनका खैराती पानी पीते हैं?
3. राजनैतिक सत्ता हो, सुभीते हों, पैसा हो, आसपास चापलूस और फ़ायदा उठाने वाले हों, तो मन्त्री का वह लड़का कट्टर मूर्ख होगा जो पैसा,दारू, औरत न करे। कोई राजनीतिज्ञ ऐसा नालायक बेटा पैदा नहीं करता।
4. बेचारा आदमी वह होता है जो समझता है कि मेरे कारण तमाम हलचल हो रही है, पर वास्तव में उसके कारण छिपकली भी कीड़ा नहीं पकड़ रही है।
5. बेचारा आदमी वह होता है, जो समझता है कि सब उसके दुश्मन हैं, पर सही यह है कि कोई उस पर ध्यान नहीं देता।
6. बेचारा आदमी वह वह होता है जो समझता है कि मैं वैचारिक क्रांति कर रहा हूं और लोग उससे सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं। वह आदमी सचमुच बड़ा दयनीय होता है जो अपने को केन्द्र बनाकर सोचता है।
7. गांधी जयन्ती पर जितना झूठ बोला जाता है, उतना कुल मिलाकर साल भर में नहीं बोला जाता। दूसरे दिन झूठ बोलने में थोड़ा खटका लगता है। २ अक्टूबर को बेखटके झूठ बोला जाता है।
8. धोखों का आविष्कार करने में यह देश बहुत आगे है। विश्व औद्योगिक मेलों में अगर धोखे भी भेजे दिये जायें तो पहला इनाम मिल जाये।
9. बड़े-बड़े लोग रेडियो पर बोलते हैं, भाषण देते हैं कि शिक्षा से चरित्र निर्माण होता है। सुनकर सोचता हूं कि फ़िर इस शिक्षा ने बोलनेवाले को चरित्रहीन क्यों बना दिया?
ये राजनीतिक पदों, शासकीय पदों पर आसीन लोग, खाते-पीते सुखी लोग कहते हैं- शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन या नौकरी पाना नहीं। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को चरित्रवान बनाना है- याने हमें इस शिक्षा से चरित्रवान बेकार, चरित्रवान भुखमरे, चरित्रवान चोर, चरित्रवान जेबकतरे मिलेंगे, चरित्रवान जीविका कमाने वाला नहीं मिलेगा। यही शिक्षा का सही उद्देश्य है।
10. राजनीति से सन्यास उससे बड़ी राजनीति के लिये लिया जाता है।
11. दस गरीबों को दाना बांटा जाता है, हजारों गरीबों को लूटने के लिये भभूत रमाकर नदी किनारे बैठा साधू नहाती स्त्रियों को देखता है। धूनी लगाये हुये महात्मा डाकुओं को पुलिस हलचल की जानकारी देते हैं। बम भोले के नाद के साथ अग्नि तपते साधु की धूनी में चोरी से सोना गलाया जाता है। बड़े-बड़े काम होते हैं संन्यास से।

परसाई के पंच- 24

 1. संन्यास लेनेवाला राजनीतिक उस साधु की तरह है जो सुबह से ईश्वर-चिंतन के बहाने भोजन-चिन्तन करता है, दोपहर को माल खाकर शाम तक ईश्वर-चिन्तन के बहाने नारी चिन्तन करता है और अंधेरा होने पर किसी भक्तिन के घर में घुस जाता है।

2. किसी खास कम्पनी की सिगरेट निकालो तो उसे जलाने के लिये कम्पनी एक सुन्दरी भी साथ देती है।
3. इस समय मेरे सामने जो विज्ञापन है, उसमें एक युवक एक खास मिल के कपड़े का सूट पहने खड़ा है। उसके चेहरे पर निहायत मूर्खतापूर्ण हंसी है। एक लड़की दायें और एक बायें बाजू से उसे दांत निकालकर, मुग्ध होकर देख रही है। एक लड़की पीछे से झांक रही है।
4. बुद्धि, विद्या, चरित्र का अवमूल्यन हो गया है। इनसे कोई मतलब नहीं। वे विज्ञापन में दिखाते हैं –मूर्खतापूर्ण सौंदर्य या सौंदर्यमयी मूर्खता। समझदार लड़कियां अच्छे कपड़ों से सजी मूर्खता पर मिटती हैं।
5. पढी-लिखी, गुणवती, सुन्दर लड़की को लगता है कि यह सब बेकार है। मेरा बाप अगर बेईमान होता तो मेरे लिये अच्छा पति तो खरीद देता।
6. अगर बैल सूट पहनने लगे तो वह मनुष्य से ज्यादा इज्जतदार हो जायेगा, क्योंकि वह उपभोक्ता हो जायेगा।
7. यदि पृथ्वी पर भेड़ियों की आबादी बढ जाये और वे सूट पहनने लगें तो उत्पादक अपने वैज्ञानिकों से यह घोषणा करा देंगे-’प्रकृति ने भेड़िये को मनुष्य से ऊंची नस्ल का बनाया है। भेड़िया ही वह महामानव या अतिमानव है जिसकी कल्पना मनीषियों ने की है, सबसे ऊपर भेड़िया सत्य है।
8. आज तो युद्ध सामग्री भी उपभोक्ता सामान हो गयी है। इसकी खपत के लिये जरूरी अगर लड़ाई है तो वह उत्पादक के लिये नैतिक है। लड़ाई से हथियारों के खरीदार बढेंगे।
9. बेईमान आदमी पैदा करने के लिये खाद दिया जा रहा है और ईमानदार की फ़सल बिना पानी सूख रही है।
10. अब तो जो आदमी भ्रष्टाचार की बात करता है, वह पिछड़ा हुआ है।
11. इस देश के लोगों को जनमेजय की तरह नाग-यज्ञ करना चाहिये। बहुत नाग हो गये हैं। इन्हें यज्ञ वेदी में झोंकना चाहिये ! स्वाहा ! स्वाहा ! पर नागों के रक्षक कई इन्द्र भी हैं।

Saturday, August 29, 2020

परसाई के पंच- 22

 1. ये हमारे भाग्य-विधाता सारे महापुरुषों की दुर्गति कर रहे हैं। बुद्ध, महावीर, गांधी सबको हास्यास्पद बना रहे हैं। ये डरते हैं कि कहीं कोई मन्त्री हमारा नाम लेकर अच्छी बात न कर दे। लोग हंसेंगे।

2. जांच कमीशनों की रिपोर्ट और लता मंगेशकर के गाने , ये दोनों हमारे जीवन में रस भरते हैं। जिन्दगी जीने लायक है क्योंकि; इसमें लता मंगेशकर और जांच कमीशन है।
3. अनन्त स्कैण्डल हैं इस पवित्र भूमि में। हिमालय जिसका मुकुट है, जिसके चरण सागर धोता है, गंगा-यमुना जिसके हृदय-प्रदेश में शोभित हैं, जिसमें राम और कृष्ण जैसे अवतार हुये, जिसमें दुर्योधन, शकुनि, विभीषण पैदा हुये, उस देव-भूमि में सरकार बदलने से स्कैण्डल नहीं बदलते।
4. देशवासियों की मानसिकता ऐसी हो गयी है कि जो चीज जैसी है, वैसी नहीं मानी जाती। उसमें राजनीति तलाशी जाती है।
5. हम पैंसठ करोड़ भारतवासियों के में नब्बे फ़ीसदी बिना चेहरे के आदमी हैं। हमारी कोई पहचान नहीं है। हम आदमी भी नहीं हैं।
6. राजनीतिज्ञों के लिये हम नारे और वोट हैं; बाकी के लिये हम गरीबी, भूख, बीमारी और बेकारी हैं। मुख्यमंत्रियों के लिये हम सिरदर्द हैं और उसकी पुलिस के लिये हम गोली दागने के निशान हैं।
7. पद पाने से बड़ा रचनात्मक काम कौन सा है। कुरसी पर बैठकर उस कुरसी की मरम्मत करते जाना रचनात्मक काम है।
8. सब एकमत हैं कि अपना भला करना, जनता का कोई ध्यान न रखना, मूर्खों के स्वर्ग में रहना, सत्ता के लाभ के पानी से अपने-अपने खेत सींचना ही मतैक्य है।
9. नंगापन देश की एकता को मजबूत करता है। एक धोती पहने हो और दूसरा नंगा हो, यह फ़ूट का लक्षण है। नंगे-नंगे में कोई भेद नहीं होता है। पार्टी में नंगेपन से एकता आती है।
10. एक अरसे से मेरी भी इच्छा रही है कि एक दो संसद-सदस्य, विधायक या लोकल नेता ही खरीदकर रख लूं, कभी काम आयेंगे। लोग केसर, कस्तूरी और संखिया भी वक्त पर काम आने के लिये घर में रखते हैं।
11. भारतीय लोकतंत्र का हाल यह है कि हर पार्टी के लोग बिकाऊ हैं; जिसे जरूरत हो खरीद ले।

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Friday, August 28, 2020

परसाई के पंच- 21

 1. एक देश है ! गणतन्त्र है ! समस्याओं को इस देश में झाड़-फ़ूंक, टोना-टटका से हल किया जाता है ! गणतन्त्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-कांटे में कुछ गड़बड़ आ गयी है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतन्त्र ठीक चलने लगता है।

2. सारी समस्यायें मुहावरों, नारों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। साम्प्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया है- हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई !
3. यह गांधी का देश है। यहां हृदय-परिवर्तन से काम होता है। मैं व्यापारियों से नैतिकता की अपील कर दूंगा। वे कीमतें एकदम घटा देंगे।
4. उनकी बात अलग है। वे भारतीय संस्कृति के हिसाब से करते हैं। रखैल रखेंगे मगर सांस्कृतिक ढंग से उससे राखी बंधवायेंगे, उसे धर्म-बहन बनायेंगे, तब वह रखैल होगी। नेता ज्यादा बूढे हुये तो धर्म-पुत्री बनाकर रखेंगे।
5. अनशन फ़ायदे की चीज है, बशर्ते ज्यादा न खिंचे और मौसम्बी का रस पिलाने के लिये कोई ठीक-ठाक बड़ा आदमी मिल जाये।
6. अनशन पवित्र क्रिया है। किसी भी मांग पर हो सकता है। दूसरे की बीबी हड़पने के लिये भी आदमी अनशन कर सकता है। नैतिक प्रभाव और जनमत का दबाव पड़े तो दूसरे की बीबी मिल सकती है। कुल मामला ’इशू’ बनाने का है।
7. आदमी भले हैं। तबादले में कभी पैसा नहीं खाया, इस हद तक निकम्मे हैं। आदर्शवादी हैं।
8. अब कोई आदमी सुरक्षित नहीं है। एक दिन ऐसा आयेगा, जब इस देश के आधे आदमियों की जांच हो रही होगी; बाकी आधे जांच कमीशनों में होंगे।
9. राजनीतिक लाभ के लिये शुद्ध ब्राह्मण गोमाता का मांस मन्दिर में डालकर हिन्दू-मुस्लिम दंगा करवा देता है।
10. राजनीतिक लाभ मिलता हो तो राजनीतिक सूरमा अपनी धर्मपत्नी से पेमेण्ट पर किसी से बलात्कार करवा के हल्ला कर सकता है कि अमुक जाति के आदमी ने मेरी पवित्रता को भ्रष्ट किया। हरिजन कल्याण के मामले में भी हमारी नीति बड़े पवित्र पाजीपन की है। हरिजन को मन्दिर-प्रवेश कराते हैं और उधर उसकी झोपड़ी में आग लगा देते हैं।
11. धर्म,उपकार और दया की पाखण्ड-महिमा अपार है। सुबह नियम से मछलियों को दाना खिलाते हैं और रात को फ़िश करी’ खाते हैं।

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आओ आलसिया जायें

 

रोज की तरह आज फ़िर पांच बजे जाग गये। जाग गये लेकिन उठे नहीं।
जागने का तो ऐसा है कि अलार्म लगा है। रोज घनघनाता है। वो मोबाइल के हाथ में है। उसको क्या? जबका लगाओ, बज जायेगा। लेकिन अलार्म बजने और उठने में फ़र्क है। उठना मुश्किल काम है जी।
जागने के बाद सोचते रहे लेटे-लेटे कि अब उठ जायें। टहल के आयें। जल्दी उठने और टहलने का गाना गायें। लेकिन फ़िर आलस्य ने हाथ पकड़ लिया- रुको यार। उठ जाना। कहां भाग रहे हो बिस्तर का साथ छोड़कर। कौन चुनाव हो रहे हैं जो दलबदल करो। दो मिनट बाद उठना।
हम आलस्य के बहकावे में आकर दो मिनट लेटे रहे। ऐसे न कित्ते दो मिनट हो गये। फ़िर जब पानी सर के ऊपर होता दिखा और समय घड़ी के पार तो झटके से उठ गये। आलस्य ने लपक के पकड़ने की फ़िर कोशिश की लेकिन हम फ़िर फ़ूट लिये उसकी पकड़ से। झट से कमरे का ताला लगाकर नीचे आ गये। लगे टहलने धांय-धांय। जल्दी-जल्दी। जैसे कोटा पूरा करना हो।
आलस्य के चक्कर में हमारे तमाम काम स्थगित पड़े हैं। जरूरी और गैरजरूरी दोनों। जैसे सिस्टम की संगति में अच्छी योजनायें भी वाहियात अमल में बदल में जाती हैं वैसे ही आलस्य की संगति में जरूरी काम भी गैरजरूरी लगने लगते हैं। अंतत: स्थगित हो जाते हैं। आलस्य जरूरी और फ़ालतू का भेद मिटाता है। सबको समान भाव से देखता है। सबको स्थगित करता है। उसके यहां घपला नहीं चलता कि ले-देकर किसी काम को करवा दे और किसी को स्थगित करवा दे।
आलस्य का वात्सल्य अद्भुत होता है। ऐसे प्रेम से व्यवहार करता है कि उसकी संगति से अलग होने का मन नहीं होगा। लगता है कभी उससे जुदा न हों। लगता है वो हमेशा ये गुनगुनाता रहता है – यूं ही पहलू में बैठे रहो, आज जाने की जिद न करो।
आलस्य को लोग बुरा गुण मानते हैं। न जाने कितने उदाहरण बताकर इसको बदनाम करते हैं। आलस्य को मानव जीवन का सबसे बड़ा शत्रु बताते हैं। वे तस्वीर का एक पहलू बताते हैं। दूसरा पहलू नहीं दिखाते।
आलस्य का सौंदर्य अद्भुत होता है। इसकी संगति में व्यक्ति परम आशावादी होता है। अपनी क्षमताओं में असीम वृद्धि महसूस करता है। जो काम महीनों तक टालता रहता है उसके बारे में यही सोचता है अरे दो मिनट का काम- हो जायेगा।
आलस्य व्यक्ति को बुरे काम करने से भी रोकता है। आप किसी को सजा देने की सोचते हैं, नुकसान करने की सोचते हैं, सोचते हैं गड़बड़ करके ही रहेंगे लेकिन आलस्य मुस्कराते हुये आपको बरज देता है- अरे छोड़ो यार फ़िर करना। जान देव। मटियाओ।
सोचिये त जरा अगर हम आलसी न होते तो आज अमरीका और न जाने किसको पछाड़ के कित्ता आगे हो गये होते। लेकिन आगे हो जाने के बाद फ़िर करेंते क्या अकेले आगे खड़े-खड़े। अमेरिका की तरह ही कुछ ऊल-जलूल हरकतें न। इसीलिये आराम से खड़ें हैं। खरामा-खरामा प्रगति करते हुये। हड़बड़ाते हुये प्रगति करने से क्या फ़ायदा? उस प्रगति का क्या सुख जिसको फ़ील न किया जा सके। रास्ते में जो मजा है वो मंजिल में कहां?
देखिये इस बात को कवि किस तरह कहता है:
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है ,
बस जीने के खातिर मरती है।
पता नहीं कहां पहुंचेगी ,
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी ।
आलस्य की जब कोई बुराई करता है तो बड़ा गुस्सा आता है। मन करता है पकड़कर हिंसावाद कर दें। लेकिन आलस्य बरज देता है। छोड़ यार। हिंसा कमजोर का हथियार है। आलसी को हिंसा शोभा नहीं देती।
दुनिया में जित्ते भी सुविधाओं के आविष्कार हुये हैं वे सब आलस्य के चलते हुये हैं। सुविधा पाना मतलब आलसी हो जाना। अलग आलस्य की शरण में जाने की भावना न होती तो लिफ़्ट न होती, जहाज न होता, कम्प्यूटर न होता।
और तो और अगर आलस्य न होता तो न घपला होता, न घोटाला न करप्शन न स्विस बैंक ने। न मंदी न बंदी। सब आलस्य के उपजाये हैं ये प्रगति के उपमान। आदमी अरबों इकट्ठा करता है सिर्फ़ इसीलिये कि वो और उसकी औलादें आलस्य का संग सुख उठा सकें।
आलस्य की महिमा अनंत है। अविगत गत कछु न आवै की तरह इसके बारे में बहुत कुछ कहते हुये भी सब कुछ कहना संभव नहीं है। उसमें भी आलस्य आड़े आ जाता है। रोक देता है मुस्कराते हुये -बस,बस बहुत हुय़ी चापलूसी। अब बंद करो ये खटराग। आओ आलसिया जाये।
लेकिन आलस्य न होता तो क्या ये लेख हम पोस्ट कर पाते? बताइये।

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Thursday, August 27, 2020

परसाई के पंच- 20

 1. वास्तव में अनाथ तो उस अनाथालय के अध्यक्ष और मन्त्री और कमेटी के मेम्बर हैं। ये लड़के तो उनके पालनकर्ता हैं। ये बैन्ड बजाकर पैसे मांगते हैं और उस पैसे से उन लोगों का पेट भरता है। ये तो अनाथालय के प्रबन्धकों के माई-बाप हैं। असल अनाथ तो वे हैं जो अनाथालय चलाते हैं।

2. टिकट के मौसम में गांधीवादी बाज होता है। झपट्टा मारा और टिकट ले भागे।
3. अपनी स्त्री से बढकर अपनी प्रसंशा सुनने वाला धैर्यवान श्रोता और कौन मिलेगा।
4. जो जितना बड़ा होता है उतनी ही चापलूसी पसन्द होता है।
5. व्यभिचार से जाति नहीं जाती; शादी से जाती है।
6. अरे, जब यह कहा जाये कि स्त्री बाहर निकले , तब यह अर्थ होता है कि दूसरों की निकलें, अपनी नहीं।
7. अश्लील पुस्तकें कभी जलायी नहीं गयीं। वे अब अधिक व्यवस्थित ढंग से पढी जा रही हैं।
8. स्मगलिंग तो अनैतिक है लेकिन स्मगल किये हुये सामान से अपना या अपने भाई-भतीजे का फ़ायदा होता है, तो यह काम नैतिक हो जाता है।
9. साहूकार खुदा का सच्चा नूर होता है।
10. दुनिया भगवान को पूजती है, पर अपने से कम अक्ल भी उसे समझती है।
11. अगर दो साइकिल सवार सड़क पर एक-दूसरे से टकराकर गिर पड़ें तो उनके लिये यह लाजिमी हो जाती है कि वे उठकर सबसे पहिले लड़ें, फ़िर धूल झाड़ें। यह पद्धति इतनी मान्यता प्राप्त कर चुकी है कि गिरकर न लड़नेवाला साइकिल सवार बुजदिल माना जाता है, क्षमाशील सन्त नहीं।