Monday, September 14, 2020

परसाई के पंच- 33

 1. हमारे देश में छोटा आदमी हमेशा ’सैम्पल’ के काम आता है, और कटता है बड़ों की भलाई के लिये।

2. सिंचाई विभाग में अगर करोंड़ों के घोटाले का हल्ला हो, तो १-२ क्लर्कों को तैयार रहना चाहिये, ’सैम्पल’ के रूप में बलिदान के लिये। बड़े इन्जीनियर , जो लाखों खा रहे हैं और ठेकेदार जो लाखों के झूठे बिलों का भुगतान करा रहे हैं, नहीं पकड़े जायेंगे।
3. इस व्यवस्था में कोई अकेला पैसा नहीं खाता। सब मिलकर खाते हैं- खानेवाले भी और उन्हें पकड़ने वाले भी। इसलिये वास्तविक बड़े भ्रष्टाचारी कभी नहीं पकड़े जायेंगे। पकड़े जाने लगें तो इस देश के तीन-चौथाई मन्त्री, सांसद और विधायक जेल में होंगे। लोकतन्त्र का ऐसा नाश भला कौन देशभक्त करना चाहेगा।
4. भ्रष्टाचार मिटाने की जितनी मशीनरी हैं, जितने विभाग हैं, सब खत्म कर दिये जायें। इनके रहते भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता , क्योंकि इनकी समृद्धि के लिये भ्रष्टाचार जरूरी है। इन विभागों को बन्द करने से अरबों रुपये बचेंगे, जिनसे सिंचाई और बिजली की योजनायें चल सकती हैं।
5. भूत के पांव पीछे होते हैं, ऐसा कहा जाता है। कुछ लोगों के दिमाग के पांव पीछे होते हैं- ये मानसिक भूत हुये। इनके लिये जो बीत गया, वह परम श्रेष्ठ होता है, वर्तमान अत्यन्त हेय और उनकी यह कृपा है कि वर्तमान में जीकर वे उसे गौरवान्वित कर रहे हैं।
6. हर युग के भूत से वर्तमान की कुश्ती हुई है। कालिदास की अवहेलना जब केवल उनकी नवीनता के कारण होने लगी, तो उन्हें ललकारना पड़ा कि जो पुराना है वही श्रेष्ठ नहीं है।
7. कुछ लोग वर्तमान के सूर्य के प्रकाश में काम नहीं करना चाहते; भूत की चादर ओढ टांगे फ़ैलाकर सो जाते हैं। बौना आखिर अपने पूर्वज की छ: फ़ुटी तस्वीर कब तक दिखाता फ़िरेगा और इससे उसका कद कैसे बढेगा?
8. जो जितना सभ्य है, वह उतनी ही अधिक शोभा साधने की फ़िक्र में रहता है।
9. लोग भगवान को उस मूर्ख धनवान जैसा मानते हैं, जो जरा सी चापलूसी से फ़ूलकर थैली खोल देता है और जिसे कोई भी बुद्धू बना सकता है।
10. जो दूसरे के लिये है, वह खराब होना ही चाहिये। जो अच्छा है वह वह अपना है। खोटी सुपारी पूजा में , खोटा नारियल होली में, सड़ा माल भिखारी के कटोरे में, खोटा पैसा भिखारी के हाथ में।
11. इस जमाने में इन्द्र दधीचि के पास हड्डी मांगने आते तो दधीचि भी किसी सर्जन को बुलाकर कहते- देखो मेरे शरीर में ’फ़ाल्स रिब्स’ हैं, उनमें से एकाध टुकड़ा इसे काट दो, जिससे ये टल जायें। आज दानवीर कर्ण होता तो वह भी जाली नोट रखता। हरिशचन्द्र तो बिना अदालत एक कौड़ी भी उस ब्राह्मण को न देते।

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Friday, September 11, 2020

परसाई के पंच- 32

 1. राजनैतिक मुख्य धारा वह है, जिसमें चाहे मैला उतराता हो,पर जिसमें बहने से सत्ता के द्वीप पर पहुंचा जा सकता है।

2. अज्ञानता राजनेता की शोभा है।
3. जो शासक जितना अधिक भ्रष्टाचारी हो, उसे प्रजा को सदाचारी बनाने का उसी अनुपात में प्रयत्न करना चाहिये।
4. जब सत्ताधारी और नेता तथा सारे बड़े लोग जानते हैं, मानते हैं और जिनके पास जीवन से प्रमाणित यह सत्य है कि दुराचरण से ही सुख, सफ़लता और सम्पत्ति मिलते हैं तो सदाचार सिखाकर इन छात्रों की जिन्दगी क्यों बरबाद करने पर तुले हैं?
5. औरत साथ होने से डाकू गिरोह रूमानी हो जाता है।
6. भारतीय कवि अपने स्वार्थ और दूसरे के नुकसान साधने में काइयां है मगर बाकी मामलों में निपट बोदा है, भोंदू है। वह साम्प्रदायिक और संकीर्ण भी है।
7. जो बार-बार डराये , धमकाये कि हाथ-पांव तोड़ दूंगा, जान ले लूंगा , वह भीतर से वास्तविक रूप से कायर होता है। गली के दुमदबाऊ कुत्ते भौंकरे रहते हैं, काटते नहीं।
8. एकाध सुन्दरी युवती पतिव्रता पार्टी के लिये ताकत होती है।
9. इस देश में यह रस्म पड़ गयी है कि जो क्रांति की जितनी ज्यादा बात करता है, वह उतने ही जोर से वास्तविक क्रांति को रोकना चाहता है।
10. तमाम झूठे विश्वासों, मिथ्याचारों, कर्मकाण्डों, तर्कहीन धारणाओं, पाखण्डों को कण्ठ में अंगुली डाल-डालकर और पानी भरकर उल्टी करानी पड़ती है, तब धर्म की अफ़ीम का नशा उतरता है। अगर यह न किया जाये तो आदमी जहर से मर जाता है।
11. नशे को एक के बाद एक ’किक’ चाहिये वरना नशे का चढाव उतर जाता है।

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Thursday, September 10, 2020

परसाई के पंच- 31

 

1. इस देश में सामप्रदायिक दंगे का उन्माद मिर्गी के फ़िट की तरह कुछ शहरों में आता रहता है।

2. मिर्गी के फ़िटग्रस्त को जूता सुंघाया जाता है, जिससे वह होश में आ जाता है। मगर इन शहरों में साम्प्रदायिक दंगा कराने वाले नेताओं, रहनुमाओं को आजतक जूता नहीं सुंघाया गया। ये मिर्गी के स्थायी फ़िट के आनन्द में रहते हैं।
3. भजन भी दो नम्बरी हो गये। जहां नेता, व्यापारी, शासक. धर्मगुरु, समाज सेवक सब दो नम्बरी हो गये, वहां भगवान एक नम्बरी रहकर क्या अपनी दुर्गति करायें? क्या ईमानदार अफ़सर की तरह जंगली इलाके में तबादले का बनवास भोगें? भगवान भी दो नम्बरी हो गया।
4. भगवान के सोने की चोरी के शक में जो पकड़े गये हैं, उनमें मन्दिर के प्रधान महन्त भी शामिल हैं। भगवान भी नेता की तरह चमचे से हार जाते हैं।
5. हम नेता की बुरी हरकत का फ़ौरन अनुकरण करते हैं। नेता अगर कोई औरत भगा ले जाये, तो उसके हजारों अनुयायी औरत भगाते हैं। पर कोई नेता अगर ठीक कर चुकाये , तो इससे उल्टी प्रेरणा पाकर उसके अनुयायी कर-चोरी करते हैं।
6. देश को छोटे-छोटे क्षेत्रों में, भाषाई इकाइयों में, साम्प्रदायिक आधार पर , सांस्कृतिक समूहों में, जाति में, वर्ण में, बांटने की तैयारी कर रहे हैं –हमारे बौने नेता। भारत की एकता नष्ट करने के आसार हैं।
7. इस देश का नेता जनता को बदचलन औरत समझकर उसे तरह-तरह से फ़ुसलाता है – अपनी नेताई छवि से, वादों से, नारों से, उछल-कूद से, लोभ से, छाती-पीट से, अश्रुपात से, हिन्दूवाद से, गांधीवाद से, समाजवाद से- गाने गाता है, सीटी बजाता है, हाव-भाव करता है। मगर कभी जनता पलटकर इस नेता को चप्पल जड़कर कहती है – हरामजादे, मैं क्या तुझे जानती नहीं हूं, तू शोहदा है। मैं कोई बदचलन औरत नहीं हूं।
8. पद पर चिपका रहने वाला नेता, जब इस्तीफ़ा देता है, तब वह ’मेकप’ करता है।
9. इतिहास को जब न्याय करना होता है, तब वह अन्यायी के हाथ में कुदाली देकर कहता है- अपनी कब्र खोद।
10. अमरीकी शासक वर्ग का यह चरित्र है कि वह अनुभव से कभी कुछ नहीं सीखता।
11. हीरो ही नहीं ’विलेन’ भी हरा सकता है। बस, विकल्प चाहिये। जनता के सामने विकल्प पेश करने की जरूरत है। जनता उसे राजसत्ता सौंप देगी।

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Wednesday, September 09, 2020

पैराशूट फैक्ट्री , कानपुर में बनेंगे पी-7 पैराशूट



 आसमान में बड़े जहाज से सफेद फूल के गुच्छे की तरह खिलते हुये नीचे आना वाला सामान पी-7 पैराशूट है। इसमें 7 टन वजन तक का सामान नीचे उतारा जा सकता है। जीप, छोटे ट्रक जैसे सामान को उतारने के लिए इस पैराशूट का प्रयोग होता है। अभी तक इसे इम्पोर्ट किया जाता रहा है। अब पैराशूट फैक्ट्री , कानपुर में बनाये गए पैराशूट के सफल परीक्षण के बाद यह देश में ही बनेगा।

1942 में स्थापित पैराशूट फैक्ट्री पैराशूट बनाने वाली एकमात्र फैक्ट्री है। देश में कोई ऐसा संस्थान नहीं जहां पैराशूट बनाना सिखाया जाता हो। हर तरह के पैराशूट बनाने में सक्षम हैं पैराशूट फैक्ट्री के लोग। खानदानी हुनर की तरह यहां नए लोग पुराने लोगों से पैराशूट बनाना सीखते हैं। डिजाइन ठीक हो और मैटेरियल उपलब्ध हो तो यह अकेली निर्माणी देश और दुनिया की तमाम पैराशूट की जरूरतें पूरी कर सकती है।
सरकारी संस्थान अपनी अधिक लागत के लिएबदनाम हैं लेकिन पैराशूट फैक्ट्री में बनने वाले पैराशूट की लागत दुनिया की बड़ी पैराशूट बनाने वाली कम्पनियों से बहुत कम हैं -एक चौथाई से भी कम।
कई साल की मेहनत के बाद यह पैराशूट बना। इसके पहले जब भी बना इसमें कुछ न कुछ डिजाइन डिफेक्ट रहा। कभी कपड़ा गड़बड़, कभी डोरी। हर बार डिजाइनर की अनुभवहीनता का ठीकरा पैराशूट फैक्ट्री के मत्थे फूटता रहा। ऐसा लगभग हर उत्पाद में होता है।
बहरहाल कई बार की असफलताओं के बाद पी-7 पैराशूट का परीक्षण सफलत रहा। इसके लिए ओपीएफ के सभी लोग
बधाई
के पात्र हैं।
पी-7 पैराशूट के बाद अब अगला लक्ष्य पी-16 पैराशूट है। इसका उपयोग टैंक, तोप आदि को उतारने में होता है। आयुध पैराशूट फैक्ट्री में यह भी बन जायेगा।
इस पैराशूट को बनाने में 40 से अधिक असेम्बली लगती हैं। 15 लोगों के दो गैंग मिलकर महीने भर में एक पैराशूट बनाते हैं। इसकी टेस्टिंग के लिए जितनी जगह चाहिए होती है उतने में सौ मीटर की दौड़ हो जाये।
एक पैराशूट की कीमत लगभग एक करोड़ है। समझिए युध्द के लिए तैयारी में कितना पैसा लगता है।
आयुध निर्माणी परिवार का सदस्य होने के नाते और पैराशूट फैक्ट्री से जुड़ाव के नाते यह सफलता मेरे लिए भी खुशी और गर्व का विषय है। आयुध पैराशूट निर्माणी , कानपुर के महाप्रबन्धक और उनकी पूरी टीम को
बधाई
।

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परसाई के पंच- 30

 . अवैध शराब का धन्धा सहकारिता के सिद्धांत पर चलता है। शहरों में धड़ल्ले से खुले रूप में अवैध शराब बिकती है पुलिस का हफ़्ता बंधा है। एक्साइज वालों का हफ़्ता बंधा है। अक्सर स्थानीय विधायक और नेता का सहयोग इस धन्धे में होता है।

2. ठेकदार-अफ़सर में जो स्नेह सम्बन्ध सदियों से बना है, उसे भ्रष्टाचार पता नहीं किस तर्क से मान लिया गया है। इस स्नेह-सम्बन्ध के कारण ही निर्माण-कार्य होते हैं। पुल बनते हैं, जो साल भर में ही तिड़कने लगते हैं। सरकारी इमारतें बनती हैं, जो पहली बरसात में ही धसकने लगती हैं। सड़क बनती है, जिस पर बनते ही गड्ढे पड़ने लगते हैं। ठेकेदारों की सम्पन्नता और अफ़सरों के सुखी जीवन का रहस्य यही ठेकेदार-अफ़सर प्रेम-सम्बन्ध हैं।
3. सरकारी निर्माण-कार्य में सीमेण्ट की चोरी नैतिकता है, जो युगों से चली आ रही है। झूठे बिलों का भुगतान भी इन्हीं स्नेह-सम्बन्धों के कारण होता है जो नैतिक है।
4. सार्वजनिक क्षेत्र में सबसे व्यापक और बड़ा उद्योग यह तबादले कराना और रद्द कराना है।
5. भ्रष्टाचार की बात करना अब वैसा ही है, जैसे सत्यवादी हरिशचन्द्र की कथा सुनाना। ’सत्यवादी’ हरिशचन्द्र की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है इस देश के भ्रष्टाचार की कथा।
6. ईमानदारी इस देश में लुप्त चीज हो गयी है। बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गयी है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है, बड़ा पिछड़ा आदमी है।
7. व्यापारियों को सामान्य भ्रष्टाचारी अफ़सर प्रिय है, पर ज्यादा भ्रष्टाचारी उनमें नैतिकता जगा देता है।
8. उपभोक्ता संस्कृति में गधे को भी ग्वालियर रेयान की पोशाक पहनाकर विज्ञापन में खड़ा कर सकते हैं, इस शब्दों के साथ- वाह ! यह गधा घुड़दौड़ में प्रथम आया, क्योंकि यह ग्वालियर रेयान की पोशाक पहने है।
9. अखिल भारतीय पार्टियों की यह हास्यास्पद दुर्गति दयनीय है। कहीं कोई बाबा, कोई तान्त्रिक, कोई पाखण्डी साधु खड़ा हो जाय, तो ऑल इण्डिया नेता उसे घेर लेंगे, उसे नेता बना लेंगे। इनका ऑल इण्डियापन तहसील में सिकुड़ जाता है।
10. ये सब नेता क्षेत्रीयता की निन्दा करते हैं। जातिवाद, भाषावाद के खिलाफ़ हैं। मगर किसी कस्बे में कोई बाबा राजनीति में खड़ा हो जाये, तो उसे ये ऑल इण्डिया नेता घेर लेते हैं।
11. परम्परा से भाग्यवादी, चमत्कार विश्वासी, वैज्ञानिक दृष्टि से हीन हमारे इस अति प्राचीन समाज में हर कुछ अलौकिक होकर पुजने लगता है। निराकार ब्रह्म से लेकर प्रेत तक की पूजा होती है।

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Tuesday, September 08, 2020

आत्मनिर्भर भारत -आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहाँपुर का योगदान

 कल दूरदर्शन के शाहजहाँपुर संवाददाता प्रदीप मिश्र जी ने हमारा करीब दो मिनट का इंटरव्यू लिया। इंटरव्यू नहीं -बाइट। यह बाइट हमारी निर्माणी में तैयार किये उत्पाद ECWCS के बारे में थी। ECWCS माने एक्सट्रीम कोल्ड वेदर क्लोथिंग सिस्टम। मतलब बहुत ठंड के मौसम के लिए कपड़े का सिस्टम। ऊंचाई पर जहां तापमान शून्य से 40 से 50 डिग्री कम होता है। तेज हवाएं चलती हैं 40 से 50 किलोमीटर प्रतिघन्टा की रफ्तार से। बारिश और बर्फ कभी भी पड़ने लगती है। आक्सीजन कम होती है। ऐसी जगह के लिए बहुत खास ड्रेस सिस्टम की जरूरत होती है।

अभी तक यह ड्रेस सिस्टम विदेशों से आयात होता है। हमारी निर्माणी ने इसे बनाया है। सब कुछ देशी है इसमें। लगाकर सामान से सिलाई तक। करीब एक करोड़ रुपये के बराबर विदेशी मुद्रा की बचत होगी। इसका सफ़ल ट्रायल इंडो तिब्बत बॉर्डर फोर्स द्वारा किया जा चुका है। सेना से भी जल्द ही आर्डर मिलने की संभावना है।
बाइट का विवरण नीचे है। दो मिनट की मेरी बात को दस सेकेंड से भी कम समय में रखते हुए उत्पाद के बारे में जानकारी दी गयी। देखिये बाइट दूरदर्शन पर। पढ़िए समाचार भी नीचे। पूरी बाइट अगली पोस्ट में इस लिंक पर देखें /सुनें
Anchor -जनपद शाहजहांपुर आयुध वस्त्र निर्माणी(ओसीएफ) ने प्रधानमंत्री जी के सपनो को साकार करते हुए आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत फैक्ट्री ने स्वदेशी मैटेरियल का प्रयोग कर एक बिशेष उत्पाद (ईसीडब्लूसीएस) यानी एक्सट्रीम कोल्ड विंटर क्लोदिंग सिस्टम तैयार किया है।इस स्वदेशी कोल्ड ड्रेस के लिए फैक्ट्री प्रबंधन पिछले सात बर्षो से शोध कर रहा था।यह विशेष ड्रेस माइनस 50 डिर्गी तापमान में जवानों को सुरक्षित रखेगी इसे बनाने में पूर्णतया स्वदेशी मैटेरियल से तैयार की गई है।इस काम को अंजाम देने के लिए पुरुष कारीगरों के अलावा महिलाये बढ़चढ़कर योगदान कर रही है ताकि हर मौसम में सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए जरूरी सामान समय से मिल सके।
V/o-आयुध वस्त्र निर्माणी महाप्रबंधक ए.के. शुक्ला ने बताया आतमनिर्भर भारत के तहत फैक्ट्री ने बिशेष उत्पाद एक्सट्रीम कोल्ड विंटर क्लोदिंग सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी मैटेरियल से तैयार किया है।उन्होंने बताया ओसीएफ ने 2013 में इस प्रोजेक्ट पर कार्य शुरू किया था इस थर्मल इन्सुलेट सिस्टम की थ्री लेयर्स में तैयार 4.50 किलोग्राम की यह ड्रेस शरीर का तापमान नियंत्रित कर नमी को पसीने के रूप में बाहर निकलती है और शरीर को अंदर से सुख रखती है।यह ड्रेस माईनस 50 डिग्री से भी जवानों को सुरक्षित रखेगी।उन्होंने बताया अभी तक सेना के लिए इस उत्पाद पर निजी क्षेत्र पर निर्भरता रहती थी यह पहला मौका है जब कोई सरकारी उपक्रम सेना सुरक्षा बलों के लिए इस तरह की ड्रेस स्वदेशी फार्मूले से तैयार कर रही है इससे फैक्ट्री प्रबंधन उत्साहित है।
बाइट-ए के शुक्ला महाप्रबंधक ओसीएफ शाहजहांपुर

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Monday, September 07, 2020

परसाई के पंच-29

 

1. महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियां पैदा होती हैं।
2. हमारे देश में तो ऐसा था कि पचासों कृपाकांक्षी युवक एक कतार में बैठे रहते थे और युवती किसी एक पर कृपा करके उसके गले में जयमाला डाल देती थी। बाद में, मध्ययुग में, जब व्यवस्था सड़ी तो वर बिकने लगे।
3. टेण्डरवाले कभी-कभी एक और चक्कर में पड़ जाते हैं। ऊंची बोली के इन्तजार में लड़के की उम्र निकल जाती है। तब उसे किसी शादी के सीजन में ’क्लीयरेंस सेल’ में सस्ते माल की तरह निकाल देते हैं।
4. आधुनिक और प्रगतिशील बनने वाले युवकों को भी मैंने देखा है। युवक कहता है, मैं तो दहेज के खिलाफ़ हूं। लेकिन फ़ादर नहीं माने। मैं फ़ादर का बहुत आदर करता हूं। कई तो मण्डप में मचल जाते हैं बच्चे की तरह, जो टाफ़ी के लिये मचलता है। हम तो स्कूटर लेंगे।
5. जैसे-जैसे काला धन बढ़ रहा है, विवाह के बाजार में वर की कीमत बढ़ रही है।
6. नकली दवाइयां सच्चा समाजवाद निभाती हैं। वे गरीब को भी मिलती हैं और अमीर को भी। वे अस्पतालों में भी खरीदी जाती हैं। इस नकली दवाइयों को मतदाता भी खाता है और वह नेता भी, जिसे वह चुनता है।
7. शिकायत जब ऊंचे स्तर से उठती है तब उसकी अहमियत होती है और चिन्ता होने लगती है। दिल्ली में मामूली लोगों के बच्चों की रोज ही हत्या होती है। मगर महत्वपूर्ण व्यक्ति के बच्चों की हत्या हो तो उस अपराध का स्तर बढ़ जाता है। हत्यारों की बार-बार फ़ोटो छपती है, प्रेस-इंटरव्यू होते हैं और वे अनतर्राष्ट्रीय ख्याति पा जाते हैं।
8. इस देश में सबसे आसान काम राजनीति करना है।
9. इस महान देश की यह महिमा है कि अगर आदमी सनकी हो और उसके पास पैसा हो या कहीं से मिल जाये, तो वह अपने नाम से पार्टी बना सकता है।
10. भारतीय राजनीति में ऐसे-ऐसे नेताओं के दल हैं, जो सिर्फ़ कार्टून बनाने वाले के काम के रह गये हैं।
11. अपने बेटों, पोतों, परपोतों के लिये धन इकट्ठा करना और भाई-भतीजों को मालदार बनाना उत्तम प्रकार की संवेदनशीलता है। इस संवेदनशीलता की जो खबरें अखबारों में छपती हैं, वे ’अश्लील’ हैं। इनसे जनता की नैतिकता गिरती है।

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Sunday, September 06, 2020

परसाई के पंच- 28

 1. पाकिस्तान ने लगातार फ़ौजी तानाशाही के कारण अपने को एक पेशेवर गुण्डा बना दिया है। उसे पैसे दे दो, लाठी दे दो और कह दो कि जा, उस शरीफ़ आदमी को पीछे से लाठी मार आ। गुण्डा बार-बार पिटता है मगर पेशा नहीं छोड़ता। पेट का सवाल है।

2. सन्तुष्ट और असन्तुष्ट विधायक में यह खुला फ़र्क है कि सन्तुष्ट का बिल दूसरा चुकाता है और सन्तुष्ट को अपना बिल खुद चुकाना होता है। असन्तुष्ट जब सन्तुष्ट हो जाता है तब उसका बिल चुकाने वाले निकल आते हैं।
3. विधायकों की दो जातियां होती हैं- सन्तुष्ट और असन्तुष्ट। इनकी बाहरी पहचान कुछ नहीं है सिवा इसके कि असन्तुष्ट थोड़ा भुनभुनाता रहता है। उसके चेहरे पर तनाव रहता है।
4. राजनीति में जब एक गुट पिट जाता है तो वह असन्तुष्ट होकर जनता के दुखों पर विलाप करने लगता है- हाय ! जनता की हालत कितनी खराब है। पीने को पानी नहीं मिलता। दाम आसमान पर चढ गये हैं। गुण्डागिरी का यह हाल है कि माताएं-बहनें सड़क पर नहीं निकल सकतीं। हाय जनता की हालत देखकर रोना आता है।
5. ये असन्तुष्ट आंसू पोंछने के लिये चार-चार रूमाल रखते हैं। जो धोती पहनते हैं उनकी धोती आंसुओं से भीग जाती है।
6. जब ये असन्तुष्ट सत्ता में पहुंचकर सन्तुष्ट हो जाते हैं तब इनकी जगह नये असन्तुष्ट आकर जनता की हालत पर रोने लगते हैं।
7. अभाव की दाद जब लाइलाज हो जाये, तब उसे खुजाने का मजा लेना चाहिये।
8. वास्तव में क्रांति से सामान्य आदमी को आजादी नहीं मिलती। वह हमेशा गुलाम रहता है। आजदी हमेशा शासक और शोषक वर्ग को मिलती है। इसलिये सामान्य आदमी शगल के लिये क्रांति करे तो उसे प्रहसन (मजाकिया नाटक) की तरह करे, क्रांति को कभी गम्भीरता से नहीं करना चाहिये। यह नाटक हमेशा दुखान्त होता है।
9. कोई देश हो या आदमी हो, अमेरिकी पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खेल में वे ताश के पत्ते होते हैं।
10. गांधीवाद, समाजवाद , धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह खास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाये, सत्ता पा लेना। एक पक्का गाना चल रहा है, जिसके बोल हैं-’ प्रभु मैं कैसे सत्ता पाऊं?’
11. हम तो पहले जैसे ही हैं। वही कर रहे हैं। भूख से मरते हैं और चुप रहते हैं। मंहगाई बर्दाश्त करते हैं, बेखटके बच्चे पैदा करते हैं, घटिया फ़िल्में देखते हैं, कच्ची दारू उतारते हैं और पीकर मरते हैं। हरिजनों को जिन्दा जलाते हैं, कृष्णार्पण करके घूस लेते हैं, सस्पेण्ड होने पर ग्रहशांति करवाते हैं।

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Saturday, September 05, 2020

परसाई के पंच-27

 1. चरित्रवान और चरित्रहीन में कुल इतना फ़र्क होता- एक पकड़ा नहीं जाता और दूसरा पकड़ा जाता है। जिसकी दबी है वह चरित्रवान और जिसकी खुल गयी वह चरित्रहीन।

2. निराशा की नैतिकता भी स्थाई नहीं होती।
3. इमर्जेन्सी के दौरान भी, और अब भी, मन्त्री को देखते ही विद्वान ’इमर्जेन्सी’ की बात करने लगते हैं। तब उसके समर्थन में बोलते थे, अब विरोध में बोलते हैं।
4. एक बेचारी मामूली क्रांतिकारी होता है, जो क्षेत्र में काम करता है। भूखा रहता है। रोटी और प्याज झोले में लेकर चलता है, पिटता है, जेल जाता है। यह मामूली क्रांतिकारी है। एक अतिक्रांतिकारी होता है, विशिष्ट। यह दिन में दाढी ’ट्रिन’ कराता है, काफ़ी हाउस में बैठकर कॉफ़ी पीता है, बिटर कॉफ़ी। क्रांति एक कड़वी चीज है। कॉफ़ी में शक्कर डली हुई आयी हो, तो चम्मच से उसे निकालकर टेबिल पर डाल देता है, जिस पर मक्खियां भिनकती हैं। सिगरेट को क्रोध में मरोड़कर बुझाता है, जैसे बुर्जुआ का गला घोंट रहा हो। दिन में यह क्रांतिकारी मार्क्स, लेनिन, माओ के जुमले याद करता है, रात को दोस्तों के साथ शराब पीता है और क्रांतिकारी जुमले दुहराता है। फ़िर मुर्गा इस तरह खाता है, जैसे पूंजीवाद को चीथ रहा हो।
5. क्रांति के लिये हमेशा दूसरे के बाप की तलाश करनी चाहिये। अपने बाप को खून चूसने की सुविधा दी जाती है क्रांति में। उस खून का एक हिस्सा क्रांतिकारी बेटा भी पीकर सर्वहारा का नेतृत्व करने बढ जाता है।
6. जवानी में जैसे अच्छे कपड़े, अच्छे जूते, अच्छी टाई का शौक होता है, वैसे ही सम्पन्न घरों के कुछ युवकों को क्रांति का शौक हो जाता है। क्रांतिकारिता को वे एक और अच्छा सूट, एक और अच्छी टाई, एक और अच्छा जूता समझते हैं। इससे शोभा बढती है, प्रतिष्ठा बढती है।
7. मैं कुछ क्रांतिकारियों को जानता हूं जिनकी बाकी जिन्दगी इस प्रचार को धोने में गुजरती है कि वे कम्युनिस्ट थे। क्रांतिकारिता , जिसे उन्होंने कभी द्वार पर रंगोली की तरह सजाया था, अब पांवों में कांटे की तरह चुभती है। उसे वे नष्ट कर देना चाहते हैं।
8. क्रांतिकारिता के पानी में जो मछली ज्यादा उछलती और उतराती है उसे अमेरिकी बगुला उतनी ही फ़ुर्ती से पकड़ता है।
9. अमेरिकी अस्मिता उस औरत की तरह है, जिसकी तरफ़ देखने से ही उसका सतीत्व भंग हो जाता है।
10. मजहबी उन्माद की पूंजीवाद से ही पटती है।
11. तनाव से डर पैदा किया जाता है। डर से हथियार की बिक्री होती है।

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Friday, September 04, 2020

परसाई के पंच-26

 1. हम समझते थे , यह लोकतंत्र वटवृक्ष है। कैसी भी आंधी आये, उखड़ेगा नहीं। रोपा इसी उद्देश्य से था। मगर अब सिद्धांतहीन, बेईमान, गैरजिम्मेदार हमारे नेताओं ने उसे गमले का पौधा बना दिया है। अब यह हाल है कि कोई भी बैल,गधा, भैंसा उस पर मुंह मारकर पत्ते नोंच लेता है। अभी यह पौधा उखड़ा तो नहीं है, मगर गर्दिश में है।

2. गलती हमारी भारतीय जनता की भी है। हमने समझ लिया कि पांच साल में एक बार वोट देना ही लोकतंत्र है। जिसका ज्यादा हल्ला हो, उसे वोट दे दो।
3. जिन्हें पांच साल के लिये चुन लिया उन्होंने अपने को ही देश मान लिया। वे मुंह खोलकर अपने भीतर वैसे ही भारत को बताने लगे, जैसे कृष्ण ने अर्जुन को अपने मुंह में सारा ब्रह्माण्ड दिखाया था।
4. क्या इसीलिये कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। मंहगाई को रोयेंगे, लेकिन दीवाली ठाट से ही मनायेंगे। जैसे-जैसे मंहगाई बढ़ती है, वैसे-वैसे उत्सव बढ़ते हैं।
5. वैदिक आर्य उत्सव-प्रेमी था। मस्त था। खाती-पीता, नाचता था। गेहूं पैदा करना उसे पहले नहीं आता था, पर उसने तब भी वह सोमलता खोज ली थी, जिससे सोमरस निकलता था। यानी घर में रोटी का ठिकाना नहीं है पर दारू की भट्टी जरूर खोले बैठे हैं।
6. लक्ष्मी की उत्पत्ति की कल्पना अद्भुत है। वह समुद्र मन्थन से अन्य रत्नों के साथ निकली थी। समुद्र-मन्थन अकेले देवों ने नहीं किया था। उसके लिये दानवों का सहयोग लिया था। जब रत्न निकले तो दानवों को तो मदिरा पिला दी और लक्ष्मी को विष्णु ले उड़े।
7. फ़ौजी तानाशाह इन्सानों से डरता है। अलग-अलग इन्सानों से कम डरता है, पर इकट्ठे इन्सानों से बहुत डरता है।
8. तानाशाह एक डरपोक आदमी होता है। अगर पांच गधे भी साथ-साथ घास खा रहे हों, तो तानाशाह को डर पैदा होता है कि गधे भी मेरे खिलाफ़ साजिश कर रहे हैं।( हालांकि गधे अपनी बिरादरी के खिलाफ़ साजिश नहीं करते।)
9. धार्मिक उन्माद पैदा करना, अन्धविश्वास फ़ैलाना, लोगों को अज्ञानी और क्रूर बनाना राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरुषसत्ता का पुराना हथकंडा है। हिन्दू पीछे नहीं हैं मुसलमानों से।
10. हम दूसरी जातियों पर थूकें तो वह अपने ऊपर ही गिरेगा। हमारा सौभाग्य यह है कि हमारे शंकराचार्य उन्माद नहीं पैदा कर सकते, जैसा अयातुल्ला और इमाम कर सकते हैं। शंकाराचार्यों की इस अक्षमता ने हमें बहुत बचाया।
11. हर नेता दूसरे की धोती खींचता है। कुछ तो शुरु से ही सिर्फ़ चड्डी पहने हैं। ये नाड़ा खींचते ही नंगे हो जाते हैं।

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Thursday, September 03, 2020

रात लगी कहने सो जाओ, देखो कोई सपना

 सूरज भाई सुबह-सुबह जम गए हैं आसमान में। आलथी-पालथी मार के बैठे हैं। आंगन में पंखा डुलाते हुए बैठी बुढ़िया की तरह हुकुम दे रहे होंगे -'ये छुटकी तुम इधर चलो, बड़की तुम चलो जरा भारत दैट इज इंडिया पर रोशनी फैला के आओ, ये मंझली तुम्हारी शिकायत मिली है कि तुम बहुत धीरे रोशनी करती हो। सबको बराबर रोशनी बांटना तुम्हारा काम है। रोशनी कोई राहत सामग्री थोड़ी है जो नेताओं, अधिकारियों की तरह जित्ती बांटो उससे ज्यादा खुद के लिए रख लो। आइंदा ऐसा किया तो किसी ब्लैकहोल में भेज दूंगा।'

मंझली मनचली नजरों से सूरज भाई को निहार रही है। उसको पता है कि सूरज भाई उसको कितना चाहते हैं। चुनाव में चंदा देने वालों को सरकार बनने पर उनके भले लिए नीतियां बनाने वाले जनप्रतिनिधियों से भी ज्यादा प्यार करते हैं सूरज भाई मंझली को। वह सूरज भाई को 'अदा पर फिदा' नजरों से निहारती रही। सूरज भाई भी उनको कनखियों से देखते हुए अनदेखा करते रहे। इस अलौकिक प्रेम की शोभा का वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं किसी कवि के पास। इसके लिए किसी लफ्फाज नेता की सेवाएं लेनी पड़ेंगी।
ये तो अभी की बात। सुबह जब निकलने को हुए तो ऐसे दबे पांव अंधेरे की चादर आहिस्ते से हटाकर आये धरती की तरफ जैसे पुराने जमाने के आशिक अपनी माशूक से मिलने जाते थे। लेकिन कितना भी दबे पांव आये यहां की चिड़ियां तो जान ही गयी कि सूरज भाई आ गए। वे चहचहाते हुए गुडमार्निंग टाइप करने लगीं। दबे पांव आने वाले सूरज भाई चिडियों की चहचाहट सुनकर लाज-लाल हो गए। उनकी देखा-देखी दिशाएं भी लाल हो गयी। कुछ देर बाद सब सूरज भाई सामान्य हो गए। दे रोशनी के थान के थान धरती और उड़ेलने लगे। पूरे 12 घण्टे के वियोग की कमी पूरी करने लगे। धरती को भी 'रोशनी चम्पी' कराने में मजा आ रहा था।
उधर सुबह का हूटर बजा। पूरे शहर में हल्ला हो गया होगा। हूटर कर्मचारियों के लिए निर्माणी आने जाने का इशारा है। सुबह आने के लिए शाम को जाने के लिए। सुबह तो लोग आहिस्ते-आहिस्ते आते हैं। शाम को जाते समय हूटर बजते ही भीड़ की भीड़ फटाक से निकल लेना चाहती है।
हूटर से कायनात की शुरुआत की बात जुड़ती है। लोग कहते हैं कि सृष्टि की शुरआत बड़े धमाके से हुई। धमाका हुआ और ब्रहाण्ड बन गया। तारे-ग्रह-नक्षत्र बने। एक दूसरे से दूर भागते हुए पसरने लगे।
ऐसा लगता है कि ये जो बिग बैंग है न वो कायनात का हूटर होगा। इधर बजा उधर कायनात के कारखाने में काम करने वाले सारे तारे-ग्रह-नक्षत्र कांजी हाउस का दरवज्जा खुलने ओर भाग निकलने वाले जानवरों की तरह अदबदा कर भड़भड़ाते हुए निकल लिए होंगे। पूरी कायनात में फैल गए होंगे। बाद बाकी उसी से सृष्टि का निर्माण हुआ।
सुबह उठकर टहलने निकले तो हाथ का बैंड बता रहा कि रात 6घण्टा 14 मिनट सोए। उसमें 2 घण्टे 12 मिनट गहरी वाली नींद। बाकी हल्की नींद। मने नींद में भी दूध और पानी की तरह मिलावट। हल्की और गहरी नींद का गठबंधन भी बढ़िया दूध और पानी शादी में आराम वाली पत्ती और सपनों की इलायची डालकर बनी चाय की तरह है। पीकर आनन्द आ जाता है।
सपने की बात से याद आया कि रात फिर गड़बड़ सपना देखे। पूरा तो नहीं याद लेकिन कुछ ऐसा कि इम्तहान आ गया है। तैयारी नहीं है। कुछ आता नहीं। लगता है फेल हो जाएंगे। पूरे सपने भर फेल होने का डर हावी रहा। इतना डर गए कि हनुमान जी का प्रसाद भी नहीं मान पाए कि बजरंगबली नैया पार कराओ सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाएंगे।
बहुत डर लगा इम्तहान के सपने से। अब कब्जे में कोई कोई चैनल हैं नहीं जो इम्तहान के डर से बचने के लिए रिया-सुशांत टाइप स्टोरी चलवा दें। तमाम देशों की सरकारें करती हैं ऐसा। भुखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने के लिए कोई सनसनाती हुई खबर चलवा देते हैं। मन किया सूरज भाई से पूछें कि उनके यहां मीडिया कैसे काम करता है। क्या उनके यहां भी सुशांत-रिया टाइप किस्से चलते हैं। लेकिन जब तक पूछे तब तक सूरज भाई और उचक गए थे आसमान में। गलत थोड़ी कहते हैं नन्दन जी:
जिसे दिन बताये दुनिया, वो तो आग का सफर है,
चलता है सिर्फ सूरज, कोई दूसरा नहीं है।
सपने के चक्कर में इतना सब कह गए। सपने कभी उपचार होते थे । रमानाथ जी कहते हैं:
रात लगी कहने सो जाओ,देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना।
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
सो न सका कल याद तुम्हारी,आई सारी रात।
लेकिन हमको तो फुल नींद भी आई, किसी की याद नहीं आई। लेकिन नींद के बहाने जगने पर क्या क्या लंतरानी हांक रहे। वास्तविकता से मुंह छिपाने के लिए सपने के कनकौवे उड़ा रहे। क्या यही आपदा में अवसर है।

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Wednesday, September 02, 2020

परसाई के पंच-25

 

1. मौन मूर्ख , मुखर मूर्ख से फ़िर भी अच्छा होता है। मुखर को बाद में मौन होना पड़ता है।
2. रचनात्मक कार्य यानी लोगों को लाइसेन्स , परमिट दिलाना, उनके तबादले कराना, उनकी नियुक्ति कराना, कभी-कभी उनकी जमानत कराना, केस उठवाना, सार्वजनिक जमीन कर कब्जा करवाना, तस्करियों , जुआडियों को सुरक्षा प्रदान करना। ये सब ’रचनात्मक कार्य’ ही तो हैं।
3. जयन्ती करने के और भी फ़ायदे हैं। सरकारी अनुदान और चन्दा मिलता है, जिससे आत्मा का उन्नयन होता है।
4. फ़फ़ूंद से पेनिसिलिन बनता है जो रोगाणुओं को पास फ़टकने नहीं देता। फ़फ़ूंदे हुये दिमागों में वैचारिक पेनिसिलिन बन जाता है, जिससे नये विचारों के रोगाणु उस पर असर नहीं करते।
5. पूंजीवादी सभ्यता अमानवीकरण करती है। महाजनी सभ्यता यही है। यह शोषक और शोषित दोनों का अमानवीकरण करती है।
6. कोई सरकार न आज तक शराबबन्दी कर सकी , न कर सकेगी। न यह इस्लाम के नाम से सम्भव है, न महात्मा गांधी के नाम से। शराब बन्दी तो कमाई करके पीने का सुभीता दिलाती है।
7. पुलिस और आबकारी वाले अगर छापा मारें , तो नेताजी बीच में पड़कर मामला संभाल भी लेते हैं। पुलिस वाले जरूरतमन्द को खुद बता देते हैं कि कहां मिल जायेगी। अगर कहीं पुलिस छापा मारे, तो वहां के ग्राहकों को बता देती है कि दो-तीन दिन फ़लां अड्डे से ले लीजिये।
8. हमें-जनता को समझ में नहीं आता कि हम मनुष्यों को चुन रहे हैं या केचुओं को, जिनके हड्डी ही नहीं है।
9. क्रांति इस देश में भुनी हुई मूंगफ़ली हो गयी है। इसके खोमचे लगे हैं। जिसे देखो, वही पचीस पैसे में क्रांति की मूंगफ़ली का पूड़ा लेता है और छीलकर खाने लगता है।
10. इस्तीफ़े की घोषणा मनाने वालों को ध्यान में रखकर की जाती है। जैसे आमरण अनशन की घोषणा दूसरे दिन मुसम्मी का रस पिलाने वाले को ध्यान में रखकर की जाती है।
11. अगर निष्कण्टक राज करना है तो प्रजा में अज्ञान और अन्धविश्वास फ़ैलाना जरूरी है।

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