Thursday, September 29, 2005

नयी दुनिया में

[जिस तरह से कालीचरण,भोला और रविकामदार जी हमारी यायावरी से प्रभावित व कुछ आतंकित हुये उससे लगा कि इस लेखमाला की एक प्रति प्रधानमंत्री जी के कार्यालय में भेज दूं। जब भी विदेश दौरे पर जायें इसे साथ में लेते जायें। जहां विकसित देशों से बातचीत में कहीं 'अर्दभ' में फंसे, यह लेख पढ़ दें। विकसित देश फौरन 'हीनभावना मोड' में आ जायेंगे। जैसी कि आशा थी ,जीतेन्दर ने इसे अलग से ब्लाग बनाकर लिखने का सुझाव उछाला। उनके सुझाव पर जवाब सुरक्षित है- इसी पोस्ट में। सुनीलजी कुछ डायरी में लिखा है कुछ दिमाग में। खिचड़ी मिलती रहेगी। रवि भाई लेख लिखने शुरु किये हैं,देखें कितने होते हैं। आशीष आओ तुमको अपने संग भी थोड़ी सैर कराते हैं, कुछ किस्से कालेज के सुनाते हैं।]

हां तो हम थे कानपुर में। 28 सितम्बर,1983 को हमें चलना था इलाहाबाद के लिये वापस। हम चले भी और सकुशल पहुंच भी गये। जहां से चले थे वहीं पहुंच गये। पूरे तीन महीने 2 दिन के बाद। यात्रा की कहानी सुनाने के पहले जरूरी है यात्रा की तैयारी के किस्सों के बारे में बताना। उसके लिये चलना पड़ेगा मोनेरेको। मोनेरेको जहां हमने चार साल जम कर मौज-मस्ती की । मजबूरन कुछ पढ़ाई भी करनी पड़ी। यह मजबूरी, आवश्यकता कम, न्यूटन के जड़त्व के नियम के अनुपालन के कारण अधिक थी।

हमारे तमाम दोस्त कालेज की तरफ जाने वाली सड़कों पर जगह जगह मिलते गये। हम वापस लौट आये थे। तमाम अनुभवों के साथ। पर एक अनुभव से हम वंचित रह गये थे इस साल। इस साल हम नये साथियों का स्वागत नहीं कर पाये थे। एक बैच की रैगिंग छूट गयी थी । हमारे बच्चे अपने बच्चों के बाप बन गये थे और हम खुशी में शरीक भी न हो पाये। सड़क नापते रहे। अब समझ में आ रहा है कारण राजेश की शुरुआती कविताओं के भटकाव का तथा बलियाटिक के शाश्वत दुख का। इनके ‘पाटी-पूजन कार्यक्रम’ में कहीं चूक जरूर हुई।

जिनकी रैगिंग छूट गयी उसके लिये वो रोयें। हमारे अनुभव कम थोड़ी हैं रैगिंग के। हमने भी कुछ कम मौज नहीं ली। कुछ किस्से अभी भी याद हैं। ये कुछ किस्से इतने हैं कि शुरु होते हैं तो खत्म होके ही नहीं देते। अभी भी हमारे मित्र नवीन शर्मा से कालेज हास्टल की बात करो तो घंटों बतियाने के बाद तड़फ के कहते हैं -यार याद मत दिलाओ वो दिन। मन ,’नास्टल्जिया’ जाता है। तो कुछ किस्सों में से कुछ दोहराने की कोशिश करता हूं ताकि सनद रहे।

मोनेरेको
मोनेरेको
इंटर के तुरंत बाद हम करना चाहते थे बी.एस.सी.। गुरुजी ने एक दिन पूछा कम्पटीशन की भी तैयारी कर रहे हो कि नहीं बोर्ड की परीक्षा के साथ? कैसी चल रही है तैयारी? तब तक हमें यह तो पता था कि लोग इंजीनियरिंग/मेडिकल कम्पटीशन की तैयारी करते हैं लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं थी तथा हम बी.एस.सी. के प्रति आकर्षित थे। जब गुरुजी ने ज्ञान-चक्षु खोले तब हम जगे तथा कम्पटीशन के फार्म भरे। इंटर के तुरंत बाद हमारा मोनेरेको में तथा रुड़की में चयन हो गया । रुड़की में बहुत नीचे नंबर था। लेकिन मोनेरेको में जो रैंक थी उसके हिसाब से किसी भी रीजनल इंजीनियरिंग कालेज में,किसी भी ब्रांच में दाखिला मिल सकता था। हमने यांत्रिक इंजीनियरिंग का पल्ला पकड़ा और पहुंच गये एक नयी दुनिया में।
हमारे तमाम दोस्तों ने अपनी ब्रांच बदली बाद में। कोई सिविल से इलेक्ट्रिकल में गया कोई इलेक्ट्रिकल से कम्प्यूटर में लेकिन हमने जिसको एक बार पकड़ा उसे छोड़के के नया पकड़ने की कभी नहीं सोची चाहे वो ब्रांच हो या ब्लाग या बीबी। सुन रहे हो जीतेन्दर बाबू! क्या नया ब्लाग बनाना जिसकी उमर केवल बीस-पचीस पोस्ट हो? चाहे मुफ्त में बनता हो लेकिन सिर्फ नयेपन के लिये नया ब्लाग बनाना और बीस-पचीस पोस्ट बाद बंद कर देना मुझे तो ब्लाग-हत्या लगता है।

हम पहली बार अपने मां-बाप से दूर हुये थे। लेकिन हास्टल में उनकी कोई कमी नहीं थी। वहां सीनियर अपने को जूनियर का बाप कहते थे। इस नयी दुनिया में हमारे तमाम कुंवारे बाप थे। चंद कुंवारी मायें थी। देखा जाये तो कालेज याहू का कोई चैट रूम था जहां गिनती की फीमेल तथा हर जीव में फीमेल की संभावनायें तलाशते सैकड़ों मेल थे

प्रसंगवश बता दूं कि हिंदी के आदिचिट्ठाकार आलोक के पिताजी हमारे ही गुरुकुल के हैं तथा जूनियर-सीनियर के बीच बाप-बेटे के रिश्ते के नाते हमारे लकड़दादा के लकड़दादा के लकड़दादा लगते होंगे।

नये आने वाले जूनियर उस सद्यजात बालक की तरह थे जिनके गाल कोई भी आता-जाता नोंच जाता है। बिना कुछ किये केवल कैलेंडर बदल जाने के कारण बने बाप ,अपने बच्चों को अथाह प्यार करते थे। संस्कारवान बनाने में महीनों लगा देते। तमाम नये-नये गुर सिखाते। मुझे लगता है कि आज जो कुछ दुनिया में नया-नया पापुलर हो रहा है वह हमारे कालेज की रैगिंग की नकल करके किया गया है। लक्ष्य पिक्चर में जो ऋतिक रोशन फौज में ट्रेनिंग के दौरान भागा-भागी करता है, ‘क्राउलिंग’ करता है वे सब हमारे कालेज की किसी ‘मास रैगिंग ‘ के हिस्से है। बाबा रामदेव जितने आसन सिखाते हैं वे सारी कलाबाजियां किसी न किसी ‘बौद्धिक’ में हम कर चुके हैं। पता नहीं बाबा जी ‘मुर्गासन’, जो हमारे यहां सबसे प्रचलित आसन था, से क्यों परहेज करते हैं!
जिस तरह आज भी भ्रष्टाचार को लोग अपरिहार्य मानते हुये भी बुरी चीज मानने से ऊपर नहीं उठ पाये हैं वैसे ही रैगिंग को भी अनिवार्य बुराई मानते थे। हर बुरी माने जाने वाली चीज रात में ही करनी चाहिये इस रूढ़िवादी विचार से बंधे लोग रैगिंग करने के लिये रात का ही समय चुनते। वैसे रैगिंग के लिये रात का समय चुनने के पीछे कुछ लोग बताते हैं कि बाप लोग दूरदर्शी थे तथा मानते थे कि उनको कुछ बच्चों समेत एक दिन अमेरिका जाना है जहां समय में १२ घंटे का अंतर है।भविष्य के हिसाब से ‘बायलाजिकल कंडीशनिंग’ के लिये रात भर जाग-जगाकर प्रेम-पूर्वक रैगिंग करते थे।

आज से बीस साल पहले देश में छुआछूत का काफी बोलबाला था। सीनियर लोग ब्राम्हणों की तरह रहते तथा जूनियर को अछूत मानकर छूते नहीं थे। सारा प्रेम-प्रदर्शन दूर से होता। रिमोट संचालित थी रैगिंग।अब जब से समाज में छुआछूत की भावना कम हुयी है यहअस्पृश्यता का भाव तिरोहित हो गया है। सीनियर लोग बच्चों से आम मां-बाप की तरह मारपीट करने लगे हैं।

आज ही अखबार में पढ़ा कि किसी कालेज में रैगिंग के दौरान जूनियर की पिटाई की गयी जिससे उसके खून निकलने लगा। रोज तमाम किस्से सुनने में आते हैं।कारण तमाम हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण मुझे समझ में आता है समय तथा जगह का अभाव।

रैगिंग के प्रति तमाम दुष्प्रचार के चलते इसे बंद करने के तमाम प्रयास होते हैं। इन प्रयासों के चलते बाप लोगों में बच्चों के प्रति अपने प्रेम प्रदर्शन की भावना बढ़ जाती है तथा जहां मिलता है मौका वे सारा प्यार छलका देना चाहते हैं अपने जूनियर बच्चों में। जूनियर को वे चिरविरहणी कामातुर नायिका की तरह दबोच लेते हैं जो कि नायक के प्रति प्रेम प्रदर्शन में उसे घायल करके ही सुकून पाती है।

यह भी पाया गया कि सबसे बीहड़ रैगिंग करने वाले आमतौर वे सीनियर होते हैं जिनको खुद की रैगिंग कराते समय बुखार चढ़ आता था। अपनी रैगिंग के समय फूल की तरह कुम्हला जाने वाले लोग साल बीतते-बीतते जूनियर्स के स्वागत के लिये भटकटैया की तरह तत्पर हो जाते।

संसार समर में जूझने के लिये तमाम कौशल जरूरी होते हैं। नंगई तथा मजबूत फेफड़े इसके लिये जरूरी हथियार होते हैं। नंगई की कला तो को अंधेरे के कपड़े पहनकर दिगम्बर बनकर कुछ दिन में ही सीख जाते लेकिन गाली-गलौज सीखने में कुछ मेहनत करनी पड़ती।

धाराप्रवाह, बहुआयामी गालियां देने में सक्षम बालक काफी काबिल माना जाता। जिस तरह से अंग्रेजी बोलने में सक्षम जाहिल-से-जाहिल शख्स को लोग बिना किसी शक के बहुत काबिल मानलेते हैं वैसे की उर्वर गालियों का सृजन करने सकने वाले को पैदाइसी नेतृत्व गुण संपन्न मान लिया जाता।

इस लिहाज से हमारे तमाम साथी भयंकर नेतृत्व क्षमता से युक्त थे।एक सांस में पचीस तीस बहुआयामी गालियां निकाल देते।वातावरण में भविष्य के प्रति आश्वस्ति के बीज बिखेरते रहते।इधर देख रहा हूं कि बालकों में नेतृत्व क्षमता में भयंकर गिरावट आयी है। मेरा मन डूब सा गया यह सुनकर कि एक बालक से जब धुंआधार गालियां बकने को कहा गया तो शरमाते हुये उसने बका- दुराचारी,भ्रष्टाचारी,अनाचारी। यह कहकर बालक चुप हो गया।

मैं सोचने लगा-हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।बीस साल पहले तक बड़े-बड़े विद्वानों,मां-बहन तथा तमाम उत्पादक अंगों को दिन-रात याद करने वालों के वंशज दुराचारियों,भ्रष्टाचारियों की संगति में आ बैठे हैं।गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में कोई नहीं है इन्हें बताने वाला?

लेकिन बुरी मानी जाने वाली वस्तु का भी क्या सामाजिक महत्व हो सकता है? मुझे तो लगता है होता है।पता नहीं आप क्या सोचते हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “नयी दुनिया में”

  1. eswami
    बहुत सही जा रही है संस्मरण मेल.
    सच रैगिँग मे मारपीट आदी की खबरेँ सुन कर मन बहुत खिन्न होता है और इसके खिलाफ बने नीयम सख्त ही होने चाहिए.
    मौज मजे के लिए की हुई रैगिँग का रूप और मजा अलग होता है – हमारा एक सीनीयर रैगिँग करते समय इतनी मौज लेता था की जूनियर्स अड जाते थे पहले उसे बुलाओ फिर जितनी चाहे रैगिँग लो!
  2. Vinay
    “लेकिन बुरी मानी जाने वाली वस्तु का भी क्या सामाजिक महत्व हो सकता है? मुझे तो लगता है होता है।”
    सोचने लायक मुद्दा है. आपके स्पष्टीकरण का इन्तज़ार रहेगा. महत्व तो बेशक होता है, क्योंकि अच्छा या बुरा, असर तो होता ही है. पर हर बुरी “माने जानी वाली” वस्तु का सकारात्मक सामाजिक महत्व हो, ऐसा मुझे नहीं लगता.
    बहरहाल, एक और शानदार लेख के लिए बधाई और शुक्रिया.
  3. आशीष
    रैगिँग कुछ बुराइँया जरूर है, लेकिन उसका मजा कुछ और है. जो बाप बच्चो को जितना सताता है, उतनी ही मदद करता है, मार्गदर्शन करता है.
    १२ वी से निकलने के बाद कालेज की दुनिया काफी अलग होती है, इस दुनिया से परिचय कराती है रैगिँग.
    रैगींग किताबी दुनिया से बाहर निकाल कर यथार्थ की दुनिया मे लाती है, हर बच्चा यहीं पर कालेज के तरीके या दुनियादारी सीखता है.
    आशीष
  4. देबाशीष
    रैगिंग के शारीरिक उत्पीड़न के पक्ष ने ही इसे बदनाम किया है। मेरे कॉलेज के समय में भी दो ऐसे किस्से हुए कि लोगों का कान के पर्दे फटे और आँख भेंगी हो गई। एक बार का वाकया याद है, कॉलेज के पास ही एक स्टेडियम था, हम जूनियर भेड़ों की नाई पंक्तिबद्ध हो कर जा रहे थे। जब पहुचें तो सीनीयरों का एक समूह बारी बारी आकर बिना कुछ सवाल किये बस तमाचे जड़ चला गया। आँखे थर्ड बटन पर टंगी थी तो चेहरा तक न देख पाये। रेगिंग का यह वाकया अभी तक ज़ायका बिगाड़ देता है।
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    [...] स यूं ही गालियों का सामाजिक महत्व पिछली पोस्ट में मैंने लिखा:- “लेकिन बुरी म� [...]
  6. anitakumar
    रैगिंग का कोई व्यक्तिगत अनुभव तो नहीं है पर जो कुछ समाचार पत्रों में पढ़ा उससे तो रैगिंग के नाम से ही उबकाई आती है। लेकिन यहां पढ़ कर लगता है कि हां रैगिंग अगर आत्मियता से की जाये तो जिन्दगी की शाला में प्रवेश पाने जैसा है
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
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  8. : गालियों का सामाजिक महत्व
    [...] पिछली पोस्ट में मैंने लिखा:- [...]

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