Saturday, September 24, 2005

नैपकिन पेपर पर कविता

http://web.archive.org/web/20110101210508/http://hindini.com/fursatiya/archives/52

रात हो चुकी है। नींद मेरे ऊपर डोरे डाल रही है। मैं जाग रहा हूं यह सोचते हुये कि अब दीपक जी चाय बनाते हुये चिट्ठे का मजनून सोच रहे होंगे । विनय जैन जा चुके हैं चाय बनाने । स्वामीजी के पास कोई काम ही नहीं है लिहाजा वे बहुत व्यस्त हैं। मेरे मन में विचार उठ रहा है कि लिखूं या सो जाऊं?’लिखूं’ या ‘सो जाऊं’ के विचार कैटरीना और रीटा तूफानों की भांति मेरे मन को अमरीका बनाये हुये मथ रहे हैं।सारे ख्याल तूफान प्रभावित क्षेत्र से अमेरिकी नागरिकों की तरह पलायन कर चुके हैं। सारा आपदा प्रबंधन आपदाग्रस्त हुआ पडा़ है ।मेरा मानस पटल चिट्ठा विश्व के इंडिया कहिन हिस्से की तरह सूना पड़ा किसी विचार पौध के सर उठाने की राह देख रहा है।
बहुत दिन से विचार कर रहा था कि गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में कुछ लिखा जाये। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जहां इस विचार ने सर उठाके अंगड़ाई लेने की कोशिश की वहीं तमाम छुटभैये पवित्रता वादी स्वयंसेवक टाईप विचार-पुत्र जिनको गाली-गलौज से सख्त नफरत हैं इससे प्रेम पूर्वक कहते हैं:-
“अबे ओय धत्तन! दादा उतको मत। नहीं त माले-माले दूतों ते तांद दंदी तल देंगे। थाले यहां दाली बतता है! पता नहीं ति बहू-बेतियां भी पलती हैं इथे?”
हमने तमाम तरह से समझाने का प्रयास किया कि हम गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में लिखना चाहते हैं। इसका मतलब यह थोड़ी कि हम गालियां लिखना चाहते हैं। लेकिन वह न माना तो नहिंयै माना। उसने अपनी समझदानी ताले में बंद करके चाभी किसी गधे के सिर पर टांग दी थी जो अंतत: गायब ही हो गयी होगी।
वह आगे भी हकलाते/तुतलाते हुये बोला:-
हम थब थमधते हैं। तौनौ बेतूफ नहीं है।तुम फूत लो यहां थे पतली दली थे। नहीं तो तहूं लामू भइया आ दये तो थाली इथ्माल्तनेथ निताल देंगे।थतिया थली बिस्तला दोल तल देंदे । पतरा तल देंगें मालते-मालते ।अइसा थुलेंगे कि मालते-मालते एलगिन मिल बना के थोलेंगे। वइथे भी आद उनता मूद बहुत आफ है। तैपेलवा तुथ लिथिस है दांदुली ते थिलाफ ।
जूतों से चांद गंजी होने से बचाने के लालच में वो बेचारा मासूम विचार हमेशा दब जाता है तथा अगली बार उचकने से पहले के समय तक के लिये देबाशीष की तरह जन्मदिन मनाकर नौ-दो-ग्यारह हो जाता है।
जहां जन्मदिन की बात चली हम कान सहित खड़े हो गये। लगा कि भोपाल की तरफ से आवाज आ रही है- आपने तो फुरसतिया को जच्चा-बच्चा केंद्र बना दिया है। दे सोहर पर सोहर गा रहे हैं। ये कोई तरीका भला !
हमने कहा कि भाई अपनी दुकान पर मना रहे हैं जन्मदिन तुम्हें काहे तकलीफ हो रही है? जवाब मिला- अरे तकलीफ की बात हम नहीं कर रहे हैं लेकिन फिर भी जब हो-हल्ला होता है तो डिस्टर्बेन्स तो होता है न। बधाई के बहाने टिप्पणी लिखवाते हो हमे सब पता है। हम बोले तो तुम भी लिखवाओ न!
बताया गया -उसके लिये लिखना नहीं पड़ेगा। उतना कष्ट कौन उठाये।हम तुम्हारे भले के लिये बता रहे हैं। तीन बार जीतेन्द्र के बारे में लिखा चुका ।बाकी बहुत लोगों के बारे में कुछ नहीं ये क्या मजाक है?आडिट हो गया तो बाकी लोगों की उपेक्षा का आरोप लगेगा जवाब नहीं देते बनेगा।
हमसे सही जवाब नहीं देते बना। कारण दो थे। एक तो नींद ने जोरदार हमला बोल दिया था। हमें कुर्सी से उठाकर बिस्तर पर पटक दिया। दूसरे एक जनहितकारी समुदाय की कविता पैदा हो गयी इस आपा-धापी में। सो वह कविता सोचा जा रहा है सब साथियों को पढा़ दी जाये। सुख-दुख सदैव बांटे जाने चाहिये साथियों में। कविता अनुभूति कार्यशाला के लिये लिखी गयी। हमसे हमारी पसंदीदा कविता पूछी गयी। हमने बतायी-पुष्प की अभिलाषा। हमने सोचा कि इतने में बात खतम हो जायेगी लेकिन हमसे कहा गया कि उसी तरह की कोई कविता लिखो। सच माना जाये हमें अपने कवि न होने जितना अफसोस हुआ उतना शायद भारतीय क्रिकेट टीम को फाइनल दर फाइनल हारते नहीं हुआ होगा।
लेकिन खाली अफसोस से तो कविता नहीं लिखी जाती । कविता लिखने के लिये तो साहस चाहिये ।हमने जुटाया साहस तथा लिखी कविता।अगर सच माना जाये तो कविता एक मींटिंग में ऊंघने से बचने के लिये समोसा के साथ मिले नैपकिन पेपर पर बगल के बगल में बैठे साथी से पेन मांग कर लिखी गयी। कविता पेश है शीर्षक है अभिलाषा:-

अभिलाषा

चाहतें बहुत सी उठतीं हैं
इस मन के दृश्य पटल पर ,
कुछ तुरत लोप हो जातीं हैं
कुछ बैठी रहतीं हैं जमकर।

जो जमीं चाहते रहतीं हैं
वे बारम्बार उचकतीं हैं,
कब बहुरेंगे उनके दिन भी
उचक-उचककर कहतीं हैं।
कुछ खुद की खुशी चाहतीं हैं
कुछ कहतीं हैं जग आबाद रहे,
सबको पूरा करना मुश्किल
पहले किसको यह कौन कहे।
चाहों के इस विपुल कोश से
मैं वही चाहतें चुनता हूं ,
जिनके पूरा हो जाने से
जग सारा पुलकित होता है।
चाहता यही हूं मैं प्रभुवर
संभव हो तो ऐसा करना,
जीवन सबका खुशहाल रहे
दुनिया चहके जैसे झरना।
पूनम की पुलक चांदनी सा
जीवन में सबके उल्लास रहे,
उल्लास रहे, परिहास रहे
हर पल-क्षण सहज सुवास रहे।
हे जग-उपवन के माली जी!
हैं खिले यहां पर पुष्प अनेक,
सबको महकाने की चाहत में
मैं पुष्प रोपता हूं और एक।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “नैपकिन पेपर पर कविता”

  1. आशीष
    फुरसतिया जी,
    आपके चिठ्ठे पर निदं का असर तो साफ दिखाइ दे रहा है, आपने सुनील जी को दिपक जी बना दिया. :-)
    आशीष
  2. अनुनाद
    पण्डित जी , इ आपके नीदिये का प्रभाव है कि हास्य-गुणी “लेखवा” का विवाह शान्त रस वाली ( रस-शान्त नहीं ) “कवितवा” से करा दिये | गुण-वुण ठीक से नहीं बैठाये | वात्स्यायन जी का कहा भी भूल गये का ?
  3. आशीष
    अइयो, गलती से मिस्टेक हो गयी ! अब लग रहा है “नींद” मुझे आ रही थ :-)
    आशीष
  4. kali
    वाह ! बहुत सही लिखे रहे. काफी कुछ तो समझ आ गया, बाकी का ३-४ बार में समझ आ जाएगा. कविता बहुत बढिया रही. लिखते रहो, प्रभु समोसा-नैपकिन की ईच्छापूर्ति करते रहेंगे. टाँग खिँचाई का मौका दिया ईसी बहाने पंडित जी ने भोपाल को याद तो किया.

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