Saturday, September 03, 2005

मरना तो सबको है,जी के भी देख लें


http://web.archive.org/web/20110925232152/http://hindini.com/fursatiya/archives/39
[हिंदी चिट्ठाकारों का परिचय कराने का काम अभी तक निरंतर में बखूबी हो रहा था.फिलहाल निरंतर की निरंतरता में कुछ व्यवधान है.इसलिये चिट्ठाकारों के परिचय का काम यहां जारी रखा जा रहा है.शुरुआत हिंदी ब्लाग जगत की सक्रिय महिला चिट्ठाकार प्रत्यक्षा से की जा रही है]
प्रत्यक्षा
प्रत्यक्षा
उँगलियाँ आगे बढा कर
एक बार छू लूँ
मेरे मन के इस निपट
सुनसान तट पर
ये लहरें आती हैं
कहीं से और चलकर.

यह वह कविता थी जिससे प्रत्यक्षा ने २८ अप्रैल,२००५ को अपने चिट्ठे की शुरुआत की.
महात्मा बुद्ध की निर्वाण बोध स्थली,गया में जन्मी प्रत्यक्षा ने अपनी स्कूली पढा़ई रांची में की.अपने स्कूल ,सेक्रेड हर्ट रांची ,को याद करते हुयी बतातीं हैं:-
इस स्कूल से बहुत कुछ सीखा मैंने(बावजूद इसके कि मिशनरी स्कूल के अच्छे /खराब पहलुऒं पर खासी बहस की जा सकती है).और जो सीखा वो सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि कुछ और था जो बहुत ‘बेसिक और फन्डमेन्टल’ था. और आज मुझे लगता है कि वो जो जीवनमूल्य मैंने अपने स्कूल में रहने के दौरान पाये वो मैं अपने बच्चों को ‘पासआन’ (देना) करना चाहूंगी.
पटना से एम.ए.करने के बाद एन.टी.पी.सी.से एक्जीक्यूटिव ट्रेनी के रुप में शुरुआत की. फिलहाल पावरग्रिड कारपोरेशन गुडगांव में प्रबंधक वित्त के पदपर कार्यरत प्रत्यक्षा के पति,संतोष जी.आई.सी.में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.ग्यारह वर्ष के बेटे हर्शिल तथा सात साल की बिटिया कामायनी (जिसे प्यार से पाखी कहकर पुकारती हैं)की मां प्रत्यक्षा ने अपने ब्लाग सफर के शुरुआत की दास्तान बताते हुये लिखा हैं:-
हिन्दी में लिखना लगभग छूट सा गया था.स्कूल और कालेज के बाद हिन्दी में सिर्फ पढ ही रही थी.पत्र वगैरह भी लिखना कम हो गया था.फोन से सब काम चल रहे थे.फिर नेट का ज़माना शुरु हुआ.तब रोमन में हिन्दी लिख कर मन बहला लिया करते थे.पढने का जो कीडा कुलबुलाया करता उसने मज़बूर किया गूगल के शरण में जाकर हिन्दी पत्रिका खोजने के लिये.सफलता मिली साथ में अभिव्यक्ति और अनुभूति को पढने का चस्का भी.फिर गाहे बगाहे पढते रहे.पहली कहानी अभिव्यक्ति के “माटी के गंध ” मे चुनी गई और छपी.फिर अनुभूति पर समस्यापूर्ति में कवितायें लिखना शुरु किया.और जैसा सब जानते हैं.ये छूत की बीमारी एक बार जो लगी सो ऐसे ही छूटती नहीं.तो बस हाजिर हैं हम भी यहाँ.इस हिन्दी चिट्ठों की दुनिया में.
वित्तीय आंकड़ों तथा रचनात्मकता के साथ तारतम्य बिठाने की कोशिश में लगातार लगी प्रत्यक्षा को रंगों का खेल अच्छा लगता है तथा ख्वाहिश है कि:-
कभी भविष्य में, ऐसा सोच रखा है कि कैन वस पर रंग बिखेरना और चाक पर मिट्टी के घडे बनाना सीखूँगी…
संगीते में रुचि कुछ के बारे में कहती हैं:-
संगीत सुनना बहुत सुकून देता है.कुमार गंधर्व के निर्गुण भजन,लता मंगेशकर की हृदयनाथ के निर्देशन में गायी मीरा भजन, भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, मल्लिकार्जुन मंसूर्, बेगम अख्तर, मेंहदी हसन, मलिका पुखराज, आबिदा रवीन,बीटलस, साइमन गार्फंकल……सब बहुत भाते हैं.
आध्यात्म जीवन का एक पहलू है…धर्म किसी जरूरतमन्द की मदद है……इस प्रक्रिया में हूँ कि जीवन का ताना बाना कुछ ऐसा हो ….जिसमें मानसिक सुकून जरूर हो
पसंदीदा लेखकों के बारे में बताते हुये कहती हैं:-
पढना बहुत अच्छा लगता है.खासतौर पर महिला लेखकों को.कुर्र्तुलएन हैदर, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, यशपाल,टामस हार्डी, माम, जेन औस्टेन,ली हार्पर्.लिस्ट लम्बी है बचपन से लेकर पढती आई हूँ.कई ,उम्र के पहले…कुछ बाद भी..ये यात्रा अनवरत चल रही है
मरना तो सबको है,जी के भी देख लें को जीवन का मोटो मानने वाली प्रत्यक्षा की नींद में भी कोई आता है तो उसकी खुशबू कविता में आ जाती है:-
रात भर ये मोगरे की
खुशबू कैसी थी
अच्छा ! तो तुम आये थे
नींदों में मेरे ?

इनकी हंसी के तार उनकी हंसीके रिमोट से जुड़े हैं:-

अचानक
मैं बेसाख्ता यूँ ही
हँस देती हूँ
शायद
तुम भी कहीं मुझे याद कर
हँस रहे होगे.

प्रत्यक्षा कामानना है -खामोशी का एक सुकून होता है, खामोशी की एक आवाज़ भी होती है.
प्रत्यक्षा की शब्दों की बाजीगरी अनायास भवानीप्रसाद मिश्र की कविता गीत फरोश की याद दिलाती है.
पढना बहुत अच्छा लगता है.खासतौर परमहिला लेखकों को.कुर्र्तुलएन हैदर, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, यशपाल,टामस हार्डी, माम, जेन औस्टेन,ली हार्पर्.लिस्ट लम्बी है
प्रत्यक्षा की कविता में लड़कियां सिर्फ आंखों से बोलती है:-
मेरे अन्दर छिपी है
एक खामोश चुप लड़की
जो सिर्फ आंखों से बोलती है.

उसके गालों के गड्डे बतियाते हैं,
उसके होंठों का तिल मुस्काता है
उसकी उंगलिया खींचतीं हैं
हवा में तस्वीर ,बातों की.

खामोशी की आवाज में सरसराहट सुनने वाली,यादों में की खुशबुऒं में डूबने वाली प्रत्यक्षा कीकहानियों का खास पॆटर्न् है.इनकी कहानियों की नायिकायें आमतौर पर नायक के बेपनाह प्यार को हासिल करने के बाद अलगाव की त्रासदी की शिकार होती हैं.कारण कभी मतलबी विकल्प होते हैं कभी बेहद छोटे दिखने वाले अहम.पर नायिकायें कमजोर नहीं हैं वे आमतौर पर नायक को मुक्त,माफ करके बडप्पन का इजहार करती हैं.
प्रत्यक्षा इस बात पर लगभग डराते हुये कहतीं हैं:-

अब देखिये..हम लिखते हैं एक धांसू सा …दुखी प्रतडित पुरुष की कहानी…फिर देखते हैं आप एक पैटर्न वाली कहनियों का इलज़ाम कैसे नहीं हटाते.

कुछ तुम लिखो,कुछ हम कहें के अन्दाज में प्रत्यक्षा जिन कविताऒं को पसंद करती हैं उनमें कुछ अपनी तरफ से भी जोड़ती रहती हैं-चाहे वो फिर फुरसतिया के हायकू हों अनूप भार्गव की नज़्म या फिर साथी ब्लागर भी इनकी इस रुचि में बराबर सहयोग करते हैं तथा इनकी कविता की जमीन पर अपनी पोस्ट का तंबू तानते रहते हैं.कविता-प्रतिकविता को जारी रखने का श्रेय प्रत्यक्षा को दिया जा सकता है.
मेरे अन्दर छिपी है,एक खामोश चुप लड़की
जो सिर्फ आंखों से बोलती है.
बूंद-बूंद से घड़ा भरता है शायद यही बताना चाहती हैं प्रत्यक्षा जब वे अपने लेख,टिप्प्णियों में ….,…., बिंदुओं की फौज इस्तेमाल करती हैं.पहले इसका कापी राइट
जीतेन्दर के पास था.अब पता नहीं क्यों जीतेन्द्र की बिंदियां कम हो रही हैं.
अपनी सोच के बारे में बताते हुये प्रत्यक्षा कहती हैं:-
जो चीजें इंद्रियों को भली लगे..कोशिश करती हूँ..ऐसी चीजों को सहेजूँ…आध्यात्म जीवन का एक पहलू है…धर्म किसी जरूरतमन्द की मदद है……इस प्रक्रिया में हूँ कि जीवन का ताना बाना कुछ ऐसा हो ….जिसमें मानसिक सुकून जरूर हो….लिखना इसी प्रक्रिया का पहला कदम है…
यह पहला कदम निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहे यही हमारी मंगलकामना है.

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

18 responses to “मरना तो सबको है,जी के भी देख लें”

  1. Sunil
    अनूप, प्रत्यक्षा जी की इस प्रस्तुति के लिए बहुत धन्यवाद. कई बार उनसे ईमेल के द्वारा तो बात हुई थी इसलिए उनके बारे में और जानकारी पा कर बहुत अच्छा लगा. चिट्ठों से, कविताओं और कहानियों से लेखक के अपने बारे में धीरे धीरे जानने को मिलता है और शायद इस तरह पूरी तरह से जानना तो नामुमकिन है. धन्यवाद. सुनील
  2. Dr.jagdish vyom
    आप काफी रोचक शैली में लिख रहे हैं। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। प्रत्यक्षा जी का परिचय रुचिकर है।
    इसे मैँ नियमित देखूँगा। -डॉ॰ व्योम
  3. फ़ुरसतिया » जन्मदिन के बहाने जीतेन्दर की याद
    [...] ��तेन्दर की याद [जब से जीतेन्द्र ने प्रत्यक्षा का परिचय पढा़ तब से नहा धो के प� [...]
  4. प्रत्यक्षा
    और कुछ कहूँ उसके पहले ये कि बिंदियाँ जितेन्द्रजी का साथ छोड गईं,सब मेरे पास जो आ गईं .
    अब भई इनके कापी राईट आपने मुझे दे दिये तो इन्हें संभाल कर रखना भी तो पडेगा (देखिये यहाँ एक भी नहीं ):-)
    शुक्रिया अनूप रोचक परिचय , मंगलकामना और कापीराईट के लिये
    .प्रत्यक्षा
  5. Bhola Nath Upadhyay
    भाई साहब,
    बन्दा गोविन्द जी का छोटा भाई है | उनके शुरुआती लेखन के दिनों में मैं ऊनका प्रूफ रीडर हुआ करता था | काम था हिज़्ज़ों की गलतियं सुधारना | बदले में नयी कहानी फ्री में पढने को मिल जाती थीं | ाआदतन अभी भी ध्यान गलतियों पर चला ही जाता है| प्रत्यक्षा जी के परिचय में “महात्मा बुद्ध की निर्वाण स्थली,गया” लिखा है | क्षमा सहित बताना चाहता हूं कि बुद्ध कि निर्वाण (मृत्यु)स्थली कुशीनगर है |ागर मैं सही हूं तो बदले में एक नई कहानी का पुरस्कार चाहूंगा |
  6. फ़ुरसतिया » देबाशीष-बेचैन रुह का परिंदा
    [...] ाशीष-बेचैन रुह का परिंदा [अब जब हम अपने दो साथियों का परिचय दे ही चुके तो सोच [...]
  7. Bhola Nath Upadhyay
    भाई साहब,
    सरकारी महकमों में अभी भी कुछ नें आत्माएं हैं जो आलोचनाओं के बदले पुरस्कार दे सकतीं हैं, यह जानकर आत्मिक सन्तोष होता है | शायद देश धीमा ही सही उन्नति तो कर ही रहा है |फिलहाल तो मै आपका ही लेख क पुरस्कार चहूंगा क्योंकि आपके बिन्दास लेखन का में ” बेतकल्लुफी” का जो भाव होता है वो वास्तव मे सम्मोहित करने वल्ल है| हां बोनस में हो सके तो प्रत्यक्षा जी की कहानी भी | वैसे भी मैने अभी तक उन्हें पढा नहीं है |
  8. फ़ुरसतिया » आवारा पन्ने,जिंदगी से–गोविंद उपाध्याय
    [...] ाय [प्रत्यक्षाजी के बारे में लिखे परिचयात्मक लेख में कथाकार गोविंद उपाध्या [...]
  9. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » बड़े भाई साहब को जन्मदिन मुबारक हो!
    [...] ेष्ठ आलोचक हैं अनूप भाई। आजकल सारे चिठ्ठाकारो का अवलोकन चल रहा है फुरसतिया प [...]
  10. फ़ुरसतिया » संगति की गति
    [...] ��म्हा के पास भी नहीं है। कौवा बोला- जैसा करेंगे वैसा भरेंगे। ये कम थोड़ी हैं । [...]
  11. गिरीश कुमार
    आपको साहित्‍य और आध्‍यात्‍म के क्षेत्र में देखकर बहुत अच्‍छा लगा ।
    गिरीश कुमार, पावरग्रिड, गुड़गांव,
  12. फ़ुरसतिया » हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती
    [...] �। ये तो अब पता चला कि प्रत्यक्षाजी पैदाइश भी गया की ही हैं। तब पता होता तो साथ [...]
  13. फुरसतिया » अपनी फोटो भेजिये न!
    [...] हमारे कुछ फरमाइशी पाठक भी हैं। इनमें सबसे पहले आये भोला नाथ उपाध्याय। वे चुपचाप हमारे लेख पढ़ते रहे। एक लेख में गलती पकड़ लिये तो टिपियाये और अपने बारे में बताये। हमने अपने सजग पाठक की सजगता का इनाम दिया और उनके भैया गोविन्द उपाध्याय के लगातार तीन संस्मरण उनको पढ़वाये। गोविंद जी सालों पहले अपने लिखना-पढ़ना छोड़ चुके थे लेकिन हमारी संगति में वे फिर से इस जंजाल में आ फंसे। अब हालत यह है कि महीने में चार-पांच कहानियां घसीट देते हैं। बाकायदा चार्ट बना रखा है कि कौन कहानी कहां भेजी,कहां से वापस आयी, किस अंक में कौन सी छप रही है। इसे मैं अपने ब्लागिंग की एक उपल्ब्धि मानता हूं कि इसके चलते एक स्थापित कहानीकार में दुबारा लिखने की ललक जगी। [...]
  14. फुरसतिया » प्रत्यक्षा-जन्मदिन मुबारक
    [...] प्रत्यक्षा की कहानी सूचनाPopularity: unranked [?]Share This (No Ratings Yet)  Loading …  [...]
  15. …सही बात पर स्टैंड भी लेना चाहिये-प्रत्यक्षा
    [...] यह भी पढ़ें:- १.मरना तो सबको है,जी के भी देख लें २. प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने [...]
  16. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.मरना तो सबको है,जी के भी देख लें 2. सतगुरु की महिमा अनत 3.मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक 4.जन्मदिन के बहाने जीतेन्दर की याद 5.हम घिरे हैं पर बवालों से 6.देबाशीष-बेचैन रुह का परिंदा 7.आवारा पन्ने,जिंदगी से–गोविंद उपाध्याय 8.आवारा पन्ने,जिंदगी से(भाग दो) – गोविंद उपाध्याय 9.आवारा पन्ने,जिंदगी से(भाग तीन) 10.संगति की गति 11.आओ बैठें ,कुछ देर साथ में 12.राजेश कुमार सिंह -सिकरी वाया बबुरी 13.नैपकिन पेपर पर कविता 14.सैर कर दुनिया की गाफिल 15.नयी दुनिया में 16.हम तो बांस हैं-जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे [...]
  17. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 1.मरना तो सबको है,जी के भी देख लें 2. सतगुरु की महिमा अनत 3.मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक 4.जन्मदिन के बहाने जीतेन्दर की याद 5.हम घिरे हैं पर बवालों से 6.देबाशीष-बेचैन रुह का परिंदा 7.आवारा पन्ने,जिंदगी से–गोविंद उपाध्याय 8.आवारा पन्ने,जिंदगी से(भाग दो) – गोविंद उपाध्याय 9.आवारा पन्ने,जिंदगी से(भाग तीन) 10.संगति की गति 11.आओ बैठें ,कुछ देर साथ में 12.राजेश कुमार सिंह -सिकरी वाया बबुरी 13.नैपकिन पेपर पर कविता 14.सैर कर दुनिया की गाफिल 15.नयी दुनिया में 16.हम तो बांस हैं-जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे [...]

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