Sunday, November 20, 2005

बड़े तेज चैनेल हैं…

http://web.archive.org/web/20110101185823/http://hindini.com/fursatiya/archives/66
बड़े तेज चैनेल हैं…


पत्रकार एक सनसनीखेज प्राणी होता है। वह सनसनी ओढ़ता है,सनसनी बिछाता है। सनसनाते हुये सांस लेता है सनसनाते हुये छोड़ता है। पत्रकार के जीवन से अगर सनसनी निकाल ले तो वह परकटे पक्षी की मानिंद असहाय हो जाता है।
पिछले कुछ दिनों से मैं अपने देश की पत्रकारिता का अंदाज पकड़ने का प्रयास कर रहा हूं। इस सिलसिले में कुछ एकदम ताजे से अनुभव जो याद आ रहे हैं वे प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
करवाचौथ के दिन जब पूरे भारत देश की हिंदू महिलायें अपने पति के दीर्घायु होने की कामना में निर्जला व्रत रखें थीं तथा अमेरिका में स्वामीजी श्रीमती अतुल अरोरा से पहलीबार प्रेमपूर्वक बतियाते हुये प्यारे देवर का दर्जा पाने के लिये पसीना बहा रहा थे उसी दिन स्वामीजी के गृहराज्य मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में एक व्यक्ति को देश के सारे प्रमुख टीवी चैनेलों ने घेर रखा था। उसके बारे में बार-बार सूचनायें प्रसारित हो रही थीं। उसने घोषणा कर रखी कि उस दिन शाम को पांच बजे उसकी मौत हो जायेगी। शाम तक पूरा देश टकटकी लगाये उसके बारे में समाचार देखता रहा।
बेरोजगारी,बलात्कार,भ्रष्टाचार की तमाम नियमित खबरों को ज्योतिष के चमत्कार ने किनारे कर दिया। जितने आत्मविश्वास से वह व्यक्ति अपने मरने की घोषणा कर रहा था उतने आत्मविश्वास से बहुतेरे लोग अपना नाम तक नहीं बता पाते।
विशेषज्ञों के भी बयान होते जा रहे थे। क्या आपको सच में लगता है कि आप मर जायेंगे? कैसा लग रहा है मरते हुये? मरने के बाद क्या करेंगे? इस तरह के तमाम सवाल भी पूछे जा रहे थे। शाम को ‘काउन्टडाउन’ शुरु हुआ। पांच बज गये। वह व्यक्ति नहीं मरा। लोगों ने सोचा कि शायद उनकी घड़ियां गलत हों लिहाजा लोगों ने कुछ देर और इंतजार किया। इसके बावजूद भी जब वह नहीं मरा तो टीवी चैनेल वाले उसे जिंदा छोड़कर दूसरे कार्यक्रम कवर करने चले गये। दिन भर की सनसनी का क्रेन्द्र बना वह व्यक्ति टीवी चैनेलों के लिये अचानक गन्ने की चुसी हुई गंडेरी हो गया।
देश के करोड़ों लोगों के अरबों घंटे बरबाद करके सारे चैनेल बिना किसी अपराध बोध के दूसरे कार्यक्रमों में मशगूल हो गये। किसी चैनेल ने इस मनोवृत्ति पर चर्चा करने में समय बरबाद करना उचित नहीं माना। ज्योतिष में विश्वास रखने वाले शायद कहेंगे कि कुंडली गलत बनी होगी। अविश्वास करने वाले कहेंगे यह सब बकवास है। तमाम लोग बीच की स्थिति में रहेंगे।
लेकिन यह सोचने की बात है कि जो देश एक आदमी के मरने की भविष्यवाणी के सही-गलत ठहरने की बात का सच जानने के लिये करोड़ों घंटे बरवाद कर दे तथा भविष्यवाणी गलत साबित होने पर उस बारे में सोचे तक नहीं ,चर्चा तक न करे वह देश कैसे आगे बढ़ेगा?
ऐन दीवाली के पहले धनतेरस के दिन दिल्ली में कुछ आतंकवादियों ने विस्फोट किये। दिल्ली दहल उठी। मैं टेलीविजन देख रहा था। एक चैनेल में उसका संवाददाता विस्फोट की ‘रनिंग कमेंट्री’ कर रहा था। उसके एक कान में मोबाइल चिपका था। दूसरे हाथ में कैमरा माइक था। वह घायलों को सीधे दिखा रहा था। हर क्षण अगल-बगल वाले से पूछताछ करते हुये मृतकों – घायलों की संख्या तुरंत घोषित करता जा रहा था। बिना किसी दुविधा के यह संख्या गलत भी हो सकती है। उसके बयान जो मुझे याद हैं:-
ये आप देख रहे हैं यहां धमाके हुये। अभी तक २० लोग मर चुके हैं। ४० घायल हो चुके हैं। क्या कह रहे हैं? तीस लोग मरे हैं? अच्छा पैंतीस और घायल ६० लोग हुये हैं। यह संख्या अभी और बढ़नी चाहिये।जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है मृतकों-घायलों की संख्या बढ़ रही है।अभी तक ४० लोग मर चुके हैं ७० लोग घायल हुये हैं।अभी तक इस घटना की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है।
संवाददाता के चेहरे पर दुर्धटना के चलते किसी उदासी की छाया नहीं है। उल्टे आवाज में घटना के सबसे पहले प्रसारण का आत्मविश्वास चमक रहा था। वह तीसरे अंपायर की तरह इधर-उधर भागते हुये कमेंटरी में पसीना बहा रहा था।वह वीर बालक वीर रस के कवि की तरह सनसना रहा था। सनसनी दिखा रहा था। सनसनी का क्लोज अप दिखा रहा था। उसके चेहरे पर गर्व का भाव था वह सबसे पहले इसे दिखा रहा था।
घटना की किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली” सुनकर लगता है कि ये लोग किसी आतंकवादी गुट से संपर्क करते होंगे-
यार, तुमने बहुत दिन से कोई जिम्मेदारी का काम नहीं किया। इसकी जिम्मेदारी ले लो। वह कहता होगा- भइया पुरानी ही जिम्मेदारी नहीं पूरी कर पाये हैं। ये नई कैसे लेलें। दूसरे गुट के लोग भी कुछ ऐसा ही कहते होंगे – क्या सारी जिम्मेदारी हमी लेंगे? किसी और को भी दो कुछ!
सवाल-जवाब भी मजेदार होते हैं। पहले से तय सा होता है कि सवाल ऐसे किये जायें कि बताने वाला हड़बड़ाकर उसी निष्कर्ष पर पहुंच जाये जिस पर वे पहले ही पहुंच चुके हैं।
दिल्ली दुर्धटना के बाद दीवाली वाले दिन संवाददाता लोगों से सवाल-जवाब कर रहा था-
सवाल-इस दुर्घटना के बाद अब दो दिन बाद कैसा महसूस कर रही हैं?
जवाब-बहुत खराब लग रहा है। जिसका इतना अच्छा पड़ोसी मारा गया हो वह अच्छा कैसे महसूस कर सकता है?
सवाल:- दीवाली कैसे मनायेंगीं? क्या पटाखे छुटायेंगी?
जवाब:- पटाखे की हमारी उम्र कहां रहीं? और अच्छा भी नहीं लगता दुख के माहौल में यह सब कुछ। बस खाली पूजा कर लेंगे। बच्चे हैं वे कुछ करेंगे कैसे रोकें उन्हें?
सवाल:-आपको क्या लगता है कि ये काम किन लोगों ने किया होगा?
जवाब- जिन लोगों ने भी किया वे बहुत खराब लोग हैं। पता नहीं क्या मिलता है उन्हें ऐसा करके? पता नहीं क्यों करते हैं वे ऐसा।
पत्रकार इस तरह के तीन-चार इंटरव्यू लेकर निष्कर्ष देता है:-
इस तरह आपने देखा कि दिल्लीवालों के हौसले आतंकवादियों की नापाक हरकतों से पस्त नहीं हुये हैं। दो दिन पहले हुये विस्फोटों से सहमी दिल्ली धीरे-धीरे अपनी लय में लौट रही है। दिल्ली के लोगों ने दिखा दिया है कि उनमें भाईचारे,उत्साह का कितना जज्बा है। शायद इसीलिये इसे दिल वालों की नगरी कहते हैं – नई दिल्ली के चांदनी चौक इलाके से कैमरामैन अलाने के साथ मैं फलाने।
ये निष्कर्ष श्रीमान फलाने लोगों से बातचीत के बाद नहीं निकालते। पहले से तय निष्कर्ष के अनुरूप जवाब पाने के लिये कवायद करते हैं। यह जड़ से फुनगी की स्वाभाविक यात्रा के उलट फुनगी से जड़ की यात्रा है। अंग्रेजी में इसे ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ कहते हैं। उल्टी यात्रा।
हर चैनेल खबर को सबसे पहले दिखाना चाहता है। सच दिखाना उतना जरूरी नहीं जितना अहम है सबसे पहले दिखाना। कभी-कभी तो चैनेल इतने तेज होते हैं कि खबरें प्रसारित होने के बाद घटती हैं। भूतपूर्व राष्ट्रपति की मृत्यु की सूचना भी किसी चैनेल ने पहले से ही दे दी। ‘काल करे सो आजकर आजकरे सो अब’।
आज सूचना ताकत बन गई है। समाचार चैनेलों की संख्या बढ़ती जा रही है। उनके लिये संवाददाता का चुनाव लोग शकल देख कर करते हैं। अच्छी शकल और आवाज वाले लोग भर्ती किये जा रहे हैं। समाचार की संवेदनशीलता ,भाषा पर पकड़ तो आ ही जाता है सोचकर भर्ती किये गये लोग जो भाषा बोलते हैं वो सुनकर कभी-कभी लगता है कि किस लोक के लोग हैं ये लोग जो ऐसी समझ में आने वाली भाषा बोल लेते हैं।
समाचारों का सबसे त्रासद पहलू यह हो रहा है कि उससे विचार नदारद हो रहा है। व्यक्तिगत ऊलजलूलपन समाज के सरोकारों से ज्यादा अहम है। महिलायें क्यों बाध्य हों करवाचौथ का व्रत रखने के लिये इस बात पर बहस के बजाय सारे देश को मजबूर किया जाता है कि एक अदद आदमी नियत समय पर मरता है कि नहीं। सारे देश की महिलाओं की जिंदगी के मुकाबले एक आदमी की मौत का तमाशा ज्यादा महत्वपूर्ण है।
यह सलाह फिजूल है कि उस आदमी की सारे दिन की रिकार्डिंग करके जरूरी होता तो बाद में दिखा देते। बाद में सनसनी कहां से लाते?
सानिया मिर्जा नई सनसनी हैं। उसकी अपनी जिंदगी है? वह टेनिस खेलती है। खूबसूरत है। कायदे से जवान भी नहीं हुई । टेनिस खेलने के अलावा शरमाने-इठलाने के दौर से गुजर रही उस लड़की से यह पूछना क्या मायने रखता है कि विवाहपूर्व यौन संबंध जायज है या नाजायज। क्या लोग विवाह पूर्व यौन संबंध सर्वे रिपोर्ट देखकर बनाते हैं? पता नहीं किन हालात में इस तरह के इंटरव्यू होते हैं कि सनसनी के छौंक के बिना काम ही नहीं चलता ।
टीवी पत्रकारिता अभी शुरुआती दौर से गुजर रही है। जिस तरह वाई२के के दौर में जो भी बच्चे मानीटर के सामने की बोर्ड पर हाथ रखे बरामद हुये वे अमेरिका भेज दिये गये उसी तरह हर चिकना-चुपड़ा बेरोजगार चेहरा मीडिया में धंस रहा है। जिस तरह कम्पयूटर में प्रोसेसर ,मानीटर तथा की बोर्ड के मुकाबले कम अहमनहीं होता वैसे ही शायद मीडिया को भी कुछ दिन बाद पता चले कि पत्रकारिता के लिये खूबसूरत शकल,स्मार्टनेस से भी ज्यादा जरूरी है संवेदना तथा भाषा पर पकड़।
क्या पता जिस दिन पता चले भी तो दूसरी कोई सनसनी इस खबर को नेपथ्य में डाल दे!
मेरी पसंद
अगर तू इश्क में बरबाद नहीं हो सकता,
जा तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता।
दिल के सहरा में कोई फूल खिला दीवाने
वर्ना ये शहर तो आबाद नहीं हो सकता ।
टूटना मेरा मुकद्दर है कि मैं शीशा हूं
और शीशा कभी फौलाद नहीं हो सकता।
मेरी आवाज तो मुमकिन है दबा दी जाये,
मेरा लहजा कभी फरियाद नहीं हो सकता।
मैं तुझे भूल भी जाऊं तो यकीं है मुझको,
तू मेरी फिक्र से आजाद नहीं हो सकता।
-स्व.वाली असी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “बड़े तेज चैनेल हैं…”

  1. अनाम
    बहुत ही सही बात पकड़ी है आपने। और बहुत ही अच्छे शब्दों में लिखा है। भारत की मीडिया भी बरबाद होती जा रही है।
  2. सुनील
    अनूप जी, बहुत अच्छा लिखा है और सही बात भी. हालाँकि आप ने बात टेलीविजन पत्रकारिता की है, पर आजकल के अखबार वाले भी समाचार देने के बजाय सनसनी खोजने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. किसी दुर्घटना से सीधा टेलीकास्ट करके, मृत्य लोगों के परिवारों से बेहूदे सवाल करना, देख कर घिन्न आती है.
    सुनील
  3. Manoshi
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। आपकी पसंद की शायरी भी बहुत पसंद आयी।
  4. जीतू
    आजकल तो सारे चैनल वाले, सत्यकथा और मनोहर कहानिया या कहो…गरम कहानियाँ के टीवी एडीशन हो गये है। क्या वो जमाना था, टीवी बालाएं अपना पल्लू सम्भालते हुए ख़बरे पढती थी, खबर अधूरी रह जाये लेकिन पल्लू नीचे नही गिरना चाहिये, आजकल तो पल्लू नाम की चीज ही नही रही। अभी पिछले दिनो पढ रहे थे, रुस मे एक चैनेल पर खबरे पढने वाली लड़की, खबरे पढते पढते एक एक करके अपने कपड़े उतारती जाती है। लगता है भारत मे भी वो दिन जल्द ही आने वाला है। न्यूज चैनेलों की भाषा कितनी गन्दी हो गयी है इसका उदाहरण स्टार न्यूज देखकल लगाया जा सकता है। और एक्सक्लूसिव का चस्का इतना चढा हुआ है कि कल को शायद ये लोग क्राइम भी खुद करवा कर, सबसे पहले खबरे दें दें। हम तो बस इतना ही कहेंगे

    “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान…कितना बदल गया इन्सान”

  5. Nitin Bagla
    हिन्दी चिट्ठाकारों में कई लोग मीडिया(दृश्य एवं श्रव्य दोनों)से जुडे हुए हैं…इस मुद्दे पर उनके विचार जानना दिलचस्प होगा…(भविष्य में अनुगूंज का विषय भी बन सकती है)
  6. shwetank
    Aap meri deewaanagi ho
  7. निधि
    आपके पुराने लेख पढ़ रही थी । इस वाले के साथ चिट्ठे पर टिप्पणी वाली प्रविष्टी (सुभाषित) भी पढ़ी । आनंद आ गया ।

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