Monday, July 14, 2014

अम्मा घर की रौनक थीं





सुबह जब भी उठते हैं अम्मा की याद आती है। यह सोचकर मन उदास हो जाता कि वे अब नहीं रहीं।

मुनव्वर राना का शेर है:

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई ,
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई

हमारे यहां घर या मकान तो था नहीं। अलबत्ता हमारी शादी के बाद मां अधिकतर समय हमारे साथ ही रहीं। हमारे परिवार में तीन बेटियां हैं। दो बड़े भाई की, एक बीच वाले भाई की। बड़े भाई आर्थिक रूप से कमजोर थे। अम्मा जब हमारे साथ आईं रहने तो बडे भाई की बिटिया स्वाती को अपने साथ लेकर आईं। मतलब सब भाइयों के हिस्से एक बेटी। स्वाती हमारी ऐसी बेटी बनी कि पूछो मती। अपनी आंटी को लेकर उसका अधिकार भाव इतना तगड़ा रहा है कि अपने सामने वह उनके साथ किसी दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाती- आंटी के पति को भी नहीं। उसके चलते घर में सबसे छोटा होने के बावजूद कन्यादान का मौका सबसे पहले मुझे मिला।

अम्मा कहतीं थीं -"गुड्डो (हमारी श्रीमती) न होतीं तो हम इतने दिन जिन्दा न रहते।"

गुड्डो कहतीं -"अम्मा जी से ही घर में रौनक है।"

सास-बहू के सम्बन्ध अद्भुत रहे। बहू जब तक घर लौट के नहीं आती थी सास (दिन में)खाना नहीं खाती थीं।बहू आएगी। खाना लगाएगी। तब दोनों साथ खायेंगी।

हम जब घर में होते तो अम्मा चाय हम दोनों के लिए कमरे में धर देतीं।लेकिन बहू अकेली होती तो उसको अपनी चाय किचन से लानी होती। बेटे के लिये अम्मा खुले आम पक्षपाती थीं। जब हम कानपुर जाते तो अम्मा हमारी पसंद की तमाम चीजें बनातीं। उनकी इस मामले में सब मौज लेते- "बेटा आया है। देखना है बेटे के लिए क्या बनेगा आज।"

मेरी चाय की मात्रा अक्सर ज्यादा हो जाती तो पाबंदी लगती। लेकिन जब हमारी चाय के लिए सब लोग (अम्मा सहित) मना कर चुके होते तो कभी-कभी अम्मा अपनी खिंचाई कि परवाह न करते हुए किचन जाकर हमारे लिए चाय बना आतीं और गुप्त सूचना दे देतीं हमें-"चाय धरी है कप माँ। उठा लाव।"

अम्मा अपनी बहू के लिए अक्सर माँ में बदल जाती। रात 11 बजे जगाकर गुड्डो को ठंडा दूध पिलाती। जब कभी बहू को माइग्रेंन होता तो उसका सर दबाती। जब बहू को व्रत रहना होता तो अपना पूजा का कार्यक्रम करते हुये भी उसके नाश्ते की व्यवस्था करतीं। कोशिश करतीं बहू बिना नाश्ता किये स्कूल न जा पाये।

बहू भी सास को हमेशा चकाचक रखतीं। अम्मा को कहीं जाना होता तो उनको तैयार करतीं। एकदम फिट करके भेजती। बहू को हमेशा इस बात की चिंता रहती थी कि उसकी सास की कोई तमन्ना अधूरी न रह जाए। इस मामले में हमारे परिवार के सब लोग घामड़ सरीखे रहे। हम यह महसूस ही नहीं कर पाते कि एक बुजुर्ग हो चुकी स्त्री की भी कुछ तमन्नायें हो सकती हैं। सबसे पहले हरगांव में उनके लिये दांत बनवाये। अम्मा के लिए सोने की चेन,पायल,कील और न जाने क्या-क्या इस पराये घर की लड़की ने अपनी कमाई से ख़रीदे। बाहर जाते समय हम उनकी सेहत के चलते उनको साथ ले जाने में हिचकते लेकिन उनकी बहू कहती-"नहीं अम्मा जी साथ चलेंगी।" दो महीने पहले हम सब साथ पिक्चर गए थे। अम्मा को लगभग उठा-उठाकर एस्केलेटर से ले गये।


वैसे तो अम्मा खुश -खुश ही रहतीं। लेकिन कभी-कभी कोई बात हो जाती तो चुप हो जातीं। नरसिंम्हा राव जी की तरह मुंह फ़ुला कर बिस्तर पर बैठ जातीं। मैं घर में होता तो तुरन्त ही उनको हिला-डुलाकर, बतियाकर उनका अबोला खतम कर देता। हमारे न रहने पर अबोला कुछ खिंचता। हद से हद एकाध दिन। लेकिन फ़ौरन हमें बताया जाता -"अम्मा बोल नहीं रहीं आज।" फ़िर फ़ोन पर वार्ता होती बहाने से। मजे की बात कि हर बार वे अपनी ही गलती मानकर बात खतम करतीं- "हम बहुत सोचते हैं कि ऐसा न हो लेकिन अपनी बेवकूफ़त में मूर्खता कर देेते हैं।" उनके इस डायलाग का इलाज उनको प्यार करके, हिला-डुलाकर हो जाता। वे फ़िर मुस्कराने लगतीं। घर मे फ़िर रौनक लौट आती।

अम्मा को सेहत के चलते मेहनत के काम करने की सख्त मनाही सी थी। लेकिन वे क्लास के शरारती बच्चों की तरह अक्सर ही अनुशासन भंग करती पायी जातीं। कभी बाथरूम में अकेले कपडे धोने लगतीं। कभी कहीं सफ़ाई करने लगतीं। कभी कुछ और। अभी कुछ ही दिन पहले जबकि उनको चलना-फ़िरना तक मुश्किल था अम्मा की बहू को ऐसे ही किचन की तरफ़ जाना हुआ। देखा कि अम्मा किचन प्लेटफ़ार्म पर चढी कुछ सफ़ाई कर रहीं थीं। बहू यह देखकर सन्न रह गयीं। कहा-" अम्माजी आप यह क्या कर रही हैं। मैं अभी इनको बताती हूं।" यह सुनते ही अम्मा सट्ट से किचन प्लेटफ़ार्म से नीचे उतरकर चप्पल समेटकर चल दीं।

यह बात श्रीमती जी ने तीन दिन पहले बताई जब मैंने कानपुर से आते हुये कहा-" आज पहली बार अम्मा के बिना घर से जा रहे हैं।" इस पर उन्होंने इस घटना के बारे में बताया और उस दिन के फ़ोटो भी दिखाये जो उन्होंने खींच लिये थे। फ़ोटो देखकर और यह सोचकर कि अम्मा हमारे नाम से इतना डरतीं थी कि प्लेटफ़ार्म से फ़ौरन नीचे आ गयीं हम लोग बहुत देर तक हंसते रहे।

आज अकेले में यह सब सोचकर रोना आ रहा है।

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