Saturday, March 04, 2017

झाड़े रहो कलट्टरगंज -3


इसके पहले का किस्सा बांचने के लिये इधर आइये:
अहाते के अन्दर घुसते ही मंडी का नजारा दिखा। पल्लेदार बोरे में सिंघाड़े लादे इधर से उधर कर रहे थे। कोई गोदाम से लादकर बाहर खुल्ले में पलट रहा था। कोई बिके हुये माल को उठाकर ले जा रहा था।
पीठ पर बोरा लादे बदन झुकाये पल्लेदार को देखते ही दुष्यन्त कुमार का शेर याद आया:
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
लगता है दुष्यन्त जी ने यह शेर किसी पल्लेदार को देखकर ही लिखा होगा।
भूरे रंग के सिंघाड़े देखकर लगा कि मानो कत्था बिक रहा हो। एक बार पता लग गया फ़िर भी कई बार यही एहसास हुआ कि कत्थे के ढेर लगे हुये हैं।
वहीं घुसते ही कुछ लोग बोरे के आसनों पर बैठे दिखे। कोई ऊंघ रहा था। कोई चिलम सुलगा रहा था। हमारे हाथ में कैमरा देखकर चिलम वाले ने थोड़ा संकोच सा किया। लेकिन जैसे ही हम बतियाने लगे तो सहज हो गया और दम मारकर चिलम दूसरे को थमा दी। वह भी धुंआ खैंचने लगा। कोई पुडिया फ़ाड़कर मसाले को सीधे मुख-कुंड में हवन सामग्री की तरह डाल रहा था।
पता लगा कि ये लोग पास के गांवों से सिंघाड़े का सौदा करने आये हैं। किसी के कुछ बोरे बिक गये हैं , कुछ का सौदा होना बाकी है। खरीददार के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये हुये हैं।
लोगों ने बताया कि इस बार सिंघाड़े के दाम गिर गये हैं। जिसके दाम पिछले साल 100 रुपये मिले थे उसके इस बार 60 रुपये ही मिल रहे थे। लोगों ने बताया कि नोटबंदी का असर भी रहा किसानों को अपनी उपज के दाम कम मिलने में। लोगों के पास पैसा ही नहीं था मजूरी देने के लिये। इसके अलावा मांग भी कम हो गयी।
सिंघाड़े के लिये तालाब खरीदना, सिंघाड़े लगाना, उसकी रक्षा करना , तोड़ना , सुखाना और फ़िर बाजार तक लाना। बहुत मेहनत का काम है। लेकिन करना पड़ता है भाई। पेट भरने के लिये सब करना पड़ता है।
जहां आदमी इकट्ठा होता है वहीं बाजार लग जाता है। चाय वाले लोगों को चाय बेचने के लिये आ गये। घुमंतू चाय की दुकानें लग गयीं। एक मटर चाट वाला अपना आधे से ज्यादा खोमचा चाट बेंच चुका था। बाकी भी निपटाने ही वाला था। बोला - ’रोज नहीं आते यहां। आज छुट्टी का दिन था इसलिये यहां आ गये। रोज यहां इत्ते ग्राहक नहीं मिलते।’

जारी है किस्सा अगली पोस्ट में

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