Monday, March 13, 2017

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच
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1. लिखे हुये का सम्मानित होना आवश्यक है, अन्यथा लिखना ही वृथा।
2. सम्मानोपरान्त लेखन की अपनी आभा होती है। लेख के बाद कैप्शन में दिया जा सकता है- लेखक फ़लां-फ़लां पुरस्कार से सम्मानित ।
3. वे लिखने से समझौता कर सकते हैं पर सम्मान से नहीं।
4. एक दिन के लिये सेल में आने वाली चीजें ऐसा इम्प्रेशन देती हैं कि यदि उनके साथ थोड़ी भी ढिलाई बरती गयी तो वे आउट ऑफ़ स्टॉक की माला पहन लेंगी।
5. ऑनलाइन शॉपिंग की खूबी है कि कोई जान ही नहीं पाता कि अगले ने कितने का आर्डर किया है।
6. सरकार कई सालों से आम आदमी को नचा रही है पर यह उसका विशेषाधिकार है।
7. जनता की ओपिनियन चुनाव के पहले जाहिर होने से सरकार को चंदे का टोटा भी पड़ जाता है और काफ़ी बड़ा निवेश उसके हाथ से निकल जाता है।
8. हमारे देश में राजा के लिये अलग अलग नियम हैं।
9. ऐसी सरकार या मंत्री ही नाकारा है जो जासूसी के योग्य नहीं हैं।
10. जहां देश गिर रहा है, समाज गिर रहा है, बादल और पहाड़ गिर रहे हैं, रिश्ते-नाते और चरित्र गिर रहा है, इन सबके बीच यदि बेचारा रुपय्या गिर रहा है तो कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?
11. जो कुछ नहीं करते वे कमाल करते हैं।
12. लालबत्ती धारी होने से फ़ायदा यह है कि बिना कुछ कहे उनके सारे काम हो जायेंगे।
13. नेता बनने के बाद जो भी काम होते हैं, सब जनता के ही नाम से जाने जाते हैं।
14. पढाना भी कोई नहीं है। पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढती है और न देश की जीडीपी।
15. जिस चीज के पीछे बाजार हो जाता है, वैसे भी वह सभ्य और सामाजिक ट्रेडमार्क बन जाता है।
16. बाजार ही हमारा सच्चा समाज है- खेल,सिनेमा और मीडिया तो महज अदने से औजार।
17. गरीब वैसे भी हर किसी की भौजाई होता है और भौजाई से फ़ागुन में मजाक तो बनता है।
18. देश आलू-टमाटर से कहीं बड़ा है और उससे भी बड़ा मसला है हमारे गौरव का। बच्चों के लिये स्कूल या अध्यापक भले न हो पर पाठ्य-पुस्तकों में हमारे अतीत का बखान जरूर हो।
19. मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे तो स्वत: निपट जायेंगे जब धर्म और संस्कृति पर खतरा दिखाया जायेगा।
20. चुनाव कई दुश्मनों को दोस्तों में और दोस्तों को दुश्मनों में बदल देता है।
21. (चुनाव में) घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति कट्टर सेकुलर हो जाता है और सेकुलर को अचानक राष्ट्रहित के सारे विकल्प खोजने पढ जाते हैं।
22. गरीबी पर चर्चा पिछड़ेपन की निशानी है, बहस करनी है तो ’डिजिटल इण्डिया’ पर करो। शब्द बदलने चाहिये ताकि उसके अर्थ ढूंढे जा सकें।
23. असल मंजिल वही पाते हैं जो सुविधानुसार अपने रास्ते बदल लेते हैं।
24. शिखर पर वही विराजते हैं जो शरीर ही नहीं आत्मा बदलने की क्षमता रखते हैं।
25. सबके दिन बहुरते हैं। कोई ऊपर-ऊपर बटोर पाता है तो कोई तलहटी से मलाई मार लाता है।
26. भ्रष्टाचार जिस कुर्सी पर बैठता है, वह नैतिकता का पाठ पढने लगती है।
27. हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं।
28. मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं, भक्तों के नहीं। इसलिये वे वहां भरतनाट्यम करें, मल्लयुद्ध करें या माइक उखाड़ें सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है।
29. किसी की खूबसूरती पर पूछकर लिखने से वो मौलिकता और वो भाव नहीं आ सकते जो छुप-छुपकर देखने और चाहने के अनुभव से आते हैं।
30. चुनावी जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है।
31. पूरे देश में अब खास नहीं आम होने में रार मची हुई है।

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