Sunday, July 16, 2017

इतवार को गंगा दर्शन

इतवार की सुबह सुहानी होती है। लखनऊ जाते Ashok भाईसाहब की कार में लिफ़्ट शुक्लागंज पहुंचे। पांच रुपये बचाये। बचत के बाद पईयां-पईयां लौटे। लौटते दौरे की रपट पेश है।
एक दुकानवाला दीवार पर चिपका उसको गले टाइप लगा रहा था। दीवार से अलग हुआ दुकान का पंखा घूमने लगा। पता चला कि दीवार के पास लगे तारों में से एक में अपनी दुकान का तार जोड़कर ’कटिया’ लगा रहा था। कटिया फ़ंसते ही दुकान पर लगा पंखा चलने लगा। इसके बाद इत्मिनान से वह दुकान साफ़ करने लगा। मन किया कटिया का फ़ोटो लेकर लगाते लेकिन डरे की कहीं नाई की दुकान वाला मुफ़्तिया चंपी न कर दे। आगे बढ गये।
सडक पर बैटरी-वाहन खड़ा किये दो लोग बतिया रहे थे। ड्राइवर की सीट पर बैठा आदमी सड़क पर चाय सुड़कते आदमी की बातें ध्यान से सुन रहा था। दूरी होने के कारण उनके विमर्श का विषय पता नहीं चल सका। लेकिन पक्का वह व्यंग्य-विमर्श तो नहीं ही था। होता तो किसी न किसी ग्रुप में उसकी चर्चा हो गयी होती अब तक। हेडलाइट को घूंघट की तरह ढंंके था वाहन वाला।
पास ही गंगा जी बह रही थी। उसके किनारे गये। स्नानार्थी गंगा किनारे जा रहे थे। कुछ लौट भी रहे थे। बगल में 150 साल से भी ज्यादा पुराना गंगापुल अलसाया लेटा था नदी में। नदी भी मजे में धूप में नहाती अलसाई लेटी थी।
रेती में कल तक जहां खरबूजे-तरबूज की खेती थी वहां अब पानी लहलहा रहा था। फ़िर भी अभी नदी घाट से काफ़ी दूर थी। नदी में पानी ज्यादा गहरा नहीं था। घुटनों तक पानी में लोग बैठ-लेटकर नहा रहे थे। नदी में गोल बनाकर बैठी-बतियाती-नहाती महिलायें दिखीं। ऐसा लगा मानों नदी के आंगन में बैठी गप्पाष्टक कर रहीं हों।
एक बीच के उमर के बुजुर्गवार नदी के किनारे मुंडी धरकर ’जलसंसद’ को देरतक प्रणाम करते रहे। प्रणाममुद्रा के बाद सीधे हुये और नदी को मंझाते हुये पानी में बैठकर नहाने लगे।
नहाने के बाद नदी के किनारे ही बालू के बने शिवलिंगों की लोग पूजा कर रहे थे। अलग-अलग बने शिवलिंग पर अगरबत्ती,फ़ूल सटाकर लोग प्रणाम करते दिखे। एक शिवलिंग के पास दो प्रौढा महिलायें घर के किस्से आपस में साझा कर रहीं थीं। हमको पास खड़ा देखकर कुछ रुकीं। इसके बाद फ़िर शुरु हुईं। कुछ देर बाद शंकर जी को भजन सुनाते हुये पूजा-अर्चना में जुट गयीं। भजन के बोल जो थे उनका मतलब था - ’शंकर जी हमारे अज्ञानों का ध्यान मत देना। अपना कृपा बरसाते रहना।’
लोग प्लास्टिक की बोतलों में गंगाजल भरकर ले जा रहे थे। पहले ध्यान रहता तो लखनऊ भेज देते । मिल जाता लखनऊ में शिक्षा द्विवेदी को । उन्होंने एक पोस्ट में गंगाजल भेजने का आग्रह किया है गंगा किनारे रहने वाले साथियों का।
एक महिला तो बोतल में ठूंसकर रेत भी भर रहीं थीं। शायद पूजा के काम आये घर में।
घाट किनारे पंडे भी थे। एक पंडा जी खटिया पर बैठे मंत्र पढते हुये महिलाओं के प्रसाद को ग्रहण कर रहे थे। पास में खड़ा एक लड़का उनके लिये मछली लाने की बात कर रहा था। वे बोले -लाओ तो सही। लड़के ने कहा -पंडा जी गंगा किनारे मछली खाओगे? पंडा जी ने कहा-’अरे तुम लाओ तो सही। चाहे मछली लाओ, चाहे बुकरा। हम खायें चाहे किसी को खिला दें इससे तुमसे क्या मतलब?’
फ़ूल बेंचने वाले पांच रुपये के दोने लगाये फ़ूल बेंच रहे थे। महिलायें और पुरुष दोनों नहाने के बाद घाट पर ही कपड़े बदल रहे थे। नदी के किनारे अपने समाज के खुले स्नानागार हैं। एक महिला नदी में घुसकर नदी के पानी को चट्टान की तरह मानकर उसमें अपनी चद्दर पटककर धोने लगी।
हम खड़े ही थे वहां कि एक गेरुआ बाबा गंगा मैया की जय का हल्ला मचाते हुए आये। इतनी तेजी से नदी में धँसे कि एकबारगी तो गंगा जी भी सहम गईं। उनका किनारे का पानी थरथरा गया। बाद में भक्त कन्फर्म हुआ तो कुछ स्थिर हुईं। हमारा भी मन हुआ नहाने का लेकिन कुछ दूर पानी में अंदर जाकर कुछ देर खड़े रहकर वापस आ गये!
एक नाव वाला बड़े ध्यान से पानी मे नाव खड़ी किये सारे कार्यव्यापार देख रहा था। लौटते हुये हमने दो साइकिलें घाट किनारे 69 मुद्रा में खड़ी आपस में प्रेमालाप मुद्रा में खड़ी बतियाती दिखीं। जोड़ी की छोटी कन्या राशि और बड़ी साइकिल बालक टाइप लग रही थी। जुगुलजोड़ी बढिया लग रही थी।
लौटते में देखा घाट किनारे आये तो देखा एक सांड दो लड़कियों को दौडाता हुआ दूरतक रेती में उछलता रहा। लड़कियां रेत में डरती-गिरती-पड़ती भागीं। सांड पलटकर दूसरी तरफ़ भागा। शायद पुल के ऊपर से गुजरती रेल घबरा गया था या फ़िर बौखला गया था।
घाट किनारे तखत पर बैठे एक बाबा जी चिलम तैयार कर रहे थे। पास ही एक लंगड़ी कुतिया चार पिल्लों को दूध पिला रही थी। कुतिया की एक टांग कट गयी थी। बाबाजी अपने बच्चों को दूध पिलाती कुतिया को देखते उसकी मातृत्व महिमा पर व्याख्यान देते रहे कि लंगड़ी होने के बावजूद अपने बच्चों को दूध पिला रही है।
पास ही एक गुब्बारे वाला गुब्बारे फ़ुलाते हुये सजा रहा था। घाट किनारे बेंचने के लिये जा रहा था। रंग-बिरंगे गुब्बारे आकर्षक लग रहे थे। हम घाट से घर की तरफ़ चल दिये।

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