Wednesday, July 19, 2017

आम और आदमी

आजकल आम चलाचली की बेला पर हैं। पहले दशहरी , फिर चौसा और अब सफेदा के दिन हैं। कुछ दिन और खा लें। फिर यह भी निकल लेंगे।
इतवार को एक किलो लेने पर आम वाला बोला-'ज्यादा-ज्यादा ले जाओ। जल्दी खत्म हो जाए तो फिर दूसरे फल लगाए।' आम के भी दिन पूरे हुए लगता है।
आम के भाव अस्सी रुपये किलो हो गए हैं। जब भी आम खरीदते हैं शाहजहांपुर के आम के दाम याद आते हैं। आठ-दस रुपये किलो के। दस गुना मंहगे हो गए भई। बीस साल पहले के दाम दिमाग में चिपके हुए हैं। हटते ही नहीं।
एक दिन रात को तो गजब हुआ। रात खाने के समय देखा आम खत्तम। अमास लगी थी। रोज लगती है। लपक कर पहुंचे सड़क पर। बाहर ही मिल गया आम वाला। आम कम बचे थे। भाव 40 रुपये। आम हो या जनप्रतिनिधि, संख्या में कम होने पर भाव कम ही हो जाते हैं। तौला लिये। घर आकर पता चला आधे आम दागी। हिसाब बराबर हो गया।
जब भी आम खाते हैं अम्मा की बात चलती है। अम्मा आम बहुत चाव से खाती थीं। गुठली पर गूदे का रेशा तन बचता। जब तक आम की फसल रहती खाती। आम के बहाने अम्मा की रोज याद आती है। इसी महीने विदा हुई थीं। पुरानी पोस्टें उछलकर फेसबुक पर आतीं। हम उनको पढकर वापस दबा देते।
आम की तरह आम आदमी के किस्से रोज देखते हैं। सडक पर आते-जाते लोगों को देखते हैं। पूरा शहर गड़बड़ हड़बड़ी में भागता दिखता है। कहीं कोई किसी को जगह नहीं देता। चौराहे पर लोग लाइट नहीं सिपाही देखते हैं। इतवार को लाल बत्ती देख तीन चौराहे पर रुके हम। सिपाही नहीं था। पीछे की गाड़ियों ने मार हॉर्न बजाबजा कर वो हाल कर दिया कि आसमान चिल्लाया -'अरे हमको तो सर से उतार दो मालिक।'
हमको लोगों को भागते देख हमको याद आता है:
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है
बस जीने के खातिर मरती है
पता नहीं कहां पहुंचेगी
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी।
शार्टकट की प्रवृत्ति हर जगह दिखती है। हीर पैलेस के पास डिवाइडर पर प्लासटिक के खम्भे लगे हैं। मोटरसाइकल पर सवार उनको दबाकर बगल से निकलते हैं। दबते-दबाते अब तो खम्बा निकल ही गया। जहां अवरोध की जगह रास्ता बन गया है।
हम कनपुरिये बड़े बिंदास टाइप होते हैं। नियम-कानून की पुड़िया बनकर जेब में धरे रहते हैं।' झाड़े रहो कलटरगंज' हमारा नारा है।
ऊपर पढ़ने से लगता है हम बड़े शरीफ चालक हैं। हमको भी लगता है ऐसा है। लेकिन कई बार ओवरब्रिज पर गाड़ी बीच से मोड़ते हैं तो लोगों के अंदाज से लगता है कि लोग कह रहे हैं -' अजीब अहमक सवार है।' लोग कहते तो कुछ नही लेकिन गाड़ी के आगे-पीछे से निकलते हुए हमको मुड़ने नही देते। हमारे अहमकपन की सजा वहीं सुना देते हैं। हम उसी समय तय करते हैं अब बीच से नहीं मुड़ेंगे। कई बार तय किया। लेकिन मुड़ते बीच से ही हैं।
आप भी ऐसा ही करते हैं क्या ?

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