Wednesday, July 26, 2017

सूरज भाई भी रोशनी की जलेबी नहीं जलेबा बनाते हैं

सुबह बरामदे में आये तो सूरज भाई ने चमकते हुए गुडमार्निंग किया। 15 डिग्री ऊपर चमक रहे थे। तीन चार काले बादल उनको कमांडो की तरह घेरे हुए थे। सुबह जब निकले होंगे तब आसमान में रोशनी का खूंटा गाड़ा होगा। फिर उसके चारों तरफ किरणें छितरा दी होंगी। जैसेे जलेबी बनाते हुए हलवाई पहले कपड़े से थोड़ा मैदा कड़ाही में चुआने के बाद उसके आसपास जलेबी की कढ़ाई करता है वैसे ही सूरज भाई भी रोशनी की जलेबी नहीं जलेबा बनाते हैं। हलब्बी जलेबा।।
फोटो खींचते हैं तो सूरज भाई चमकते हुए दिखते हैं। काले बादल गोल। नेपथ्य में चले गए। हमको सामने सूरज को घेरे हुए काले बादल दिख रहे। लेकिन फोटो में केवल चमकदार सूरज भाई और उनकी किरणें। मने कैमरा भी टीवी चैनल हो गया और सूरज भाई सरकार। सिर्फ चमक दिखानी है। कुछ भी धुंधला दिखे उसे चमक के पीछे कर दो। वाह रे मेरे कैमरे। जियो।
कैमरे से ध्यान आया कल दफ्तर जाते समय कुछ फ़ोटो खैंचे थे। पानी बरस रहा था। गाड़ी में बैठे-बैठे फोटो खैंचे। देखिये आप भी। बताते चलते हैं उनके बारे में।
घर से निकलते ही एक बुजुर्ग साइकिल पर मोमिया की चादर लपेटे जाते दिखे। देखते ही आइडिया आया कि जिस तरह जाड़ो में कम्बल बांटते हैं गरीबों को उसी तर्ज पर गरीबों को बरसात में मोमिया की चादर बांटी जाए।
एक जगह लोग ठेलिया के ऊपर काली बरसाती की छत के नीचे बैठे पानी के नजारे देख रहे थे। एक आदमी छाता लिए बैठा था। हमने रुक कर फोटो कहीं खींची तो 'बरसाती कैम्प' के नीचे बैठे लोग ध्यान से हमको देखने लगे। हमने भी 'जैसे को तैसा' के नियम का पालन करते हुये उनको देखा और आगे बढ़ गए।
आगे एक आदमी साइकिल पर छाता लगाए जाते दिखा। जब तक फोटो खींच पाते वह निकल गया बगल से। हमने कैमरे को डांटा कि इतने सुस्त हो। कैमरा बेचारा चुप।
सड़क पर एक आदमी दाएं हाथ में छाता पकड़े और बाएं हाथ में दूध का डब्बा लिए तसल्ली से चला जा रहा था। उसकी चाल में किसी बहुमत वाली सरकार का आत्मविश्वास था।
वहीं पानी की लाइन में काम के लिए गहरा गड्डा खुदा था। गहराई में काम के लिए रोशनी की दरकार होती है। भाई लोगों ने पास खड़े बिजली के खम्भे को गर्दनिया नीचे झुका लिया था। प्राइवेट संस्थानों में गर्दन पकड़कर काम कराने का खुला इश्तहार कर रहा था गड्ढे के ऊपर झुका हुआ खम्भा।
आगे सड़क पर तमाम लोग बारिश से अपनी-अपनी तरह से मुकाबला करते हुए सड़क पर जा रहे थे। एक बुजुर्ग बिना छाते के भीगते चले जा रहे थे। उनका कुर्ता कमर के जरा उपर तक भीगा हुआ था। पानी की बूँदे शायद बुजुर्गियत का लिहाज करते हुए आगे और नीचे बढ़ने में संकोच कर रहीं थीं।
सड़क पर कुछ बच्चियां भी जाती दिखीं। सहेलियों के साथ एक छाते में किनारे से भीगते हुए हाथ थामे एक -दूसरे का हाथ थामे। हाथ पकड़ने के पीछे 'ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे' वाला भाव रहा होगा। वैसे हो तो यह भी सकता है कि सड़क पर चलते हुए सुरक्षा के लिहाज से दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा हो।
कोई लड़का नहीँ दिखा एक दूसरे का हाथ थामे सड़क पर जाता।
पुल पर एक आदमी स्कूटर धकेलते आता दिखा। शायद उसका पेट्रोल खत्म हो गया हो। पुल के बीच पहुंचकर सुस्ताने के लिए खड़े होकर कुछ देर उसने इधर-उधर देखा। लेकिन इधर-उधर देखने से कुछ होता तो नहीं है न। अगर होता तो दुनिया इधर-उधर ही देखती रहती। कुछ देर बाद फिर वह स्कूटर को धकेलते हुए आगे बढ़ गया।
इस बीच एक जगह पानी का भराव मिला। पानी से गाड़ी गुजरी तो पहिये के नीचे आया पानी कुचलने के डर से छिटककर फुटपाथ पर गुजरते आदमी के सीने से चिपक गया। हमने हमेशा की तरह एक बार फिर से सोचा कि पानी में गाड़ी धीमी करनी चाहिए। लेकिन तब तक गड्डा पार हो गया था।
बारिश के सीन देखते हुये शेर अपने आप याद आ गया:
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।
आज पानी तो नहीं बरस रहा। लेकिन दफ्तर तो जाना है। इसलिए निकलते हैं। आप भी मजे करिये।

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