Sunday, July 23, 2017

किसी अखबार से आये हैं क्या?

सुबह घास छीलने के बाद घर से निकले। घर के पास ही एक जगह सड़क खुदी हुई थी। तीन इंसानों की गहराई के बराबर। ऊपर मिट्टी के ढेर पर एक महिला सुर्ती रगड़ते हुए नीचे जाते आदमियों को देख रही थी।
हम भी 'सैन्ट्रो सुंदरी' को किनारे ठढ़िया दिए। मौका मुआयना करने लगे।
पता चला कि पानी की पाइपलाइन साफ हो रही थी। आदमी की ऊंचाई के बराबर सीमेंट पाइप में लोग घुस रहे थे। आगे करीब 100 मीटर की दूरी तक अंदर जाकर उसकी मिट्टी बाहर करते हुए पाइप लाइन साफ करनी थी।
हमने पूछा -'अंदर तो अंधेरा होगा। कुछ दिखेगा नहीं। मिट्टी कैसे दिखेगी?'
'आगे वाले के पास टार्च है। रोशनी का इंतजाम है।' - वहां खड़े आदमी ने हमारी जानकारी बढ़ाई।
हाथ में मोबाइल कैमरा देखते ही उसने पूछा -' किसी अखबार से आये हैं क्या?'
मन किया कह दें -'हां, फुरसतिया टाइम्स से आये हैं।' लेकिन फिर नहीं बताये। बेकार घबड़ा जाता।
इस बीच किनारे बैठी महिला ने तम्बाकू ठोंकते हुए होंठ के नीचे दबाई और गड्ढे में उतर गई। नीचे बिछी सीढ़ी के पुल पर डगमग चलती हुई पाइप की सुरंग में चली गई। कम से कम चार -पांच लोग तो मेरे सामने अंदर गए। उसके पहले का पता नहीं।
हमने पूछा कि अंदर हवा का , सांस लेने का इंतजाम भी है कुछ? बाहर खड़े आदमी ने हमको समझाया कि हवा का इंतजाम है। तीन जगह खुली है पाइपलाइन। लेकिन जिस तरह उसने समझाया उससे हमको कुछ समझ नहीं आया।
हमारी बुद्धि कुछ देर अंदर गए आदमियों के हाल और हवा का इंतजाम समझने के लिए फड़फड़ाती रही। पास में ही मीट की दुकान पर जंगलों के अंदर कुछ मुर्गे भी फड़फड़ा रहे थे। बगल की दुकान में एक बालक मीट का कीमा बनाते हुए ग्राहक को निपटा रहा था।
हम आगे बढ़ गए।

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