Friday, August 11, 2017

वइसे भी बुरा मानने पर कोई जीएसटी तो लगा नही है

आज सुबह-सुबह साइकिल सामने पड़ गई। पड़ क्या अड़ सी गई। घुमा के लाओ। खड़े-खड़े पहिये-पैडल सब अकड़ गए हैं।
दफ्तर का समय हो रहा था। मन किया साइकिल को गाना सुना दें:
'मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग।'
यह सोचते ही साइकिल निकाली और गद्दी को घोड़े की पीठ की तरह सहलाते हुए निकल लिए।
पहला पैडल मारते ही पता चला कि पैडल मडगार्ड से सटकर चल रहा है। लगता है दोनों की अंतरात्मा जाग गई है। गठबंधन हो गया है दोनों में। हमने सोचा इसका इलाज अब बाद में । आगे बढ़ गए।
सड़क एकदम गुलजार हो गयी थी। गड्ढे युक्त सड़क पर लोग उचकते-धँसते आते-जाते दिखे। ज्यादातर लोग दिहाड़ी कमाने निकले थे। कुछ बच्चे भी स्कूल जा रहे थे।
शुक्लागंज की तरफ से आने वाली सड़क पर तमाम बच्चे स्कूल की ड्रेस में आते दिखे। एक बच्ची साइकल से आ रही थी। चलते-चलते अपनी चुन्नी भी संभालती जा रही थी। सर सीना झुकाए चुन्नी सम्भालते अगल-बगल चौकन्ना देखते हुए साइकिल चलाते बच्चियों का स्कूल जाना भी अपने आप में पराक्रम है।
सड़क किनारे लोग सोये हुये थे। अधनंगे बदन विभिन्न मुद्राओं में सोए लोग। जो जग गए थे, खासकर युवा होते लड़के , किनारे खड़े सड़क की सवारियों को देखते हुए समय की ऐसी-तैसी कर रहे थे।
हम गंगापुल पर आ गए। सोचा सूरज भाई मिलेंगे। लेकिन वो गोल। गंगा जी दोनों तटों तक पसर गईं थीं। बांहे पसारे अलमस्त,अलसाई सुंदरी से अपने तट के बिस्तर पर लेटी हुई थीं।
गंगा जी का पानी सरपट भगा चला जा रहा था। लगता है उसको कोलकाता पहुंचने की हड़बड़ी हो। जगह-जगह पानी अलग-अलग अंदाज में बह रहा था। अलग-अलग आकृतियों में। लम्बवत आकार में बहता पानी अचानक किसी गोले की तरह की आकृति में बहने लगता। कोई बड़े आकार का पानी का गोल फूटकर छोटे आकारों में बहने लगता। राजनीतिक पार्टियों की तरह पानी अलग-अलग टूट-फूट-मिल-जुलकर आगे भगा चला जा रहा था। सामने जाते किसी पानी के समूह को देखकर कहना मुश्किल की दस मीटर पहले किस तरह बह रहा था।
अलग-अलग गुट में बहता पानी गंदगी के लिहाज से भी अलग-अलग दिखा। कोई टुकड़ा भूरा और कम गन्दा तो उसके बगल वाला थोड़ा उजला और क्यूट। लेकिन उसके बगल का ही पानी गाढा काला। देखकर लगता सीधे नाले से निकलकर वीआईपी की तरह नदी में घुस गया है। अलग-अलग तरह के गंदे पानी एक दूसरे इलाके में घुसकर 'सर्जिकल स्ट्राइक' टाइप करते हुये आगे बढ़ रहे हैं।
बीच-बीच में किसी जगह कोई पानी का बड़ा बबूला नदी सतह पर उभरता और चारों तरफ फैल जाता। ऐसा लगता मानों नदी के पेट से गैस निकली हो। नदी ने डकार ली हो और पानी हिल गया। मन किया नदी को सलाह दें कि सुबह-सुबह खाली पेट एक ठो 'ओमेज' खा लिया करो। लेकिन फिर सलाह दिए नहीं। आजकल लोग सलाह का बुरा मान जाते हैं। मानते हमेशा रहे हैं लेकिन आजकल कुछ ज्यादा ही मानते हैं। वइसे भी बुरा मानने पर कोई जीएसटी तो लगा नही है।
पुल के नीचे से निकलता पानी ऐसे सरपट भाग रहा था जैसे कांजी हाउस से छूटे जानवर, स्कूल से छूटे बच्चे, कारखानों ने निकले कामगार या फ़िर कमजोर हुई पार्टी से अंतरात्मा की आवाज पर निकला जनसेवक। पुल के ऊपर खड़ी रेल नदी का सौंदर्य निहार रही थी। रुकी हुई थी। काफ़ी देर तक खड़ी रही। फ़िर चल दी। रेल को पता नहीं चला कि हम नदी की कहानी सुना रहे हैं वर्ना वह नंदन जी की गजल हमको सुनाने लगती:
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना।
मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भँवर देखना कूदना डूब जाना।
अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी
मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना।
ये तन्हाईयाँ, याद भी, चान्दनी भी,
गज़ब का वज़न है सम्भलके उठाना।
हम गजल सुनकर फारिग ही हुए थे कि पुल बड़ी तेजी से हिलने लगा। मुझे लगा हमसे गले मिलने की तमन्ना है उसकी। लेकिन फिर याद आया कि रेल की गजल के जबाब में उसको भी दुष्यंत कुमार का शेर याद आ गया होगा:
तुम किसी रेल सी गुजरती हो
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
हम लौट पड़े। सामने से आता एक रिक्शा दिखा। रिक्शे में 12 स्कूली बच्चे लदे थे। रिक्शा वाला उचक-उचककर रिक्शा चला रहा था। एक आटो बीच पुल रुक गया। आटो वाला चाबी घुमा-घुमाकर उसको चलाने की कोशिश करता रहा। एक सवारी आटो उतरकर नदी को निहारते हुये बीड़ी सुलगाने लगी।
हम सवारी, नदी, पुल को निहारते हुये वापस शहर की तरफ़ लौट पड़े। कानपुर नगर निगम हमारा स्वागत कर रहा। शहर में घुसते हुये मन यह सोचकर खुश था कि अभी शहर से आने-जाने पर जीएसटी नहीं लगी है।

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