Saturday, August 19, 2017

बात चाय की नहीं, प्रेम की है

गंगा तट पर पहुंचे शाम को। दो लोग अंधेरे में मछलियों को दाना खिला रहे थे।बताया - रोज का क्रम है।
वे पालीथिन में लईया लिए थे। पानी में डालते जा रहे थे। मछलियां लपक रहीं थीं। बच्चे का दाना खत्म हो गया। वह चलने लगा। बड़े ने टोंका -'गंगा जी को प्रणाम करके जाओ।'
सामने ही एक बुजुर्ग माला जप रहे थे। माला फेरने के बाद गंगा की रेती पर मत्था टिकाया और मोमिया की चटाई तहा कर पास के तख्त पर पटक दी।
बुजुर्गवार पिछले 40 साल से बिना नागा गंगा तट पर आते हैं। शाम को रेती पर बईठ कर 16 बार माला जपते हैं। इनमें 11 बार शंकर जी के लिए, एक बार गंगा जी के लिए, गायत्री जी के लिए और अन्य देवताओं के लिए हैं।
त्रिभुवन नारायण शुक्ल नाम है बुजुर्ग का। उम्र 76 साल। सेहत टनाटन। नयागंज में कोई फुटकर सामान की दुकान है। शाम को वापस लौटते हुए माला जपने के बाद शुक्लागंज घर जाते हैं। ज्वालादेवी परिसर में बेटे की मोटरसाइकल की दुकान है। जिंदगी में कोई फिक्र नहीं -ऐसा बताये शुक्ल जी।
वहीं खड़ेश्वरी बाबा के मंदिर में आरती चल रही थी। लोग घण्टा-घड़ियाल बजा रहे थे। बाबा एक पांव पर खड़े भक्तों को निहार रहे थे।
बाहर चाय की दुकान पर दूध खत्म हो गया था। चाय वाले ने कई बार उदास लहजे में चाय न पिला पाने के लिए अफसोस जताया। हमने कहा -'कोई नहीं कल पियेंगे।' इस पर उन्होंने कहा-' बात चाय की नहीं, प्रेम की है।' इत्ती जल्ली तो फिल्मों में भी प्रेम नहीं होता जित्ता जल्ली गंगा तट पर हो गया।
पुल के पहले पटरियों पर कीचड़ धुली सड़क पर सब्जी वाले लोग सब्जी बेंच रहे थे। पटरी पर रेल गुजर रही थी।पुल पर साइकिल, रिक्शे, ऑटो, मोटर और मोटरसाइकिल सब एक साथ गुजर रहे थे।
गंगा नदी तसल्ली से आरामफर्मा थीं। सारी बत्तियां बुझाकर सो रही थीं। किनारे की बत्तियां नाइटबल्ब सी टिमटिमा रहीं थीं।
पुल पार करके एक जगह देखा एक भाई कुछ गया रहे रहे। साथ के लोग तसल्ली से सुन रहे थे। पता चला शुक्लागंज के किन्ही महेश दीक्षित का गीत है। गीत में गंगा, नारद, शिव और अन्य देवताओं का जिक्र है। बताया बहूत पसन्द है उनको यह गीत। दीक्षित जी के गीत अक्सर गाते हैं।
हम दीक्षित जी से परिचित नहीं। आप भी नहीं होंगे। लेकिन उनके गीत कोई थकान मिटाने के लिए सुन रहा है यह बड़ी भली बात लगी।
यह भी लगा कि दुनिया में साहित्य और संवेदना के प्रसार का काम सबसे बेहतरीन माने जाने वाले लोगों की रचनाओं से ही नहीं होता। अनगिनत मामूली, अनाम लोग इस काम में अपना योगदान देते हैं। यह योगदान किसी बड़े रचनाकार से कम नहीं होता।
अब शनिवार को सप्ताहांत में इतना ही। बकिया फिर। 

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