Tuesday, August 01, 2017

न पहनें न ओढ़े, फ़ोटो खिंचवावन खातिर बीच मां टप्प से घुसि गईं


सबेरे दफ्तर के लिए निकले। गाड़ी सर्विसिंग के लिए जमा है। साथी चतुर्वेदी जी लेने के लिए आने वाले हैं। उनका इंतजार करते हुए घर से बाहर निकलते हैं। घर के बाहर कुछ महिलाएं इकट्ठा हैं। हम चतुर्वेदी जी का इंतजार करते हुए उनसे बतियाने लगते हैं।
मैदान में घास छीलने का काम करने के लिए आई हैं महिलाएं। साढ़े आठ बजे मैदान खुलेगा। तब काम शुरु होगा। शाम पांच बजे तक काम करती हैं। 200 रुपये मिलते हैं रोज के। दो-तीन दिन बाद मिलते हैं पैसे।
न्यूनतम मजदूरी 536 रुपया प्रतिदिन है। आधे से भी कम मजदूरी में काम करती हैं महिलाएं। हम कहते हैं -'बहुत कम मिलते हैं।'
रोज 20 रुपया खर्च करके आते हैं हम लोग - 'एक बताती है। '
उनको पता भी नहीं है कितनी न्यनतम मजदूरी है। कितना उनका हक है। पता हो जाए तो शायद दुख हो। अभी तो चहकती हुई, अच्छे से तैयार होकर काम पर आई हैं। 200 रुपये भी बहुत हैं उनके लिए।
फोटो खींचने के लिए पूंछते हैं तो हंसने लगती हैं। एक मुंह ढंककर पीछे चली जाती हैं। खींचकर दिखाते हैं तो लपककर देखती हैं। दुबारा खींचने की बात करते हैं तो एक कहती हैं (सामने हरी साड़ी वाली) खराब आये डिलीट कर देना। उनको फोटो अच्छी न आने पर डिलीट करने का हिसाब पता है।
दुबारा खींचकर दिखाते हैं तो खुश-खुश देखती हैं। तब तक चतुर्वेदी जी आ जाते हैं। हम चल देतेे हैं।
पीछे से सुनते हैं सब महिलाएं एक महिला से मजे लेते हुए कहती हैं -'न पहनें न ओढ़े, फ़ोटो खिंचवावन खातिर बीच मां टप्प से घुसि गईं।' सबकी हंसी दूर तक सुनाई देती है।
ये महिलाएं घर से निकल रही हैं । बिना 'सेल्फी विदाउट मेकअप' और 'ब्लैक डीपी' के अभियान के अपनी तरह से महिला सशक्तिकरण की मुहिम पर लगी हैं। दोनों में कोई विरोध भी नहीं है। हर तरफ से आगे बढ़ना है।
आगे सड़क पर जाम है। बस वाला बीच सड़क पर बस रोककर सवारी भर रहा है। बस को 'जाम करके ' वह बस आगे बढ़ाते। जाम हटता है। हम आगे बढ़ते हैं। जाम का सदुपयोग करके पोस्ट रास्ते में टाइप करते हैं।
दफ्तर आकर बायोमेट्रिक में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इसके बाद काम में जुट जाते हैं।
आप मजे से रहिये। बाकी किस्सा जल्दी ही शाम को सुनाते हैं।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10212202655675059

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