Friday, June 19, 2026

तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन


 आज सुबह तैराकी के लिए निकले। पराग डेयरी चौराहे के पहले एक बच्चा तेजी से सड़क पार करता दिखा। भागता, लड़खड़ाता, झुककर सीधे खड़ा होता। शायद सड़क किनारे के बने किसी घर में रहता होगा।   सूरदास जी कृष्ण जी के बालपन का वर्णन करते हुए लिखते हैं :

'किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥'

सड़क किनारे रहते घरों के बच्चों के लिए सड़क ही उनका आँगन होती हैं।वहीं वे  घुटनों के बल चलना, दौड़ना, भागना सीखते हैं। सड़क रूपी आँगन में मणियाँ नहीं लगी। बिम्ब नहीं बनते यहाँ।  बारिश के दिनों में अलबत्ता सड़क के गड्ढों में परछाइयाँ बनती होंगी। बच्चे उन परछाइयों को पकड़ने की कोशिश करते होंगे। लेकिन  कोई सूरदास इस पर कोई पद नहीं रचता। हर बच्चे का बचपन कृष्ण के बचपन सरीखा नहीं होता। 

बच्चे के गुजरने के इंतज़ार करते हुए कार रोकी। बच्चा डिवाइडर पारकर अपने घर में घुस गया। यहाँ तो सड़क है।हम अपने देश के बच्चे को बचाकर निकल रहे हैं।  ईरान, फ़िलिस्तीन में सड़क और घर में खेलते बच्चों का क्या हुआ होगा। खेलते-खेलते कोई मिसाइल उन पर गिरती होगी। वे 'शांत' हो जाते होंगे। युद्ध चलता रहता है। बाद में कभी समझौता होगा। जिन लड़ाई लोलुप, सत्ता लालची बुड्ढों ने युद्ध का बिगुल बजाया होगा वही लोग शांति का मसीहा बनकर पेश होते है। लड़ाई थमती है लेकिन अनगिनत बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों की क़ूबानी लेकर। 

आज शुक्रवार को ईरान-अमेरिका में शांति समझौता हुआ। देखना है कि यह सही में लागू हो पाता है क्या। ईरान-अमेरिका में शांति होते ही खबर आई कि यूक्रेन ने रूस की पाइप लाइन  पर ड्रोन  से हमला कर दिया। लगता है दुनिया हथियारों के सौदागर यह सुनिश्चित करते हैं कि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में लड़ाई होती रहनी चाहिए। वे  दुष्यंत कुमार के शेर को अच्छे से याद करके अमल में लाते हैं:

'मेरे सीने (देश ) में न सही, तेरे सीने (देश) में सही, 

हो कहीं भी (युद्ध की) आग लेकिन आग जलनी चाहिए।'

कल डायना नायड की आत्मकथा  'Find a way ' के शुरुआती अंश पढ़े । डायना के पिता (सौतेले) ने बचपन से उनको जल्दी उठकर तैराकी का अभ्यास करने की आदत डाली। उनको ज़ेहन में बचपन से विश्वास दिलाया कि उनका नाम NYAD स्पेशल है। उनकी किसी और सहेली का नाम डिक्शनरी में नहीं होगा लेकिन नायड़ का नाम होगा। यह खास नाम है। डायना नायड ख़ास है।

डायना नायड  अपने सौतेले पिता  एरिस Aris को अपना असली पिता समझती रहीं। Aris का वर्णन करते हुए डायना नायड ने लिखा है -'वह जालसाज था। बहुभाषी था। 17 भाषाएँ जानता था। वाकपटु था। अपनी लच्छेदार बातों से लोगों को मुग्घ कर लेता था। डायना की सहेलियाँ उसने मिलने के बाद कहती थीं -'इतना शानदार व्यक्तित्व मैंने पहले कभी नहीं  देखा।' 

लेकिन एरिस Aris का दूसरा रूप भी था। वह असल में जालसाज था। क्रूर था। उसने डायना का 14 वर्ष की उम्र तक यौन शोषण किया। डायना घर में डरकर रहती थी। उनकी माँ जानने के बावजूद डायना को अपाए सौतेले पिता के यौन शोषण से बचा नहीं पायी। इसका उनके मन में अपराध बोध था। उनमें अपने बच्चों को बचाने के लिए, अपने पति के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं थी। इसका कारण शायद यह भी था कि वे बचपन में माँ-बाप के प्यार से वंचित रहीं। अपने पति के प्यार को खोने से डरती थी वे। बाद में हालांकि उन्होने अपने पति से तलाक लिया। यह शायद बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत देर से उठाया कदम था। 

डायना नायड की आत्मकथा इस मामले में अनूठी है। ख़ासकर इसलिए  कि उन्होंने अपने जीवन के निर्माण में शामिल लोगों के बारे में लिखते हुए आख़िर में उनकी अच्छाइयों के लिए उनको याद किया है। सौतेले पिता द्वारा अपने यौन शोषण के बावजूद उन्होंने दो बातों के लिए अपने पिता को धन्यवाद दिया :

"'विजेता' (चैंपियन) के रूप में मेरी खुद की छवि बनाना ।

नींद को छोड़कर तैराकी के अभ्यास को तरजीह देना।"

डायना नायड अपने मैराथन तैराक बनने के पीछे अपने सौतेले पिता द्वारा सिखाई इन बातों को सबसे प्रमुख मानती हैं।

डायना नायड की आत्मकथा अभी पढ़ रहे हैं। बाद में डायना नायड के समलैंगिक होने के पीछे भी कारण उनके सौतेले पिता द्वारा उनका बचपन में किया यौन शोषण कारण रहा? शायद इस बारे में डायना नायड ने आगे लिखा हो आत्मकथा में।

डायना नायड की यह आत्मकथा अंग्रेजी में हैं। किसी शब्द का मतलब डिक्शनरी में खोजने में समय लगता है। कल इसका उपाय मैंने यह निकाला कि गूगल के एआई वर्जन में जाकर किताब के पेज का फ़ोटो उसमें अपलोड करके निर्देश देते हैं -'हिंदी में अनुवाद करो (ट्रांसलेट इन हिंदी) । पूरे पेज का हिंदी अनुवाद फौरन सामने आ जाता है। उसको हम फटाक से पढ़ लेते हैं। कभी-कभी अंग्रेजी भी पढ़ते हैं जो कि हिन्दी के साथ पढ़ने में बेहतर समझ आती है।

आज पूल में अभ्यास किया। सर पानी में झुकाकर रखें रहे। पाँव चलाते रहे। सर उठाकर तैरते हुए साँस लेने में कुछ प्रगति हुई । लेकिन पूरी सफलता नहीं मिली। अलबत्ता अब हाथ चलाना सीख लिया है। यह पता चल गया कि कैसे हाथ चलाने से सर ऊपर उठेगा, साँस लेने के लिए। सबसे बड़ी बात कि सीखने में हड़बड़ी वाली भावना अब नहीं है। तसल्ली से तैरने का आनंद ले रहे हैं । तैरना मजेदार है। तैरते हुय साँस लेना सीखना है। सीख ही जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन था। 


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