कल घर लौटते समय एक जगह भीड़ देखी। तमाम नौजवान हाथ में कागज लिए दिखे। कुछ लिखते हुए भी। हमें लगा कि किसी शायद कोई इम्तहान होगा। बच्चे शायद इम्तहानी हैं। रुककर पूछा तो पता चला क़िस्सा अलग है। मालूम पड़ा ये उत्तर प्रदेश की 108 एंबुलेंस सेवा के ड्राइवर हैं। पिछले ठेके में काम करते थे। नया ठेका हुआ तो सबको निकाल दिया गया। फिर कर्मचारियों की कमी के कारण (जैसा ड्राइवरों ने बताया) पुराने लोगों को बहाल किया जा रहा है। उसी बहाली के लिए ड्राइवर लोग जमा थे।
करीब दो सौ मीटर की दूरी पर सड़क किनारे ड्राइवर ही ड्राइवर थे। उनके हाथ में सेवा में HR महोदय, EMRI ग्रीन हेल्थ सर्विसेज लिखे फार्म थे। लोग ख़ुद को सेवा में बहाली के लिए, तबादले के लिए प्रार्थनापत्र लिख रहे थे। कोई कासगंज से आया था, कोई मुरादाबाद से, कोई फतेहगढ़ से। कोई रात में आया तो कोई एक दिन पहले। कुछ कल ही आए थे। कोई स्टेशन पर रुका, कोई फुटपाथ पर, कोई कहीं और।
एंबुलेंस सेवा में कंपनिया पीपीपी मॉडल पर कम करती हैं। ठेका बदलने पर पुराने लोगों को निकाल देना आम बात है। इसमें सरकार का कानूनन प्रत्यक्षत: कोई हस्तक्षेप नहीं होता। हल्ला होने पर कुछ लोगों को ले लिया जाता है। निकाले जानेका मुख्य कारण पैसे लेकर नए लोगों को भर्ती कर लेना होता है। कुछ में कम पैसे पर भी रखा जाता है।
ड्राइवर को लिखा-पढ़ी में सरकार द्वारा नियत न्यूनतम वेतन ही दिया जाता है। लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। ड्राइवरों को उनकी उपस्थिति के अनुसार 12000 से 17000 प्रतिमाह भुगतान होता है। उनके खाते में 17000 हज़ार रुपये भुगतान होते हैं। लेकिन तरह-तरह से उनसे 4000 -5000 हज़ार वापस ले लिए जाते हैं। ठेकेदार इसके लिए अलग-अलग तरकीबें अपनाते हैं। जो ड्राइवर पैसा देने से मना करते हैं उनको निकाल दिया जाता है। इसमें कोई कुछ नहीं कर पाता। नियोक्ता किसी-किसी मामले कुछ हस्तक्षेप करते हैं लेकिन अधिकतर मामलों ऐसा ही होता। चार-पाँच हज़ार मजदूरों से वापस ले ही लिया जाता है।
श्रमिक सेवाओं में ठेकेदारों द्वारा यह शोषण पूरे देश भर में आम है।अमूमन सभी संस्थानों में ऐसा होता है। जानकारी के बावजूद कोई कुछ नहीं कर पाता। कानूनन सेवा प्रदाता कंपनी को अपने कामगार रखने, निकालने का अधिकार होता है।
EMRI ग्रीन हेल्थ सर्विसेज भारत की सबसे बड़ी ग़ैर -लाभकारी पेशेवर आपातकालीन सेवा प्रदाता संस्था है।यह एक गैर-लाभकारी संगठन (ट्रस्ट/सोसाइटी) है। डॉ. जी.वी.के. रेड्डी (Dr. GVK Reddy) इस संस्था के चेयरमैन हैं। वह प्रसिद्ध व्यापारिक समूह 'जीवीके' (GVK) के भी संस्थापक और अध्यक्ष हैं, जिसने वर्ष 2009 में इस संस्था का अधिग्रहण किया था।
ग़ैरलाभ संस्था होने के बावजूद इसके संचालन में ड्राइवरों से वसूली और उनका शोषण आम बात है। कई बार 12 घंटे की जगह 24 घंटे की ड्यूटी हो जाती है। ड्राइवरों छुट्टी नहीं मिलती। अचानक निकाल दिया जाता है। निकाले गए ड्राइवर की जगह दूसरे ड्राईअवर कम पैसे में, ज्यादा शुरुआती पैसा लेकर ड्राइवर रख लिए जाते हैं। एक निकालो हज़ार मिलते है । कागजों पर पैसा पूरा मिलता है लेकिन वास्तव में कहानी अलग होती है।
कल एक ड्राइवर ने बताया कि नई भर्ती में एक ड्राइवर से 50 हज़ार रुपये मांगे जा रहे हैं। पचास हज़ार रुपये मतलब तीन महीने की तनख्वाह। मतलब 25% उगाही। हो सकता है सबके साथ ऐसा न हो लेकिन सर्विस सेक्टर में ऐसा होना आम बात है।
सर्विस सेक्टर में कंपनियां न्यूनतम सेवा शुल्क (3.85%) लेती हैं। यह 3% लाभ (Profit) और 0.85% GeM पोर्टल ट्रांजैक्शन शुल्क (Transaction Charges) को मिलाकर बनता है। आज के समय में जब बैंकों में बिना कुछ किए पैसा जमा रहने पर ब्याज दर 2.5% है। ऐसे में तमाम खर्चे और स्टाफ़ रखकर, व्यवस्था बनाए रखने का खर्च लगाकर कोई भी कंपनी 3.85% लाभ में काम कर ही नहीं सकती। इससे कहीं अधिक लाभ तो वे ब्याज पर पैसा उठाकर कमा सकती हैं।
सेवा प्रदाता कंपनियों में तमाम लोगों का पैसा होता है। एक ग्राम प्रधान ने बताया कि उनके पास काफ़ी पैसा जमा हो गया है। अब वे कोई सेवा प्रदाता कंपनी खोलने की सोच रहे हैं। अपने यहाँ सर्विस सेक्टर काले धन को गोरा करने का भी एक जरिया हैं।
आज के समय में देश की अधिकांश सेवायें आउटसोर्सिंग करते हुए चल रही हैं। ऐसे में इनके संचालन में यह देखा जाना जरूरी है कि नियम ऐसे बनें ताकि उनका अनुपालन सही में हो सके और कामगारों का शोषण रुक सके।
No comments:
Post a Comment