मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी साहब कहते हैं -"मैंने बस में बराबर वाली सीट पर बैठी खूबसूरत ख़ातून से पूछा -'क्या मैं इस परफ्यूम का नाम पूछ सकता हूँ जो आपने लगाया हुआ है मैं अपनी बीबी को तोहफे में देना चाहता हूँ।ख़ातून ने जबाबन कहा -'आप ये वाला परफ्यूम अपनी बेगम को मत दीजिये वरना किसी भी जलील आदमी को उससे बात करने का मौका मिल जाएगा।"
यह लतीफ़ा कल उन्मुक्त जी की एक ब्लॉग पोस्ट में सुनने को मिला। उन्मुक्त जी के ब्लॉग पर मैं हिंदी ब्लॉग के कलेक्शन हिंदीब्लॉगजगत से पहुँचा। इस ब्लॉग में क़रीब चार सौ हिन्दी ब्लॉग संकलित हैं। उन ब्लॉग्स में जब भी कोई नई पोस्ट आती है वह हिंदीब्लॉगजगत में अपडेट हो जाती है। करीब पंद्रह साल पहले जो लोग ब्लॉग पर पोस्ट लिखते थे उनमें से कुछ अभी भी नियमित अपनी पोस्ट्स ब्लॉग पर भी लिखते रहते हैं। उनमें से एक सुनील दीपक जी हैं। उनके ब्लॉग (जो कह न सके) पर कुछ मनपसंद हिंदी ब्लॉग स्थल की लिस्ट है। उन पर जाकर मनपसंद ब्लॉग को पढ़ा सकता है।
इस मामले में ब्लॉग फ़ेसबुक से बेहतर है। फेसबुक में भले ही आपके पाँच हज़ार मित्र हों लेकिन नियमित पोस्ट उन कुछ लोगों की ही दिखती है जिनको आप नियमित देखते रहते हैं। इसके कारण अनगिनत बेहतर लिखने वालों मित्रों का पढ़ने से वंचित रह जाते हैं। ब्लॉग के एक और खूबी है कि आप किसी ब्लॉगर की सब पोस्ट्स पढ़ सकते हैं। सिलसिलेवार। अलग-अलग लेबल की। फेसबुक में ऐसा करने में काफ़ी मसक्कत करनी पड़ती है। यह लिखते हुए सोच रहा हूँ कि काश हिंडीब्लॉगजगत की तर्ज पर हिंदी फ़ेसबुक जगह भी होता जहाँ मनपसंद फेसबुकिए मित्रों की पोस्ट्स अपडेट होती रहतीं और उनको जबमन आता जाकर पढ़ लेते।
मैंने अभी तक जो कुछ भी लिखा सोशल मीडिया पर (फेसबुक, ब्लॉग, अख़बार) वह सब अपने ब्लॉग फ़ुरसतिया पर पोस्ट कर रखा है। किसी मित्र को पढ़ना हो तो ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकता है। गूगल पर फ़ुरसतिया (fursatiya) सर्च करने पर हमारा ब्लॉग दिख जाता है। 20 अगस्त, 2004 से शुरू करके क़रीब 21 साल में करीब साढ़े तीन हज़ार पोस्ट्स लिखीं फ़ुरसतिया ब्लॉग में। औसतन डेढ़ सौ से प्रति वर्ष से कुछ ऊपर । चिट्ठाचर्चा की पोस्ट्स मिला लें तो औसत और ऊपर होगा। कभी चिट्ठाचर्चा करने का जुनून सा था। एक दिन में तीन-तीन बार करते थे चर्चा।
ब्लॉगिंग के समय में बहुत कुछ सीखा। नए-नए तरीके। फोटो लगाने, लिंक लगाने, हाथ से लिखने और भी तमाम काम। फेसबुक में सरलता आई है तो बंधन भी हैं। सबसे बड़ी बाधा यह कि अपनी पोस्ट में आप फेसबुक की लिंक के अलावा कोई दूसरी कड़ी लगायेंगे तो आपकी रीच कम हो जायेगी। ब्लॉग में ऐसी कोई सीमा नहीं थी। आप कितनी भी पोस्ट, किसी भी प्लेटफार्म की लगा सकते हैं। कई मामलों में ब्लॉग फेसबुक से बेहतर विकल्प है। ब्लॉग में अलग-अलग टेम्पेलेट मौजूद हैं। मनमाफिक टेम्पेलेट लगा सकते हैं। फेसबुक में यह सुविधा नहीं है। आपको एक ही अंदाज में टेम्पेलेट में पोस्ट पढ़नी पड़ेंगी। कोई फोटो और लेखन के अलावा कोई अलगाव नहीं।
कल बहुत दिन बाद मैंने अपने ब्लॉग में अपनी फोटो बदली। बीस साल पहले की फोटो के बदले नई फ़ोटो लगाने में घंटे भर से ऊपर लग गया। सारे तरीके भूल गए थे। आख़िर में फ़ोटो लग ही गई। टेम्पेलेट भी बदला। आने वाले समय में और तमाम बदलाव करेंगे ब्लॉग में। एक बदलाव यह कि अभी तक अपनी पोस्ट पहले फेसबुक पर लिखते थे फिर मौक़ा मिलने पर ब्लॉग पर डालते थे। इस चक्कर में तमाम पोस्ट ब्लॉग पर पोस्ट करने में देर हो जाती थी। अब कोशिश करेंगे कि पहले ब्लॉग पर लिखेंगे इसके बाद फेसबुक पर पोस्ट करेंगे।
बात उन्मुक्त जी से शुरू हुई थी। उन्मुक्त जी अनाम नाम से लिखते थे। उनके बारे में विवरण लोगों को पता नहीं था। लेकिन लेखन से पता चलता था कि उन्मुक्त जी एक ज्ञानी, समझदार और आदरणीय इंसान हैं। कल उनकी एक पोस्ट से पता चला कि वे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज थे। ब्लॉगिंग के दौर में वे इलाहाब्द हाईकोर्ट के जज थे। जज होने के नाते अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने अनाम रहकर लिखना बेहतर समझा। उनकी एक पोस्ट से पता चला कि उनकी एक किताब आर यू ए नार्मल जज (Are You a Normal Judge? On Law and Other Things) छपने के लिए चली गई है। फ़िलहाल वे सुप्रीम में कोर्ट में वकालत करते हैं। सेवानिवृत होने के बाद अब उनकी अनाम रहने की मजबूरी खत्म हो गई है। शायद उनसे कभी मिलना हो।
आपसे अनुरोध है कि फेसबुक पर लिखी इस पोस्ट मेरे ब्लॉग पर पहुँचकर भी देखें। उसमें संबंधित पोस्ट्स, ब्लॉग के लिंक पर क्लिक करके उनतक पहुंचा जा सकता है। फेसबुक में यह सुविधा नहीं है। आप मेरी पोस्ट मेरे ब्लॉग पर पहुँचकर पढ़ेंगे और वहाँ टिप्पणी करेंगे तो मुझे और अच्छा लगेगा। बताइए कि मेरे ब्लॉग में क्या सुधार करना ठीक होगा?
फेसबुक पर नियमित लिखने वाले मित्रों को बिना माँगी सलाह है कि वे अपनी पोस्ट्स अपने ब्लॉग पर अपडेट करते रहें। अपना लिखा सुरक्षित रखने का यह सुगम उपाय है।

No comments:
Post a Comment