Tuesday, October 29, 2019

व्यंग्य यात्रा के बहाने



कल व्यंग्य यात्रा का साठवां अंक मिला। दो प्रतियां। दो अंक ही भेजवाते हैं प्रेम जनमेजय जी । जब से भेजना शुरु किया तब से ही। शायद सुरक्षा कारणों से ऐसा करते हों। ’व्यंग्य यात्रा’ की अकेली प्रति जाने से मना करती हों। डर लगता होगा। पाठकों से, व्यंग्यकारों से। दो प्रतियां साथ रहेंगी तो सुरक्षा रहेगी।
व्यंग्य यात्रा के प्रख्यात व्यंग्यकारों पर केंद्रित अंक फ़िर-फ़िर पढने योग्य हैं। लेकिन लफ़ड़ा यह कि ऐन मौके पर पत्रिका दायें-बायें हो जाती है। छपाई-प्रूफ़ के लिहाज से व्यंग्य यात्रा चकाचक पत्रिका है। विभिन्न स्तम्भों के हिसाब से रचनायें अलग-अलग मिजाज की।
पाथेय की इस बार की रचनाओं में परसाईजी की -एक मध्यमवर्गीय कुत्ता और मनोहरश्याम जोशी की ’इस देश का यारों क्या कहना’ उनकी प्रसिद्द रचनायें हैं।
चिंतन में व्यंग्य पर केंद्रित कई लेख हैं। व्यंग्य पर इतनी बातचीत पढते हुये पाठक अगर सावधान न रहे तो रहे तो सही में उसके व्यंग्य विशेषज्ञ होने का खतरा है। अपने भाई एम.एम.चन्द्रा जी एम.एम. चन्द्रा तो इतने हुनरमंद व्यंग्य विशेषज्ञ हैं कि व्हाट्सएप पर बतकही को भी अपने चिंतन में शामिल कर लेते हैं।
त्रिकोणीय व्यंग्य यात्रा का बहुत अच्छा प्रयोग है। इसके माध्यम से व्यंग्ययात्रा के संपादक नये -पुराने-भूले-बिसरे-स्थापित-अस्थापित व्यंग्यकारों से परिचय कराते रहते हैं। इस बार जिन तीन व्यंग्यकारों का परिचय कराया व्यंग्य यात्रा वे हैं अरविन्द विद्रोही , मधुसूदन पाटिल और कुंदनसिंह परिहार। पत्रिका में इनका परिचय , रचनायें और उनके साक्षात्कार भी हैं। इन रचनाकारों के बारे में पढकर अच्छा लगा।
गद्य और पद्यव्यंग्य में कई जानने वाले साथियों के व्यंग्य हैं। उनको आहिस्ते-आहिस्ते बांचेंगे। इधर पढी जाने वाली किताबों में अन्य किताबों के अलावा संतोष त्रिवेदी की किताब ’ नकटों के शहर में’ के बारे में कुछ लिखा गया है। आखिरी पैरा सलाह है- " संतोष को हिन्दी व्यंग्य के हित के लिये अपना आलस्य त्यागना होगा और विषयों की विविधता पर भी नजर डालनी होगी।"
लिखा तो आगे भी कुछ और है लेकिन वो हम न बतायेंगे। आप लोग खुदै बांचियेगा अगर किताब मिली हो। अब लेकिन मसला यह है कि मास्टर साहब अपना आलस्य त्यागेंगे क्या? हिन्दी व्यंग्य का हित क्या होकर ही रहेगा?
व्यग्य यात्रा के प्रधान संपादक प्रेम जन्मेजय जी हैं। यह वाकई काबिलेतारीफ़ बात है कि वे लगातार यात्राओं, समारोहों, आयोजनों, गोष्ठियों, महोत्सवों के बावजूद यह पत्रिका पिछले 15 वर्षों से निकाल रहे हैं। व्यंग्य यात्रा के प्रधान संपादक होने के चलते उनका हक है कि वे अपने हिसाब से इसमें रचनायें छापें। वे इसका भरपूर उपयोग भी करते हैं। व्यंग्य के साथ अपने से जुड़ी खबरों को विस्तार से स्थान देने में कोई कन्जूसी नहीं करते।
लेकिन इस चक्कर में कभी-कभी कुछ मजेदार रचनायें भी छप जाती हैं। इसी अंक में एक छपी एक रचना का शीर्षक है -" जो काम परसाई ने नहीं किया वह प्रेम जन्मेजय ने किया"। इसमें कुल्लू में व्यंग्य महोत्सव की रपट छपी है। इस रपट में बताया गया है कि " व्यंग्य शिविरों का आयोजन कर जो काम प्रेम जन्मेजय ने किया वह परसाई ने नहीं किया।"
इस शीर्षक को और फ़िर रपट को पढकर मुझे हंसी आई। कवि यहां कहना क्या चाहता है यह समझ नहीं आया ! परसाई जी व्यंग्य शिविर नहीं आयोजित कर पाये प्रेम जी कर रहे हैं?
इस तरह की रपट लिखी जाती हैं। मुग्ध भाव से अकेले में पढी भी जा सकती हैं लेकिन ऐसे शीर्षक पढकर हंसी ही आती है। परसाई जी 2000 के दशक में विदा हो गये। तब फ़ेसबुक नहीं था। ब्लाग नहीं था। आज सोशल मीडिया पर लिखने वाला हर लेखक कह सकता है-" जो काम परसाई ने नहीं किया वह हमने किया।"
ऐसा शायद अति व्यस्तता के चलते भी हुआ हो लेकिन इस तरह के शीर्षक सनसनीखेज समाचार की तरह ही लगते हैं ।
यह टिप्पणी व्यंग्य यात्रा के अंक को उलट-पलटकर देखते हुये ही। इसके लिये उकसाया Arvind Tiwariअरविन्द तिवारी जी की आज की व्यंग्य यात्रा पर लिखी टिप्पणी ने। उसका लिंक नीचे। इसी बहाने आज व्यंग्य यात्रा का चन्दा भी भेजा गया और मुफ़्त में पत्रिका पढने के अपराध बोध से मुक्ति भी।

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Monday, October 28, 2019

ठेलिया पर दिए, हाथ में अधखाई मिठाई

 

तमाम और बच्चों की तरह यह बच्ची भी दीपावली के मौके पर दिए, खिलौने बेचती दिखी। ठेलिया पर दिए खिलौने। हाथ में मिठाई । हाथ की मिठाई को टुकड़ा-टुकड़ाकर , आहिस्ता-आहिस्ता खाती जा रही थी। किसी गरीब की पूंजी की तरह मिठाई धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी। बच्ची के मन में शायद डर होगा कि कहीं मिठाई खत्म न हो जाये।
उसके साथ खड़े , शायद उसके परिवार के ही सदस्य का मन भी मिठाई खाने को ललक उठा। उसने बच्ची से मिठाई मांगी। बच्ची ने कुछ देर बाद अधखाई मिठाई उसे दे भी दी।
जिस जगह यह बच्ची अपनी ठेलिया और अधखाई मिठाई के साथ दिखी वह जगह बिरहाना रोड है। यहां शहर के सबसे नामी-गिरामी ज्वैलर्स के शो रूम हैं। करोड़ो का सोना बिका होगा कल यहां।

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Sunday, October 20, 2019

हिजली बंदी ग्रह एक बेहतरीन राष्ट्रीय स्मारक



खड़गपुर आईआईटी में सुबह डॉ. राजीव रावत के साथ टहलने निकले। उनके झोले में चाय का थरमस और कप थे। संगत के लिये बिस्कुट भी। खड़गपुर का विशाल परिसर कार में टहलते हुये देखा। फ़िर एक जगह उतर कर फ़ुटपाथ पर चाय की अड्डेबाजी हुई। सामने सूरज भाई चहकते हुये दिखे। उनको भी चाय आफ़र की गयी। वे खुश होकर और चमकने लगे।

रास्ते में वहां के सुरक्षा अधिकारी भी मिल गये। बताया उन्होंने कि लगभग 500 सुरक्षाकर्मी हैं यहां। उनके साथ एक चक्कर पैदल भी मारा गया। रास्ते में बादाम के पेड़ एक लाइन में अनुशासनबद्ध तरीके से खड़े थे। केले, चाय, काफ़ी, धान और न जाने किसकिस रकम के खेत दिखे। 2000 एकड़ जमीन में पसरा है आईआईटी खड़गपुर। यहां की आईआईटी में अकेली आईआईटी है जहां कृषि भी पढाई जाती है।
रास्ते में सड़क पर दो गिलहरियां आपस में मस्तियाती दिखीं। गले मिलकर हंसती, खिलखिलाती। एक दूसरे को गुदगुदाती। कबड्डी टाइप खेलतीं। एक न शायद दूसरी कोई कोई चुटकुला भी सुनाया हो क्योंकि वह कुछ देर तक सड़क पर लोटपोट होती रही।
वापस आते हुये हिजली बंदी गृह देखने गये। आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों को जेलों में भेजा गया। एक समय ऐसा आया कि जेलों में जगह नहीं बची। तब अंग्रेजों ने कैदियों को जेलों के अलावा दूसरे बंदीगृहों में रखा । पहला बंदी गृह बक्सा किले में बना। दूसरा बंदी गृह हिजली में सन् 1930 में बना। हिजली साम्राज्य का एक हिस्सा थी यह जगह।
1931 में हिजली में 16 सितम्बर, 1931 को एक महत्वपूर्ण घटना घटी। बंदीगृह में मौजूद दो निहत्थे बंदी संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेन गुप्ता अंग्रेज पुलिस द्वारा गोली से उड़ा दिये गये। सुभाष चन्द्र बोस गोलीबारी में मारे गये बंदियों के शव लेने हिजली आये। तमाम नेताओं ने , जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर भी शामिल थे, ने इस घटना की निन्दा की। ’हिजली गोलीबारी’ जेल/बंदीगृह में पुलिस फ़ायरिंग की पहली घटना थी।
बंदीगृह 1937 में बंद कर दिया गया। 1940 में फ़िर खोला गया। 1942 में यह अंतिम रूप से बंद कर दिया गया। बंदी लोग दूसरी जगह भेज दिये गये। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां पर अमेरिकी की २०वीं वायुसेना कमान का मुख्यालय भी रहा।हिजली में खड़ा एक जहाज शायद उसी समय का है।
सन 1946 में बने उच्च तकनीकी शिक्षा आयोग ने यह सिफारिश की कि अमेरिका के मेसाट्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की तर्ज पर भारत में भी तकनीकी संस्थान स्थापित किये जायें। उन दिनों भारत के अधिकांश उद्योग कलकत्ता में थे इसलिये पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अनुरोध किया कि पहले तकनीकी संस्थान की स्थापना कलकत्ता में ही की जाये। परिणाम स्वरूप मई,1950 में कलकत्ता में पूर्वी उच्च तकनीकी संस्थान की स्थापना हुई। बाद में जून, 1950 में इस तकनीकी संस्थान को कलकत्ता से 120 किमी दूर खड़गपुर के हिजली नामक एतिहासिक स्थान में स्थानान्तरित किया गया।
1951 में जब खड़गपुर आईआईटी की स्थापना हुई तो शुरुआत इसी कैंप से हुई। बंदीगृह के एक-एक कमरे में एक-एक विभाग चालू हुये। आज पूरे परिसर में पसरे हैं। 1990 में बंदीगृह के एक हिस्से को ’नेहरू विज्ञान एवं तकनीकी म्यूजियम’ में बदल दिया गया। हिजली बंदीगृह अब शहीद भवन के नाम से जाना जाता है।
सन 1956 में खड़गपुर तकनीकी संस्थान के संस्थान के दीक्षांत समारोह में अपने उद्गार व्यक्त करते हुये भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा:-
“ऐतिहासिक हिजली बंदी ग्रह जो भारत के बेहतरीन स्मारकों में से एक है अब भारत के नये भविष्य के रूप में बदल रहा है। यह चित्र मुझे उन परिवर्तनों का आभास कराता है जो कि भारत में हो रहे हैं।“
इस बंदीगृह के परिसर में 16 सन 1931 को सितम्बर को पुलिस की गोलीबारी में मारे गये शहीद संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेन गुप्ता की स्मृति में कार्यक्रम होते हैं। उनके परिवारों , परिचितों के परिजन आते हैं। कम से कम यहां “शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले” पर अमल होता है।
शहीद भवन के बाहर बैरकें बनी हैं जहां कभी बंदी रखे जाते होंगे। बड़ी सरिया में लगा हुआ ताला इतनी दूर कि किसी बंदी के हाथ बढाकर खोलने की संभावना शून्य।
वहीं एक रेलगाड़ी भी दिखी। बुजुर्गा रेलगाड़ी के आगे सिग्नल भी दिखा। लेकिन बूढा गाड़ी थककर वहीं खड़ी हैं। कोयला खत्म , पानी गोल, खत्म हो गया इंजन का खेल।
शहीद भवन से होते हुये मुख्य इमारत आये। वहां पहले मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय, जिनके आह्वान पर यह आई.आई.टी. बना है, की प्रतिमा लगी है।
लौटते हुये चयास लगी। एक जगह बैठकर चाय पी गयी। इसके बाद वापस आ गये गेस्ट हाउस। कार्यक्रम के लिये तैयार भी होना था।

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Friday, October 18, 2019

खड़गपुर आईआईटी में 36 साल बाद

 

कल आईआईटी खड़गपुर पहुंचे। राजभाषा विभाग में एक कार्यक्रम के सिलसिले में। आना तो आलोक पुराणिक जी को भी था लेकिन पता नहीं कैसे उनके दिमाग से इस आयोजन की तारीख फिसल गई। उन्होंने अपने विद्यालय में एक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई। उसका जिम्मा भी उनके ही सर माथे आया। लिहाजा उनकी टिकट कैंसिल करवानी पड़ी।

इस बुलउवे के सूत्रधार डॉ राजीव रावत यहां राजभाषा अधिकारी हैं। पहले वे फील्ड गन फैक्टरी में राजभाषा विभाग में थे। 2009 में वहां से यहां आए। उसी परिचय के सिलसिले से यहां आना हुआ।
आईआईटी खड़गपुर की यह मेरी दूसरी यात्रा है। पहली बार 36 साल पहले साइकिल से आये थे। राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित यह देश की पहली आईआईटी थी। 1951 में स्थापना हुई।
दिन में राजभाषा विभाग का काम काज देख रहे डॉ अशोक मिश्र जी से मुलाकात हुई। बांदा जिले के रहने वाले डॉ अशोक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। इस लिहाज से एक ही गुरुकुल के विद्यार्थी हुए हम लोग।
शाम को इंस्टिट्यूट के कुछ छात्रों से बातचीत मुलाकात हुई। छात्रों के यहां दो समूह हैं । एक टेक्निकल लिटरेरी सोसाइटी (TLS), दूसरा आवाज (AWAAZ)। दोनों में क़रीब 100-100 सदस्य हैं। TLS में बंद समूह में साहित्य गतिविधियां चलती हैं। आवाज का फेसबुक पेज है। इसमें परिसर में हो रही गतिविधियों की जानकारी रहती है। छात्रों
के प्लेसमेंट , स्थानीय लोगों से जुड़ी घटनाओं की सूचनाओं के अलावा आवाज के पेज पर एक दिन मेस के खाने में छिपकली पाए जाने की खबर भी दिखी।
महफिल जब जुड़ी तो कुछ बातचीत भी हुई। देश के अलग-अलग हिस्सों से आये बच्चों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। दो छात्रों ने अपनी कविताएं भी सुनाई। यश जबलपुर के रहने वाले हैं । उन्होंने मंटो की कहानी टोबा टेकसिंह पर आधारित कविता सुनाई। बहुत सुंदर पाठ। एक और छात्र ने चांद पर अपनी कविता सुनाई। दोनों के वीडियो बनाये गए। परिचय के साथ दोनों कविताएं अलग से।
वहीं डॉक्टर पंकज साहा जी से भी मुलाकात हुई। अपने व्यंग्य सँग्रह 'हा ! बसन्त!' की एक प्रति उन्होंने हमको दी।
आज इसका लोकार्पण होना है।
रात को खाने पीने के बाद हम संस्थान देखने गए। जिस बिल्डिंग के सामने खड़े होकर 36 साल पहले फोटो खिंचाई थी एक बार फिर उसी के सामने थे। वह समय ब्लैक एंड व्हाइट का था। आज का रंगीन। लेकिन यादों में वह छवि आज भी उतनी ही चमकदार है।
खड़गपुर के बाकी किस्से आगे।

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खड़गपुर आई आई टी में राजभाषा कार्यक्रम




खड़गपुर आई आई टी के मुख्य द्वार पर कार्यक्रम के बैनर। बैनर बता रहा है कि आलोक पुराणिक जी Alok Puranik को भी यहां आना था। ख्यातिलब्ध साहित्यकार के दिमाग से यह सूचना फिसल गई। उन्होंने अपनी झकास ऊर्जा के चलते कोई दूसरा कार्यक्रम 'सकर' लिया जिसके पीर, बाबरची, भिस्ती, ख़र सब वही हैं। लिहाजा उनका यहां आना रह गया। बच्चों का नुकसान हुआ।

आलोक जी ने हालांकि शरीफ लोगों की तरह माफी मांग ली यह कहते हुए कि उनकी जिंदगी में ऐसा पहली बार हुआ। लेकिन विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि ऐसा हसीन हादसा उनके साथ पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले पिछली बार ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान समारोह से लौटते हुए वे जिस ट्रेन में चढ़ गए थे उसके टीटी ने बताया कि उनका रिजर्वेशन नहीं है। आलोक जी ने फट से मोबाइल से रिजर्वेशन टीटी को दिखा दिया। टीटी ने कहा -'यह ठीक है कि आपका रिजर्वेशन इसी ट्रेन में है, बर्थ भी यही है लेकिन रिजर्वेशन जो आप दिखा रहे एक महीने बाद का है।'
इसके बाद आलोक पुराणिक जी को इज्जत के साथ अगली स्टेशन पर उतारा गया। जहां हम लोग अपनी ट्रेनों का इंतजार कर रहे थे। मजे लिए गए उनके। चायबाजी हुई।
इससे सिद्ध होता है कि आलोक पुराणिक अपने समय से कम से कम एक महीना आगे चलते हैं। समय के साथ चलने के लिए उनको याद दिलाना पड़ता है।
कुछ लोगों ने आलोक पुराणिक जी के न आ पाने को राजनैतिक रंग दिया। उनके अनुसार आलोक पुराणिक यहां इसलिए नहीं आये क्योंकि उनका फोटो पोस्टर में बाई तरफ है। आलोक जी जानते हैं कि बंगाल में बाईं तरफ वालों के हाल ठीक नहीं है इसलिए उन्होंने यहां आना बचा लिया।
बहरहाल कल बच्चों को आलोक पुराणिक जी के बारे में बताया गया तो वे बहुत उत्सुक हुए उनसे मिलने के। जल्दी ही किसी कार्यक्रम में उनको यहां बुलाया जाएगा। जिसमें उनका फोटो बीच में होगा। आलोक जी केंद्र में रहते हुए सहज रहेंगे। भूलेंगे नहीं आना।

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सूरज की मिस्ड कॉल पर ब्लॉगर साथी राजीव तनेजा के विचार।

पुराने ब्लॉगर साथी अनूप शुक्ल जी की किताबों को जब अमेज़न पर सर्च किया तो रुझान पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित उनकी किताब "सूरज की मिस्ड कॉल" का नाम कुछ अलग सा,आकर्षक लगा तो सोचा कि सबसे पहले इसी किताब को मंगवाया जाए और पढ़ा जाए।

कमाल का लिखते हैं अनूप शुक्ल जी। छोटी..छोटी, बारीक..बारीक बातों पर भी उनकी पैनी नज़र क्या कमाल दिखाती है, यह इस किताब को पढ़कर पता चलता है। जिन बातों की तरफ कभी हमने ध्यान ही नहीं दिया। ना ही कभी उनके बारे में सोचा कि उन पर भी कभी कुछ लिखा जा सकता है, महीन..महीन बातों पर भी उनकी लेखनी अपना जादू दिखाने से बाज़ नहीं आती।

इस किताब के ज़रिए उन्होंने सूरज ,उसकी किरणों, पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों इत्यादि हर चीज़ को एक तरह से जीवित और हमसे बात करने वाला बना दिया है। पढ़ते वक्त कई बार हैरानी हुई कि वह इस तरह का कैसे सोच लेते हैं तो कई बार बरबस ही चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और कई बार कुछ गहरी बातों को ढंग से समझने के लिए उन्हें फिर से पढ़ना भी पड़ा।

कुल 144 पृष्ठों की इस किताब का मूल्य 150/- रुपए मात्र है जो कि किताब की उम्दा क्वालिटी को देखते हुए बिल्कुल भी ज़्यादा नहीं है। हाँ!..कुछ जगहों पर मात्राओं और नुक्तों की ग़लतियाँ थोड़ा अखरती हैं। एक आध जगह ये भी लगा कि बात को जैसे अधूरा छोड़ दिया गया है। खैर..इन छोटी-छोटी कमियों को आने वाली पुस्तकों और इस पुस्तक के आगामी संस्करण में सुधारा जा सकता है।
नए लेखक अनूप शुक्ल जी से काफी कुछ सीख सकते हैं। उम्दा लेखन के लिए अनूप शुक्ल जी को बहुत बहुत
बधाई
 

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Saturday, October 12, 2019

कमलेश पांडेय को ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान की बधाई

आज कमलेश पांडेय को वलेस घराने का तीसरा ज्ञान चतुर्वेदी मिलना है। महाकाल की नगरी उज्जैन में। इसके साथ ही कमलेश जी वरिष्ठ व्यंग्यकार भी हो गए। इस सम्मान के लिए कमलेश जी को बधाई

यह तीसरा ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान वलेश घराने का चौथा सम्मान है। वलेस का पहला सम्मान निर्मल गुप्त और लखनऊ के एक अन्य साहित्यकार को मिला था जो शायद अब वलेस में हैं नहीं।
इसके साथ ही कमलेश जी के परिचय में सम्मान के आगे कोई नहीं वाली जगह अब 'ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान' लिखा जा सकेगा।
वलेस सम्मान को भी
बधाई
मध्य प्रदेश की परिधि से बाहर निकलकर दिल्ली की कक्षा में स्थापित होने के लिए।
कमलेश पांडेय ठहर कर लिखने वाले आलसी घराने के लेखक हैं। दिल्ली की नौकरी का मारा , वरिष्ठ व्यंग्यकार बेचारा। इनके आलस्य को कोंचकर इनको जगाना पड़ता है तब उससे इनका लेखन बाहर आता है। आलोक पुराणिक की संगत का कोई असर नहीं पड़ा उन पर। उनका यह आलस्य किताब छपने-छपाने में भी हावी रहता है।
इस कार्यक्रम में मुझे भी शामिल होना था। रिजर्वेशन बहुत पहले ही करा रखा था लेकिन दफ्तरी व्यस्तताओं के चलते निरस्त कराना पड़ा। कमलेश जी को सम्मानित होते फोटुओं में देखना पड़ेगा अब।
'सेल्फी बसन्त के साथ' कमलेश जी सबसे ताजी किताब है। इसके छपने की योजना मंडी हाउस में चाय की दुकान पर बनी। संयोग कि इस छपाई की साजिश में शामिल आलोक पुराणिक और अनूप शुक्ल उज्जैन जाने से वंचित रह गए। महाकाल ने केवल कमलेश पांडेय को चुना अपनी कृपा प्रदान करने के लिए। जय हो महाकाल की।
सम्मान समारोह की झलकियां अब फोटुओं , वीडियो में ही देखने को मिलेंगी। पता नहीं भोपाल में रहने वाले रवि रतलामी जी जैसा कोई प्रतिबद्ध रिकॉर्डर उज्जैन में होगा कि नहीं जो पूरे कार्यकरण की अविकल रिकार्डिंग उपलब्ध करा सके।
बहरहाल कमलेश जी एक बार फिर से
बधाई
बधाई
टीम वलेस को इस कार्यक्रम के सफल आयोजन की।

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Tuesday, October 08, 2019

मस्जिद की दीवार पर संस्कृत

कल बुरहानपुर टहलना हुआ। मध्यप्रदेश में खण्डवा और भुसावल के बीच बसा हुआ बुरहानपुर सूत और कपड़े की बड़ी मंडी है। 400-450 साल पहले यहां के सूती कपड़ों का जलवा ऐसा था कि इसके चलते इंग्लैंड में वहां का कपड़ा उद्योग खस्ताहाल हो गया। भारत से आने वाले कपड़े पर पाबंदी लगाई गई।
बुरहानपुर में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं। यहीं पर मुमताजमहल 39 साल की उमर में 13 बच्चे को जन्मते हुए 'शांत' हो गयी थी। आगरे के ताजमहल के बनने तक यहीं एक कब्रगाह में उनका शव रखा था। ताजमहल बनने के उनका शव आगरे ले जाकर दफनाया गया।
बुरहानपुर की प्रसिद्द इमारतों में से एक है काले पत्थर की बनी मस्जिद । इसे यहां जामा मस्जिद कहते हैं। मंदिर के मोअज्जिन मुस्ताक अहमद के अनुसार मस्जिद 450 साल पुरानी है। काले पत्थर की बनी इस मस्जिद की खासियत है कि इसमें कोई छत नहीं है। पूरी इमारत खम्भों पर टिकी है। नीचे से ऊपर जाते हुए खम्भे चौड़े होते गए और इन पर ही मस्जिद की इमारत टिकी हुई है।
मस्जिद की दूसरी खासियत इसमें मस्जिद बनवाने वाले शासक की संस्कृत में लिखी तारीफ है। फारुखी वंश के शासक को सूरज और चांद के समान बताते हुए तारीफ की गई है।
मस्जिद में संस्कृत में लिखी इबारत को देखकर कानपुर के प्रसिद्ध गीतकार अंसार कम्बरी Ansar Qumbri के गीत की पंक्तियां याद आ गईं:
शायर हूं कोई ताजा गजल सोच रहा हूं,
फुटपाथ पर बैठा हूं महल सोच रहा हूं।
मंदिर में नमाजी हो और मस्जिद में पुजारी,
हो किस तरह से ये फेरबदल सोच रहा हूं'।
मंदिर के अहाते में ही शाही कब्रें बनी हुई हैं। कभी रोब-दाब से जीने वाले शाही वंशजों की कब्रों पर एक कौआ बैठा अपने पंजों में दबे सामान का नाश्ता कर रहा था। एक कब्र पर बैठे ऊब गया तो उचककर दूसरी पर बैठ गया। शाही कब्रों के को धूप और बारिश से बचाने वाला मोमिया फटकर किसी झंडे की तरह फड़फड़ा रहा था।
मोअज्जिन साहब की उम्र 70 के करीब थी। हाथ-पैर जिस तरह से हिल रहे थे उससे लगा कि फालिज के झटके से उबरे हैं। 30 से मस्जिद में अजान दे रहे हैं। मस्जिद का ख़र्च यहां से लगी दुकानों के किराए से आता है। शायद कुछ चन्दा भी आता हो।
मस्जिद में घुसते हुए दोनों तरफ चबूतरे बने हुये हैं। कोई उनपर बैठकर आराम कर सकता है। मस्जिद के सामने दो तालाबों में पानी है। वजू करने के लिए पत्थर के पीढ़े बने हैं। वहीं एक मिट्टी के बर्तन में पानी रखा था। एक गिलहरी पानी पीते हुए गर्दन हिलाते हुए पानी को अंदर रखती जा रही थी। उसको देखते हुए दूसरी गिलहरी भी आ गयी। वह भी पानी पीने लगी।
मस्जिद के बाहर सड़क पूरी गुलजार थी। एक महिला सड़क को घर के आंगन की तरह आबाद किये बर्तन धो रही थी। अंगीठी पर रखी पतीली पर कुछ पक रहा था। पानी रखने के लिए ड्रम में का भी इंतजाम था।
मस्जिद को देखकर हम आगे बढ़ लिए। आगे ताप्ती नदी के किनारे बना किला हमारा इंतजार कर रहा था।

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Saturday, October 05, 2019

बर्फ़ सड़क खा जाती है

भारत के आखिरी गांव थांग से लौटते हुये शाम हो गयी थी। तसल्ली से आराम किये। गेस्ट हाउस में खान-पान का चौकस इंतजामा। मौसम खुशनुमा।

हुंडर में फ़ोन बन्द था। घर में सबको पहले ही बता दिया था - फ़ोन नहीं मिलेगा। जब कभी बहुत जरूरत हुई तो ड्राइवर के फ़ोन से बात कर ली।
हमारे एक अजीज दोस्त से लेह में फ़ोन बात हुई थी। उसने कहा -’सुना है पहाडों पर आसमान में तारे नहीं दिखते। देखकर बताना ऐसा है क्या?’
रात में निकले देखने आसमान। तारे नदारद। कोना-कोना देख लिया। कोई तारा नहीं दिखा। शायद यह उसी दिन की बात हो। लेकिन यह बात पक्के तौर पर कहना मुश्किल कि पहाड़ों पर आसमान में तारे नहीं दिखते।



सुबह पैंगोंग लेक जाना तय था। ड्राइवर ने जल्दी निकल लेने की बात कही। देर होने पर सूरज की रोशनी में बर्फ़ पिघलकर सड़क खा जाती है। रास्ता रुक सकता है। पानी के बहाव से सडक कट जाने की बात तो सुनी थी। लेकिन पिघली हुई बर्फ़ द्वारा सड़क खा जाने की बात पहली बार सुनी। रास्ते में कई जगह देखा भी। पिघली हुई बर्फ़ सड़क खा गई थी। बगल के रास्ते से पत्थरों के बीच से आगे निकले।
रास्ते में कई जगह झरने, नदियां मिलीं। पहाड़ से निकलती नदियां पहाड़ का सहारा लेते हुये धड़ल्ले से बह रही थीं। पहाड़ की दीवार के सहारे नीचे उतरती नदी ऐसी लग रही थी मानों वह कायनात से छुपन-छुपाई खेल रही हो।
जगह-जगह बाइकर्स मिले। हेलमेट धारी बाइकर्स की टोली सड़क पर धड़धड़ाती हुई चलती। जहां सड़क कट गयी थी वहां जैसे पत्थरों के खेत से गुजरते हुये आगे बढे। गिट्टियों के ऊपर गाड़ी हिचकियां जैसी लेती हुई चल रही थी।

रास्ते में कई जगह ढाबे मिले। चयास लगी। लेकिन ड्राइवर जल्दी से जल्दी सारी सड़क नाप लेना चाहता था। किसी अवरोध के आने के पहले वह पैंगोंग पहुंच जाना चाहता था। इसलिये चाय कि इच्छा दुरबुक तक दबानी पड़ी।
दुरबुक पैंगोंग के पहले का बड़ा कस्बा है। चौड़ी सड़क के दोनों ओर ढाबे। मैगी और चाय का सेवन किया गया। इस इलाके में खास तरह की नमकीन चाय मिलती है। उल्टी वगैरह में फ़ायदेमन्द। दुकान महिलायें चलाती हैं। स्मार्ट फ़ोन धारी स्मार्ट महिलायें। सेवा प्रदान करते के बाद मोबाइल में व्यस्त हो जातीं। फ़टाफ़ट सेवा। खुशनुमा एहसास। पहुंचते ही ड्राइवर उनसे स्थानीय बोली में गपियाने लगा। उसकी चाय-नाश्ते के पैसे लेने से मना कर दिया दुकानदारों ने।
दुरबुक से आगे बढने पर याक दिखने लगे। कहीं-कहीं खच्चर-गधे भी दिखे। अकेले चरते हुये गधे अपने में मस्त दिखे। वैसे भी गधे अपने में ही मस्त रहते हैं।
एक जगह गाड़ियां रुकीं थी। हम भी रुक गये। सड़क से थोड़ी दूर मिट्टी के टीलों में बने खोह में नेवले टाइप के जीव दिख रहे थे। लोग उनकी फ़ोटो ले रहे थे। वीडियो बना रहा थे। हम भी जुट गये। मुरमुथ नाम बताया इस जीव का। ये जीव अपने खोह के बाहर ऐसे बैठे हुये थे जैसे कोई अपने घर के बाहर सड़क पर चारपइया डालकर धूप सेंक रहा हो।

मुरमुथ दर्शन के बाद हम लोग पैंगोंग झील की तरफ़ बढे। कुछ देर में पहुंच भी गये वहां। भारत, तिब्बत और चीन के बीच पसरी हुई लेक झील लगभग 134 किमी लम्बी है। जाड़े में झील जम जाती है। झील का पानी एकदम साफ़ । सर्फ़ एक्सेल से धुला हुआ सा। अपनी खूबसूरती का एहसास था शायद पानी को। इसीलिये वह इठलाते हुये झील में लहरा रहा था।
पैंगोंग झील को पहले शायद लेह-लद्दाख को कम लोग जानते थे। थ्री ईडियट फ़िल्म के आखिरी दृश्य इस झील के किनारे फ़िल्माये जाने के बाद झील धुंआधार पापुलर हो गयी। पर्यटकों की संख्या बढ गयी। आसपास के गावों के लोगों का रोजगार बढा । एक लोकप्रिय किताब, एक पापुलर फ़िल्म लोगों की रोजी-रोटी का अवसर भी पैदा कर सकती है।
झील तो वैसी ही बल्कि ज्यादा कहीं बहुत ज्यादा खूबसूरत दिखी जैसी पिक्चर में थी अलबत्ता फ़िल्म में दिखाया गया रैंचों स्कूल इस जगह से सैंकडों किमी दूर लेह में है। फ़िल्म में लेह का स्कूल उठाकर पैंगोंग में धर दिया गया है। लेकिन यह कोई नई बात नहीं। फ़िल्मों में ऐसा तो होता ही है।
लेकिन इन सब बवालों में पड़े बिना हम पैंगोंग झील की खूबसूरती निहारने में जुट गये। आप भी देखिए हमारी निगाह से।
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Saturday, September 21, 2019

'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' को वर्ष 2018 का गुलाब राय सर्जना पुरस्कार


मेरी किताब 'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' को उप्र हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2018 के गुलाब राय सर्जना पुरस्कार के लिए चयनित होने की सूचना मिली। इस पर 40000/- का इनाम मिलेगा। यह पुरस्कार निबन्ध विधा में है।

इसके पहले मेरी किताब 'सूरज की मिस्ड कॉल' पर वर्ष 2017 का 75000/- सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' सम्मान मिला था।
इनाम की सूचना सबसे पहले हमारे Dayanand Pandey जी ने दी। उनका सादर आभार। दयानन्द जी को पिछले वर्ष हिंदी सहित्य संस्थान का 2 लाख रुपये का सम्मान मिला था।
किताब में पिछले कुछ सालों में कानपुर की घुमक्कड़ी के किस्से हैं। घुमक्कड़ी से पाया अनुभव ही इस घुमक्कड़ी की कमाई है। इसीलिए हमारी किताब का नाम रखने वाले और हमारी किताबों के स्थाई भूमिका लेखक व्यंग्य पंडित Alok Puranik ने इसका नाम तय किया था 'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी।'
नाम तय करने के साथ ही भूमिका भी लिखी है आलोक जी ने और बताया थाकि अनूप शुक्ल को वो वृत्तान्तकार किस लिए मानते हैं।
किताब समर्पित है अपने बचपन से बड़े होने तक के कनपुरिया संगी-साथी Sharad Prakash Agarwal , Jaidev Mukherjee संतोष बाजपेई, Vikas Telang , Ajay Tiwari, राजीव मिश्र, अनिल श्रीवास्तव , लक्ष्मी बाजपेयी, ब्रजेश शुक्ल और Rakesh Dwivedi को जिनके साथ जिया समय अपन की जिंदगी की सबसे बड़ी नियामतों में से एक है।
किताब रुझान प्रकाशन से आई है। शुक्रिया किताब के प्रकाशक Kush Vaishnav का जिन्होंने हमारी किताबें छापना शुरू करके हमको लेखक बना दिया।
इस सम्मान में हमारे सबसे बड़ा योगदान हमारे पाठकों का है जो हमारे लिखे को बांचते हैं और हमेशा उत्साह बढाते हैं। उनके प्रोत्साहन के बगैर न कोई किताब सम्भव थी न कोई इनाम। सभी पाठक संगी-साथियों को मन से आभार।

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Saturday, September 14, 2019

हिन्दी दिवस के कुछ अनुभवों से


१. सितम्बर का महीना देश में हिन्दी का महीना होता है। हिन्दी नहीं, राजभाषा का। देश भर में राजभाषा माह, पखवाड़ा, सप्ताह, दिवस मनाया जाता है। श्रद्धा और औकात के हिसाब से। क्या पता कल को राजभाषा घंटा, मिनट या फ़िर सेकेंड भी मनाया जाने लगे।
२. एक दक्षिण भारतीय ने बताया कि -पहले उनको लगता था हिन्दी कविता में हर पांचवी लाइन के बाद वाह-वाह बोला जाता है।
३. एक कवि ने अपनी किसी कविता में ’कड़ी’ शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने उसको ’कढ़ी’ समझकर ग्रहण किया और कल्पना करते रहे कि क्या स्वादिष्ट कल्पना है।
४.आज अगर नेता, पुलिस पर कविता लिखना बैंन हो जाये तो आधे हास्य कवि या तो बेरोजगार हो जायें।
५.आपातकाल में तमाम लोगों ने इस तरह की कवितायें लिखीं जिनके व्यापारियों के खातों की तरह दो मतलब होते थे। एक जो सारी जनता समझती थी दूसरा वह जिसे सिर्फ़ वे समझते थे। अपना मतलब उन्होंने दुनिया भर को आपातकाल के बाद बताया और अपने लिये क्रांतिकारी कवि का तमगा गढ़कर खुदै ग्रहण कल्लिया।
६. एक कवि सम्मेलन में वीर रस के कुछ कवियों ने पाकिस्तान कोी गरियाया। पाकिस्तान को गरियाते हुये एक ने तो इत्ती जोर से कविता पढ़ी कि मुझे लगा कि अगर पाकिस्तान कहीं उसको सुन लेता तो एकाध फ़ुट अफ़गानिस्तान की तरफ़ सरक जाता।
७. पाकिस्तान में भी हिन्दुस्तान के विरोध में वीर रस की कवितायें लिखीं और चिल्लाई जाती होंगी। सोचता हूं कि क्या ही अच्छा हो कि दोनों देश की वीर रस की कविताओं की ऊर्जा को मिलाकर अगर कोई टरबाइन चल सकता तो इत्ती बिजली बनती कि अमेरिका चौंधिया जाता। ऐसा हो सकता है। दोनों देशों के वीर रस के कवि जिस माइक से कविता पाठ करें उसके आवाज बक्से के आगे टरबाइन फ़िट कर दी जाये। इधर कविता शुरू हो उधर टरबाइन के ब्लेड घर्र-घर्र करके चलने लगें और दनादन बिजली उत्पादन होने लगे। बिजली के तारों पर सूखते कपड़े जलकर खाक हो जायें। हर तरफ़ रोशनी से लोगों की आंखें चमक जायें।
८.हिन्दी लिख-पढ़ लेने वाले लोग हिन्दी दिवस के मौके पर पंडितजी टाइप हो जाते हैं। उनके हिन्दी मंत्र पढ़े बिना किसी कोई फ़ाइल स्वाहा नहीं होती। काम ठहर जाता है। हिन्दी का जुलूस निकल जाने का इंतजार करती हैं फ़ाइलें। हिन्दी सप्ताह बीते तब वे आगे बढ़ें।
९. हिन्दी दिवस के दिन साहब लोग हिन्दी का ककहरा जानने वालों को बुलाकर पूछते हैं- पांडे जी अप्रूव्ड को हिन्दी में क्या लिखते हैं? स्वीकृत या अनुमोदित? ’स’ कौन सा ’पूरा या आधा’ , ’पेट कटा वाला’ या सरौता वाला?
१०. काव्य प्रतियोगिताओं में लोग हिन्दी का गुणगान करने लगते हैं। छाती भी पीटते हैं। हिन्दी को माता बताते हैं। एक प्रतियोगिता में दस में से आठ कवियों ने हिन्दी को मां बताया। हमें लगा कि इत्ते बच्चे पैदा किये इसी लिये तो नही दुर्दशा है हिन्दी की?
११. कवि आमतौर पर विचारधारा से मुक्ति पाकर ही मंच तक पहुंचता है। किसी विचारधारा से बंधकर रहने से गति कम हो जाती है। मंच पर पहुंचा कवि हर तरह की विचारधारा जेब में रखता है। जैसा श्रोता और इनाम बांटने वाला होता है वैसी विचारधारा पेश कर देता है।
१२. कोई-कोई कवि जब देखता है कि श्रोताओं का मन उससे उचट गया तो वो चुटकुले सुनाने लगता है। वैसे आजकल के ज्यादातर कवि अधिकतर तो चुटकुले ही सुनाते हैं। बीच-बीच में कविता ठेल देते हैं। श्रोता चुटकुला समझकर ताली बजा देते हैं तो अगला समझता है- कविता जम गयी।
१३. विदेश घूमकर आये कवि का कवितापाठ थोड़ा लम्बा हो जाता है। वो कविता के पहले, बीच में, किनारे, दायें, बायें अपने विदेश में कविता पाठ के किस्से सुनाना नहीं भूलता। सौ लोगों के खचाखच भरे हाल में काव्यपाठ के संस्मरण सालों सुनाता है। फ़िर मुंह बाये , जम्हुआये श्रोताओं की गफ़लत का फ़ायदा उठाकर अपनी सालों पुरानी कविता को -अभी ताजी, खास इस मौके पर लिखी कविता बताकर झिला देता है।
१४. कोई-कोई कवि किसी बड़े कवि के नाम का रुतबा दिखाता है। दद्दा ने कहा था- कि बेटा तुम और कुछ भी न लिखो तब भी तुम्हारा नाम अमर कवियों में लिखा जायेगा। कुछ कवि अपने दद्दाओं की बात इत्ती सच्ची मानते हैं कि उसके बाद कविता लिखना बंद कर देते हैं। जैसे आखिरी प्रमोशन पाते ही अफ़सर अपनी कलम तोड़ देते हैं।
१५. बिहार से रीसेंटली अभी एक मेरे फ्रेंड के फादर-इन-ला आये हुए थे, बताने लगे - 'एजुकेसन का कंडीसन भर्स से एकदम भर्स्ट हो गया है. पटना इनुभस्टी में सेसनै बिहाइंड चल रहा है टू टू थ्री ईयर्स. कम्प्लीट सिस्टमे आउट-आफ-आर्डर है. मिनिस्टर लोग का फेमिली तो आउट-आफ-स्टेटे स्टडी करता है. लेकिन पब्लिक रन कर रहा है इंगलिश स्कूल के पीछे. रूरल एरिया में भी ट्रैभेल कीजिये, देखियेगा इंगलिस स्कूल का इनाउगुरेसन कोई पोलिटिकल लीडर कर रहा है सीजर से रिबन कट करके.किसी को स्टेट का इंफ्रास्ट्रक्चरवा का भरी नहीं, आलमोस्ट निल 🙂 ( १५ नम्बर रिटेन by Indra Awasthi)

Thursday, September 12, 2019

बस निकल लो गुरु आगे जो होगा देखा जाएगा



लेह से भारत के आखिरी गांव थांग तक के रास्ते में कई बाइकर्स मिले। मोटरसाइकिल पर धड़धड़ाते जाते। खरदुंगला पास पर भी कई टोलियां मिलीं। उनमें कुछ लड़कियां भी थीं। इन बाइकर्स को देखकर लगा कि यही असल जिंदगी यही है, घूमना। यायावरी, घुमक्कड़ी। बाकी तो सब ऐं-वैं ही है।

जो बाइकर्स मिले थांग में वे कोलकता से आये थे। उनमें से एक कोल इंडिया में काम करते थे। दूसरे किसी प्राइवेट फर्म में और तीसरे अभी नौकरी के चक्कर से बचे थे। कुछ और साथी भी साथ में आये थे। लेकिन एक का गाजियाबाद के पास कहीं एक्सीडेंट हो गया था तो वो लौट गए वापस।
काफी समय तक उनके यात्रा के अनुभव सुने। उनके खर्च के बारे में जानकारी ली। अपनी बचत के पैसे ख़र्च करके यात्रा कर रहे थे ये बाइकर्स। मुझे अपनी साइकिल यात्रा की याद आई। बिहार में एक जगह एक दरोगा जी ने हमको अपने पास के सारे पैसे खर्चे के लिए दे दिए थे। उसको याद करके भावुक हो गए अपन। मुझे लगा कि दरोगा जी के वे पैसे हमारे पास जमा हैं। उधार हैं। हमने तुरन्त लगभग जबरदस्ती उन बाइकर्स में से एक को कुछ पैसे ख़र्च के लिए दिए।


मेरे पैसे देने से उनके खर्चे नहीं पूरे होने वाले। लेकिन 35 साल पहले का एक अच्छा अनुभव मेरे मन मे कल के अनुभव की तरह सुरक्षित था। उसने मुझे मजबूर सा किया कि हम भी वैसा ही करें। जो प्रेम मिला मुझे वह आगे बढ़ाएं।किसी के साथ कि अच्छाइयां कभी बेकार नहीं जाती। वे आगे और कई गुना खूबसूरत होकर निखरती हैं।
उन बाइकर्स से विदा होकर हम वापस लौटे। वे रास्ते में कई बार मिले। जितनी बार मिले, हमने तय किया कि दुनिया घूमनी है एक दिन। अब वह दिन कब आएगा यह तो पता नहीं लेकिन यह यकीन है कि एक दिन आएगा जरूर।


जब भी ऐसे घुमक्कड़ों को देखते हैं तो मन करता है कि अपन भी निकल लें। याद आता है कि कालेज के दिनों में कैसे निकल लिए थे, बिना कुछ आगा-पीछा सोचे। तीन महीने साइकिल चलाई। इलाहाबाद से कन्याकुमारी तक हो आये। 35 से भी पहले की कहानी है यह। लेकिन लगता है कल की बात है। मन करता है कि फिर निकल लें। पूरी दुनिया घूमने। लेकिन दुनिया के इतने लफड़े कि बस सोच कर ही रह जाते हैं। स्व. शायर वाली असी के शेर याद आते है:
मैं रोज मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था
मगर सफ़र न कभी एख़्तियार (शुरू)करता था।
तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैँ जिंदगी पे बहुत एतबार (भरोसा)करता था।
तमाम उम्र सच पूछिये तो मुझ पर
न खुल सका कि मैं क्या कारोबार करता था।
मुझे जबाब की मोहलत कभी न मिल पायी
सवाल मुझसे कोई बार-बार करता था।
लौटकर लेह में देखा कि वहां मोटरसाइकल किराये पर भी मिलती हैं। यात्रा के शौकीन लोग वहां से किराये पर लेकर टहलने निकल सकते हैं। आप का भी मन कर रहा हो तो बस निकल लो गुरु बाकी जो होगा देखा जाएगा।

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