Tuesday, June 15, 2021

कानपुर की लाल इमली

 

यह फोटो हमारे मित्र Rajeev Sharma ने भेजते हुए अपन से मजे लिए -'अगर इस फोटो में (डॉ शुक्ला का) इश्तहार न होता तो यह इमारत लन्दन में किसी जगह की इमारत लगती।'

यह इमारत कानपुर की लाल इमली की है। लाल इमली कभी ऊनी कपड़ों के लिए देश भर में प्रसिद्ध थी। फिलहाल वर्षो से ताला बन्दी की मार झेल रही है। अक्सर इसके फिर से चलने की बात चलती है लेकिन फिर ठहर जाती है। मिल नहीं चलती।
कानपुर की शान रही इस मिल के अलावा कभी कानपुर में अनेकों मिलें थीं। कानपुर पूर्व का मानचेस्टर कहलाता था। धीरे-धीरे मिलें बन्द होती गईं। मिलों के कामगार बेरोजगार हो गए। कोई रिक्शा चलाने लगा, कोई मजदूरी करने लगा। कभी भारत का मानचेस्टर कहलाने वाला शहर कुली-कबाड़ियों का शहर बन कर रह गया।
वैसे तो कानपुर में आई.आई.टी., एच. बी.टी.आई. , मेडिकल कॉलेज के अलावा कई रक्षा उत्पादन के संस्थान भी हैं, जिनमें कामगारों की संख्या दिन पर दिन सिकुड़ती जा रही है, लेकिन कानपुर के हाल-बेहाल होते जा रहे हैं। किसी शहर की सेहत उसकी लोगों को रोजगार और रोजी-रोटी मुहैया करा सकने की क्षमता से नापी जाती है। हालांकि अभी भी कानपुर के आस-पास रहने वाले लोग रोजी-रोटी की तलाश में कानपुर ही आते हैं लेकिन यह भी सच है कि मस्ती के अंदाज में 'झाड़े रहो कलक्टरगंज' कहने वाले शहर के दुश्मनों की तबियत अक्सर नासाज ही रहती है। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि जिस शहर में कभी कपड़ा मिलों का जाल बिछा था, वह शहर अब मसाले- गुटखे-जर्दे के उत्पादन के लिए जाना जाता है।
कनपुरियों के पान मसाले के प्रचलित कई किस्सों में एक मसाला प्रेमी अमृत पीने का ऑफर यह कहते हुए ठुकरा देता है -'अभी मसाला खाये हैं।'
बहरहाल बात लाल इमली की इमारत और उस पर डॉ शुक्ला के इश्तहार की हो रही थी। यह भी तो हो सकता है कि यह इमारत लन्दन की ही कोई इमारत हो और उस पर वहीं के किसी डॉ शुक्ला का इश्तहार हो। आखिर लन्दन में भी तो डॉ शुक्ला हो सकते हैं।
लन्दन की बात चली तो याद आया कि प्रख्यात लेखक यूसुफी साहब ' खोया पानी' की भूमिका में लन्दन के बारे में लिखते हुए कहते हैं-'यूं लन्दन बहुत दिलचस्प शहर है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि यह गलत जगह स्थित है।'
यूसुफी साहब पाकिस्तान और लन्दन जाने के पहले कानपुर में भी कुछ दिन रहे, कानपुर के किस्से भी लिखे उन्होंने। लन्दन के गलत जगह बसे होने की बात कहते हुए वे कहीं यह तो नहीं कहना चाहते थे कि लन्दन को टेम्स नदी किनारे होने की जगह गंगा किनारे कानपुर में होना चाहिए। ऐसा होता तो कानपुर की लाल इमली लन्दन में ही कहलाती।
युसूफ़ी साहब भले ही ऐसा न सोचते हों लेकिन हमारे ऐसा सोचने में कोई फीस थोड़ी लगती है। है कि नहीं?
वैसे आपको लन्दन में किसी डॉ शुक्ला का पता हो तो बताइए । उनसे कहा जाए कि वे अपना इश्तहार किसी इमारत में लगवाकर फ़ोटो भेजें ताकि हम बता सकें कि लन्दन भी उतना गया बीता नहीं है- वहां भी डॉक्टर ( शुक्ला) मिलते हैं।
सूचना: 'खोया पानी' एक बेहतरीन किताब है। इसका लिंक कमेंट बॉक्स में। 🙂

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Friday, June 11, 2021

क्रांति के रास्ते की कठिनाइयां

 

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के जन्मदिन पर उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके क्रांतिकारी जीवन की कठिनाइयां का वर्णन देखिए।
उन्होंने जैसे-तैसे क्रांतिकारी कार्यो का संचालन किया। क्रांतिकारी पर्चे आये तो उन्हें भी वितरित कराया। पर समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी। वे बताते हैं कि चने मिलना भी कठिन था। " सब पर कुछ न कुछ कर्ज हो गया था। किसी के पास सबूत कपड़े तक न थे। कुछ विद्यार्थी बनकर धर्मक्षेत्रों तक में भोजन कर आते थे। चार-पांच ने अपने-अपने केंद्र त्याग दिए थे। पांच और रुपये से अधिक रुपये मैं कर्ज लेकर व्यय कर चुका था। यह दुर्दशा दे मुझे बड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे भी भरपेट भोजन न किया जाता था। सहायता के लिए कुछ सहानुभूति रखने वालों का द्वार खटखटाया, किंतु कोरा उत्तर मिला। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था। कुछ समझ में न आता था। कोमल हृदय नवयुवक मेरे चारों तरफ बैठकर कहा करते पंडित जी, अब क्या करें? मैं उनके सूखे-सूखे मुंह देख बहुधा रो पडता कि स्वदेशसेवा व्रत लेने कारण फकीरों से भी बुरी दशा हो रही थी। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी ऐसी नहीं थी जो साबुत होती। लँगोट बांधकर दिन व्यतीत करते थे। अंगौछे पहनकर नहाते थे, एक समय क्षेत्र में भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे के सत्तू खाते थे। मैं पन्द्रह वर्ष से एक समय दूध पीता था। इन लोगों की ऐसी देखकर मुझे दूध पीने का साहस न होता था। मैं भी सबके साथ बैठ कर सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि इतने नवयुवकों के जीवन को नष्ट करके उन्हें कहाँ भेजा जाए। जब समिति का सदस्य बनाया था तो लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएं बंधाई थीं। कइयों का पढ़ना-लिखना छुड़ाकर काम मे लगा दिया था। पहले से मुझे यह हालत मालूम होती तो मैं कदापि इस प्रकार की समिति में योग न देता। बुरा फंसा ! क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता था। अंत में धैर्य धारण कर दृढ़तापूर्वक कार्य करने का निश्चय किया।"
सुधीर विद्यार्थी जी की किताब-' मेरे हिस्से का शहर' से साभार।

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पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन

 आज अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जन्मदिन है। उनकी याद को नमन करते हुए उनके जीवन से जुड़े किस्से यहां पेश हैं। कैसी विषम परिस्थियों में जिये हमारे क्रांतिकारी।

मैनपुरी केस में आम माफी की राजकीय घोषणा के पश्चात बिस्मिल शाहजहाँपुर आये। उस समय तक एक क्रांतिकारी के रूप में लोग उनका नाम जानने लगे थे। यहां शहर में वे आये तब उनके लिए सब कुछ बदला हुआ था। उन्होंने लिखा है--" कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था। जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता, वह नमस्ते कर चल देता था। पुलिस का बड़ा प्रकोप था। प्रत्येक समय वह छाया की भांति पीछे-पीछे फ़िरा करती थी। इस प्रकार का जीवन कब तक व्यतीत किया जाए। मैने कपड़ा बुनने का काम सीखना आरम्भ किया। जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे। कोई काम सिखाना नहीं चाहता था। बड़ी कठिनाई से मैंने कुछ काम सीखा। उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का स्थान खाली हुआ। मैंने उसी स्थान के लिए प्रयत्न किया। मुझसे पांच सौ रुपये की जमानत मांगी गई। मेरी दशा बड़ी सोचनीय थी। तीन-तीन दिवस तक भोजन प्राप्त नहीं होता था, क्योंकि मैंने प्रतिज्ञा की थी कि किसी से कुछ सहायता न लूंगा। पिताजी से कुछ कहे बिना मैं चला आया था। मैं पांच सौ रुपये कहां से लाता। मैंने दो-एक मित्रों से केवल दो सौ रुपये की जमानत देने की प्रार्थना की। उन्होंने साफ इंकार कर दिया। मेरे हृदय पर वज्रपात हुआ। संसार अंधकारमय दिखाई देता था। पर बाद को एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई। अब अवस्था कुछ सुधरी। मैं भी सभ्य पुरुषों की भांति जीवन व्यतीत करने लगा। मेरे पास भी चार पैसे हो गए। वे ही मित्र, जिनसे मैंने दो सौ रुपये की जमानत देने की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास चार-चार हजार रुपयों की थैली, अपनी बन्दूक , लाइसेंस सब डाल जाते थे कि मेरे यहाँ उनकी वस्तुएं सुरक्षित रहेंगी। समय के इस फेर को देखकर मुझे हंसी आती थी।"
-सुधीर विद्यार्थी जी की किताब 'मेरे हिस्से का शहर' से साभार।

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शहादत के बाद बिस्मिल का परिवार

 इस मां के संकट के उन दिनों को बिस्मिल की बहन श्रीमती शास्त्री देवी के शब्दों में देखिए-"पिताजी की हालत दुख से खराब हुई। तब विद्यार्थी जी पन्द्रह रुपये मासिक खर्च देने लगे। उससे कुछ गुजर चलती रही। फिर विद्यार्थी जी भी शहीद हो गए। मुझे भी बहन से ज्यादा समझते थे। समय-समय पर खर्चा भेजते थे। माता-पिता, दादा, भाई, दो गाय थीं। रहने के लिए हरगोविंद ने एक टूटा-फूटा मकान बता दिया था, उसमें गुजर करने लगे। वर्षा में बहुत मुसीबत उठानी पड़ी। फिर पांच सौ रुपये पंडित जवाहरलाल जी ने भेजे। तब माता जी ने कहा कि कुछ जगह ले लो। इस तरह के दुख से तो बचें।

नई बस्ती में जमीन अस्सी वर्ग गज ले ली। एक छप्पर एक कोठरी थी। उसमें गुजर की। पिताजी भी चल बसे। माताजी बहुत दुखी हुईं। एक महीने बाद मैं भी विधवा हो गयी। अब दोनों मां-बेटी दुखित थीं। मेरे पास एक पुत्र तीन साल का था। माता जी बोलीं कि मैं तो शरीर से कमजोर हूँ किस तरह दूसरे की मजदूरी करूँ। बिटिया अब क्या करना चाहिए। मैंने कहा कि जहां तक मुझसे होगा, माताजी आपकी सेवा करूंगी, आप धीरज बांधो। ईश्वर की यही इच्छा थी।
माता जी के पास रामप्रसाद जी के सोने तीन टोले तोले के बटन थे। उन्होंने किसी को नहीं बताया, छिपाए रहीं। जाने कैसा समय हो, इसलिए कुछ तो पास रखना चाहिए। पिताजी के स्टाम्प खजाने में दाखिल किए, दो सौ रुपये मिले। फिर बटन बेच दिए। फिर मैंने ईंट-लकड़ी लगाकर एक तिचारा तथा उसके ऊपर एक अटारी बनवाई। ऊपर माता जी ने गुजर की। नीचे का हिस्सा आठ रुपये में किराए पर उठा दिया। आठ रुपये में मैं , माताजी तथा बच्चा रहते थे बहुत ही मुसीबत से। एक समय वह भी कभी-कभी खाना प्राप्त होता था। मैंने एक डॉक्टर के यहां खाना बनाने का काम छह रुपये में कर लिया। माता जी ने सबसे फरियाद की कोई इस बच्चे पढ़ा दो। कुछ कर खायेगा। मगर शाहजहाँपुर में किसी ने ध्यान नहीं दिया।"
कहाँ थे तब बिस्मिल के शहर के राजनेता और समाजसेवी। किसी ने बिस्मिल की मां और उनके पिता को सहारा नहीं दिया। वे कब, कहां और कैसे मरे यह भी किसी को नहीं पता। कोई यादगार नहीं बनी शाहजहाँपुर की धरती पिता मुरलीधर और माँ मूलमती की। इस शहर के किसी सभागार में इनकी तस्वीरें नहीं लटकाई गईं। 1992 में जब मैं इस शहर के खिरनी बाग मुहल्ले में रामप्रसाद बिस्मिल उद्यान का निर्माण करा रहा था तब मैंने बिस्मिल की आदमकद संगमरमर की प्रतिमा के एक ओर मां मूलमती की समाधि भी बनवा दी जिस पर गोरखपुर जेल में बिस्मिल से मां के मिलन की कथा भी दर्ज है।
बिस्मिल की मां और पिता के अंतिम दिन इस शहर के माथे पर कलंक की तरह लगते हैं मुझे। आखिर कौन माफ करेगा हमें। क्या हम बिस्मिल के एक भाई और उनके मां-पिता को स्वाभिमान से जीने और मरने की सुविधा देने लायक भी नहीं थे।
सुधीर विद्यार्थी जी की पुस्तक 'मेरे हिस्से का शहर' के
लेख 'एक मां की आंखें' का अंश
अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के जन्मदिवस पर श्रद्धा सहित।

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Monday, June 07, 2021

स्वांग -एक गांव के बहाने भारतीय समाज की कहानी

 

ज्ञान चतुर्वेदी जी का नया उपन्यास स्वांग पढ़ा। पिछले हफ्ते मंगाया। लगकर पढ़ गए तीन-चार दिन में। 384 पेज का उपन्यास 3-4 दिन में पढ़ लिया जाए यह अपने आप में उसके रोचक, मजेदार और पठनीय होने का प्रमाण है।

उपन्यास के मुखपृष्ठ में लिखे नोट के अनुसार -'एक गांव के बहाने समूचे भारतीय समाज के विडम्बनापूर्ण बदलाव की कथा है' यह उपन्यास।
उपन्यास पढ़ते हुए और खत्म करने पर भी लगता है कि क्या सही में हमारा समाज ऐसा ही चल रहा है अभी तक। कोटरा में स्कूल, थाना, पत्रकारिता, जाति अभिमान, नेतागिरी, रिश्वत के किस्से ऐसे धड़ल्ले से चलते हैं जिनको पढ़ते हुए लगता है समाज अभी भी वहीं ठहरा है जहां वर्षों पहले था। अपराध, बदमाशियां, जाति की समस्याये और नेतागिरी और कमीनेपन के साथ लागू हो गई हैं। पढ़कर दुख होता है कि सब कुछ वैसे का वैसे ही चल रहा है :
तमाशा है जो ज्यों का त्यों चल रहा है,
अलबत दिखाने के लिए कहीं-कहीं सूरतें बदल रहा है।
उपन्यास में बुंदेलखण्ड के बहाने अपने समाज के किस्से बयान किये गए हैं। हर तरफ नीचता की जीत हो रही है। कहीं कोई उम्मीद की किरण नहीं नजर आती -'सिवाय पंडित जी की बिटिया लक्ष्मी के जो अपने बाप-भाई की मर्जी के खिलाफ आगे पढ़ने का तय करती है।' इसके अलावा गजानन बाबू हैं जो रामराज्य लाने के लिए कृतसंकल्प हैं। लेकिन समाज उनको पागल मानकर पहले ही खारिज कर चुका है। शुरू में पागल करार किये गए गजानन बाबू अंततः लॉकअप में पहुंच जाते हैं।
पंडित जी उपन्यास के केंद्रीय चरित्र हैं। उनके चित्रण से रागदरबारी के वैद्य जी अनायास याद आते हैं। श्रीलाल जी ने रागदरबारी में वैद्य जी का परिचय देते हुए लिखा था -'वैद्य जी थे, हैं और रहेंगे।'
सन 1965 में लिखे रागदरबारी के 55 साल बाद लिखे उपन्यास स्वांग में वैद्य जी लगता है पंडित जी के अवतार में आए हैं -हरामीपन की नई कलाओं से लैस होकर। उनके सुपुत्र अलोपी रुप्पन बाबू और बद्री पहलवान का संयुक्त लेकिन संक्षिप्त संस्करण हैं।
ज्ञान जी डिटेलिंग के उस्ताद हैं। बातचीत करते हुए ऐसी-ऐसी ऊंची बातें उनके पात्र कह जाते हैं कि उनके (पात्रों के) खिलाफ एफ. आई.आर. का मामला बनता है कि इतने बेवकूफ लगने वाले पात्र इतनी ऊंची बात मजे-मजे में कह कैसे गए। बहुत पहुंचे हुए पात्र हैं। कहीं कहीं यही डिटेलिंग ज्यादा हुई भी लगती है। जबरियन खींची हुई लगती है। लेकिन रोचकता बनी हुई है इसलिए अखरती नहीं।
उपन्यास में अदालत है तो गवाह भी हैं। जज भी हैं। जज का गुस्सा भी है। जज के गुस्से का कारण उपन्यास के शुरू में ही बताया गया-'सही में तो उनका गुस्सा अपनी बबासीर पर है, वे अपने चूतड़ के भट्टो पर नाराज हो रहे हैं; हमें जे लगता है कि वे हमसे नाराज हैं। देखो, सही बात जे है कि बवासीर का तो वे कुछ कर नहीं सकते, इसीलिए तुमपे गुस्सा निकालते हैं।' पंडिज्जी बोले।
इसे पढ़ते हुए रागदरबारी का यह अंश याद आया-"गवाही देते समय कभी-कभी वकील या हाकिमे इजलास बिगड़ जाते हैं । इससे घबराना न चाहिये। वे बेचारे दिन भर दिमागी काम करते हैं। उनका हाजमा खराब होता है। वे प्राय: अपच, मंदाग्नि और बबासीर के मरीज होते हैं। इसीलिये वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। उनकी डांट-फ़टकार से घबराना न चाहिये। यही सोचना चाहिये कि वे तुम्हें नहीं अपने हाजमें को डांट रहे हैं।"
मजेदार यह है कि ज्ञान के पात्र जजों के गुस्से से सहमते नहीं बल्कि मजे लेते हैं और कहते हैं:
"तो बवासीर को हिरासत में काहे नहीं ले लेते? कर दें स्साली को अंदर? निकाल दें ऑर्डर..." कोई बोला।
"...अंदर ही तो रहती है" किसी ने बवासीर के विषय में बताया।
"सन्देह का लाभ मिलता है बवासीर को।" कहकर हंसे पण्डित जी।
उपन्यास में ऐसे रोचक और मनोरंजक डायलाग जगह-जगह हैं। ज्ञान जी की नजर अद्भुत है इस मामले में। छोटे-छोटे प्रसंगों में इस तरह की विसंगतियां बतकही के दौरान सामने आती हैं। कहीं-कहीं इनकी अधिकता देखकर यह भी लगता है कि इनकी बहुतायत मस्खरी पैदा कर रही है। लेकिन यह शायद लगतार उपन्यास पढ़ने के कारण लगा हो ऐसा।
बुंदेली पृष्टभूमि पर लिखे होने के बावजूद इस उपन्यास की कमजोरी 🙂 यह है कि इसमें ज्ञान जी ने गालियां बहुत कम रखी हैं। लगता है ' हम न मरब' में आई गलियों में हुई आलोचना से अतिरिक्त सावधान हो गए हैं। सिवाय बुंदेली तकियाकलाम 'भैंचो' और 'घण्टा' के सबको भगा दिया अपने उपन्यास से।इस चक्कर में कुछ पात्र तो बेचारे संस्कृतनिष्ठ शब्द तक इस्तेमाल करते हुए दिखे। देखिए:
"हर नली तमंचा नहीं होती। लोकल लुहारों की कारीगरी से बनी चीज को हम नपुंसक का शिश्न मानते हैं।"
भले ही ज्ञान जी के उपन्यासों में गाली का विरोध करने वाले लोग इसे अपनी सफलता माने लेकिन हम तो यही कहेंगे कि ज्ञान जी ने लोगों के दबाब में आकर अपने पात्रों की भाषा सेंसर कर दी। उनके साथ अन्याय किया। 🙂
कुल मिलाकर स्वाँग एक बेहतरीन पठनीय और रोचक उपन्यास है। पढ़कर आनन्द से अधिक अवसाद होता है कि हमारा समाज ऐसा ही बना हुआ है, बल्कि दिन पर दिन खराब होता जा रहा है।
स्वांग पर यह हमारी पहली पाठकीय त्वरित टिप्पणी है। आगे कभी विस्तार से।
किताब हमने जब खरीदी थी तब 399 रुपये की थी। अब कम कीमत पर उपलब्ध है। 244 की मिल रही। खरीद लीजिए। मजे की गारंटी।

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Saturday, June 05, 2021

जैसे उनके दिन बहुरे

 

अभी तक परीक्षाओं में पास होने की तीन डिवीजन थीं- फर्स्ट डिवीजन, सेकेंड डिवीजन और थर्ड डिवीजन। 60 प्रतिशत से ज्यादा नम्बर पाने वाले बच्चे फर्स्ट डिवीजन, 45 और 60 प्रतिशत के बीच वाले बच्चे वाले सेकेंड डिवीजन और 33 प्रतिशत से 45 प्रतिशत वाले बच्चे थर्ड डिवीजन में पास कहलाते थे। थर्ड डिवीजन को गांधी डिवीजन भी कहते थे।
कोरोना काल में इम्तहान मुश्किल हो गए। इम्तहान मतलब संक्रमण का खतरा। पहले इम्तहान टाले गए और अब अंततः निरस्त हो गए। तय हुआ कि बच्चों को उनके पिछले अंको के आधार पर अंक देकर पास किया जाएगा।
जिन बच्चों के पिछले इम्तहानों के कोई नम्बर नहीं होंगे उनको सिर्फ अगली कक्षा में प्रोन्नत किया जाएगा। क्या पता आगे चलकर ऐसे बच्चों की डिवीजन कोरोना डिवीजन कहलाये। बच्चे बतायेंगें -'हम कोरोना डिवीजन में पास हुए हैं।'
होशियार बच्चे थोड़ा दुखी होंगे कि उनके नम्बर कम हुए। 100 प्रतिशत की आशा रखने वाले बच्चे को शायद कम नम्बर मिलें। अखबार में खबर, फोटो इंटरव्यू की आस वाले बच्चे भी निराश होंगे।
इससे अलग बड़ी संख्या उन बच्चों की भी है जो कोरोना की कृपा हाईस्कूल या इंटर पास कर जाएं। जो बच्चे कई सालों से इम्तहानों की देहरी न लांघ पाए वो कोरोंना काल में अगली कक्षा में पहुंच जाए। ऐसे लोग कोरोना के शुक्रगुजार होंगे।
हमारे जान पहचान में ऐसे कई बच्चे हैं जो वर्षों की मेहनत के बावजूद अगली कक्षा में नहीं जा पाये। कोरोना कृपा से वे अब सफल कहलायेंगे। भले ही कोई कहे कि कोरोना के चलते पास हुए वरना फेल हो जाते। लेकिन कहने से क्या होता है। कहलायेंगे तो पास ही भले ही डिवीजन कोरोना डिवीजन हो। बकौल परसाई जी -'अपनी बेइज्जती में दूसरे को शामिल कर लेने से बेइज्जती आधी हो जाती है।' यह तो लाखों लोग शामिल हो गए साथ। बेइज्जती धुंआ-धुंआ हो गयी।
कोरोना डिवीजन ने सिर्फ पास होने का रास्ता नहीं खोला है। इसने तमाम लोगों की रोजी-रोटी और नौकरी बचाने का रास्ता भी बनाया है। कई विभागों में अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पाने वालों को हाई स्कूल पास होना अनिवार्य होता है। नौकरी लगने के पांच साल में हाईस्कूल पास न होने की स्थिति में नौकरी से निकाल दिए जाने का प्रावधान होता है। कोरोना डिवीजन ऐसे तमाम लोगों के लिए वरदान की तरह है जो कई प्रयासों के बाद अब यह सोचने लगे थे -'नौकरी छूटने के बाद क्या करेंगे?'
ऐसा एक उदाहरण हमारी निर्माणी में ही है। उसको नौकरी मिले पांच साल होने वाले थे। अभी तक के हाल देखकर यही लगता था कि उसकी नौकरी अब बस चन्द महीने की ही मोहताज है। लेकिन कोरोना काल में लोगों को प्रोन्नत करने के निर्णय से लगता है वह भी प्रोन्नत हो जाएगा। उसकी नौकरी बच जाएगी और वह जिंदगी भर इसके लिए शायद कोरोना का शुक्रगुजार हो।
आपदाएं किसी के लिए वरदान भी लेकर आती हैं।
पास होने के लिए मोहताज लोगों के लिए कोरोना डिवीजन एक वरदान की तरह है। उनके दिन फिर गए इस वरदान से।
जैसे उनके दिन बहुरे वैसे सबके बहुरे।

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प्रेम

 इंसान के व्यक्तित्व का एक हिस्सा होता है जो हमेशा प्रेम को अस्वीकार करता है। यह वह हिस्सा होता है जो नष्ट होना चाहता है। ऐसे हिस्से को हमेशा अनदेखा/माफ किया जाना

चाहिए।
"There is always a part of man that refuses love ;it is that part which wants to die;it is that part which needs to be forgiven".
-अल्वेयर कामू
बमार्फत Shree Krishna Datt Dhoundiyal

Friday, June 04, 2021

यह क्या हो रहा है?

 आजकल खबरों में सच और झूठ , अफवाह और वास्तविकता इस कदर घुली मिली है कि असलियत पता नहीं चलती। लुटने वाला चोर साबित हो रहा है, जिसको जुतियाया जाना चाहिए उसकी जय बोली जा रही है। यह सब क्या है -'हमारे एक मित्र भन्नाते हुए बोले।'

यह जादुई यथार्थवाद है। मार्खेज का नाम सुने हो? जादुई यथार्थवाद उसी के नाम पर चला है। हजार साल पहले की बात आज घटती हुई बताता है। आज की बात को हजार साल पहले घटी बताता है। सब गड्ड-मड्ड। मार्खेज तो लिखकर चला गया, हमारा समाज उसको जी रहा है। यह जो हो रहा है न , वह जादुई यथार्थवाद है। हमारा समाज जादुई यथार्थवाद जी रहा है। हमारे दोस्त ने अंगड़ाई लेते हुए बताया।
हम जिस दोस्त को बुड़बक समझते थे वह सुबह-सुबह इतने ज्ञान की बात कह गया। हम समझ नहीं पा रहे कि क्या कहे? मन कह रहा है कि धृतराष्ट्र की तरह आंख मिचमिचा के पूछें - यह क्या हो रहा है?

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Thursday, June 03, 2021

साइकिल दिवस के बहाने

 

आज विश्व साइकिल दिवस है। 2018 से ही मनाया जाना शुरू हुआ। यूनाइटेड नेशन की जनरल असेम्बली में तय हुआ कि 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाएगा। तय हो गया तो मनाया जाने लगा।
किसी के नाम से कोई दिन मनाया जाए तो समझ लीजिये उसका अस्तित्व खतरे में है। या तो उसकी फोटो पर माला चढ़ गई है या फिर मामला सिर्फ यादों तक ही सिमटने वाला है।
साइकिल दिवस मनाया जाना भी इसी खतरे की तरफ इशारा है। दुनिया में साईकिलें कम होने लगी हैं। कम भले हुई हैं फिर भी चल तो बहुत रही हैं। चलती भी रहेंगी इंशाल्ल्लाह। जैसे पेट्रोल, डीजल के दाम तरक्की कर रहे हैं उससे लगता है साइकिल की सवारी भी लोकप्रिय होगी। मजबूरी का नाम साइकिल सवारी होगा।
बचपन में सुदर्शन जी का लेख साइकिल की सवारी पढ़ने तक साइकिल चलाना सीख गए थे। पहले कैंची चलाना सीखे फिर उचक के डंडे पर बैठकर और फिर गद्दी पर। लेकिन साइकिल अपनी नहीं थी। दोस्तों की साइकिल चलाते रहे।
इलाहाबाद में किराये की साइकिल चलाई। शायद 30 पैसे घण्टा। हॉस्टल का कमरा नम्बर लिखवाकर साईकल किराये पर मिल जाती।
इलाहाबाद में पढ़ने के दौरान ही साईकल से भारत यात्रा का प्लान बना। झटके में। बहुत अचानक ही तय कर लिया कि साइकिल यात्रा पर जाना है। तीन दोस्त साथ।
दीवानगी इतनी कि इम्तहान के दौरान साईकल यात्रा की तैयारी भी करते। इम्तहान होते ही निकल लिए। 1 जुलाई , 1983 को। अपनी टीम का नाम रखा हम लोगों ने -'जिज्ञासु यायावर।' नाम के पीछे अज्ञेय जी कविता -'अरे यायावर रहेगा याद' का कितना हाथ था कहना मुश्किल। क्या पता उस समय तक पढ़े ही न हों यह कविता।
बहरहाल हम निकले 1 जुलाई को और तीन महीने में उप्र , बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, पांडिचेरी, तमिलनाडु होते हुए तय समय पर 15 अगस्त को कन्याकुमारी पहुंच गए। लौटते में केरल, कर्नाटक, गोआ, मुंबई, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश होते हुए 2 अक्टूबर को वापस इलाहाबाद पहुंच गए।
रास्ते में दोस्तों के घर, ढाबे, मन्दिर, मस्जिद, धर्मशाला, थाना, स्कूल , पुलिया मतलब जहां भी जगह मिली रुके। वह अनुभव अभी भी उकसाता है फिर कहीं निकल लेने को। लेकिन लड़कपन का मन अब कहां। समझदारी जोखिम लेने से रोकती है।
बाद में बहुत दिन तक साइकिल छूटी रही। जबलपुर में फिर शुरू हुई। पूरा जबलपुर साईकिल से घूमा। खूब चलाई साईकिल। एक दिन में सत्तर किलोमीटर तक। साइकिल से 'नर्मदा परिक्रमा' का विचार भी किया कई बार लेकिन अमल में नहीं ला पाए। जोखिम लेने और आवारगी का जज्बा वो नहीं रहा जो लड़कपन में था।
फिर कानपुर और अब शाहजहांपुर में भी साइकिल चलाना जारी रहा। 'शाहजहांपुर साइकिल क्लब' के साथियों के साथ इतवार को साइकिल चलाना शुरू हुआ। अलग से भी चलाते। एक दिन सिंधौली तक गए। लेकिन फिर कोरोना ने डरा दिया और साइकिल कोरोना को कोसती हुई गैराज में धरी है। देखिए कब चलेगी फिर से।
बहरहाल आज विश्व साइकिल दिवस के मौके पर सभी साइकिल चलाने वालों को
बधाई
। आप भी शुरू करें साइकिल चलाना। मजा आएगा। अच्छा लगेगा।

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Saturday, May 29, 2021

इब्ने शफी, बी.ए के पंच

 "जब एक आदमी पागल हो जाता है तो उसे पागलखाने में बंद कर देते हैं और जब पूरी कौम पागल हो जाती है तो ताकतवर कहलाने लगती है।"

-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'अनोखी रक्कासा' से।

शहंशाहियत में तो सिर्फ एक नालायक से दो-चार होना पड़ता है, लेकिन जम्हूरियत में नालायकों की पूरी टीम बवाले जान बन जाती है।
-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'भयानक जजीरा'- 1953 से।

Thursday, May 27, 2021

लव एट द टाइम ऑफ कोरोना

 बहुत दिन से लिखना स्थगित है। इस बीच कोरोना का हल्ला इतना रहा कि हर तरफ बस कोरोना ही कोरोना। कई मित्र, जान पहचान वाले और उनके परिवारी जन 'शांत' हो गए। कुछ इलाज शुरू होने में देरी से गये, कुछ गलत इलाज से, कुछ डर से। एक की पत्नी ने बताया कि ये तमाम तरह के वीडियो देखकर दहशत में आ गए। बीपी कम हो गया। नहीं रहे।

गब्बर सिंह की बात याद आई -'जो डर गया, समझो मर गया।'
बीमारी के नित नए इलाज बताये जा रहे हैं। इतनी तरकीबें कोरोना से बचाव कि अगर उनकी गिनती की जाए तो जनसँख्या के आकंड़ों पर भारी पड़ें। कई इलाज तो आपस में इतने विरोधी कि अगर एक साथ खड़े कर दिए जाएं तो उनमें आपस में मारपीट हो जाये। 'इलाज दंगा' हो जाये शहर में।
इलाज से बेहतर बचाव है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की बात हो रही। मास्क जरूरी है। पानी जरूरी है। सफाई जरूरी है। सांस रोकने का अभ्यास जरूरी। सब अपनाए जा रहे हैं। एक डॉक्टर के वीडियो में आया कि पच्चीस सेकेंड तक सांस रोक लिए तो समझिए फेफड़े मजबूत हैं। हम अभ्यास करके 40 सेकेंड तक रोक लिए। लगा कि घर में बाउंसर बैठा लिए हैं, कोरोना आएगा तो दौड़ा लेंगे।
जिनके यहां कई लोग नहीं रहे उनके हाल का अंदाज ही लगाया जा सकता है। हर नई फोन काल उठाते हुए जी दहलता - ' कोई अनहोनी की खबर न हो।' सबेरे किसी भी इंसान से मिलते हुए लगता -'कहीं यह किसी के न रहने की खबर न दे।'
कल एक मित्र से बात हुई। उन्होंने अपने कई परिवारी जन खोये कोरोना में। हाल पूछने पर जबाब आया -'जिंदा हूँ।' दो शब्द का यह जबाब कोरोना से जूझते लोगों की मन:स्थिति का एक्सरे है।
कोरोना हो जाने पर आइसोलेशन की बात होती है। अलग कमरा, अलग बाथरूम। सब कुछ अलग। ऐसे में मुझे हमेशा अपने देश की आधी से भी अधिक आबादी वाले वो लोग याद आये जिनमें कई-कई लोग एक कमरे/कोठरी में रहते हैं, कई-कई परिवार एक बाथरूम, एक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। वो कैसे आइसोलेशन में रहेंगे।
बहुत कठिन समय से गुजरना हो रहा है। इससे बचाव के लिए सावधानी, इलाज तो जरूरी है ही। साथ ही जरूरी है जिजीविषा। जीने की इच्छा। जीने की अदम्य इच्छा बहुत तगड़ी एंटीबायटिक है, बहुत असरदार स्टेरायड है कोरोना से मुकाबला करने के लिए।
हमारा एक दोस्त 10 दिन आईसीयू में रहा। होश नहीं रहा उसको। जब होश आया तो डॉक्टर ने कहा -'सरदार जी, दवाएं तो ठीक हैं। लेकिन जब तक आप नहीं चाहेंगे तब तक ठीक नहीं होंगे। आप को खुद अपने को ठीक करने के लिए मेहनत करनी होगी।' दोस्त आजकल घर आ गया है। कमजोरी दूर हो रही है। ठीक हो रहा है।
परसाई जी ने लिखा है -''हड्डी ही हड्डी, पता नहीं किस गोंद से जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिए गए हैं। यह जीवित रहने की इच्छा ही गोंद है।"
इस बीच कई बार बहुत कुछ लिखने की सोची। लेकिन मन नहीं हुआ। बीच में एक पोस्ट लिखने की सोची थी। संकट के समय में अनजान लोगों ने जिस तरह अनेक लोगों की सहायता की , तन से, मन से, धन से उससे लगा कि जब सारे तंत्र फेल हो जाते हैं, सारे सिस्टम भू लुंठित हो जाते हैं। जब राजनेताओं के बस में सिवाय निर्लज्ज बहानेबाजी, बटोलेबाजी और बयानबाजी के कुछ नहीं बचता ऐसे कठिन समय में भी समाज में ऐसे लोग होते हैं जो इंसानियत के जज्बे से भरे होते हैं। ऐसे लोग चुपचाप अपनी सामर्थ्य भर लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। कोई भी समाज इनके कारण ही बचा रहता है।
ऐसे तमाम लोगों को समाज में देखकर लगा कि उनके बारे में लिखते हुए मार्खेज के उपन्यास की तर्ज पर लिखें -'लव एट द टाइम आफ कोरोना।' कोरोना काल में प्रेम।
लिखाई तो जब होगी तब होगी। फिलहाल आप मजे में रहिये। डरिये मत। आक्सीमीटर से ज्यादा अपनी सांस पर भरोसा करिये। जब तक आप चाहेंगे तब तक आपकी सांस चलेगी।
खूब मस्त रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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Monday, May 24, 2021

जिजीविषा

 मरने में मरने वाला ही नहीं मरता

उसके साथ मरते हैं
बहुत सारे लोग
थोड़ा-थोड़ा!
जैसे रोशनी के साथ
मरता है थोड़ा अंधेरा।
जैसे बादल के साथ
मरता है थोड़ा आकाश।
जैसे जल के साथ
मरती है थोड़ी सी प्यास।
जैसे आंसुओं के साथ
मरती है थोड़ी से आग भी।
जैसे समुद्र के साथ
मरती है थोड़ी धरती।
जैसे शून्य के साथ
मरती है थोड़ी सी हवा।
उसी तरह
जीवन के साथ
थोड़ा-बहुत मृत्यु भी
मरती है।
इसीलिये मृत्यु
जिजीविषा से
बहुत डरती है।
-डा.कन्हैयालाल नंदन

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Sunday, May 16, 2021

कौन मुस्काया

 

कौन मुस्काया
शरद के चांद-सा
सिंधु जैसा मन हमारा हो गया।
एक ही छवि
तैरती है झील में
रूप के मेले न कुछ कर पाएंगे
एक ही लय
गूँजनी संसार में
दूसरे सुर-ताल किसको भाएंगे।
कौन लहराया
महकती याद-सा
फूल जैसा तन हमारा हो गया।
खिल गया आकाश
खुशबू ने कहा
दूर अब अवसाद का घेरा हुआ
जो भी भी पास तक आती न थी
उस समर्पित शाम ने
जी भरकर छुआ।
कौन गहराया
सलोनी रात-सा
रागमय जीवन हमारा हो गया।
पूर्व से आती
हवा फिर छू गई
फिर कमल मुख हो गयी सम्वेदना
जल तरंगों में नहाकर चांदनी
हो गयी है
इन्द्रधनु-सी चेतना
कौन शरमाया
सुनहरे गात-सा
धूप जैसा क्षण हमारा हो गया।
- गीतकार विनोद श्रीवास्तव, कानपुर

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Monday, May 10, 2021

फिर नए सपने होंगे

 

फिर घना कोहरा छंटेगा,
फिर नया सूरज उगेगा,
फिर नई कली खिलेगी,
फिर नई मंजिल मिलेगी।
फिर नए सपने होंगे,
गले लगाते कुछ अपने होंगे,
स्वप्न होंगे नए
दर्द भी कुछ नए होंगे।
हर जख्म के लिए
मरहम कुछ नए होंगे।
कोरोना काल की मनहूसियत को धता बताती हुई यह कविता सुनिए हमारे सुपुत्र Anany Shukla की आवाज में। कठिन समय में आशा की बात कहती हुई कविता सुनते हुए यही सोच रहे थे अपन -'काश हम भी ऐसे वीडियो बना पाते।' 🙂

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मुहब्बत

 *किसी शहर से परिचित होने के लिए शायद सबसे आसान तरीका यह है कि यह जानने की कोशिश की जाए कि उसमें रहने वाले लोग किस तरह काम करते हैं, किस तरह प्यार और मुहब्बत करते हैं और किस तरह मरते हैं।

*सच तो यह है कि यहां हर आदमी जिंदगी से ऊबा हुआ है और अच्छी आदतें डालने की कोशिश में लगा रहता है। हमारे नागरिक कठोर परिश्रम करते हैं, लेकिन इसमें उनका एकमात्र उद्देश्य धनवान बनना होता है।
* निश्चय ही आजकल सबसे साधारण बात जो हमें देखने को मिलती है वह यह कि लोग सुबह से लेकर शाम तक काम करते हैं और फिर जिंदा रहने के लिए उनके पास जो समय बच रहता है, उसको बर्बाद करने के लिए ताश खेलने की मेजों , जलपान-ग्रहों या गपशप करने की जगहों की ओर चल पड़ते हैं।
* जिसे 'प्रेम-क्रीड़ा' कहा जाता है, उसमें हमारे यहां के लोग या तो एक-दूसरे का बहुत तेजी से भक्षण कर लेते हैं या फिर दाम्पत्य-सम्बन्ध की हल्की-फुल्की आदत डालकर जिंदगी बसर करने लगते हैं। इन अतिवादों के बीच का जीवन हमें यहां अक्सर देखने को नहीं मिलता।
* और शहरों की तरह ओरान में भी, समय और चिंतन की कमी के कारण लोगों को एक-दूसरे से मुहब्बत करनी पड़ती है, बिना यह जाने हुए कि मुहब्बत क्या चीज होती है।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास प्लेग के अंश।

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Sunday, May 09, 2021

कोरोना से लड़ना सबका फर्ज है

 

"अगर आदमी ध्यान से सोचे तो हर घटना का , चाहे वह कितनी ही अप्रिय क्यों न हो, आशापूर्ण पहलू भी होता है।
यह सुनकर रेम्बर्त ने गुस्ताखी से अपने कन्धे सिकोड़े और बाहर निकल आया।
दोनों शहर के केंद्र में पहुंच गए थे।
"यह निहायत अहमकाना बात है न डॉक्टर! दरअसल मैंने अखबारों के लिए लेख लिखने के लिए दुनिया में जन्म नहीं लिया था। मेरा ख्याल है किसी औरत के साथ जिंदगी बसर करने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ। यह तर्क संगत बात है न ?"
रियो ने सतर्कता से उत्तर दिया कि सम्भव है रेम्बर्त की बात में सच्चाई हो।"
ऊपर उद्धरत बातचीत अल्वेयर कामू के प्रसिद्द उपन्यास प्लेग के दो पात्रों की है।
ओरान शहर में प्लेग फैल जाती है। रेम्बर्त संयोगवश ओरान में आया था। प्लेग महामारी से बचाव के लिए शहर के फाटक बंद कर दिए गए। लोगों का आना-जाना रुक गया।
रेमबर्त शहर से बाहर जाने के लिए छटपटाने लगा। उसकी प्रेमिका उसका इंतजार कर रही थी। लेकिन शहर के फाटक बंद थे। कोई बाहर नहीं जा सकता था।
रेम्बर्त ने हर सम्भव कोशिश की निकलने की। उच्चाधिकारियों से मिला। जोर-जुगाड़ लगाया। डॉ रियो से अनुरोध किया कि उसे प्लेग के कीटाणु न होने का प्रमाणपत्र दे ताकि वह उसे दिखाकर निकल सके। रियो ने मना कर यह कहते हुए:
"मैं तुम्हे सर्टिफिकेट नहीं दे सकता, क्योंकि मुझे यह नहीं मालूम कि तुम्हारे अंदर इस बीमारी के कीटाणु नहीं है। और अगर मुझे मालूम होता तो भी मैं इस बात की गारंटी कैसे दे सकता हूँ कि मेरे यहाँ से निकलकर प्रीफेक्ट के दफ्तर तक पहुँचने के बीच तुम्हें इस बीमारी की छूत नहीं लग जायेगी।"
रेम्बर्त हर तरह से अपने को सही ठहराने की कोशिश करते हुए निकलने की कोशिश करता है। असफल होता है। इस बीच वह डॉक्टर रियो के सम्पर्क में रहते हुए शहर से निकलने की कोशिशें करता रहता है।
डॉक्टर रियो आपदाग्रस्त लोगों के इलाज में लगा रहता है। रेम्बर्त शहर से निकलने की फिराक में। इस सिलसिले में वह गेट पर तैनात लोगों से जोड़-तोड़ कर निकलने की कोशिश में रहता है। उसको अपनी प्रेमिका से मिलने की उतावली है।
रेम्बर्त को पता चलता है कि डॉक्टर रियो की बीबी शहर से करीब 100 मील दूर एक सेनिटोरियम में है।
अगले दिन तड़के ही रेम्बर्त ने डॉक्टर को फोन किया। "जब तक मैं शहर से निकलने का कोई तरीका नहीं निकाल लेता , क्या तब तक तुम मुझे अपने साथ काम करने दोगे?"
कुछ देर की खामोशी के बाद जबाब सुनाई दिया , "जरूर, रेमबर्त! धन्यवाद।"
इसके बाद रेम्बर्त डॉक्टर रियो के साथ काम करने लगा। शहर से निकलने की कोशिश भी जारी रहीं।
एक दिन रेम्बर्त का शहर से बाहर निकलने का जुगाड़ बन गया। उसका शहर से जाना तय हो गया। वह रियो और तारो से विदा लेकर गया। रेम्बर्त की जगह नई टीम बन गई।
जिस रात रेम्बर्त को जाना है उसी शाम वह वापस आकर डॉक्टर रियो से मिलता है। आगे की बात :
"रेम्बर्त बोला , "डॉक्टर , मैं शहर छोड़कर नहीं जा रहा। मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।"
तारो बिना हिले-डुले कार चलाता रहा। लगता था कि रियो अपनी थकान से छुटकारा पाने में असमर्थ था।
"और ----'उसका' क्या होगा?" रियो की आवाज बड़ी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
रेम्बर्त ने जबाब दिया कि उसने सारे मामले पर बड़ी गम्भीरता से सोच-विचार किया है। उसके विचार तो नहीं बदले लेकिन अगर वह चला गया तो उसे अपने पर शरम आएगी, जिसकी वजह से अपनी प्रियतमा के साथ उसका सम्बन्ध और भी पेचीदा हो जायेगा।
इस बार और अधिक उत्साह दिखाते हुए रियो ने कहा कि यह निरी बकबास है। अगर कोई अपने सुख को ज्यादा पसन्द करता है तो इसमें उसे शरम नहीं महसूस करनी चाहिए।
" यह तो सही है," रेम्बर्त ने जबाब दिया, "लेकिन जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शरम महसूस हो सकती है।"
तारो ने, जो अभी तक खामोश रहा था, पीछे मुड़कर देखे बगैर कहा कि अगर रेम्बर्त दूसरे लोगों के दुख में हिस्सा बटाने की इच्छा रखता है तो उसके पास फिर अपने सुख के लिए कोई समय नहीं बचेगा। इसलिए दोनों रास्ते में से उसे एक चुनना ही पड़ेगा।
"बात यह नहीं है," रेम्बर्त ने फिर कहा।" अब तक मैं हमेशा अपने को इस शहर में एक अजनबी- सा महसूस करता था। और मुझे ऐसा लगता था कि आप लोगों से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन अब मैंने अपनी आंखों से जो कुछ देखा है, इसके बाद मैं जान गया हूँ कि मैं चाहूं या न चाहूं मैं यहीं का हूँ। प्लेग से लड़ना सबका फर्ज है।""
इसके बाद रेम्बर्त शहर छोड़कर भागने के प्रयास छोड़ देता है। डॉक्टर रियो की टीम से जुड़कर प्लेग रोगियों की सेवा में जुट जाता है। एक दिन ऐसा भी आता है जब शहर में प्लेग खत्म हो जाती है और सड़कों पर मरते हुए चूहों की जगह बिल्लियां दिखने लगती हैं।
पिछली सदी में हुई प्लेग महामारी पर केंद्रित यह उपन्यास पढ़ते हुए आज कोरोना की विभीषिका के समाचार छाए हुए हैं। तमाम लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। असमय विदा हो रहे हैं।
यह विवरण एक पराये शहर के पत्रकार की एक अजनबी शहर के लोगों की पीड़ा से जुड़कर वहां के लोगो की सेवा करने की भावना का है।
आज जब हमारा समाज इस विभीषिका से जूझ रहा है तब समय यह देखने का भी है कि हम अपने समाज से कितने जुड़े हैं। हमारे अंदर डॉक्टर रियो और पत्रकार रेम्बर्त के कितने अंश बचे हैं।
डॉक्टर रियो और रेम्बर्त प्लेग से लड़े थे। आज कोरोना फैला है। कोरोना से लड़ना हमारा फर्ज है।

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Friday, May 07, 2021

प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है

 *इंसान को मुसीबतजदा लोगों की तरफ से जरूर लड़ना चाहिए, लेकिन अगर वह लड़ाई के सिवा हर चीज में दिलचस्पी लेना बंद कर दे तो लड़ाई का क्या फायदा?

*प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है और हमेशा इंसान की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब वह कैद से, अपने काम से, कर्तव्य परायणता से ऊब जाता है, और सिर्फ एक ही चीज की तमन्ना करने लगता है - किसी प्रिय चेहरे की, प्यार भरे किसी दिल की गरमी और जादू पाने की।
*इंसानों में घृणा करने योग्य बातों की अपेक्षा प्रशंसनीय गुण अधिक मात्रा में हैं।
अल्वेयर कामू के उपन्यास ' प्लेग' से।

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Thursday, May 06, 2021

लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है - मनोहर श्याम जोशी

 मेरी तमाम ऐसी 'रचनाएं' भी हैं, जो मैं अपने मानस पटल पर ही लिखकर खुश हो गया, कागज पर उतारी नहीं। एक जमाना था कि इस तरह सोची हुई रचनाएं भी बोलकर सुना डालता था। खैर, अब तो आलम यह है कि बात करते-करते यह भी भूल जाता हूँ कि बात किस प्रसंग से शुरू की थी और उसे किस ओर ले जाना चाहता था। जो रचनाएं मैंने शुरू भी कीं, उनमें से भी ढेरों ऐसी हैं , जिन्हें मेरी अन्य व्यस्तताओं ने या मेरे भीतर बैठे आलोचक ने पूरा होने ही नहीं दिया।

मैंने अभी अन्य व्यस्तताओं का जिक्र किया, उनमें से अधिकतर व्यवसायिक लेखन से जुड़ी हुईं थीं और लुत्फ की
बात यह है कि इस तरह के लेखन में भी मैं काटता-जोड़ता रहा हूँ।
मैं जब सम्पादक था , मेरी इसी संसोधन वृत्ति से परेशान प्रेस फोरमैन मुझे अपने लिखे हुए का प्रूफ एक बार से ज्यादा पढ़ने नहीं देता था कि ये तो हर बार बदलते ही चले जायेंगे।
तो मेरे हिस्से सन्तोष नहीं,खाली संशय पड़ा है। तो मेरे पास गिनाने को मेरी एक भी उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता अफसोस अनेक हैं, जिन्हें बहानों की संज्ञा भी दी जा सकती है। गनीमत इतनी ही है कि ये बहाने कुछ ठोस और महत्वपूर्ण न लिख पाने के हैं।
कहा जाता है कि रचनात्मक तेवर दो तरह के होते हैं -एक रूमानी दूसरा क्लासिकी। मुझे खुशफहमी रही है कि मैं अपने गुरु नागर जी की तरह क्लासिकी तेवर का धनी हूँ। और अपने दूसरे गुरु अज्ञेय जी की तरह रोमांटिक नहीं। लेकिन क्लासिकी तेवर साध लेने पर भी कोई रचनाकार अपनी रचना में अपने मन का उल्लंघन नहीं कर सकता। यह क्या है कि लेखन अंततः और मूलतः आत्माभिव्यक्ति ही है। जिसे आत्म या सेल्फ कहा जाता है वह आध्यात्म और विज्ञान , दोनों के पंडितों के लिए खासी रहस्यमयी चीज रही है।
आद्यात्म और मष्तिष्क विज्ञान दोनों का ही विद्यार्थी न होने के कारण मैं उस रहस्यवादी आयाम में जा सकने की योग्यता नहीं रखता। लेकिन मुझे इसमें संदेह नहीं कि लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है और कि स्वयं से किसी भी लेखक के लिए मुक्ति सम्भव नहीं।
आप विश्वास कीजिये मैने किशोरावस्था से अब तक कुछ और हो जाने का यत्न किया है। जैसे स्कूल में, जब मैंने पाया कि हीरो का दर्जा मुझे ज्यादा पढ़ाकू लड़के नहीं , खिलाड़ी लड़के पाते हैं , तब मैंने किसी खेल की टीम में जगह पाकर अपनी जय बुलवाने की जी-तोड़ कोशिश की। और लड़कों की अपेक्षा काया में कमजोर तथा उम्र में छोटा होने के कारण मेरी खेल के मैदान में एक न चली।
यह कमी पूरी करने के लिए मैं हर खेल के बारे में अपना।किताबी ज्ञान बढ़ाता चला गया, ताकि खिलाड़ियों के बीच उठ बैठ सकूं। अपने को कुछ और बना सकने के क्रम में मैंने अपने को स्वयं अपने लिए हास्यास्पद बनाया। उच्चतर शिक्षा के दौरान चाहा कि बहुत बड़ा वैज्ञानिक बन सकूं। मुझे ' कल का वैज्ञानिक' की उपाधि भी मिली, लेकिन मैं वैज्ञानिक न बन सका। नियति ने मुझे इतना ही धैर्य और इतनी ही समझ दी थी कि विभिन्न विषयों की सतही जानकारी हासिल कर सकूं और उनपर पत्रकार की हैसियत से कलम चला सकूं।
तो मैं तमाम कोशिशों के बाद मैं ही रह गया - एक अदद कायर, कमजोर और रोंदू किस्म का इंसान, जो अपनी कातर भावुकता , हर नए उत्साह के 'पर' नोच डालने वाली अपनी उद्दत उदासी और संसार तथा स्वयं पर उठते नपुंसक आक्रोश की पर्दादारी करने के लिए व्यंग्य- विनोद, आत्म व्यंग्य और विडम्बना की शरण लेता रहा है।
- स्व. मनोहरश्याम जोशी
आज के अमर उजाला से साभार

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प्लेग की जगह कोरोना

 


महामारी मुझे इसके सिवा कोई नया सबक नहीं सिखा पाई कि मुझे तुम्हारे साथ मिलकर लड़ना चाहिए। हमसे से हरेक के भीतर प्लेग है, धरती का कोई आदमी इससे मुक्त नहीं है। और मैं यह भी जानता हूँ कि हमें अपने पर लगातार निगरानी रखनी होगी, ताकि लापरवाही के किसी क्षण में हम किसी चेहरे पर अपनी सांस डालकर उसे छूत न दे दें। दरअसल कुदरती चीज तो रोग का कीटाणु है। बाकी सब चीजें ईमानदारी, पवित्रता -इंसान की इच्छाशक्ति का फल हैं-ऐसी निगरानी जिसमें कभी ढील न हो। एक नेक आदमी जो इसमें कभी ढील नहीं देता , किसी को छूत नहीं देता।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास 'प्लेग' से।
पिछली सदी में लिखे इस कालजयी उपन्यास को आज पढ़ते हुए लगा कि काफी कुछ वैसा ही घट रहा है, बड़े पैमाने पर, ज्यादा तेजी के साथ। सिर्फ प्लेग की जगह 'कोरोना' ने ले ली है।
नीचे हमारा परिवेश - रास्तों पर जिंदगी बाकायदा आबाद है।


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