Friday, September 27, 2024

शरद जोशी के पंच -4

 



1. ये सरकारी काम कर रहे हैं और उन्हें काम के समय काम न करने का पूरा हक़ है।
2. अफ़सर खुद निठल्ला हो मगर वह दूसरों के निठल्लेपन को सहन नहीं कर सकता।
3. जंगल की सड़क हो या सरकारी दफ़्तर,चपरासी या बाबू या अफसर वहाँ काम करने नहीं,नौकरी करने आता है। काम अपने घर पर बहुत है। काम की कमी नहीं है। पर दस से पाँच का समय नौकरी का है।
4. क्षेत्रीय नेता अपने नेतृत्व का आधार बनाने के लिए प्रांतों और जातियों में परस्पर घृणा के तत्व खोजते हैं।
5. पार्टी भी ऐसे व्यक्ति को पसंद करती है, जो आदर्शवादी भाषण देने से छुरा भोंक देने तक हर स्तर पर पारंगत और व्यावहारिक हो।
6. अपराध का सफ़ेदपोस बाना काम जोखिम का और अधिक लाभकारी है।
7. मनुष्य जाति का इतिहास चमकदार व्यक्तित्वों की चर्चा और अध्ययन से भरा है। हम बीच के अंधकार को टाल गए। रुपया चमकता है,मगर एक चमकते रुपए और दूसरे चमकते रुपए के बीच जो अभाव का शून्य है,वह हमारी नज़र में नहीं आता।
8. नये नेताओं से पुराने नेताओं को इतना ख़तरा नहीं होता,जितना नए दादा से पुराने दादाओं को। बल्कि नया दादा तो उभरता ही है, पुराने दादा को पीटकर। (अब हालात उलट गए हैं)
9. अमेरिका से अधिक सहयोग लेना,वह चाहे किसी भी क्षेत्र में हो,अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है। पाकिस्तान लंगड़ा हो चुका। हमारे यहाँ फ़िक्र है कि हाय, हम लंगड़े क्यों नहीं हैं? जब अमेरिकी बैसाखियाँ उपलब्ध हैं, लंगड़े होने में हर्ज क्या है ? डिक्टेटरशिप से डिस्को तक, मेथिल सायनाइड से महिलाओं महिलाओं के फ़ैशन तक,नंगी फ़िल्मों से गंदे होटलों तक अमेरिका के प्रभाव में जो कुछ पनपता है, वह उस देश को राजनीतिक,आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से तबाह कर देने के लिए काफ़ी है।
10. सुपर स्टार कभी टाइम पर नहीं आता। टाइम पर आ जाए तो काहे का सुपर स्टार।

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बेहटा बुजुर्ग का जगन्नाथ मंदिर



भीतरगाँव का ईंटों का मंदिर (विवरण का लिंक कमेंट में) देखने के बाद अगली मंज़िल थी भीतरगाँव के पास ही बेहटा बुजुर्ग गाँव में स्थित जगन्नाथ मंदिर।
भीतरगाँव से बेहटा बुजुर्ग गाँव तीन-चार किलोमीटर दूर है। गुप्तकालीन इँटो के मंदिर के सामने की दुबली-पतली सड़क के दोनों तरफ़ दुकानों के सामने खड़े लोग सड़क को और दुबला बना रहे थे।
दुकानों का सिलसिला थोड़ी दूर पर ही खतम हो गया। आगे सड़क ख़ाली थी।
हमारी कार के आगे स्कूल से लौटते हुए दो बच्चे दिखे । एक लड़की, एक लड़का। दोनों अलग-अलग साइकिल पर । पीछे से आती कार देखकर बच्चे थोड़ा ठिठक से गए। साइकिल से उतर गए। लेकिन हमने गाड़ी उनके आगे नहीं निकाली। धीरे होते हुए रुक से गए। बच्चों ने इसे अपने आगे चलने का इशारा समझा और फिर से साइकिल पर सवार होकर चल दिए।
दोनों शायद बहन-भाई रहे होंगे। लड़की बड़ी थी। बच्चा उसके पीछे-पीछे उचक-उचककर साइकिल चलाता जा रहा था।
थोड़ा आगे चलकर मुख्य सड़क आ गयी। आगे थोड़ी दूर पर दायीं तरफ़ मुड़कर बाएँ मुड़े और कुछ दूर पर ही वह मंदिर आ गया जिसे देखने हम आए थे।
गाड़ी खड़ी करके वहाँ से गुजरती एक बच्ची से मंदिर के बारे में पता किया। पता चला यही जगन्नाथ मंदिर है। बच्ची स्कूल ड्रेस में थी। तुरंत ही स्कूल से वापस लौटी थी। माथे और होंठ के ऊपर पसीने की बूँदे चमक रही थीं। बच्ची कक्षा सात में पास ही स्कूल में पढ़ती है। मंदिर के बारे में –‘हाँ यही है मंदिर‘ बताकर वह बग़ल स्थित घर चली गयी।
बेहटा बुजुर्ग स्थित मंदिर भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। मंदिर की आकृति भगवान जगन्नाथ के रथ के आकार की है। कितना पुराना है यह मंदिर इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। कुछ लोग कहते हैं कि यह मंदिर 4200 सौ वर्ष पुराना है।
बस इतना ही पता लग पाया कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था। उसके पहले कब और कितने जीर्णोद्धार हुए या इसका निर्माण किसने कराया जैसी जानकारियां आज भी अबूझ पहेली बनी हुई हैं।
मंदिर के बारे में बताया जाता है की इस जगन्नाथ मंदिर की ख़ासियत यह है कि बरसात से 7 दिन पहले इसकी छत से बारिश की कुछ बूंदे अपने आप ही टपकने लगती हैं। जितनी बड़ी बूँदे उतनी अधिक बारिश। देर तक बूँदों का टपकना मतलब देर तक बारिश होना।
हालांकि इस रहस्य को जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं पर तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण का समय तथा बारिश की बूँदों से मानसून के अनुमान का रहस्य वैज्ञानिक पता नहीं लगा सके। लेकिन बारिश की जानकारी पहले से लग जाने से किसानों को जरूर सहायता मिलती है।
बारिश की पूर्व सूचना देने के कारण जगन्नाथ मंदिर को लोग 'मानसून मंदिर'भी कहते हैं।
आसपास के लोगों की यह भी मान्यता है कि मंदिर के ऊपर लगे चक्र के कारण आसपास के इलाक़े आकाशीय बिजली के प्रकोप से बचे हुए हैं।
मंदिर के बाहर ही पुरातत्व विभाग का सूचना पट्ट लगा है जिससे पता चलता है कि यह पुरानी इमारत है। इसके अलावा मंदिर की और कोई जानकारी देने वाला कोई बोर्ड नहीं लगा था।
मंदिर के अंदर पहुँचते ही तेज बारिश शूरु हो गयी। मंदिर के अहाते में स्थित एक कमरे के बरामदे के बाहर खड़े होकर हम बारिश का जलवा देखते रहे। अहाते में पड़े एक तख़्त पर बैठा एक बच्चा मोबाइल पर कोई गेम खेल रहा था। उसकी बहन अंदर कमरे में मोबाइल में व्यस्त थी। वहीं बैठी एक बुजुर्ग महिला बार-बार समय पूछ रही थी।
महिला को हमने समय बताया ढाई बजाने वाले हैं। उसने शायद सुना नहीं। फिर समय पूछा। हमने फिर बताया। तीसरी बार उसने पूछा –‘साढ़े बारह बज गए?’ हमने फिर बताया। उसको सुनाई नहीं दिया। बच्चे ने बताया –‘ऊँचा सुनती हैं दादी।‘
अबकी बार पूछने पर मैंने ऊँची आवाज़ में समय बताया- ‘ढाई बज गये।‘ इस बार दादी जी ने सुन लिया। लेकिन 'साढ़े बारह' की जगह 'ढाई' बज जाने पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उनके चेहर पर समय के प्रति निर्लिप्तता का भाव पसरा था।
अलबत्ता समय बताने के मेहनताने के रूप में उन्होंने अंदर की तरफ़ आकार बैठ जाने को कहा।
हम तख़्त के बग़ल से होते अंदर की तरफ़ आ गए। कुछ देर बच्चे से बात करते रहे। इस बीच पानी धीमे होता हुआ बंद हो गया।
फिर हमने मंदिर को देखा। बाहर हमारे अलावा कोई था नहीं मंदिर में। अंदर अलबत्ता पुजारी जी जगन्नाथ जी की पूजा करते हुए दिखे। उनकी पूजा में तल्लीनता देखकर हमको व्यवधान डालने की हिम्मत नहीं। मंदिर के चारों तरह परिक्रमा करके कुछ देर वहीं खड़े रहे। फिर बाहर आ गए।
बाहर आते हुए पुजारी जी के घर के बाद मंदिर के शुरू में भी एक छोटा मंदिर है। यह मंदिर शिव मंदिर है। मठ के आकार का मंदिर।
एक ही अहाते में रथ के आकार का मंदिर और मठ के आकार का मंदिर।
बाहर निकलते हुए हम सोच रहे थे कि लगभग 4200 वर्ष पुराना मंदिर की बनते समय न जाने कितनी ख्याति रही होगी। बाद में जीर्णोद्दार भी कराया गया होगा तो प्रमुख मंदिर होने के कारण ही ऐसा हुआ होगा। इतना प्रसिद्ध मंदिर आज अकेले में चुपचाप खड़ा है रमानाथ जी की कविता पंक्तियों को याद करते हुए:
भीड़ में भी रहता हूँ ,वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर ,किसी गाँव के किनारे।
मंदिर से बाहर आकर फिर हम गाँव के बाहर हो लिए और शहर की तरफ़ वापस चल दिए।

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Thursday, September 26, 2024

शरद जोशी के पंच -3

 


1. भारतीय संगीत को नष्ट-भ्रष्ट करने का एक तरीक़ा यह है कि उसमें पाश्चात्य संगीत घुसा दिया जाए।
2. भारतीय संस्कृति में शैली यह रही है कि यदि आप किसी की शरण में जाना चाहते हैं तो लपककर उसके चरण पकड़ लीजिए और तब तक न छोड़िए जब तक वह क्षमा करके आपका अंगीकार न कर ले।
3. हमारे राष्ट्रीय जीवन में 'सत्यमेव जयते' एक सील है, ठप्पा है। आप इसे सरकारी मुहर से लेकर चाय की दुकान पर लगे निरर्थक आदर्श वाक्यों की सजावट तक कहीं देख सकते हैं।
4. झूठ की तात्कालिक विजय इतनी असरकारक होती है कि सत्य की अंतत: विजय होगी। यह मात्र छलावा लगता है।
5. एक राष्ट्र नोट पर सत्यमेव जयते छापकर सत्य की जीत के प्रति बेफ़िक्र हो जाता है। सत्य के प्रति भी बेफ़िक्र हो जाता है।
6. इस देश में जहां लोग बजाय सत्य के सत्यनारायण की कथा पर अधिक भरोसा रखते हैं, वहाँ एक सील या ठप्पा, सील या ठप्पा होने से अधिक गहराई अर्जित नहीं कर पाता।
7. जहां सामाजिक जीवन में अदना आदमी असत्य से आँखे चार करने की बजाय कतराकर निकल जाने में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करता हो, जहां आर्थिक शक्तियाँ असत्य को सामान्य व्यावहारिकता के तहत स्वीकार करती हों,जहां राजनीति असत्य के पर चलते ही की जा सकती हो, वहाँ सत्यमेव जयते नोटों पर बने एक चित्र से अधिक अर्थ नहीं रखता। कलाकृति मात्र।
8. यह देश सत्यमेव जयते की सील बना सत्य के प्रति लापरवाह है। सत्य की रक्षा करने वाले न्यायालयों के प्रति लापरवाह हैं।
9. न्यायाधीशों की आर्थिक हालत उन पंडा-पुजारियों की तरह ख़स्ता होती है जो प्रदूषणग्रस्त नदी के घाट पर या उपेक्षित मंदिरों में बैठे रहते हैं।उनकी हालत तभी सुधर सकती है जब वे असत्य से निरंतर तालमेल जमाते रहें।
10. सत्यमेव जयते की सील के नीचे सत्य की रक्षा करने वालों की बढ़ी दुर्दशा है। जिन नोटों पर सत्य की जीत लिखी होती है उन ही नोटों के कारण सत्य इस देश में निरंतर पराजित होता है।

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हम बता रहे हैं न



हमारे एक मित्र हैं। हमेशा बेसिरपैर की बात करते हैं। ग़ज़ब महारत हासिल है उनको ऊलजलूल हांकने में। जिस दिन क़ायदे की बात करते करते हैं, लगता है कोई और घुस गया उनके शरीर में।
दोस्त लोग उनकी बेसिरपैर की हांकने की कला से बहुत प्रभावित हैं। कुछ तो कहते हैं किसी पार्टी में चला जाता, कोई सेठ पैसा लगता इसके पीछे तो यह भी कहीं माइक के सामने खड़ा भाइयों-बहनों कर रहा होता।
आँय-बाँय-साँय बात कहने के लिए उसको न किसी टेलीप्रामप्टर की ज़रूरत होती है न किसी आँकड़े की। वह बस कह देता है। कोई सवाल करता है तो कहता है -'हम बता रहे हैं न!'
हमने सुझाया -‘तुम भी गारंटी दे दिया करो अपने जुमले की।’
‘अब गारंटी चलन के बाहर हो गई है। न कोई देता है न कोई मानता है।’- मित्र ने थके मुँह से बताया।
'हम बता रहे हैं न!' कहने का अन्दाज़ उसका ऐसा होता है कि उसने जो कहा उसको मान लेने में ही हमारी भलाई है। न मानने पर वह ग़ुस्सा होकर रोने लगता है । जुमलेबाज़ी बंद कर देने की धमकी तक दे देता है। हमको लगता है कि अगर इसकी जुमलेबाज़ी बंद हुई तो यह जी नहीं पाएगा। एक हत्या का कलंक अनजाने हम पर लगेगा।
दोस्त अक्सर इतनी उलज़लूल हांकता है कि डर लगता है। कोई बड़ा हाँकू समझेगा कि उसकी सीट को ख़तरा है। उससे बड़ा हाँकू बन जाएगा। निपटा दिया जाएगा।
खबरें देखकर,ख़ासकर चुनाव के समय मित्र इतनी अटपटी बयानबाज़ी करता है कि चैनल वाले शर्मा जाएँ। उसकी घोषणाएँ हमेशा ऊँचे दर्जे की रहती हैं। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के नीचे बात नहीं करता। बहुत हुआ तो मुख्यमंत्री तक आ जाता है। ऊँचें लोग, ऊँची गप्प घराने की हांकता है।
यह पोस्ट आज लिखनी शुरू की थी। आगे की पोस्ट एआई से लिखवाएँगे। देखते हैं क्या लिखता है? आप बताओ क्या लिख सकता है एआई? एआई मतलब आप वो वाला मतलब मती समझना जो माननीय ने हाल में बताया है -'एआई मतलब -अमेरिका इंडिया।'
उस बात को सुनकर भी दोस्त ने मज़ेदार बात कही थी। आप कल्पना करके बताओ क्या कहा होगा उसने?

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Wednesday, September 25, 2024

शरद जोशी के पंच -2



1. एक बार इंसान डाक्टर हो जाए तो मरीज़ों की कमी नहीं। एक भी न ढूँढिए,फिर भी हज़ार मिलेंगे। बल्कि अधिकांश लोग डाक्टर को देखकर ही मरीज़ होने लगते हैं। अंदर ही अंदर मरीजियाने लगते हैं।
2. कई लोग जो बीमार नहीं होते प्रायः इसी आशा से कराहते हैं कि डाक्टर वहाँ से गुजरेगा तो उन पर ध्यान देगा। यह खाँसने-खँखारने, थूकने-डकारने, सुड़कने वालों का ध्वनि प्रधान देश है।
3. हमारे देश में डाक्टर मरीज़ों को वालीबाल की तरह खेलते हैं। एक विशेषज्ञ उछालकर दूसरे विशेषज्ञ को देता है। दूसरा तीसरे को। तीसरा फिर पहले को। मतज हवा में रहता है। ,उसके साथ मरीज़ भी। डाक्टरों के हाथ से खेलते रहते हैं।
4.एक तो कठिन है राजनीति को पहचानना और तिस पर और कठिन है नेताओं के बयानों को समझना।
5. नेताओं के बयानों की खूबी यह है कि उनके कहे वाक्यों का दूसरा अर्थ चौबीस घंटे बाद पता चलता है। और उसी अख़बार से पता चलता है जिससे कल पहला अर्थ पता चला था।
6. जिस दिन नेता सनसनीख़ेज़ बयान दे उस दिन उसे पढ़ो,पर गम्भीरतापूर्वक मत लो। चौबीस घंटे प्रतीक्षा करो। या तो बयान बदलेगा या बयान के अर्थ बदलेंगे।
7. नेताओं के वाक्यों में शब्द मुझे अपनी ऐसी-तैसी कराते प्रतीत होते हैं।
8. अमेरिका के दूतावास पृथ्वी पर किस देश में नहीं होंगे। जहां भी हारे-भरे दरख़्त हैं, गरीब लोग हैं, राजनीति में भ्रष्टाचार की दूरगामी सम्भावना है,वहाँ यह एक दूतावास उस देश के पूर्ण नैतिक पतन की के प्रति आश्वस्त भाव लेकर खड़ा है।
9. इतिहास चाहे मोटी किताब की शक्ल में लिखा जाए या दैनिक अख़बार या साप्ताहिक पत्रिकाओं के लेख के रूप में, ज़िक्र केवल राजनेताओं की गतिविधियों और उठा-पटक का होता है।
10. हर चीज़ की उपयोगिता नहीं देखी जाती। कल से आप यह बहस करने लगेंगे कि ताश के खेल में जोकर का क्या महत्व।

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Tuesday, September 24, 2024

शरद जोशी के पंच -1



1. हिंदी पत्रकारिता का स्तर विगत वर्षों में काफ़ी उठ चुका है। तुम्हारे किए से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। तुम केवल जगह घेरोगे और पाठकों को बोर करोगे।
2. लेखकों को अपने विषय में बहुत भ्रम होता है।
3. इस तरह के भ्रम के लिए लेखक होना क़तई ज़रूरी नहीं। केवल भारतीय होना पर्याप्त है।
4. अज्ञान के साथ आत्मविश्वास का संगम हमसे क्या कुछ नहीं करवा सकता। देश और देशवासियों की प्रगति का यही रहस्य है।
5. निरीक्षक के घर जाकर मार्क्स बढ़वा लेने की स्वतंत्रता शिक्षा के संविधान के अंतर्गत सभी छात्रों तथा उनके पालकों को प्राप्त हैं।
6. जिसका मंगल अच्छा होता है वह पुलिस में चला जाता है। ख़राब होता है वह अपराध क्षेत्र में। दोनो शत्रु होकर भी मित्र हैं। अनैतिक अपराधी में कुछ नैतिकता होती है। नैतिक अपराधी में कुछ अनैतिकता। दोनों पार्टियों में मिलते हैं और उनके कैसेट बनाए जाते हैं।
7. इस देश में कब, कौन किस कारण पुरस्कृत हो जाए कह नहीं सकते।
8. पद्मश्री के लिए आपको थोड़ा पद्म होना पड़ता है। मतलब, देश के जीवन के दलदल,कीचड़ से ऊपर। शुद्ध प्रतिभाशाली बनकर जियो।
9. आज फ़रहाद जीवित होता तो शीरी तो उसे नहीं मिल पाती, पहाड़ काटने की पब्लिसिटी के बहाने श्रमवीर ज़रूर हो जाता।
10. श्रम भी पाखंड और दिखावे से जुड़ गया। अब प्रभावशाली नेता अपने चमचे को ले राष्ट्रपति के पास जाएँगे। इसने मेरे चुनाव में बहुत काम किया है, इसे श्रमश्री दे दीजिए।

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Monday, September 23, 2024

इंजीनियर्स डे पर नवल सिंह से बातचीत



Indu Bala Singh जी से अपन बहुत पहले से फ़ेसबुक के माध्यम से जुड़े हैं। अध्यापन पेशे से जुड़ी इंदु जी हमारी पोस्ट्स नियमित रूप से पढ़ती रहीं हैं। अपनी टिप्पणियों से हौसला आफ़ज़ाई भी करती रही हैं। इंदु जी के बेटे नवल सिंह ने NIT राउरकेला से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के बाद कुछ दिन एक पब्लिक सेक्टर में सेवाएँ दीं। इसके बाद आईआईएम इंदौर से एमबीए किया। आजकल तकनीकी क्षेत्र में अपना काम कर रहे हैं।
15 सितम्बर को इंजीनियर्स डे के मौक़े पर नवल किसी इंजीनियर से बातचीत करना चाहते थे। इंदु बाला जी ने मेरा नाम सुझाया। हमने बातचीत के लिए फ़ौरन हाँ कहा और बातचीत हुई।
इंजीनियर्स डे के मौक़े पर हुई इस अनौपचारिक बातचीत में हमारा स्कूल, कालेज, नौकरी और जीवन के विविध अनुभव शामिल हैं। इनमें जिन निर्माणियों में हमने काम किया (OFC, SAF, VFJ, OPF , OCFS) उनके भी कुछ-कुछ किस्से हैं। गुरुजी और वरिष्ठ जन और साथियों से जुड़े संस्मरण हैं। ये सब बिना तैयारी के जैसे -जैसे बातचीत के दौरान याद आता गया उसी रूप में हैं।
नवल सिंह से हुई इस बातचीत में माडरेटर की भूमिका निभाई इंदु बाला सिंह जी ने। उनके कुछ विचार भी हैं इस बातचीत में। उनका साफ़ मानना है कि इंजीनियर, डाक्टर और अन्य स्पेशल ट्रेनिंग पाए लोगों को आई टी के क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए। अपनी ही फ़ील्ड में काम करना चाहिए। दूसरी फ़ील्ड में जाकर वे सरकार और समाज का वह पैसा एक तरह से बरबाद करते हैं जो उनकी ट्रेनिंग में लगा।
और भी कई बातें हैं इस बातचीत में। समय निकाल कर सुनिए। सुनने के लिए नीचे दी हुई लिंक को क्लिक करें। मुझसे जुड़े तमाम पहलुओं के किस्से हैं इस बातचीत में। बातचीत की अवधि है लगभग एक घंटा 45 मिनट।
अगर बातचीत सुनते हैं तो अगर सम्भव हो तो अपनी राय भी बताएँ।
(आम तौर पर मैं टैग नहीं करता लेकिन इस पोस्ट को कई मित्रों को टैग किया है । उनको सुनवाने के लिये। जिनको टैगिंग पसंद नहीं है वो बता देंगे तो आगे से टैग नहीं करेंगे)

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Sunday, September 22, 2024

दोस्ती में जासूसी



कल लाजपत भवन में कवि सम्मेलन था। सुनने गए। गाड़ी खड़ी करने में समस्या की बात सोचकर गाड़ी मंगा ली। रैपिडो से। गाड़ी वाले ने बताया -'अब ओला, उबर की राइड कोई नहीं उठाता।रैपिडो वाले कमीशन नहीं लेते। उसी की सवारी उठाते हैं।'
गाड़ी बालक से उसके काम-धाम,परिवार , यारी-दोस्ती के बारे में बातचीत हुई। बालक गाड़ी का खुद मालिक है। कभी -कभी ही खुद चलाता है। ज़्यादातर समय के लिए उसने ड्राइवर रखा है। उसको 35 रुपया पर राइड के हिसाब से भुगतान करता है। लम्बी दूरी के लिए कुछ अतिरिक्त।
गाड़ी डाउन पेमेंट पर ली थी। तीन साल पहले। पिता ने दिए थे पैसे। क़ीमत वसूल हो गयी है। अभी ट्रेनिग कर रहा है तीन साल से मेडिकल फ़ील्ड में। नौकरी लगने पर गाड़ी बेच देगा। नई ख़रीद लेगा।
बालिकाओं से दोस्ती की बात पर बताया -'कई लोगों से हुई दोस्ती। हुई। कुछ दिन रही। छूट गयी। मेडिकल लाइन में सब ऐसा ही होता है।'
मैंने पूछा -'अभी जिससे दोस्ती है वह कितने दिन पुरानी है।'
'तीन साल से दोस्ती है। वह भी मेडिकल लाइन में आने की तैयारी कर रही है।' -बालक ने बताया।
मेडिकल लाइन मतलब मेडिकल सहायक, नर्स जैसे काम।
बालक ने बताया कि वह मेडिकल लाइन के सारे काम जानता है। कर लेता है। ट्यूब लगाना, बोतल लगाना और तमाम काम।
हमने पूछा -'तीन साल की दोस्ती तो काफ़ी पुरानी हो गयी। उस बालिका में क्या ख़ासियत है ऐसी जो दोस्ती तीन साल से जारी है?'
'उसका स्वभाव बहुत अच्छा है। हमारा ख़्याल रखती है। समझाती है। कोई भी समस्या हो तो फ़ौरन साथ खड़ी होती है। हम कोई चीज़ कहें लाती है।' -बालक ने बताया।
अपने स्वभाव के बारे में बताते हुए बालक ने बताया -'हमें ग़ुस्सा बहुत आता है। वह हमको समझाती है।कभी ग़ुस्से में लड़ाई भी हो जाती है उससे। लेकिन फिर बात शुरू हो जाती है।'
'मुलाक़ात महीने में एकाध बार होती है। फ़ोन पर बात होती रहती है। घूमने भी गए हैं साथ -साथ बाहर। घर वालों को 'शक' है हमारी दोस्ती के बारे में लेकिन पक्का पता नहीं है।'- बालक ने आगे बताया।
बालक के ग़ुस्से का नमूना रेलिंग क्रासिंग पर मिल गया। एक मोटर साइकिल वाले ने गाड़ी के बग़ल में अपनी गाड़ी लगा दी। बालक ग़ुस्से में उबल गया। हमने दोनों को समझाया तो मामला शांत किया।
'तुम्हारी दोस्त जब इतनी अच्छी है तो उससे शादी क्यों नहीं कर लेते?' -हमने पूछा।
'अभी शादी की बात कैसे करें? अभी तो ट्रेनिग पूरी होनी है। उसको भी पढ़ाई करनी है अभी। देखा जाएगा जब सेट हो जाएँगे।' -बालक ने बताया।
बालक की उमर 24-25 की है। अभी सेट होने में समय है तब वह सोचेगा आगे के बारे में।
इसके बाद बालक ने अपने बारे में और बताया -'वह मोबाइल के बारे में बहुत कुछ जानता है। मोबाइल हैकिंग़ की बेसिक ट्रेनिंग ली हुई है उसने।'
इसी सिलसिले में उसने आगे बताया -'अपनी दोस्त का मोबाइल भी उसने हैक कर रखा है। पिछले तीन साल से। उसका हर मेसेज, हर नोटिफ़िकेशन हम देख लेते हैं। हमारे अलावा और किसी से उसका सम्बन्ध/सम्पर्क नहीं है।इसीलिए हमको पता है उसका स्वभाव अच्छा है।'
हमने कहा -' यह तो ग़लत बात है। इसका मतलब तुमको अपनी दोस्त पर भरोसा नहीं है। क्या तुम्हारी दोस्त को पता है कि तुमने उसका मोबाइल हैक कर रखा है? दोस्ती में जासूसी तो अच्छी बात नहीं है।'
उसने बताया -'उसको पता नहीं है। हमने चुपचाप उसका मोबाइल हैक किया है।'
हमने उससे कहा -'ये तो और ग़लत बात है। तुमने ख़ुद कई लड़की दोस्त बनाए/ छोड़े। अपनी दोस्त की जासूसी करते हो बिना बताए। उसको पता चलेगा तो क्या सोचेगी तुम्हारे बारे में?'
बालक ने कहा -'आपकी बात सही है। लेकिन करना पड़ता है यह। मेडिकल लाइन में यह सब बहुत होता है। लड़कियाँ-लड़के आपस में बहुत जल्दी सम्बन्ध बना लेते हैं। इसके बाद उसने एक क़िस्सा बताया जिसमें कुछ दिन में ही सम्बंध बनकर टूट भी गए।'
दोस्त को पता चलने की बात पर उसने कहा -'उसको पता ही नहीं चलेगा। हमारे अलावा और कोई नहीं जानता इस बात को।'
हमने कहा -'पहली बात तो यह कि कोई जाने या न जाने बिना बताए किसी की जासूसी करना ग़लत बात है। दूसरी बात जैसे तुमने हमको बताया वैसे ही किसी न किसी तरह बात उस तक भी पहुँच जाएगी। यह ठीक नहीं है।'
और कोई बात होती आगे तब तक लाजपत भवन आ गया। हम उतर गए। वह चला गया। हम भी चले गए लाजपत भवन के अंदर कवि सम्मेलन सुनने। वहाँ कई प्रेम कविताएँ सुनाई कवियों ने। किसी में प्रेम में मोबाइल हैकिंग़ का ज़िक्र नहीं था। कवि अभी भी आखों, दिल, नज़रों, ख़ुशबू, तितली और दीगर मुलायम एहसासों से मोहब्बत का इज़हार कर रहे हैं।
यह लिखते समय याद आया कि दुनिया में अपनी हर ग़लत/सही बात को जायज़ ठहराने के लिए तर्क मौजूद हैं। मोहब्बत में जासूसी की बात सही ठहराने के लिए बहुत पहले कहा जा चुका है -'मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है।'
आपका क्या कहना है इस बारे में? 🙂

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Saturday, September 21, 2024

यादों की गलियों में



दो दिन पहले बैंक जाना हुआ। चुन्नीगंज चौराहे के पास। लौटते समय सोचा कुछ दूर पैदल चला जाए। पास ही बीएनएसडी इंटर कालेज है। मन किया कि ज़रा देखें जाकर कालेज। लेकिन कालेज के सामने सड़क खुदी हुई थी। गेट बंद। बताया गया कि घूम कर जाना होगा। हम पलट लिए।
पलटकर आगे चुन्नीगंज चौराहे के सामने सड़क पर घुस गए। इस सड़क पर पहली बार आए थे। दिमाग़ में यह धारणा थी कि पूरी मुस्लिम बस्ती है। लेकिन सड़क पर घुसते ही एक मंदिर दिखा। एक लड़का लपककर आया। चप्पल उतारकर बाहर से ही प्रणाम निवेदित करके चल दिया।
अग़ल-बग़ल भी तमाम दुकानें, मकान हिंदू नाम वाले दिखे। थोड़ा आगे एक और मंदिर, जो शायद ताज़ा बना था, दिखा। क़रीब दो-तीन सौ मीटर लम्बी सड़क के दोनों ओर घनी बस्ती थी।
यह लगा हम लोग अपनी धारणाओं के आधार पर सोच बना लेते हैं। उसी सोच के हिसाब से ज़िंदगी गुजर जाती है। कई बार पता ही नहीं चलता कि हमारी धारणा ग़लत है या सही।
एक घर के बाहर एक बच्चा सड़क की मिट्टी उठाकर एक छुटकी शीशी में भरता दिखा। बड़ी तल्लनीनता से चुटकी-चुटकी मिट्टी शीशी में भर रहा था। बच्चे को देखते हुए उसकी फ़ोटो खींचने की सोची। इस बीच बच्चा हमको देखकर सहम सा गया और शीशी, मिट्टी वहीं छोड़कर भागते हुए पास बैठी महिला की गोद में दुबक गया। महिला उसको अपने आँचल में छिपाकर दुलराते हुए मुस्कराने लगी।
सड़क पारकर तिराहे पर एक नल पर लोग पानी भर रहे थे। एक बच्ची हाथ में एक छुटकी सी मिट्टी की मूर्ति लिए नल के पानी से धो रही थी। पास ही ठेलिया पर भूट्टे बेचती महिला किसी ग्राहक के इंतज़ार में पंखा झल रही थी।
कर्नलगंज मोहल्ले में, बकरमंडी चौराहे की तरफ़ जाने वाली सड़क पर स्कूल की पढ़ाई के दौरान रोज़ आना -जाना होता था। क़ब्रिस्तान के पास सड़क किनारे पतंग का माँझा बनता था। सामने पंतग की दुकाने थीं। अब वहाँ न माँझा बनता है न पतंग की दुकाने हैं। क़ब्रिस्तान के अग़ल-बग़ल कई फूलों की दुकाने और होटल खुल गए हैं। बस्ती बहुत घनी हो गयी है।
एक बिरियानी वाले से हमने पतंग की दुकानों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वो उनके ही घर वालों की दुकाने थीं। पतंगे बिकनी बंद हो गयीं तो दुकानें भी बंद हो गयीं। उन लोगों ने होटल खोल लिए।
प्लेट में बड़े पतीले से बिरियानी निकालते देखकर हमने पूछा बिरियानी में गोश्त किसका है? उसने बताया -मुर्ग़े का। एक प्लेट में दो बोटी पड़ी थीं। सामने की दुकान पर बोर्ड लगा था - अफ़सर भाई की मशहूर चिकन बिरियानी। हमको बिरियानी खानी नहीं थी इसलिए आगे चल दिए।
आगे एक हज्जाम की दुकान पर बब्लू चश्मे वाले का इश्तहारी पोस्टर लगा था -'डा. द्वारा चश्मे का नम्बर फ्री निकलवाएं। घर बुलाकर चश्मा बनवाएँ।'
पोस्टर में मोबाइल नम्बर दिए थे। जिसको बनवाना हो सम्पर्क कर सकते हैं।
बकरमंडी की ढाल से बजरिया की तरफ़ जाने वाली सड़क गाड़ियों के लिए फिसलपट्टी सरीखी है। शहर की शायद ज़्यादा तीखी ढलान वाली सड़क है। स्कूल आते-जाते बकरमंडी में बकरों की बंधी भीड़ दिखती। यसूफ़ी साहब का जुमला -'इस्लाम के लिए सबसे ज़्यादा क़ुर्बानी बकरों ने दी है' पढ़ा तो मुझे बकरमंडी मैदान में बंधे बकरे याद आए।
बकरमंडी ढाल से उतरते हुए सड़क किनारे कई कारें दिखीं। सब पर फ़ॉर सेल का बोर्ड लगा था। नई दिखती कारें बिकने के लिए खड़ी थीं। मन किया दाम पूछा जाए लेकिन फ़िर नहीं पूछा।
आगे बजरिया थाना दिखा। थाना बजरिया देखते ही मुझे गाने का मुखड़ा याद आ गया -'बीच बजरियाँ खटमल काटे, कैसे निकालूँ चोली से।' हमको आज तक नहीं समझ आया कि बीच बाज़ार में खटमल कैसे काटता होगा। इस बात की चर्चा हमने 2008 में लिखी एक पोस्ट में की थी (लिंक टिप्पणी में)
बजरिया चौराहे के आसपास तमाम आटो से सम्बंधित तमाम दुकानें हैं। कई जगह स्कूटर मोटर साइकिल रिपेयर करते कारीगर दिखे। स्कूटर का मडगार्ड ठोंक पीट कर ठीक करते कारीगर।
बजरिया चौराहे पर ही आगे बाएँ तरफ़ एक मंदिर में सुरसा की मूर्ति है। स्कूल के दिनों में अपने दोस्त Ajay Tiwari अजय तिवारी (अप्पू) के साथ इधर से ही गुजरते थे। सुरसा की मूर्ति देखते ही भागकर मूर्ति की नाक में उँगली करते। बचपन की बातें याद करते हुए हम मूर्ति को पास से देखने गए।अब मूर्ति के चारो तरफ़ रेलिंग लग गयी है। रेलिंग के बाहर से मूर्ति तक पहुँचना मुश्किल है अब। कोई पहुँच भी जाए तो बचपन की हरकतें दोहराना ख़तरनाक है आज के दिन। पता नहीं किसकी भावनाएँ आहत हो जाएँ।
आगे हरसहाय जगदंबा सहाय कालेज है। इसके बड़े मैदान में कभी हम गांधी नगर से क्रिकेट खेलने आते थे। आसपास के न जाने कितने बच्चे खेलते थे। अब मैदान के चारों तरफ़ इमारतें खड़ी हो गयी हैं। मैदान का जैसे टेटुआ दबा दिया हो उसके आसपास की इमारतों ने। बरसात में मैदान एक तबेला सा लग रहा था। कुछ 'प्रैक्टिस नेट' जैसे लगे थे वहाँ। शायद कुछ लोगों को क्रिकेट सिखाने का काम होता होगा। कभी आम जनता के लिए खुले मैदान पर कुछ ख़ास लोगों का क़ब्ज़ा हो गया है।
देश की हर सम्पदा के साथ यही हो रहा है। आम लोगों की सम्पत्ति पर ख़ास लोगों का क़ब्ज़ा होता गया है। जेबी लोकतंत्र में यही मुमकिन है।
हरसहाय के पास 'बाबा भोकाल चाय' की दुकान पर चाय पी। आगे वह गली दिखी जहां हमारे बचपन के दोस्त संतोष बाजपेयी Santosh Bajpai रहते थे। हम लोग साथ स्कूल जाते। एक बार किसी बात पर हम लोगों में अनबन हो गयी। महीनों अबोला रहा हमारे बीच। बिना बातचीत किए हम साथ स्कूल जाते रहे। एक दिन संतोष की मम्मी ने ऊपर बुलाया। समझाया। हम लोगों का अबोला ख़त्म हुआ। पास ही प्रभात शिशु सदन में संतोष पढ़ते थे। वह स्कूल भी देखा।
आगे बनखंडेश्वर मंदिर के पास अप्पू के पिताजी की चाय दुकान थी । स्कूल जाते समय हम लोग उनकी दुकान से होकर जाते। चाचा जी गल्ले से निकालकर पैसे देते। हम लोग लौटते में या जाते में लेनिन पार्क के चौराहे के पास की दुकान से गरम जलेबी खाते। बाद में जब भी कहीं जलेबी खाई तब उस जलेबी का स्वाद याद आया। बचपन में खाई चीजों के स्वाद के आगे सारे स्वाद फीके हैं।
चौराहे से अनायास अप्पू की दुकान की तरफ़ मुड़ गए। अप्पू के बड़े भाई अशोक दुकान पर थे। कई वर्षों के बाद मुलाक़ात हुई। देखकर बोले -'हाफ़ पैंट पहनकर आते थे तुम। अब रिटायर भी हो गए। समय कितनी तेज़ी से बदलता है।'
सीसामऊ चौराहे पर भारी भीड़ थे। यहाँ लोग ख़रीदारी करने दूर-दूर से आते हैं। आगे एक किताब की दुकान दिखी। बाला जी बुक स्टोर। किताबों के ढेर लगे थे। पुरानी-नई सब तरह की किताबें। दुकान देखकर कोलकता के कालेज स्ट्रीट की दुकाने याद आ गयीं। कानपुर में इस तरह की पहली दुकान दिखी।
याद आया कि यहीं नुक्कड़ पर एक कम ऊँचाई के सरदार जी किताबें किराए पर देते थे। दस पैसे एक किताब के किराए में अनगिनत किताबें पढ़ी थीं उनके यहाँ से। अब वह दुकान और सरदार जी यादों में ही हैं।
लेनिन पार्क चौराहे से खड़े होकर गांधीनगर और आनंद बाग चौराहे की तरफ़ जाने वाली सड़क देखी। इसी सड़क पर स्थित एक मकान में हम इंटरमीडिएट के बाद तक रहे। आगे आनंद बाग के प्राइमरी स्कूल में कक्षा एक से पाँच तक पढ़े। अब स्कूल टूटकर नए मकान में तब्दील हो चुका है। मकान खंडहर हो चुका है।
लेनिन पार्क,में चार बड़े-बड़े मैदान थे। वहाँ आसपास के सैकड़ों बच्चे खेलते थे। अब पार्क सिकुड़कर किसी मकान का किचन गार्डन सरीखा हो गया। मैदान पर अगडम, बग़ड़म इमारतों का क़ब्ज़ा हो गया है। देखकर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता है कि कभी यहाँ कितना बड़ा पार्क रहा होगा। लेनिन के सोवियत रूस के भी तो ऐसे ही हाल हुए हैं।
आगे ज़रीब चौकी चौराहे पर भयंकर भीड़ थी। क्रासिंग खुली तो भीड़ ऐसे भागी जैसे किसी कांजी हाउस की दीवार टूटने पर उसमें क़ैद जानवर अकबका कर भागते होंगे। एक बुजुर्गवार स्कूटर पर आ रहे थे। भीड़ के आचरण से हलकान बुजुर्ग ने क्रासिंग के पास स्कूटर रोककर शायद हवा में डायलाग उछाला -'शहर के लोग जाहिल हैं।'
बुजुर्ग की बात सुनने के लिए किसी के पास समय नहीं था। पीछे से आती सवारियों के हार्न की आवाज़ों से मजबूर होकर वे अपने बाक़ी के डायलाग अपने मुँह में ही रखकर आगे बढ़ गए।
सड़क पार कर अपन ई रिक्शा में बैठकर विजय नगर चौराहे तक आए। फिर वहाँ से आर्मापर गेट तक। कुल किराया पड़ा -20 रुपया। जाते समय कुल किराया खर्च किया था 200 रुपए। आते समय पैदल, ई रिक्शे के गठबंधन के चलते 180 रूपये की बचत हुई। यादों की गली में घूमना हुआ सो अलग।

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Friday, September 20, 2024

बाबा भोकाली चाय

 


कल शहर से गुजरते हुए एक चाय की दुकान दिखी। साइन बोर्ड पर नाम था - 'बाबा भोकाली चाय।' हरसहाय जगदंबा सहाय कालेज के पास है दुकान। दुकान दिखी तो कहीं जा रहे थे। गाड़ी से। जगह नोट कर ली। तय किया कि लौटते समय या बाद में कभी यहाँ चाय पी जाएगी।
किसी भी व्यक्ति, वस्तु, दुकान, मकान, किताब, कहानी, उपन्यास का नाम उससे पहला परिचय होता है। आकर्षक और अलग नाम उसके बारे में जिज्ञासा पैदा करते हैं। कानपुर इस मामले में अनूठा शहर है। तरह-तरह के रोचक और अलग तरह के नाम और जुमले शहर में चलन में हैं। कानपुर की पंच लाइन ही अपने में अनूठी है -'झाड़े रहो क़लट्टरगंज।'
तमाम दुकानों के रोचक नाम उनके प्रति आकर्षण जगाते हैं। ठग्गू के लड्डू, जनवादी समोसा केंद्र और भी न जाने कितने नाम होंगे। लिखाई में कनपुरिया जुमले बाज़ी का हालिया नमूना मृदुल कपिल की बमबम पांडेय सीरीज़ की कानपुर की घातक कथाओं में मौजूद है।
लौटते में पहुँच ही गए बाबा भोकाली चाय की दुकान पर। हरसहाय कालेज के बाहर की फुटपाथ पर है दुकान। 1975 से 1981 के बीच पहले जीआईसी और बाद में बीएनएसडी में पढ़ने के दौरान इस जगह के सामने से निकलते थे। उन दिनों फुटपाथ चलने के लिए मुक्त थे। आज सारे फुटपाथ पर दुकानों का क़ब्ज़ा है। कोई चल नहीं सकता फुटपाथ पर। यह हाल लगभग पूरे देश में है।
बाबा भोकाली चाय की दुकान पर पहुँचकर एक चाय का आर्डर दिया। दुकान के मालिक गोविंद खड़े-खड़े चाय बना रहे थे। पीछे प्लास्टिक का स्टूल भी रखा था बैठने के लिए। लेकिन गोविंद खड़े-खड़े चाय बनाते रहे। बतियाते रहे।
दुकान के बारे में बताते हुए जानकारी दी गोविंद ने। दुकान 7 जुलाई, 1982 को शुरू हुई थी। आनंद जनरल स्टोर के नाम से। गोविंद के पिता स्व. अशोक कुमार ने दुकान शुरू की थे। पहले पिता चलाते थे दुकान। बाद में गोविंद भी बैठने लगे दुकान पर। 2016 में पिता का निधन हो गया। अब गोविंद ही देखते हैं दुकान।
1982 में जब दुकान खुली तब अपन कानपुर से बाहर इलाहाबाद चले गए थे पढ़ने। हास्टल के पीछे की सज्जन, मालन और दूसरी चाय की दुकानों की बेंच पर टांगों कैंची बनाते हुए बैठकर चाय पीते थे। उन दिनों चाय के दाम तीस पैसे थे।
हरसहाय से 1998 के स्नातक गोविंद ने चाय की दुकान दस साल पहले शूरु की। नाम खुद रखा - 'बाबा भोकाली चाय।'
पिछले दस साल में चाय वालों का भौकाल मचा हुआ है देश में । कानपुर में 'बाबा भोकाली चाय' का भौकाल है।
भौकाल का अर्थ होता है- रूतबा, जलवा, हनक। अक्सर यह बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये गए या बनावटी रुतबे यानी हनक के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इसका प्रचलन लखनऊ- कानपुर- इलाहाबाद के इलाकों में अधिक पाया जाता है।
पहले जनरल स्टोर और चाय की दुकान साथ-साथ चलते थे। बाद में जनरल स्टोर का धंधा मंदा होता गया। लोग सामान ले जाते, पैसा नहीं दे पाते। कोरोना काल में जनरल स्टोर बंद कर दिया।
चाय की दुकान ख़ूब चलती है। आसपास तमाम दुकानें हैं। उनमें काम करने वाले लोग और सड़क से गुजरते लोग ठहरकर चाय पीते हैं। दुकानों में काम करने वाले लोग छुटके, टुइयाँ कप में साझा करके चाय पीते हैं। एक चाय में कई लोग पी लेते हैं।
दुकान से खाने-पीने भर की आमदनी हो जाती है। दुकान लीज़ पर है। हरसहाय वाले किराया लेते हैं। 500 रुपए महीना किराया है दुकान का।स्कूल में भी चाय यहाँ से मंगाते हैं लोग।
'पैसा दे देते हैं स्कूल वाले?' हमारे यह पूछने पर गोविंद ने बताया -'हाँ, मैनजेमेंट अच्छा है कालेज का।'
एक चाय के दाम दस रुपए हैं। चाय का कुल्हड़ ही डेढ़ रुपए का आता है। चाय की लागत सात-आठ रुपए आती होती होगी। मतलब एक चाय पर डेढ़-दो रुपए मतलब 15-20% कमाई।
चाय पीकर पैसे दिए तो गोविंद ने चाय के बारे में राय पूछी -'कैसी लगी चाय?' हमने तारीफ़ की। वो खुश हुए। हमने दुकान के फ़ोटो लिए और बाहर आ गए।
बाहर निकलते हुए एक रिक्शे पर बैठे आदमी का चाय का आर्डर सुना- 'दो चाय देना। एक फीकी, एक शक्कर की। साथ में दो बन-मक्खन।'
'बन-मक्खन' को हम बहुत दिन तक 'बन्द-मक्खन' कहते रहे। ठीक भी लगता है। 'मक्खन', 'बन' के अंदर बंद हो जाने पर बनी हुई चीज़ 'बन्द-मक्खन' ही तो कहलाएगी।
रिक्शे पर बैठे आदमी ने आदमी ने पूछने पर बताया -'यहाँ चाय अच्छी है। कर्नलगंज से आते हैं पीने। वाज़िद नाम बताया उन्होंने।'
खड़े-खड़े और बात हुई तो वाज़िद जी ने बताया -' भोपाल से कानपुर आते हुए ट्रेन में लकवा मार गया। सत्तर साल उमर है। ठीक हो रहे हैं धीरे-धीरे।'
सत्तर साल के वाज़िद जी को हमने अपनी अम्मा का क़िस्सा सुनाया कि इसी उमर में उनको लकवा मारा था। उन्होंने ज़िद से कसरत करते हुए इसे ठीक कर लिया था।
हमारी बात सुनकर वाज़िद जी ने रिक्शे पर बैठे-बैठे हाथ फैलाकर और मुट्ठी भींचते-खोलते हुए कसरत शुरू कर दी। कहा -'हम भी खूब कसरत करते हैं।'
उनको कसरत करते देखकर हमको अपनी अम्मा याद आ गईं।
इस बीच रिक्शेवाला उनके लिए चाय और बन-मक्खन ले आया। वो खाते हुए चाय पीने लगे। उन्होंने रिक्शेवाले के लिए चाय-बन मक्खन का आर्डर किया था। उसको कहा -'तुम भी ले लो।'
रिक्शेवाले के लिए आर्डर देते हुए बोले -'अकेले खाते अच्छा नहीं लगता।'
हम उनको चाय पीता छोड़कर चल दिए।

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