Wednesday, March 05, 2014

राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है

ऊषा सुनहले तीर बरसते
जय लक्ष्मी सी उदित हुई।

मने कि सबेरे का संदेशा लाने वाली ऊषा रोशनी के सुनहले तीर बरसाते हुये जय लक्ष्मी सी उदित हो गयी है।
सबेरे-सबेरे धरती पर बिखरी किरणें ऐसे लग रही हैं जैसे कुंकुम अक्षत की तरह ऊषा ने उनको धरती पर छिटक दिया हो। सारी धरती पर अंधकार की खाद पाकर किरणें समूची धरती पर लहलहाने लगीं हैं। रोशनी की सिंचाई से किरणें गेंहूं की बालियों की तरह पुष्ट होकर लह-लहा रही हैं।

किरणों का जलवा देखकर जहां-तहां पेड़ों पर इकट्ठा पक्षी उनकी स्तुति करते हुये चहचहा रहे हैं। प्रशस्ति गान कर रहे हैं। सब अपने-अपने हिस्से की किरण वंदना करनें में मशगूल हैं। एक पक्षी तो इत्ती जोर से वंदना कर रहा है मनो वह किरणों की धमका रहा है। उनकी वंदनायें आपस में टकरा भी रही हैं। कुछ ऐसे जैसे प्राइम टाइम में बहस करने वाले भागीदार अपनी-अपनी हांकने में लगें हैं। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है सिवाय इसके कि वे कुछ हांकने में लगे हुये हैं।

धरती पर पसरी किरणों से अलग कुछ किरणें अभी भी हवा में टहल रहे हैं। नीले आसमान में चमकती सफ़ेद किरणें ऐसे दिख रही हैं जैसे कायनात अपने कपड़े धो रही है! किरणों का जमावडा देखकर लग रहा है जैसे कोई बहुत बड़े टब में घुले वासिंग पाउडर को ऊषा कस के फ़ेंट रही हो और उसकी चमकार छलक-छलक कर सारे आसमान में पसर गयी हो।

इस बीच ‪#‎सूरज‬ भाई मेरे कमरे में चाय पीते हुये टेलिविजन देख रहे हैं। जूनियर डाक्टर हड़ताल पर हैं। हाय-हाय कर रहे हैं। मुख्यमंत्री जी घोषणा कर रहे हैं दोषियों को सजा मिलेगी।

#सूरज भाई मुस्कराते हुये चाय पी रहे हैं। रामेन्द्र त्रिपाठी की कविता गुनगुना रहे हैं:
राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है,
इस मंडी न सारी मदिरा पी ली है।
सबेरा हो गया है। आप भी मुस्कराइये और काम पर लग जाइये।

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