Tuesday, April 12, 2016

इंसान कहे जाने वाले इंसान बहुत कम मिलते हैं



सुबह निकले तो बायीं तरफ़ सूरज भाई आसमान से झांक रहे थे। भक्क लाल मुंह। अब कहने को कह सकते हैं कि बायीं तरफ़ से झांकेंगे तो लाल ही दिखेंगे। तो क्या सूरज भाई वामपंथी हैं? लेकिन वामपंथी होते तो दिन भर बने रहते। कुछ देर बाद रंग बदल लेते हैं भाई जी।

आसमान के झरोखे से झांकते सूरज भाई ऐसे लग रहे थे मानों झरोखे से कोई झांक रहा हो। आसमान में निकलने से पहले जायजा सा ले रहे थे कि बाहर सब ठीक तो है न ! कानून व्यवस्था चौकस हो तब ही निकला जाये।

हम आज पैदल ही निकल लिये टहलने। साइकिल के अलगे पहिये में हवा किसी नदी के जलस्तर सी एकदम तल से लगी थी। उस पर सवारी करते तो रिम सड़क से टिक जाता। ट्यूब और टायर पिचक जाते। भरायेंगे हवा आज। एक ठो हवा भरने वाला पंप भी रखना होगा।

पुलिया पर दो लोग बैठे गाना सुन रहे थे। भजन बज रहा था - 'जय रघुनन्दन जय सियाराम।' पता लगा कि जबलपुर नगर निगम में काम करते हैं। ठेके पर सफ़ाई कर्मचारी हैं। ‍पिछले छह साल से लगे हैं। ड्यूटी का समय सुबह छह से दिन के दो बजे। उसके बाद खाली। रांझी में ड्यूटी है। साथी का इंतजार कर रहे हैं। आयेगा तब तीनों साथ जायेंगे। पांच हजार पाते हैं। खुद का घर है इसलिये खर्च चल जाता है। बोले - 'सब ऊपर वाला चलाता है।'

हमने सोचा ऊपर वाले के पास कितना काम है। सबके काम वही कराता है। सब वही चलाता है। आग वही लगवाता है। पानी वही बरसाता है। दंगा वही करवाता है, जिंदगी वही बचाता है।तगड़ी तन्ख्वाह पाता होगा। आलीशान बंगला होगा। घोड़ा-गाड़ी होगा। मिलता तो पूछते -अरे ऊपर वाले भाई जी, आपके यहां सातवां वेतन आयोग लागू हो गया क्या? डी.ए. कित्ता है? ग्रेड पे और वाहन भत्ता कित्ता है।

सामने वाली पुलिया पर मिसिर जी अपने साथी के साथ बैठे थे। बोले नींद नहीं आती ठीक से। रात को ठंडक लगी तो कन्धे अकड़ गये नमी के कारण। उठकर कूलर बंद किया तब सोये। छुट्टी की बात चली तो एक किस्सा सुनाया कि कैसे उनके बास ने एक दिन की छुट्टी के बदले दो दिन की छुट्टी दे दी थी ताकि तसल्ली से अपने घर-परिवार से मिल आयें।

छुट्टी की बात मजेदार है। कई तरह के बास देखे हैं हमने। कुछ कभी टोंकते नहीं। कई लोग ऐसे भी दिखते हैं जो एक-एक दिन की छुट्टी के लिये हफ़्तों लटकाते हैं।

पुलिया के पास ही दो महिलायें महुआ के पेड़ से सड़क चुआ हुआ महुआ बीनते हुये अपने पास के पालीथीन में भर रहीं थीं। सड़क पर ट्रैफ़िक बहुत कम था इसलिये वे महुआ ऐसे बीन रहीं थीं मानो अपने सड़क उनके घर का आंगन हो। दिल्ली की कोई सड़क होती तो इतनी तसल्ली से सड़क पार करना तक मुहाल हो जाता। लगता कोई गाड़ी ठोंक जाये उसके पहले पार हो जाओ।

दिव्यांग बुजुर्ग लाठी ठकठकाते हुये बगल से गुजरे और लपकते हुये गेट नंबर तीन की तरफ़ चल दिये। मांगने का समय हो गया था उनका।

चाय की दुकान पर एक बच्चा अपने साथ एक बुजुर्ग के साथ आया है। उसकी टी शर्ट पर लिखा है -Being Human . मानें इंसान होना। इंसान की बात से मुझे ये पंक्तियाँ याद आ गयीं:
इंसान कहे जाने वाले
इंसान बहुत कम मिलते हैं
पत्थर तो मन्दिर-मन्दिर हैं
भगवान बहुत कम मिलते हैं।

बालक ने बताया कि जिम से कसरत करके आया है। बारहवीं का इम्तहान दिया है। आई-टी. आई. करेगा अगर एडमिशन हो गया। इंटर के नंबरों के आधार पर चुनाव होता है।

कंचनपुर में रहता है तो उसके घर परिवार का कोई न कोई सदस्य किसी न किसी आयुध निर्माणी में जरूर काम करता होगा -मैंने सोचा। पता चला कि उसके दादा जी जीसीएफ़ फ़ैक्ट्री में काम करते थे।
कई पीढी पहले उसके पूर्वज आये होंगे जबलपुर। बताया कि उसके घर में डेढ सौ साल पुराना एक मंदिर है। काली मंदिर। हम सोचे बताओ हमसे एक किलोमीटर की दूरी पर इतनी पुरानी इमारत के अस्तित्व से अनजान हैं।
इस बीच बुजुर्ग भिखारी चाय की दुकान तक आ गये थे। चाय वाले ने एक ग्लास में चाय लेकर उसको दी। उसने चाय पी और मांगने के लिये गेट नंबर 3 की तरफ़ जाने लगा। एक आदमी उधर तरफ़ से आया और उसको पैसे देकर चला गया। लग रहा था कि उसकी मुट्ठी में कुछ और सिक्के हैं जिनको शायद वह मंगलवार को हनुमान मंदिर के बाहर बैठे भिखारियों में बांटने के लिये जा रहा था।
मिसर जी लौटते हुये मिले। बोले जाकर अखबार पढेंगे जाकर। हम भी चले आये। हमको भी रोजनामचा लिखना था।



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