Friday, April 29, 2016

तितली के दिन,फूलों के दिन

तितली के दिन, फूलों के दिन

कल सुबह पैदल टहलते हुए चाय की दुकान तक गए। पुलिया पर कुंडा के मिसिर जी के साथी अकेले बैठे थे। बताया -'मिसिर जी कुंडा गए हुए हैं।' हर साल जाते हैं। गाँव में जमीन है। बाग़-बगीचे हैं। गर्मी के मौसम में बाग़-बगीचा बेंचने जाते हैं।



सामने वाली पुलिया पर एक लड़का बैठा था। मोबाईल पर गाना बज रहा था। कोई देशभक्ति का गीत। अपने साथी का इंतजार कर रहा था।


चाय की दुकान वाले ने बताया कि उनका कोई मुकदमा चल रहा है। स्कूल में नौकरी करते थे। फैक्ट्री की तरफ से चलता था। कई हजार बच्चे पढ़ते थे। स्कूल के लेटरहेड में केंद्र सरकार द्वारा संचालित लिखा था। पैसे के लिए मुकदमा चला। जज रिटायर होने वाला था। बोला -'रिटायरमेंट के बाद हमको प्रिंसिपल बनाओ। हम तुम्हारे पक्ष में फैसला देंगे।' लोगों ने हामी भरी। कुछ फैसला दिया जिसका निस्तारण अभी सुप्रीम कोर्ट में होना बाकी है। कई करोड़ का एरियर मिलना है। 25 लोग शुरू किये थे मुकदमा। इस बीच कई लोग शांत हो गए।


झिलमिल सपनों वाले दिन
जज और सरकारी सेवा वाले लोग रिटायर होने के बाद काम के लालच में गड़बड़ निर्णय लेते हैं। कई विभागों के लोग रिटायर होने के बाद वहां नौकरी करने लगते हैं जो उनके विभाग में ठेके लेती रहती हैं।
मुंशी प्रेमचन्द की 'नमक का दरोगा' कहानी का यह पक्ष मुझे अखरने वाला लगता है कि ईमानदार दरोगा वंशीधर को जो सेठ बर्खास्त करवाता है बाद में वही सेठ वंशीधर को अपने यहां नौकरी देता है। क्या पता बाद में भूतपूर्व दरोगा जी सेठ जी के गड़बड़ कामों के सूत्रधार बन गए हों।
http://fursatiya.blogspot.in/2008/08/blog-post_3.html


'सुप्रीम कोर्ट में फ़ीस बहुत पड़ती है। मुकदमा कैसे लड़ते होंगे आप?' मेरे यह पूछने पर चाय वाले ने बताया कि संयोग ऐसा रहा कि हमको जो भी वकील मिले उन्होंने हमसे मुकदमें के लिए फ़ीस नहीं ली। और खर्च भी नहीँ मांगे।


लौटते हुए देखा दो बच्चियां एक बच्चे के साथ सड़क पर बात करते हुए चली जा रहीं थीँ। अचानक दोनों में से एक बच्ची और बच्चे में सड़क पर ही रेस हो गयी। थोड़ी दूर दौड़ में बच्ची ने बच्चे को पीछे छोड़ दिया। फिर तीनों लोग हंसते-खिलखिलाते आगे चले गए।


बच्ची को बच्चे के साथ दौड़ते और आगे निकलते मैंने सोचा कि कुछ दिन बाद जब यह बच्ची बड़ी होगी तो इस तरह बराबरी से लड़के के साथ घूमना, दौड़ना और आगे निकलना पीछे, बहुत पीछे छूट जाएगा। वह
मात्र बरास्ते लड़की होते हुये स्त्री में बदल जायेगी।


मेस में कुछ बच्चे खेल रहे थे। झूला झूल रहे थे। गोल झूले पर दो बच्चियां बैठी थी। झूला स्थिर था। हमने उनको झुला दिया। थोड़ा तेज किया तो एक बच्ची बोली -'मुझे तेज झूलने में चक्कर आते हैं।डर लगता है। ' दूसरी बोली--'तेरे को तो हर बात में डर लगता है।'


कक्षा 3 में पढ़ने वाली ये बच्चियां कंचनपुर में रहती हैं। झूला झूलते हुए बात करते हुए बताती हैं -'पहले भी आती थी। पापा आते थे साथ में। वो झुलाते थे। अब हम बड़े हो गए। सहेलियों के साथ आते हैं।'

बगल के दूसरे झूलों में दो बच्चियां झूल रही थीं। ऊँचे-ऊँचे पींग मारते हुए। हाईस्कूल में पढ़ती हैं बच्चियां। आजकल स्कूल बंद हैं। अब जून में खुलेंगे।


बच्चियों के फोटो खींचते हैं। एक में एक आगे है, दूसरे में दूसरी। दिखाते हैं तो बच्चियां खुशी का इजहार करती हैं। मुझे अनायास सुमन सरीन की कवितायेँ याद आ जाती हैं।

1. तितली के दिन,फूलों के दिन
गुड़ियों के दिन,झूलों के दिन
उम्र पा गये,प्रौढ़ हो गये
आटे सनी हथेली में।
बच्चों के कोलाहल में
जाने कैसे खोये,छूटे
चिट्ठी के दिन,भूलों के दिन।

2.नंगे पांव सघन अमराई
बूँदा-बांदी वाले दिन
रिबन लगाने,उड़ने-फिरने
झिलमिल सपनों वाले दिन।
अब बारिश में छत पर
भीगा-भागी जैसे कथा हुई
पाहुन बन बैठे पोखर में
पाँव भिगोने वाले दिन।

आपको भी कुछ याद आ रहा है क्या ये फोटो देखकर

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207962446232473

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